चलाइए साइकिल, सुधारिए सेहत

    दिनांक 02-जुलाई-2020
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पूनम नेगी
 इस कोरोना काल में साइकिल की बिक्री पूरी दुनिया में बढ़ गई है। कई देशों में चिकित्सक लोगों को सलाह दे रहे हैं कि नियमित साइकिल चलाएं। इसलिए लोग गाड़ी छोड़ साइकिल की सवारी करने लगे हैं। यह पर्यावरण के लिए भी शुभ संकेत है 
 
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आम लोगों की सवारी साइकिल
 

वर्तमान महामारी के समय में समूची दुनिया में अनेक तरह के बदलाव हो रहे हैं। इनमें एक बदलाव है लोगों का साइकिल की ओर तेजी से बढ़ता आकर्षण। गौरतलब हो कि आज दुनिया की ऊर्जा जरूरतों का 80 फीसदी हिस्सा पेट्रोल व डीजल से पूरा होता है। इसी का नतीजा है हवा में चारों ओर फैला जहर। वायु प्रदूषण से हर साल दुनिया में करीब 35,00000 लोगों की मौत होती है। 75 फीसदी तक वायु प्रदूषण वाहनों से फैलता है। ऐसे में साइकिल न सिर्फ वाहनों के धुएं से फैलने वाले वायु प्रदूषण से लड़ने में कारगार हथियार साबित हो सकती है, वरन शारीरिक सक्रियता बढ़ा कर हमारी रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत कर सकती है। ‘यूएन एनवायरनमेन्ट प्रोग्राम’ की हालिया रिपोर्ट कहती है कि साइकिल चलाकर न केवल प्रदूषण से असमय जाने वाली तमाम जिंदगियां बचाई जा सकती हैं, वरन् पर्यावरण को भी सुरक्षित किया जा सकता है। ‘द एनर्जी एण्ड रिसोर्स इन्स्टीट्यूट के अध्ययन में भी यह तथ्य सामने आया है कि अगर छोटी दूरी की यात्रा के लिए दोपहिया या चार-पहिया वाहनों के बजाए साइकिल को अपनाया जाए तो इससे हर साल 1.8 ट्रिलियन रुपए की बचत की जा सकती है। इसी तरह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी ‘लॉकडाउन’ के दौरान पर्यावरण में हुए आशातीत सुधार को देखते हुए सामाजिक दूरी को सुनिश्चित करने तथा शारीरिक व्यायाम को बढ़ावा देने के लिए साइकिल का इस्तेमाल बढ़ाने की अपील की है। इस ‘हरित सुधार’ के मुद्दे पर पिछले दिनों दुनिया के कई विकसित देशों के स्वास्थ्य-कर्मियों के 200 से अधिक संगठनों द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र जी-20 समूह के नेताओं को भेजा जाना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक नए वैश्विक आंदोलन की शुरुआत मानी जा सकती है।

20वीं सदी में था साइकिल का बोलबाला   
एक जमाना था जब भारत ही नहीं समूची दुनिया में साइकिल का बोलबाला था। 1947 में आजादी के बाद अगले कई दशक तक देश में साइकिल यातायात व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा रही। खासतौर पर 1960 से लेकर 1990 तक भारत में ज्यादातर परिवारों के पास साइकिल थी। यह व्यक्तिगत यातायात का सबसे ताकतवर और किफायती साधन माना जाता था। गांवों में किसान साप्ताहिक मंडियों तक सब्जी और दूसरी फसलों को साइकिल से ही ले जाते थे। दूध की आपूर्ति साइकिल के जरिए ही होती थी। डाक विभाग का तो पूरा तंत्र ही साइकिल के बूते चलता था। एक दौर था जब ‘डाकिया आया, डाकिया आया’ की अनुगूंज कभी गांव की गलियों से लेकर शहर के मोहल्लों तक सुनी जाती थी। डाकिया की पहचान सिर पर टोपी लगाए, कंधे पर चिट्ठियों का थैला टांगे और साइकिल पर सवार व्यक्ति के रूप में होती थी। लेकिन देखते-देखते वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। आज से तीन चार दशक पहले जब देश में कार, मोटरसाइकिल या स्कूटर तक आम आदमी की पहुंच नहीं थी तब ज्यादातर लोग अपने दफ्तर या कामकाज के ठिकानों तक जाने के लिए साइकिल का ही इस्तेमाल करते थे। इससे सेहत भी दुरुस्त रहती थी। मगर 1990 में देश में आर्थिक उदारीकरण के फलस्वरूप विकसित सुविधाभोगी समाज में धीरे-धीरे साइकिल का चलन कम होता गया और झूठी शान दिखाने वाले लोगों द्वारा साइकिल को गरीबों की सवारी समझा जाने लगा। पर साइकिल आज भी छोटे शहरों, कस्बों और गांवों में रहने वाले लोगों की जीवन रेखा बनी हुई है।

