चीन को सबक जरूरी था

    दिनांक 19-जुलाई-2020   
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गलवान घाटी में मुंह की खाने के बाद चीन पीछे हट चुका है। भारतीय जवानों की बहादुरी और भारत की विदेश नीति के चलते आज चीन के साथ कोई खड़ा होने को तैयार नहीं है। विस्तारवादी चीन के लिए ऐसा सबक बेहद जरूरी था

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15 और 16 जून रात्रि को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए (जिसका मुखिया चीन का राष्ट्रपति होता है) के जवानों की गर्दन और रीढ़ की हड्डियां टूट जाएंगी कितनी विध्वंसक कार्रवाई भारतीय जवानों के द्वारा होगी चीन के लगभग 48 जवान मारे जाएंगे यह ड्रैगन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।
इस अप्रत्याशित मारकाट ने भारतीय कर्नल के ऊपर पीएलए के द्वारा हमले के बाद घातक रूप ले लिया। पीएलए या चीन यह हिमाकत बार-बार क्यों करता है क्योंकि उसकी उदंडी व्यवहार हमारी पूर्व की सरकारों ने बिगाड़ी हुई है। पूरे देश को इस बात का दुख है कि गलवान घाटी में हमारे 20 जवानों का बलिदान हुआ लेकिन चीन को हमारे जवानों ने औकात दिखा दी।
आज पूरा जवानों के साथ खड़ा है हमें अपने जवानों पर गर्व है कि उनके शौर्य के आगे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी टिक नहीं पाई और लगभग 48 पीएलए के शैतान मारे गए। चीन विश्व की दूसरी बड़ी आर्मी है ,जो ड्रैगन सपने लेता है कि वह विश्व शक्ति और मुखिया बनकर के पूरे विश्व पर आर्थिक और सामरिक रूप से राज करेगा । उसकी दुर्गति इस तरह से भारतीय जवान करेंगे उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा।
चीन के चरित्र में ही धोखा घड़ी है लेकिन भारत में भी कम्युनिस्ट और कांग्रेस पार्टी ने चीनी कुनैन की की गोली खाई हुई है।
चीन बहुत चलाक है वह अपनी वीचैट जो उसकी फेसबुक की तरह मीडिया ऐप है अपनी जनता और मीडिया से किसी भी तरह की सूचना को प्रचारित करने से बच रहा है , उसे डर है कि उसके जवानों की जो दुर्गति हुई है उसके देश में लोगों तक वह खबर पूरी सत्यता के साथ ना पहुंचे।
वैसे भी चीन इस सूचना या अपनी बदहाली को को कभी भी नहीं मानेगा कि उसके इतनी बड़ी संख्या में उद्दंड जवान मारे गए हैं ।
क्योंकि वह खबरों को छुपाने मैं हमेशा से ही चलाक और शातिर रहा है।
अभी युद्ध की संभावना आरंभिक दौर में हैं अभी भविष्य में क्या होगा कुछ भी कहना मुश्किल है आज चीन कह रहा है भारत की तरफ से हमें प्रताड़ित किया जा रहा है और भारत लाइन ऑफ कंट्रोल का उल्लंघन कर रहा है। यह हास्यास्पद है।
गलवान घाटी विवाद
1962 के युद्ध में नेहरू सरकार के अल्हड़ निर्णय के कारण भारतीय फौजियों को अपमानित होना पड़ा ,चीन की 80000 चीनी फौजों ने भारत के 10 से 15 हजार सैनिकों को बुरी तरह घेरा ,एक तरह से नरसंहार ही किया था ,क्योंकि उस समय की नेहरू सरकार ने भारतीय फौजों के साजो सामान आधुनिक हथियार ,सेना की वर्दी कपड़े यहां तक कि -30 डिग्री में कड़ाके की सर्दी में लड़ने के लिए जूते तक नहीं थे, । भारतीय जवानों को आवश्यक युद्ध संसाधनों से वंचित रखा।
