रक्तरंजित ‘ममता’ राज

    दिनांक 21-जुलाई-2020
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मनोज वर्मा
जो पश्चिम बंगाल स्वतंत्रता संग्राम में अपने महान योगदान, कला-साहित्य और बुद्धिजीवियों के गढ़ के लिए दुनियाभर में जाना जाता था, अब वह राजनीतिक हिंसा के लिए सुर्खियों में रहता है। पांच दशक से चले आ रहे खूनी राजनीतिक संघर्ष को ममता बनर्जी ने नया आयाम दिया है। कांग्रेस और वामदलों की तरह वह भी हत्या और हिंसा को सत्ता की कुंजी समझ बैठी हैं

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पश्चिम बंगाल में विधायक की हत्या से भाजपा कार्यकर्ताओं में नाराजगी है।

एक दशक पहले पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो लोगों में यह उम्मीद बंधी थी कि राज्य का विकास होगा। राज्य में दमन, हिंसा और राजनीतिक हत्याओं का सिलसिला थमेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। लंबे समय बाद पश्चिम बंगाल राज्य में केवल सत्?ता परिवर्तन हुआ। मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने शासन का वामपंथी तरीका ही चुना। ममता राज में भी ठीक उसी प्रकार से राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएं हो रही हैं, जिस प्रकार से एक दशक पूर्व वामदलों के शासनकाल में हुआ करती थीं। अंतर इतना है कि हमलावर वही हैं, बस पार्टी बदल गई है। राज्य में आए दिन होने वाली राजनीतिक हत्याएं, हिंसा और हिन्दू दमन लोकतंत्र की आत्मा को छलनी कर रही हैं।
किसी देश या राज्य की लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली कसौटी यह होती है कि वहां के शासन में लोग अपनी विचारधारा के साथ जीने के लिए कितने स्वतंत्र हैं। ममता राज में न तो हिन्दुओं को त्योहार मनाने की छूट है, न ही विरोधी दलों और आम जनता को सत्ता के विरुद्ध आवाज उठाने की। राज्य के उत्तर दिनाजपुर में आरक्षित सीट हेमताबाद के भाजपा विधायक देवेंद्र नाथ रॉय की संदिग्ध मौत इसकी बानगी है। राज्य में एक जनप्रतिनिधि की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत यह दशार्ती है कि यह तृणमूल सरकार कितनी क्रूर और असहिष्णु है, जो अपने विरोधियों से विचारधारा के साथ जीने की स्वतंत्रता भी छीन लेती है। राज्य में नेताओं और राजनीतिक कार्यकतार्ओं की सिलसिलेवार हत्या की घटनाओं ने ममता सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। जाहिर है लोकतंत्र में आस्था रखने वाला सहिष्णु समाज इस प्रकार की तानाशाही और अराजक व्यवस्था का विरोध जरूर करेगा, क्योंकि पश्चिम बंगाल न तो चीन है और न ही ममता बनर्जी चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग, जो यह मानता था कि ‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है।’ यह भद्रजनों और बुद्धिजीवियों का बंगाल है। नेताजी सुभाषचंद्र्र बोस का सोनार बंगाल है, जिसकी छवि को मौजूदा राज्य सरकार तार-तार कर रही है।
 
कठघरे में ममता सरकार 
हाल ही में भाजपा विधायक देवेंद्र्र नाथ रॉय का शव घर के पास रस्सी से झूलता हुआ मिला था। स्थानीय पुलिस इसे आत्महत्या बता रही है। लिहाजा, पति की मौत पर से पर्दा उठाने के लिए दिवंगत विधायक की पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। मतलब साफ है कि उन्हें राज्य की पुलिस पर भरोसा नहीं है। राज्य में होने वाली हिंसा की घटनाओं से राज्यपाल जगदीप धनखड़ भी आहत हैं। वह कहते हैं, ‘किसी भी राज्य में राजनीतिक हिंसा लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।’ विधायक की संदिग्ध मौत पर संज्ञान लेते हुए राज्?यपाल ने ट्वीट किया कि देवेंद्र नाथ रॉय की मृत्यु, हत्या के आरोपों सहित गंभीर मुद्दों को उठाती है। सच्चाई को उजागर करने और राजनीतिक हिंसा को रोकने के लिए पूरी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है। ममता राज में बढ़ती राजनीतिक हिंसा, हिन्दू विरोधी दंगों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या पर चिंता जताते हुए भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी कहते हैं कि भाजपा विधायक देवेंद्र्र नाथ रॉय की संदिग्ध जघन्य हत्या बेहद चौंकाने वाली है। राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह विफल है और राज्य में गुंडाराज है। लोग ऐसी सरकार को माफ नहीं करेंगे।
 
