पाकिस्तान: सभ्यता पर प्रहार

    दिनांक 20-जुलाई-2020   
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पाकिस्तान से बड़ा मूर्ख देश कौन हो सकता है ! जिससे उसकी आर्थिक बदहाली दूर हो सकती है, संरक्षित करने की बजाए उसे ही तहस-नहस करने में लगा है। मजहबी कट्टरपंथी भी इस्लाम विरोधी बताकर इसे नष्ट करने में लगे हैं। सरकार की बेरूखी और कट्टरपंथी मानसिकता रखने वालों के कारण ही खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में फिर एक प्राचीन बौद्ध प्रतिमा नष्ट कर दी गई।

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पाकिस्तान से बड़ा मूर्ख देश कौन हो सकता है ! जिससे उसकी आर्थिक बदहाली दूर हो सकती है, संरक्षित करने की बजाए उसे ही तहस-नहस करने में लगा है। मजहबी कट्टरपंथी भी इस्लाम विरोधी बताकर इसे नष्ट करने में लगे हैं। सरकार की बेरूखी और कट्टरपंथी मानसिकता रखने वालों के कारण ही खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में फिर एक प्राचीन बौद्ध प्रतिमा नष्ट कर दी गई। यह 1,700 वर्ष पुरानी बताई जा रही है। हालांकि इसके आरोपी मौलवी सहित चार लोग गिरफ्तार कर लिए गए हैं। बावजूद इसके पाकिस्तानी सरकार के हाथ से एक दुर्लभ वस्तु निकल गई। खैबर पख्तनूख्वाह सम्राट अशोक के समय बुद्ध का महत्वपूर्ण केंद्र था। 1929 में इस प्रांत के हरिपुर में खुदाई से यह साबित हो गया था।

बाद में स्वतंत्रता संग्राम और फिर इलाके में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ने से खुदाई बीच में ही रोक दी गई। 88 वर्ष बाद यानी 2017 में जब इलाके की फिर खुदाई कराई गई, तो वहां से कई दुर्लभ अवशेष मिले। बावजूद इसके पाकिस्तान सरकार क्षेत्र को संरक्षित करने में विफल रही है। परिणामस्वरूप बुद्ध प्रतिमा तोड़ने का ताजा मामला सामने आया।

पख्तूनख्वा के मर्दान जिले के तख्तबाई तहसील में एक खेत में मकान बनवा रहे स्थानीय मौलवी को जब नींव की खुदाई में बुद्ध प्रतिमा मिली तो उसने इसे इस्लाम विरोधी प्रतीक बताकर मजदूरों की मदद से नेस्तनाबूद करा दिया। इसे तोड़ने के क्रम में जब दिक्कत आई तो हथौड़ा लेकर वह खुद प्रतिमा तोड़ने में लग गया। इससे संबंधित एक वीडिया खूब वायरल हो रहा है, जिसमें मौलवी भी मजदूर के साथ प्रतिमा तोड़ता दिखाई दे रहा है। खैबर पख्तूनख्वा के पुरातत्व विभाग के निदेशक अब्दुल समद खान कहते हैं कि प्रतिमा गंधार सभ्यता से संबंधित थी। अनुमानतः 1700 पुरानी रही होगी। उसके टुकड़े को इकट्ठाकर उसके प्राचीन महत्व को समझने की कोशिश की जा रही है। इसी तरह पिछले महीने भी गिलगित-बाल्टिस्तान में एक बौद्ध स्मारक पर तोड़-फोड़ की गई थी, जिस पर भारत ने ऐतराज जताकर पाकिस्तान की तमाम हिंदू एवं बौद्ध अवशेषों को सुरक्षित रखने की मांग की थी।