नतीजा यह निकला पूर्वी तिब्बत के अक्साई चीन का 38000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ,चीन ने अपने कब्जे में ले लिया और गलवान नदी का उद्गम क्षेत्र भी अक्साई चीन ही है जो तिब्बत के रास्ते होते हुए श्योक नदी में जाकर मिलती है।
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के अध्यक्ष डॉ लोबसांग सांगे ने कहा गलवान शब्द ही लद्दाख की पृष्ठभूमि से आया है। चीनी प्रशासन का तो वहां पर वैसे भी कोई दावा बनता ही नहीं है।
तिब्बत पर 1954 में चीन ने पूर्ण रूप कब्जा किया लिया था ,वह इसकी योजना चीन 1950 से ही बना रहा था ।
क्योंकि तत्कालीन तिब्बत में चीन के खिलाफ लगातार आंदोलन चलते रहते थे ,अपनी स्वाधीनता स्वतंत्रता को लेकर।
तिब्बत की आजादी का आंदोलन आज भी चल रहा है। तिब्बत चीन के लिए दुखती रग है,
संपूर्ण तिब्बत को घेरने के लिए चीन ने शिंजियांग तिब्बत राजमार्ग जिसकी कुल लंबाई 2743 किलोमीटर है उसने इस राजमार्ग मार्ग का निर्माण 1950 में ही प्रारंभ कर दिया था ।
तत्कालीन भारतीय सरकार सोती रही और चीन पूर्वी लद्दाख (अक्साई चीन) के अंदर ही घुस कर के वह अपने राजमार्ग बना रहा था । भारत को वह हमेशा इस राजमार्ग से दूर रखने का प्रयास करता रहा है ।
मुझे इसका एक कारण यह भी लगता है लद्दाख और तिब्बत का संबंध सांस्कृतिक धार्मिक रूप से बहुत करीब रहा हैं । उदाहरण के लिए जैसे भारत का मिथिला क्षेत्र नेपाल के मिथिला क्षेत्र से सांस्कृतिक रूप से बहुत ज्यादा घुला मिला है लेकिन मिथिला का क्षेत्र दो हिस्सों में बटा हुआ है 52% नेपाल में है और 48% भारत में है,
भारत 1947 में आजाद हुआ आजादी के बाद से ही जवाहरलाल नेहरू हिंदी चीनी भाई भाई करते रहे और चीन की सेना ने 1962 में गलवान घाटी के आसपास बहादुर भारतीय फौजों का नरसंहार किया ,क्योंकि भारतीय जवानों के पास हौसला तो था लेकिन जरूरत के अनुसार ना भोजन था ना हथियार थे ना युद्ध नीति थी और युद्ध में कोई बैकअप भी नहीं था ।
देशवासियों को समझना होगा 1962 में नहीं चीन ने अक्साई चीन यानी पूर्वी लद्दाख के भारतीय क्षेत्र पर 1950 में ही कब्जा कर लिया था ।
भारत की तत्कालीन अल्हड़ सरकार को इसकी जानकारी ही नहीं लगी। मेरा शरीर सिहर उठता है तत्कालीन 1950 के आसपास कितने अनावश्यक और मस्तिष्क के कोढ़ी लोगों के पास भारतीय सरकार की कमान थी। परम पूजनीय बालासाहेब देवरस की पुस्तक सामाजिक "समरसता और हिंदुत्व" पुस्तक के 33 पृष्ठ पर श्री सीडी देशमुख जो अंग्रेजों के समय में आई सी एस अधिकारी रह चुके थे और प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू के कालखंड में वित्त मंत्री थे उन्होंने अपना आत्म चरित्र लिखा है और उसके कुछ पंक्तियां इस पुस्तक में आदरणीय बाला साहब देव रस जी ने उसका उल्लेख किया है उन्हें आज देश की जनता को समझना अत्यधिक जरूरी है ।