भाजपा विधायक की हत्या सरकार और राज्य की शासन व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल तो यही है कि जिस राज्य में एक विधायक ही सुरक्षित न हो, तो वहां की जनता कितनी सुरक्षित होगी? रायगंज के एसपी सुमित कुमार के मुताबिक, विधायक देवेंद्र्र नाथ रॉय का शव उत्तर दिनाजपुर के बलिया में पाया गया। उनकी जेब से एक सुसाइड नोट भी मिला है, जिसमें मौत के लिए तीन लोगों को कसूरवार ठहराया गया है। इस बारे में विस्तृत जांच की जा रही है। दूसरी बात, जिस तरह से देवेंद्र्र का शव उनके गांव स्थित घर के पास रस्सी से झूलता मिला है, उससे आशंका जताई जा रही है कि पहले उनकी हत्या की गई, फिर उनके शव को रस्सी से लटका दिया गया। भाजपा नेता राहुल सिन्हा ने तो इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि इस हत्या के पीछे तृणमूल कांग्रेस का हाथ है, लेकिन उसने इसे आत्महत्या दिखाने की कोशिश की है। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मामले की सीबीआई जांच का आदेश देने की मांग की है।

चुनाव के बाद बढ़ी हिंसा
देवेंद्र ने पिछले साल लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की सदस्यता ली थी। इससे पहले वह सीपीएम में थे। लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद तृणमूल कांग्रेस के दो विधायक और करीब 50 पार्षद भी भाजपा में शामिल हुए थे। वैसे देवेंद्र्र की मौत पहली घटना नहीं है, जिसे लेकर भाजपा या वामदल सवाल उठा रहे हैं। 19 मई, 2019 के बाद से जिस तरह से राज्य में बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा की वारदातें हुई हैं, वह चिंता पैदा करने वाली हैं, क्योंकि ये घटनाएं लोकसभा चुनाव के बाद की हैं। ये हिंसक घटनाएं राज्य में मतदान के दौरान और चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद दर्ज की गईं। नेशनल यूनियन आॅफ जर्नलिस्ट (एनयूजे) ने पश्चिम बंगाल में घटने वाली हर छोटी-बड़ी राजनीतिक हिंसा का विश्लेषण किया तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। साथ ही, एक सवाल भी उभरा कि आखिर 19 मई, 2019 के बाद ही राजनीतिक हिंसा क्यों हुई या हो रही है? दरअसल, लोकसभा चुनाव में मतदान और परिणाम सामने आने के बाद राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक झड़प बढ़ी है। 19 मई से 21 जून, 2019 के दौरान दोनों दलों के बीच 150 हिंसक झड़पें हुईं। इनमें भाजपा के 16 और टीएमसी के एक कार्यकर्ता की मौत हुई। इसी तरह, 158 घायलों में 136 भाजपा कार्यकर्ता थे और टीएमसी के 16। घायलों में एक पुलिसकर्मी और पांच अन्य लोग भी शामिल थे। हिंसा के अधिकांश मामलों में तो मुख्यधारा मीडिया ने दिलचस्पी ही नहीं ली। बौद्धिक रूप से जागरूक माने जाने वाले राज्य में बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक और राजनीतिक हिंसा और उस पर मीडिया की चुप्पी से उसकी भूमिका भी संदिग्ध हो जाती है।


पश्चिम बंगाल में सबसे पहले कांग्रेस ने हिंसा का रास्ता अपनाया। कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने क्रूरता से नक्सलबाड़ी आंदोलन का दमन किया, जिसमें हजारों लोग मारे गए। सत्ता में आने पर वाम मोर्चा ने भी बदले की भावना से काम किया। तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो खुलासा किया कि वामदलों के 1977 से 2007 तक के कार्यकाल के दौरान 22,000 राजनीतिक हत्याएं हुइं। अब तृणमूल कांग्रेस भी अपने राजनीतिक विरोधियों को निपटाने के लिए उनकी हत्याएं करवा रही है।


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सितंबर 2019 में उत्तर 24 परगना के श्यामनगर रेलवे स्टेशन के पास भाजपा सांसद अर्जुन सिंह पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया।
प्रकोष्ठ में सांसद की क्षतिग्रस्त कार।