  पाकिस्तान भले 1947 में भारत से अलग हो गया, पर सनातन, बौद्ध, जैन एवं सिख धर्म-पंथ से संबंधित कई महत्वपूर्ण स्थल आज भी वहां मौजूद हैं। उन स्थलों को संरक्षित और पर्यटलन स्थलों के तौर पर विकसित करना तो दूर उन्हें लावारिस छोड़ दिया गया है। अराजक तत्व इन्हें निशाना बनाते रहते हैं। कुछ दिनों पहले ननकाना साहब गुरुद्वारे पर हमला कर उसे क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की गई थी। इसी तरह कट्टरपंथियों ने अयोध्या आंदोलन के समय पाकिस्तान के तकरीबन सारे मंदिर ध्वस्त या क्षतिग्रस्त कर दिए गए। 2017 में खैबर पख्तूनख्वा में खुदाई के समय भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मुद्रा में प्रतिमा सहित 500 प्राचीन अवशेष मिलने थे। इस पर तत्कालीन सरकार ने इससे संरक्षित करने का ऐलान किया, पर उस पर अमल नहीं। मौजूदा प्रधानमंत्री इमरान खान इसी प्रांत से हैं। तब उन्होंने पाकिस्तान में सरकार बनने पर इलाके को महत्व देने और पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने का वादा किया था। इमरान खान करतारपुर गलियारा खोलने के समय भी पाकिस्तान के 400 मंदिरों के जिर्णोद्धार की बात कर चुके हैं। मगर अमल नहीं किया है। सत्तारूढ़ दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के सीनेटर एवं मानवाधिकार मामलों के संसदीय सचिव लालचंद माल्ही कहते हैं कि इसके लिए सरकार के पास बजट नहीं है, ऐसे में प्राचीन अवशेषों को सुरक्षति करने में दिक्कत आ रही है। हालांकि वह भी मानते हैं कि ऐसे स्थलों को पर्यटन के तौर पर विकसित कर पाकिस्तान अपनी आर्थिक दशा बहुत हद तक सुधार सकता है।
 

1400 मंदिरों का रास्ता बंद किया
फ्रांसीसी शोधकर्ता मिशेल बोइविन अपनी पुस्तक- सिंध हिस्ट्री एवं रिप्रेजेंटेशंस में पाकिस्तान के लाकी के बारे में लिखा है कि पाकिस्तान के सिंध प्रांत का यह पूरा क्षेत्र कभी शिवमय हुआ करता था। बलूचिस्तान के हिंगलाज माता मंदिर तक तीर्थयात्रा करने वाले इधर से गुजरते समय में इस इलाके में अपना काफी समय ध्यान, साधना और पूजा-पाठ में बिताते थे। पहाड़ों की गुफाओं में शिवभक्त साधू-संत का डेरा हुआ करता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रावृतांत के अनुसार, सातवीं शताब्दी में लाकी में 273 मंदिर थे, जिनमें से 235 केवल शिव जी के थे। 16वीं शताब्दी में इसे दुनिया के नक्शे पर लाने वाले ब्रिटिश विद्वान और यात्री रिचर्ड बर्टन की मानें तो पूरे विश्व में लाकी इकलौता स्थान था, जहां इतनी बड़ी संख्या में शिवालय हुआ करते थे। मगर यह सब  इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह गया है। पाक सरकारों की गलत नीतियों और कट्टरपंथियों के कुदृष्टिकोण के कारण लाकी के अधिकतर शिवालय एवं गुफाएं अवशेष में बदल चुके हैं। यहां तक पहुंचने का इकलौता रास्ता भी जर्जर और खतरनाक है।  पाकिस्तान के ऐतिहासिक मंदिरों पर शोध करने वाली पत्रकार रीमा अब्बासी की मानें तो मंदिरों को देश की धरोहर न मानकर इसे इसके प्रति द्वेष रखने के चलते इनके बचे-कुचे अवशेष भी मिटने के कगार पर हैं। पाक के संवदेनशील प्रांतों खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अब गिनती के मंदिर और धर्मस्थल बचे हैं। लाहौर में केवल दो मंदिर है, जिनमें से एक का कपाट बंद रहता है। लाहौर में पिछले कुछ वर्षों में एक हजार मंदिर नेस्त-नाबूद किए गए हैं।