  ज्ञात हो कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश में अमेरिका में कोरोना वायरस ने जमकर कहर बरपाया है। यह अभी भी जारी है। ऐसे में इस वायरस से बचने के लिए लोग सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करने से बच रहे हैं। बड़ी संख्या में लोगों ने ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के पालन के लिए साइकिल चलाना शुरू कर दिया है। मिलान, जेनेवा, ब्रुसेल्स और लंदन जैसे दुनिया के अनेक अत्याधुनिक शहरों ने अपनी सड़कों को साइकिलों के अनुकूल बनाने के लिए भारी निवेश का फैसला लिया है ताकि   ‘सोशल डिस्टेंसिंग’ के साथ सेहत भी दुरुस्त रख सकें। अमेरिका व इंग्लैंड में डॉक्टर मरीजों को दवाओं के साथ रोजाना 30 मिनट साइकिल चलाने का लिखित परामर्श दे रहे हैं। अमेरिका में पिछले तीन माह के दौरान साइकिलों की बिक्री में 1970 के तेल संकट के बाद से सबसे बड़ा उछाल दर्ज किया गया है। न्यूयॉर्क ने 322 किमी सड़कें सिर्फ पैदल और साइकिल यात्रियों के लिए तय कर रखी हैं। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, ब्रिटेन और फ्रांस में भी साइकिलों की बिक्री में काफी इजाफा हुआ है। इटली में साइकिल बिक्री के लिए सरकार की तरफ से प्रोत्साहन दिया जा रहा है। फ्रांस की राजधानी पेरिस को दुनियाभर की साइकिलिंग राजधानी बनाने के लिए 1.5 करोड़ यूरो की योजना बनाई गयी है। यूरोप के कई देशों में कार्यालय के लिए साइकिल के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए ‘साइकिल टू वर्क स्कीम’ लागू की गयी है। मार्केट रिसर्च फर्म एनपीडी ग्रुप का कहना है कि कोरोना वायरस के चलते विश्व बाजार में लेजर बाइक की बिक्री 121 प्रतिशत, इलेक्ट्रिक बाइक की बिक्री 85 प्रतिशत, फिटनेस बाइक की बिक्री 66 प्रतिशत, तो वहीं बच्चों की साइकिल की बिक्री 59 प्रतिशत तक बढ़ गई है।


पहिया व साइकिल
माना जाता है साइकिल का आविष्कार 19वीं सदी के पूर्वार्ध (1839) में यूरोप में स्कॉटलैंड के एक लुहार किर्क पैट्रिक मैकमिलन ने किया था, मगर पहिए का आविष्कार हमारे वैदिक भारत की ही देन है। दुनिया के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में चक्र, रथ व विमानों का विस्तृत उल्लेख मिलता है। पहिए के आविष्कार के बाद ही साइकिल और फिर कार व विमान तक का का सफर तय हुआ तथा इससे मानव जीवन को नयी गति मिली। कहा जाता है कि आधुनिक साइकिल का आविष्कार होने से पूर्व यह अस्तित्व में तो थी पर इस पर बैठकर जमीन को पांव से पीछे की ओर धकेलकर आगे की तरफ बढ़ा जाता था। मैकमिलन ने इसमें पहिए को पैरों से चला सकने योग्य व्यवस्था की। बाद में इसकी बढ़ती मांग को देखते हुए इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका के यंत्र निर्माताओं ने इसमें अनेक महत्वपूर्ण सुधार कर 1872 में इसे आधुनिक रूप दिया।

 अपना भारत भी इस बदलाव से अछूता नहीं है। बड़ी संख्या में लोग सार्वजनिक परिवहन के परंपरागत साधनों के स्थान पर परिवहन के सुरक्षित विकल्प के रूप में साइकिल को अपना रहे हैं। साइकिल की मांग तेजी से बढ़ रही है। कुछ काम-काज पर जाने के लिए साइकिल ले रहे हैं, तो कुछ लोग अपनी सेहत को बरकरार रखने के लिए तो कुछ बाजार आदि की दैनिक जरूरतों के लिए। कैब और आटो से जाने वाले लोग भी कोरोना महामारी के डर से साइकिल पर चलना पसंद कर रहे हैं। ऊपर से डीजल व पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों ने भी लोगों को साइकिल की ओर आकर्षित किया है।