पश्चिम बंगाल के संदर्भ में अमूमन कहा जाता है कि यहां राजनीतिक हिंसा नई बात नहीं है। यह तो वर्षों से होती आ रही है। राज्य में पहले कांग्रेस ने हिंसा का रास्ता अपनाया। कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रॉय ने क्रूरता से नक्सलबाड़ी आंदोलन का दमन किया, जिसमें हजारों लोग मारे गए। बाद में जब वाम मोर्चा सत्ता में आया तो बदले की भावना से काम किया। नतीजा, राज्य में राजनीतिक हिंसा का लंबा खूनी दौर चला। अब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में है तो वह भी इसी रास्ते पर चल रही है। सत्ता में आने के बाद तृणमूल कांग्रेस, वामदलों की कुछ कारगुजारियों को विधानसभा के रिकॉर्ड में लेकर आई। इसमें एक तथ्य यह भी था कि वामदलों के 1977 से 2007 तक के कार्यकाल के दौरान 22,000 राजनीतिक हत्याएं हुईं। लेकिन पूर्व की घटनाओं के आधार पर आज की हिंसा को कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। अब तृणमूल कांग्रेस के शासन में भी वही सब हो रहा है।

किसी को विरोध का हक नहीं
हिंसा से जुड़ी घटनाओं के एनयूजे के विश्लेषण में यह भी उभर कर आया कि राज्य की रक्तरंजित राजनीति को केवल राजनीतिक दलों के बीच छिटपुट हिंसा के तौर पर नहीं देखा जा सकता और न ही इनकी अनदेखी की जा सकती है। क्योंकि राज्य में दमन केवल राजनीतिक विरोधियों का ही नहीं हो रहा, यहां चिकित्सकों, अधिवक्ताओं और समाज के अन्य वर्गों ने जब भी अपने अधिकार के लिए आवाज उठाई, उन्हें किसी न किसी तरह से प्रताड़ित किया गया। दरअसल, पश्चिम बंगाल में हिंसा और राजनीति एक-दूसरे के पूरक हैं। जब भी बंगाल की राजनीति की बात होती है, पहले वहां की सियासी हिंसा की चर्चा होती है। वैसे तो देश के हर राज्य में चुनाव के दौरान छिटपुट हिंसा की घटनाएं दर्ज की जाती हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसी घटनाएं कहीं अधिक होती हैं। यहां हिंसा का नाता चुनाव से नहीं, बल्कि राजनीति से हो गया है। इसलिए यहां राजनीतिक हिंसा आम बात है। पश्चिम बंगाल में कहीं किसी पार्टी की रैली हो, किसी बड़े नेता का दौरा हो, कोई विरोध प्रदर्शन हो तो हिंसा होना सामान्य सी बात हो गई है। 1 सितंबर, 2019 को भाजपा सांसद अर्जुन सिंह को सूचना मिली कि उत्तर 24 परगना जिले में तृणमूल के गुंडों ने पार्टी कार्यालय पर कब्जा कर लिया है। जब वह कार से जा रहे थे, तब उत्तर 24 परगना के श्यामनगर रेलवे स्टेशन के पास तृणमूल के गुंडों ने उन पर हमला किया, जिसमें वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हमलावरों ने उनकी कार को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था। जिस समय उन पर हमला हुआ, उस समय पुलिस भी वहां मौजूद थी।


बंगाल में राजनीतिक हिंसा
  • 15 जुलाई, 2020: पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के कृष्णानगर में भाजपा युवा मोर्चा के 38 वर्षीय कार्यकर्ता बापी घोष की हत्या कर दी गई। हमलावरों ने बापी घोष के सिर पर बांस और रॉड से हमला किया था। इस हमले में बापी घोष बुरी तरह से घायल हो गए थे। उन्हें तुरंत कृष्णानगर जिला अस्पताल में ले जाया गया, लेकिन उनकी बिगड़ती देख डॉक्टरों ने उन्हें कोलकाता स्थित एनआरएस अस्पताल रेफर कर दिया। वहां इलाज के दौरान बापी घोष की मौत हो गई। बापी घोष के पिता निमाई घोष ने कहा कि मेरा बेटा कुछ दिन पहले ही भाजपा में शामिल हुआ था इसीलिए तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने उसे मार डाला।

  •  13 जुलाई, 2020: सीपीएम छोड़कर भाजपा में आए उत्तर दिनाजपुर की सुरक्षित सीट हेमताबाद के विधायक देवेंद्र नाथ रे की हत्या कर दी गई। उनका शव एक दुकान के बाहर फंदे पर लटका मिला। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी हत्या की गई फिर लटका दिया गया। प्रशासनिक स्तर पर इस मामले को आत्महत्या बताए जाने के खिलाफ दिवंगत विधायक की पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। हत्या का आरोप तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर लग रहा है।