श्री सीडी देशमुख अपने आत्म चरित्र में लिखते हैं खासकर नौकरशाही के विषय को उन्होंने स्पष्ट किया है उन्होंने कहा कि अंग्रेज अपने शासनकाल में नौकरशाही का उपयोग स्वाधीनता आंदोलन को दबाने के लिए तो अवश्य करते थे ,लेकिन इतना होते हुए भी इस बात की चिंता करते थे कि प्रशासन कि मशीनरी भ्रष्ट ना हो । वह ईमानदार रहे परिश्रमी रहे किंतु देश के स्वाधीन होने के बाद जो लोग कुर्सी पर आकर बैठे हैं उन्होंने कुर्सी के लिए या व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए अथवा अपने दल के लिए सरकारी बाबू ओं का गलत काम करवाने की शुरुआत कर दी है ,इसलिए इन सरकारी नौकरशाही और प्रशासन की आदतें बिगड़ती जा रही है। श्री देशमुख के अनुसार कांग्रेस का भ्रष्ट आचरण उसकी सरकारों का नौकरशाही के लिए गलत इस्तेमाल 1962 में भारत की पराजय का मुख्य कारण बनी।
गलवान घाटी में 1962 में युद्ध का कारण भी शिनजियांग और तिब्बत का राजमार्ग था और आज भी चीन गलवान घाटी में बेहतर पोजीशन के लिए भारतीय सेनाओं से झड़प करता रहता है ।
यानी कि मैं यह प्रमाणित रुप से कह सकता हूं गलवान घाटी का विवाद तत्कालीन नासमझ अल्हड़ अक्षम सरकार ने 1950 से ही उत्पन्न कर लिया था। जिसे आज तक हम भुगत रहे हैं।
चीन 1950 से ही तिब्बत पर कब्जे की योजना बनाने के साथ-साथ भारतीय लद्दाख क्षेत्र में भी अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा था ,जिसकी सूचना उस समय की तत्कालीन सरकार को कई वर्षों तक लगी ही नहीं, क्योंकि भारतीय सेना को पेट्रोलिंग की कोई आवश्यकता ही नहीं है ऐसा सरकार मान कर के बैठी थी ।
भारतीय सेना कुछ करना चाहती थी तो सेना के पास अपने संसाधन ही नहीं थे। उनकी इस नासमझी का बहुत बड़ा खामियाजा हमें आज तक भुगतना पड़ रहा है। उसके पश्चात जब जब कांग्रेस की सरकारें रहीं 5000 वर्ग किलोमीटर जमीन और चीन द्वारा कबजा ली गई ,यानी कि अब लगभग 43000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में है। चीन भारतीय सीमा पर इतना आक्रमक क्यों है इसे समझने की जरूरत है ऑस्ट्रेलिया ने चीन के लिए कहा कि उसकी जांच होनी चाहिए कि चीन की तरफ से जानबूझकर कोरोना को पूरे विश्व में फैलाया गया है और भारत ने इसका समर्थन कर दिया। साथ ही क्रोना का खौफ पूरे चीन में फैल गया साथ ही विश्व के कई प्रमुख देशों ने चीन के साथ अपने आर्थिक संबंध तोड़ने का ऐलान जब प्रारंभ किया ,तो चीन में जितनी विदेशी कंपनियां थी उनमें हड़कंप मच गया और वह भारत खासकर उत्तर प्रदेश की ओर रुख करने पर ज्यादा विचार करने लगी स्वाभाविक है इससे चीन को बौखलाहट रही होगी ।
रक्षा विशेषज्ञ और मेजर जनरल पीके सहगल से बातचीत हुई उन्होंने बताया आज भारतीय सेना विश्व की एक बेहद व्यवहारिक ,,अनुशासित ,संगठित सेना है। अब यूपीए की सरकार नहीं है जो अक्सर सीपीएम के दबाव में रहती थी और सीपीएम का चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ क्या रिश्ता है यह विश्व की बिरादरी और भारतीय लोग अच्छी तरह से जानते हैं।