 1978 में शुरू हुए दिल्ली के सबसे पुराने बाजार झंडेवालान साइकिल मार्केट के कारोबारी आर.के. अग्रवाल का कहना है, ‘‘कोरोना संकट के दौरान साइकिल की मांग पहले से काफी बढ़ने लगी है, क्योंकि संक्रमण के भय से लोग जिम व पार्कों में जाने व सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने से बच रहे हैं।’’ झंडेवालान साइकिल एंड टॉय मार्केट एसोसिएशन के सचिव विपिन का कहना है, ‘‘इन दिनों इस बाजार में साइकिल की बिक्री 25 फीसदी बढ़ गई है। लॉकडाउन से पहले रोजाना करीब 50,000 की बिक्री थी, लेकिन अब 75,000 हो गई है। इस बाजार में 2,500 रु. से लेकर 30,000 रु. तक की साइकिल मिलती है। बच्चे और छात्रों से ज्यादा बड़ी उम्र के लोग साइकिल खरीदने आ रहे हैं। इस समय ज्यादातर बड़ी साइकिलें बिक रही हैं। पिछले दो दशक में साइकिल की मांग इतनी कभी नहीं देखी गई जितनी कोरोना संकट के इस दौर में देखी जा रही है।’’ साइकिल की लोकप्रियता का यह आलम दिल्ली ही नहीं, मुंबई व देश के अन्य महानगरों व शहरों में भी दिखाई दे रहा है। बदलते परिवेश के साथ साइकिल ने अपनी उपयोगिता को बदला है। कभी लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने वाली साइकिल अब स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने वाले लोगों की पहली पसंद बन चुकी है। बाजार में ऐसी साइकिल 5,000 रु. से लेकर 1,50,000 रु. तक में मौजूद है। लिहाजा साइकिल की सुरक्षा के लिए कई कंपनियां बीमा भी कर रही हैं।

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साइकिल चलाते केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी। इनकी सादगी का मिसाल दी जाती है।
 
साइकिल को बढ़ावा देती फिल्में
भारतीय हिंदी फिल्मों ने भी साइकिल को खूब बढ़ावा दिया है। श्याम-श्वेत फिल्मों के दौर में फिल्मों की नायिका को खूब साइकिल चलाते दिखाया गया है। 1959 की फिल्म ‘अनाड़ी’ में नूतन, ‘पड़ोसन’ में सायराबानो, ‘अपना घर’ में नंदा व ‘मैंने कसम ली’ में मुमताज आदि अनेक नायिकाओं को साइकिल पर फिल्माया गया था। यह सिलसिला आज भी बरकरार है। अनिल कपूर ने ‘1942 ए लवस्टोरी’ में और शाहिद कपूर ने ‘जब वी मेट’ और ‘उड़ता पंजाब’ में साइकिल की सवारी की। ‘बर्फी’ फिल्म में इलियाना डिक्रूज रणवीर कपूर के साथ साइकिल पर आगे बैठे दिखीं, तो ‘सुई धागा’ में अनुष्का शर्मा, वरुण धवन के साथ साइकिल की पीछे की सीट पर। फिल्म ‘पीके’ में आमिर खान व ‘पीकू’ फिल्म में अमिताभ बच्चन और ‘बजरंगी भाईजान’ में सलमान खान तथा ‘पैडमैन’ में अक्षय कुमार ने खूब साइकिल चलायी।

 गौरतलब हो कि भारत ही नहीं, दुनियाभर के फिल्मकारों ने साइकिल पर केद्रित फिल्में बनाई हैं। साइकिल पर बनी बेहतरीन फिल्मों की बात करें तो इटेलियन फिल्म ‘बाइसिकल थीव्ज’ का नाम सबसे पहले लिया जाता है। दुनिया की महानतम फिल्मों में शुमार इस फिल्म की कहानी एक साइकिल के खरीदे जाने, खो जाने और एक पिता व बेटे द्वारा जुनून की हद तक उसकी तलाश पर केंद्रित है।
सादगी व ईमानदारी की मिसाल केंद्रीय मंत्री प्रताप चंद्र सारंगी आज भी साइकिल से चलते हैं। इसी तरह लखनऊ में ‘पेड़ वाले बाबा’ के नाम से मशहूर चंद्रभूषण तिवारी भी साइकिल की ही सवारी करते हैं।