  • 7 अप्रैल, 2020: पश्चिम बंगाल के कुलताली इलाके के कनकासा गांव में शकुंतला हलदर और उनके पति चंद्र हलदर की हत्या कर दी गई। चंद्र हलदर का शव घर के बाहर पेड़ से लटका मिला, जबकि शकुंतला का शव घर के भीतर था। हत्यारों ने उनके बच्चों को भी धमकाया। हलदर दंपती कसूर इतना था कि उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर 5 अप्रैल को रात 9 बजे घर की बत्ती बुझाकर दीया जलाया था। रिश्तेदारों का आरोप है इस बात से तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता नाराज हो गए, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का आग्रह नहीं मानने का फरमान जारी किया था। इसी का बदला लेने के लिए दोनों की हत्या कर दी गई।

  • 7 मार्च, 2020: पश्चिम बंगाल के गंगा सागर में भाजपा कार्यकर्ता देवाशीष मंडल की हत्या कर दी गई। देवाशीष भाजपा के बूथ अध्यक्ष थे और इलाके में पार्टी को मजबूत करने में लगे हुए थे। बताया जा रहा है कि स्थानीय तृणमूल कांग्रेस नेताओं को उनकी यह सक्रियता अच्छी नहीं लगती थी और इसी रंजिश में देवाशीष मंडल की निर्ममता से हत्या कर दी।

  •  6 फरवरी, 2020: पश्चिम बंगाल में 24 परगना के सोनारपुर में भाजपा नेता नारायण विश्वास की निर्मम हत्या कर दी गई। बाइक सवार हमलावरों ने पहले नारायण विश्वास को गोली मारी और जब वह जख्मी होकर गिर गए तो चाकू मारकर उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना से वहां अफरा-तफरी मच गई। गोली की आवाज सुनकर आसपास के लोगों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। नारायण विश्वास भारतीय जनता व्यापार संघ के सोनारपुर दक्षिण विधानसभा संख्या 4 के अध्यक्ष थे। हत्या का आरोप तृणमूल कांग्रेस पर लगा।


कोरोना वैश्विक महामारी के दौरान लॉकडाउन में भी राज्य के विभिन्न इलाकों में हिंसक घटनाओं में तेजी आई है। कोलकाता से ही सटे दक्षिण 24 परगना जिले में वामपंथी संगठन एसयूसीआई और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें हुर्इं, जिसमें दोनों पक्षों के एक-एक कार्यकर्ता की मौत हो गई। दर्जनों घर फूंक दिए गए। इसी तरह, मुर्शिदाबाद जिले में बम बनाते समय हुए विस्फोट में दो लोगों मौत हो गई। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कोलकाता में एक वर्चुअल रैली में कहा भी कि राज्य में हिंसा और राजनीति का अपराधीकरण असहनीय स्तर तक पहुंच गया है। वैसे बात केवल राजनीतिक हिंसा की नहीं है। राज्य में जिस तरह से हिन्दुओं पर हमले बढ़े हैं, उससे यही लगता है कि इसे सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। हिन्दुओं को भगाने के लिए हिंसा हो रही है या करवाई जा रही है। खासतौर से 24 परगना, मुर्शिदाबाद, बीरभूम, मालदा आदि जिले में ऐसी कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। राज्य में जनसांख्यिकी संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में मुसलमानों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। बांग्लादेशी मुसलमानों और रोहिंग्याओं को सुनियोजित तरीके से बसा दिया गया है। यह सब हिन्दू आबादी का संतुलन बिगाड़ने की साजिश के तहत किया गया है। जिन इलाकों में मुसलमानों की आबादी अधिक है और हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए हैं, वहां हिन्दुओं का दमन शुरू हो गया है। हिंसा का सहारा लेकर हिन्दुओं को भगाने की साजिशें रची जा रही हैं।

सरकारें बदलीं, पर स्वरूप नहीं
पश्चिम बंगाल में चाहे वामपंथी शासन हो या तृणमूल कांग्रेस का शासन, दोनों में कई समानताएं हैं। दोनों ही सरकारें राजनीतिक हिंसा के कारण सुर्खियों में रहीं हैं। राज्य न तो वामदलों के शासनकाल में विकास के पायदान चढ़ा और न अब ममता सरकार के कार्यकाल में। राज्य भारी-भरकम कर्ज के बोझ तले दबा है। ममता की अगुवाई में राज्य को विकास की राह पर चलना था, लेकिन इसने उन्माद की राह पकड़ ली। आलम यह है कि राज्य में हिंसा को ही शासन और चुनाव जीतने का मूल मंत्र मान लिया गया है। राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में बीते लगभग पांच दशकों से राज्य में हत्या और हिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। इस दौरान सत्ता संभालने वाले चेहरे जरूर बदलते रहे, लेकिन उनका चाल-चरित्र रत्ती भर भी नहीं बदला। दरअसल, साठ के दशक में उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने राजनीतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया। किसानों के शोषण के विरोध में नक्सलबाड़ी से उठने वाली आवाजों ने उस दौरान पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। नक्सलियों ने जिस निर्ममता से राजनीतिक कार्यकतार्ओं की हत्याएं कीं, सत्तारूढ़ संयुक्त मोर्चे की सरकार ने उतने ही हिंसक और बर्बर तरीके से उनका दमन किया। 1971 में सिद्धार्थ शंकर रॉय के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद तो राजनीतिक हत्याओं का जो दौर शुरू हुआ, वह बढ़ता ही चला गया। कांग्रेस के शासनकाल के दौरान राज्य में विपक्ष की आवाज दबाने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल होता रहा। 1977 के विधानसभा चुनावों में यही उसके पतन की भी वजह बनी। उसके बाद बंगाल की राजनीति में कांग्रेस इस कदर हाशिए पर चली गई कि अब वह राज्य की राजनीति में पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है।

राज्य में जनसांख्यिकी संतुलन लगातार बिगड़ रहा है। राज्य के विभिन्न हिस्सों मुसलमानों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। बांग्लादेशी मुसलमानों और रोहिंग्याओं को सुनियोजित तरीके से बसा दिया गया है। यह सब हिन्दू आबादी का संतुलन बिगाड़ने की साजिश के तहत किया गया है। जिन इलाकों में मुसलमानों की आबादी अधिक है और हिन्दू अल्पसंख्यक कम हैं, वहां हिन्दुओं का दमन शुरू हो गया है। हिंसा का सहारा लेकर हिन्दुओं को भगाने की साजिशें रची जा रही हैं।

1977 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद वाम मोर्चे की सरकार भी कांग्रेस के नक्शेकदम पर चलना शुरू किया। सत्ता पाने के बाद हत्या को संगठित तरीके से राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा। 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए, उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए। 1979 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार की पुलिस और सीपीएम काडरों ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों पर जिस निर्ममता से गोलियां बरसार्इं, उसका दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। मरिचझापी में करीब 40,000 बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थी थे, जिनमें महिला, पुरुष और बच्चे शामिल थे। ये सभी निहत्थे थे। हालांकि नंदीग्राम और सिंगुर की राजनीतिक हिंसा और हत्याओं ने सीपीएम के पतन का रास्ता साफ किया था। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, 2009 में राज्य में 50 राजनीतिक हत्याएं हुई थीं और उसके बाद अगले दो वर्षों में वामदल और तृणमूल कांग्रेस के 38-38 लोग मारे गए। यह वाममोर्चा सरकार के उतार और तेजी से उभरती तृणमूल कांग्रेस के सत्ता की ओर बढ़ने का दौर था। 2007, 2010, 2011 और 2013 में राजनीतिक हत्याओं के मामले में बंगाल पूरे देश में पहले स्थान पर रहा। 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक हिंसा का दौर जारी रहा। दरअसल, वाम दलों के काडरों ने धीरे-धीरे तृणमूल का दामन लिया यानी दल तो बदले, लेकिन चेहरे नहीं। अब जबकि भाजपा धीरे-धीरे राज्य में उभर रही है तो एक बार फिर नए सिरे से राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ है। ममता बनर्जी के कार्यकाल में राजनीतिक हिंसा की तस्वीर बदली नहीं। ऐसे में लोग नए विकल्प की ओर देख रहे हैं, जो 2021 के विधानसभा चुनावों में तय होगा।

पश्चिम बंगाल में राजनीकि हिंसा का निष्कर्ष यही है कि राजनीतिक दलों ने वहां के समाज का चरित्र ही हिंसक बना दिया है। सामान्य आदमी भी यदि हाथों में बांस, लाठी, कटार, खंभे लेकर विरोधियों को मारने दौड़ रहा है तो इसका अर्थ और क्या हो सकता है? अगर समाज का चरित्र हिंसक हो जाए तो उसे बदलना कठिन होता है। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए भी सबसे बड़ी चुनौती है। यह चुनौती पहले भी रही है। लेकिन अभी इसमें आक्रामकता थोड़ी अधिक है और इसके पात्र भी बदल गए हैं।