पाकिस्तान में कई मंदिरों का रास्ता बंद है। यानी मंदिर में कोई जाना भी चाहे तो नहीं जा सकता। पाकिस्तान सरकार की अदूरदर्शिता के कारण यह नौबत आई है। भारत-पाक बंटवारे के बाद भारत जाने वाले हिंदुओं  की संपत्ति दस हजार रुपये की कीमत में देने की योजना 1961ं लागू किए जाने पर हिंदुओं के धर्मस्थलों को तो इससे अलग रखा गया। मगर योजना में त्रुटि के चलते इसके आसपास की हिंदुओं की तमाम संपत्तियां दस-दस हजार रुपये में आवंटित कर दी गई। इसके बाद हिंदुओं के धर्मस्थलों के करीब मकान, गोदाम बना दिए गए, पर वहां जाने का रास्ता नहीं छोड़ा गया। रास्ता बंद कर देने से रावलपिंडी के पुराना बाजार स्थित 1929 में निर्मित यमुना देवी मंदिर में श्रद्धालु अनाज की बोरियों पर चढ़कर मंदिर के छत से अंदर जाते हैं। बीबीसी उर्दू की पत्रकार रहीं नुखबत मलिक के मुताबिक, सबसे पहले ऐसा एक मामला 2015 में तब प्रकाश में आया जब खैबर पख्तूनख्वा के कर्क जिले के गांव टेरी स्थित एक प्रसिद्ध संत की समाधि के चारों ओर मकान बनाकर वहां पहुुंचने का रास्ता अवरुद्ध कर दिया गया। समाधि में एक कृष्ण मंदिर था, उसे तोड़ कर वहां बिल्डिंग खड़ी कर दी गई। 
   

पाकिस्तान हिंदू परिषद के अध्यक्ष एवं नेशनल असेंबली के सदस्य रहे डॉक्टर रमेश वांकोआनी ने इस मसले को सुप्रीम कोर्ट और तमाम बड़े राजनेताओं के दरबार में उठाया, पर कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल का दावा है कि देश में ऐसे 1400 मंदिर और धर्मस्थल हैं, जहां तक पहुंचना अब संभव नहीं। इनके रास्ते बंद कर वहां गोदाम या पशु बाड़ा बना दिया गया है।  पंजाब के चकवाल शहर से 30 किलोमीटर दूर कटासराज गांव के प्रसिद्ध शिव मंदिर के साथ भी यही कुछ हुआ। इसके इर्द-गिर्द के सारे भूखंड पर सीमेंट फैक्ट्रियों ने कब्जा कर लिया। साथ ही मंदिर की प्राकृतिक झील से पानी निकाल कर फैक्ट्रियों में इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके कारण झील सूखने के कगार पर है। पाकिस्तान वक्फ बोर्ड के पुजारी रहे जयराम कहते हैं कि 1917 में सरकार ने ऐसी नीतियां अपनाईं कि देश से हिंदू संस्कृति ही मिट गई। अब यहां न शास्त्र पढ़ाए जाते हैं, न ही यहां कोई संस्कृत पढ़ाने वाला बचा है। वर्षों पूर्व सिंध प्रांत के स्कूलों में हिंदी टीचर नियुक्त करने की मांग उठाई गई थी, जिस पर आज तक अमल नहीं हुआ है।