1962 के युद्ध में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी चीन के समर्थन में खड़ी हुई थी। बकौल पीके सहगल के अनुसार विश्व की किसी भी बेहतरीन सेना के पास युद्ध लड़ने के लिए दो तरफा क्षेत्रों में लगभग 40 दिन का बैकअप साजो समान हथियार गोला बारूद, बेहतरीन मारक क्षमता वाले एयरक्राफ्ट, बैलेस्टिक मिसाइलें, तोपे ,हथियार सप्लाई लाइन ,बेहतरीन हथियारों की तकनीक और शानदार सूचना तकनीक होनी चाहिए। लेकिन जब जब कांग्रेस की और यूपीए की सरकार रही तो सेना के पास 2 दिन का भी बैकअप युद्ध का साजो सामान आदि नहीं बचा था ।
इस तथ्य की पुष्टि सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में भी की थी इसका अर्थ है प्रमाणिक रूप से कहा जा सकता है कि यूपीए सरकार के समय में भारतीय सेना का मनोबल अत्यधिक और लगातार तोड़ा गया था।
यूपीए कांग्रेस की सरकार थी तब मात्र बोफोर्स तोप के अलावा कोई भी युद्ध हेतु साजो सामान का सौदा नहीं किया गया कितना हास्यास्पद था ।
2014 एनडीए की सरकार आने के बाद फ्रांस ,इजरायल ,और रूस के साथ कई तरह के सैन्य साजो समान हथियारों का सौदा किया गया अपाचे हेलीकॉप्टर ,रफाएल लड़ाकू विमान का सौदा , M777 अत्यधिक त्रिव मारक क्षमता वाले अमेरिकी विमान आदि के सौदा नई एनडीए की सरकार में ही हुए। सरकार और प्रधानमंत्री की भूमिका भारतीय सरकार और भारतीय सेना पर हमें गर्व होना चाहिए पूरी तरीके से सेना के साथ खड़ी हुई भारत की सरकार सेना का हौसला बढ़ाने के लिए पूरी तत्परता से कार्य कर रही है। स्वाधीनता के बाद लगभग हमें पांच युद्ध लड़ने पड़े हैं
बालासाहेब देवराज अपनी पुस्तक सामाजिक समरसता और हिंदुत्व में कहते हैं अगर युद्ध लड़ने का प्रसंग राष्ट्र के ऊपर आता है तो राष्ट्र को पूरी शक्ति के साथ युद्ध लड़ना चाहिए और विजय प्राप्त करनी चाहिए उसके कारण से अगर किसी दल या व्यक्ति के जीवन में कोई तनाव आता है तो उसे सहज सहर्ष सहन करना चाहिए ।यह राष्ट्र के प्रति के प्रत्येक दल और व्यक्ति का नागरिक कर्तव्य है।
अक्साई चीन से लेकर अरुणाचल तक भारतीय फौज में पूरी तरीके से चौकन्ना युद्ध की स्थिति तैयार हैं उन्होंने हाय अलर्ट किया हुआ है। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने देश को और सर्वदलीय बैठक में संपूर्ण विपक्ष को विश्वास दिलाया है भारतीय सीमा पर चीनी घुस नहीं पाए भारतीय फौजों ने बहादुरी से इसका जवाब दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार चीन का नाम लेकर स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत का राष्ट्र हित सर्वोपरि है पीएम मोदी ने कहा जिन क्षेत्रों में पहले हमारी नजर नहीं होती थी वहां पर हमारी नजर है जल, थल ,नभ में हम पूरी तरह से तैयार हैं। भारतीय सेना में आज जैसा शौर्य और चैतन्य है वह बहुत ही प्रशंसनीय है क्योंकि वर्तमान सरकार सेना के कार्य योजना और तकनीकी दृष्टि से भारतीय सेना को मजबूत दिशा की ओर सकारात्मक रूप से बढ़ाती हुई नजर आ रही है।
निष्ठा ,लक्ष्य ,निर्धारित कर्म अनुशासन ,एकाग्रता कृतज्ञता, कुशाग्रता कुछ खास प्रवृत्ति के ही राजनेताओं में एक साथ विद्यमान होते हैं। इसे किसी व्यक्ति को दिया गया ईश्वर का उपहार ही कहेंगे। भारत सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक जागरूकता कुशल रणनीति का प्रयोग ठीक से समय काल का अवलोकन करते हुए चीन जैसे दुस्साहसही शैतान को भी अपनी हाराकरी योजना को बदलते हुए अपने कदम को पीछे लेना पड़ा।
कांग्रेस पार्टी और विपक्ष की भूमिका
रक्षा विशेषज्ञ लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह ने कहा भारतीय सेना का मनोबल ऊंचा उठाने की आवश्यकता है। विपक्ष को सरकार पर ऐसे मामलों में सवाल नहीं खड़ा करना चाहिए। आखिर जब प्रधानमंत्री कुछ कहते हैं तो उनके पास अपने सेना के श्रेष्ठ सूचना के केंद्र इंफॉर्मेशन के रिसोर्सेज होते हैं सेना है इंटेलिजेंस के आधार पर वह कोई बयान देते हैं
अगर विपक्षी दल खासकर कांग्रेस इस समय सरकार पर सवाल खड़ा करते हैं तो एक तरह से वह दुश्मनों को फायदा पहुंचाने का काम कर रहे हैं और सीपीएम और कांग्रेस के बयानों को चीन मीडिया उठाती है और उसका इस्तेमाल मनोवैज्ञानिक युद्ध के लिए करती है।
लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह के अनुसार 15 जून और 16 जून की रात्रि भारतीय आर्मी का साहस शौर्य के बलिदान पर विपक्ष सवाल ना खड़ा करें हमारी फौजों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को विश्व में एक्सपोज कर दिया है ।
भारत की आज की बेहतरीन विदेश नीति सैन्य नीति के कारण चीन को अपने सैनिकों को लगभग 2 किलोमीटर पीछे अपने स्थानों पर ले जाना पड़ा अपने टेंट हटाने पड़े।
प्रधानमंत्री मोदी की कुशल रणनीति के कारण अमेरिका के पेसिफिक ओशन में नेवी को अलर्ट कर दिया। फ्रांस इंग्लैंड ऑस्ट्रेलिया ताइवान को अपने खेमे की तरफ लाकर प्रधानमंत्री मोदी ने एक वैश्विक नेता की छवि को बनाया है। और विश्व बिरादरी में चीन के साथ सिर्फ कंगाल पाकिस्तान खड़ा रह गया।
भारत के प्रधानमंत्री की चीन के लिए आर्थिक नाकेबंदी ,विदेश नीति कूटनीति, यह भारत की विजय है। देश की जनता का देशव्यापी ,चीन के उत्पादों को खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा है सरकार को उसे ठीक से समझने की और उस विषय पर और क्या बेहतर कर सकते हैं विचार करने की आवश्यकता है।
भारत की सबसे पुरानी दो पार्टियां कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मानसिक रोगी की तरह इनके नेता व्यवहार कर रहे हैं।
राहुल गांधी के ट्वीट बार-बार भारतीय सेना का मनोबल ही नहीं तोड़ते अपितु चीन को वह मनोवैज्ञानिक लाभ देने का प्रयास करते हैं।
आखिर 2008 के बीजिंग ओलंपिक में राहुल और सोनिया गांधी चाइना गए थे वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ उनका आखिर क्या समझौता हुआ था ।
यह हमें भी जानने का हक है। रही बात भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तो भारतीय लोकतंत्र में अंतिम सांसे लेती हुई वह चीन के कम्युनिस्ट जूतों को अपने सर पर पीटने के अलावा कुछ नहीं कर सकती है।
 
( लेखक भाजपा नेता हैं और दिल्ली में विधायक रहे हैं )