गत 3 जून को विश्व साइकिल दिवस के मौके पर हीरो समूह द्वारा साइकिल की सवारी को बढ़ावा देने के लिए एक अभियान की शुरुआत की गई। ‘रोड पे दिखेंगी तभी तो चलेंगी’ नामक इस अभियान के जरिए केंद्र एवं राज्य सरकारों से शहरी सड़कों को साइकिलों के लिए अनुकूल बनाने अपील की गई। हीरो मोटर्स कंपनी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक पंकज मुंजाल का कहना है, ‘‘भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे समय में दोबारा शुरू हुई है, जब कोरोना का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सड़क सहित हर स्थान पर सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। शहरी संरचना को साइकिलों के लिए अनुकूल बनाने की आवश्यकता है।’’
कहते हैं न कि इतिहास अपने आपको दोहराता जरूर है। वर्तमान के कोरोना संकट ने यह कर दिखाया है। साइकिल का वही दौर अब फिर लौटता दिख रहा है।


साइकिलों का देश नीदरलैंड
नीदरलैंड एकमात्र ऐसा देश है जो साइकिलों के देश के नाम से जाना जाता है। यहां की सबसे खास बात है यहां के लोगों का साइकिल प्रेम। यहां की सरकार ने देश की प्राकृतिक सुंदरता को बचाने के लिए साइकिलों को काफी प्रोत्साहित किया है। खास बात है कि केवल आम नागरिक ही नहीं, बल्कि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रूट तक साइकिल से ही दफ्तर जाते हैं। नीदरलैंड का एम्स्टर्डम शहर ‘सिटी आफ साइक्लिस्ट’ के नाम से जाना जाता है। यहां तकरीबन एक चौथाई सफर साइकिलों से ही तय किया जाता है। यहां 22,000 मील का रास्ता साइकिल के लिए बनाया गया है। इसी तरह कोपेनहेगेन को भी ‘साइकिल फ्रेंडली’ माना जाता है। यहां की तकरीबन 52 प्रतिशत आबादी नियमित साइकिल चलाती है। इसी कारण तेल की बढ़ती-घटती कीमत इन देशों को परेशान नहीं करती।

साइकिल चलाएं, निरोगी रहें 
आधुनिक शोधों में साबित हुआ है कि अगर आप स्वस्थ व निरोगी रहना चाहते हैं तो नियमित साइकिल चलाएं, इसे अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बना लें। अमेरिका के स्टैमनफोर्ड विश्वविद्यालय में साइकिल के बहुआयामी लाभों पर हुए विस्तृत शोध के नतीजे खासे उत्साहजनक हैं। यह अध्ययन करने वाले स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिदिन न्यूनतम 30 मिनट साइकिल चलाने से न सिर्फ बढ़ता वजन नियंत्रित होता है वरन दिल की सेहत भी दुरुस्त रहती है। मधुमेह के रोगियों के लिए भी यह काफी उपयोगी है। शोधकर्ताओं के अनुसार रोजाना साइकिल चलाने से मांसपेशियां तो मजबूत होती ही हैं, रक्त कोशिकाओं और त्वचा में पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन पहुंचने से लंबे समय तक शारीरिक सक्रियता बनी रहती है। साइकिल चलाते समय आप सामान्य की तुलना में गहरी सांसें लेते हैं और ज्यादा मात्रा में आक्सीजन ग्रहण करते हैं जिसके कारण शरीर में रक्त संचार बढ़ने से फेफड़ों की कार्यक्षमता में भी सुधार आता है। इससे शरीर में मौजूद अतिरिक्त वसा भी गलने लगती है और शरीर सुडौल बनता है, शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होने से बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। इस शोध के अनुसार जो लोग सप्ताह में 5 दिन में कम से कम आधा घंटा साइकिल चलाते हैं उनके शरीर की कोशिकाएं अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा सक्रिय होती हैं और वे दूसरे व्यक्ति की तुलना में 50 प्रतिशत कम बीमार पड़ते हैं। साथ ही साइकिल चलाने वालों की याद्दाश्त भी अन्य लोगों की तुलना में 15 प्रतिशत ज्यादा होती है।