...नेपाल से सीख ले पाकिस्तान
पाकिस्तान की पत्रकार रीमा अब्बासी ने अपने लंबे शोध-अध्ययन पर आधारित एक पुस्तक लिखी है- पाकिस्तान के ऐतिहासिक मंदिर। अंग्रेजी में लिखी गई 296 पृष्ठों की इस पुस्तक में चार सौ से अधिक मंदिरों के चित्र हैं। पाकिस्तान के मंदिरों के बारे में किसी पाकिस्तानी लेखक द्वारा लिखी गई यह पहली पुस्तक है। इस बारे में लेखिका कहना है कि इस पर शोध करने के दौरान उन्हें लंबी यात्राएं करनी पड़ीं और कई जगह कटरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ा। अफगानिस्तान से सटे इलाकों में तथ्य इकत्रित करने में उन्हें सर्वाधिक दुश्वारियां पेश आईं। रीमा अब्बासी अपनी पुस्तक में आलोचनात्मक अंदाज में एक जगह लिखती हैं कि पाकिस्तान सरकार की अनदेखी और बहुसंख्यकों के गलत आचरण के चलते मंदिरों एवं धर्मस्थलों को नुक्सान पहुंचा है। हिंदू बहुल सिंध को छोड़कर खैबर पख्तूनख्वाह और बलूचिस्तान में इनके नाम-ओ-निशान मिटा दिए गए हैं। लेखिका का सुझाव है कि मंदिरों को देश की प्राचीन धरोहर मानकर इसकी देखभाल करनी चाहिए। उनके कहने का अर्थ यह है कि नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर की तरह पाकिस्तान भी अपने देश के प्राचीन मंदिरों को सुसज्जित पर्यटनस्थल के रूप में विकसित करें, ताकि यह सरकार को तंगहाली के दलदल से बाहर निकालने में मददगार साबित हों।


मंदिरों को लेकर क्यों न मने काला दिवस
अयोध्या में ढांचा ध्वंश की तारीख 6 दिसंबर करीब आते ही देश का एक वर्ग मर्सिया ख्वानी करने लगता है। मगर ऐसे लोगों  इस पर कतई अफसोस नहीं कि इस दौरान पड़ोसी पाकिस्तान में सवा सौ से अधिक मंदिर जमीनदोज कर दिए गए थे और उत्पातियों ने वहां के अल्पसंख्यकों को भारी जानी-माली नुक्सान पहुंचाया था। इस्लाम में जब बेवजह दूसरे मतावलबियों का दिल दुखाना मना है तो फिर कैसे 120 अधिक हिन्दुओं के धर्मस्थल ढहा दिए गए ? इस घटना को लेकर उस दौरान बांग्लादेश, पाकिस्तान और ईरान सहित कई देशों में भारतीय दूतावास पर हमले भी हुए थे। 2 से 8 दिसंबर 1992 दौरान हिंदुओं को सर्वाधिक तबाही पाकिस्तान में झेलनी पड़ी थी। पाकिस्तान में बीबीसी के लिए काम करने वाले फोटो पत्रकार शिराज हसन ने  ट्वीट कर उस दौरान पाकिस्तान में घटी घटनाएं साझा की हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान में लोग मंदिरों में पर टूट पड़े और सौ से अधिक मंदिरों को जमीनदोज कर दिया। मंदिरों में लूट-पाट मचाई गयी। देवी-देवताओं की प्रतिमाएं खंडित कर दी गईं और वहां रहने वालों को प्रताड़ित किया गया। पाक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, उत्पात से  हजारों-हजार अधिक हिंदू परिवार प्रभावित हुए थे। इस दौरान उपद्रवियों ने लोरलिया में छह हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया था। पाकिस्तान पत्रकार शिराज हसन अपने एक अन्य ट्वीट में लिखते हैं कि बंटवारे के बाद से कई हिंदू परिवार मंदिरों में रहते थे। ढांचा ध्वंश के समय पाकिस्तान में सर्वाधिक यही परिवार प्रताड़ित किए गए। इस दौरान रावलपिंडी के कृष्ण मंदिर का गुबंद दंगाइयों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था। इसी शहर के कल्याण दास मंदिर को भी नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की गई थी, पर उसे किसी तरह बचा लिया गया। इस मंदिर में अब दृष्टिहीनों का सरकारी स्कूल चलता है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं