पहले माफिया, फिर ‘माननीय’

    दिनांक 21-जुलाई-2020   
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उत्तर प्रदेश में जब से विकास दुबे का मामला उजागर हुआ है, तब से राज्य में वैसे लोगों की बड़ी चर्चा हो रही है, जो पहले माफिया थे और बाद में चुनाव लड़कर ‘माननीय’ बन गए। मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, विजय मिश्र जैसे लोग विधायक और सांसद बन कर भी अपराध जगत से दूर नहीं हो सके

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बाहुबली  अतीक अहमद
 

यह कहने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा अवगुण है कि वह गुंडों और बदमाशों को भी ‘माननीय’ बनने का अवसर देता है। राजनीति में आपको ऐसे बहुत से नाम मिलेंगे जिन्होंने जन सामान्य के बीच दहशत फैला कर सरकारी ठेकों पर कब्जा किया, अपराध के रास्ते चलकर अकूत सम्पत्ति अर्जित की। इसके बाद नेताओं से गठजोड़ करके राजनीति में कदम रखा और ‘माननीय’ बन गए। ‘माननीय’ बन जाने के बाद ‘पुलिस मुठभेड़’ के खतरे से छुटकारा मिल गया। नेताओं और अपराधियों की इसी गठजोड़ की उपज था कानपुर के बिकरू गांव का विकास दुबे। वही विकास दुबे, जिसने आठ पुलिसकर्मियों को मारा और बाद में पुलिस ने उसे मुठभेड़ में मार गिराया।

उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ दशकों पुराना है। फूलन देवी आपको याद होगी। सामूहिक नरसंहार की दोषी फूलन देवी को मुलायम सिंह ने पहले तो जेल से रिहा करवाया और इसके बाद संसद पहुंचा दिया। उस समय वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी ने लिखा था, ‘‘अब फूलन देवी लोकसभा में पहुंच कर बताएंगी कि अपराधियों से निपटने के लिए बनने वाला कानून कैसा होना चाहिए!’’

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बाहुबली मुख्तार अंसारी                                                इन्हें नहीं मिला न्याय : (बाएं से) कृष्णानंद राय और राजू पाल।

कांग्रेस ने की थी शुरुआत
सबसे पहले ‘बैलेट’ और ‘बुलेट’ का गठजोड़ कांग्रेस ने तैयार किया था। अपराधियों के सहारे चुनाव जीतना और फिर सत्ता में आ जाने के बाद उन अपराधियों को पुलिस की कार्रवाई से राहत दिलाना, यह कांग्रेस का काम था। इस तरह से कांग्रेस के जमाने में राजनीति का अपराधीकरण शुरू हुआ। बाद में जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू यादव सरीखे नेता दमदार हुए तो उस समय अपराध का राजनीतिकरण शुरू हुआ।

सपा-बसपा का ‘विकास’
विकास दुबे ने पहला अपराध 1990 में किया था। शुरुआती दौर में उसके खिलाफ मारपीट करने, धमकाने जैसे छोटे-छोटे मामले दर्ज होते थे। स्थानीय नेताओं की शह मिली तो उसने आसपास के इलाके में अपना दबदबा स्थापित कर लिया। इसके बाद विकास ने 2001 में दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री और भाजपा नेता संतोष शुक्ला की हत्या थाने में घुसकर कर दी। एक थाने में हत्या हुई, लेकिन आश्चर्य यह है कि उस मामले में कोई गवाह नहीं मिला और विकास छूट गया। उस समय उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी। ऐसे मामले में सरकार को उच्च न्यायालय में अपील करनी होती है, लेकिन सपा सरकार ने ऐसा नहीं किया। इसके बाद विकास का दुस्साहस बढ़ता गया। उसने नेताओं से और घनिष्ठ संबंध बनाए। अपराध के बल पर उसने काफी संपत्ति भी अर्जित की। हालांकि अब प्रवर्तन निदेशालय उन संपत्तियों की जांच कर रहा है। विकास के खिलाफ 60 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। विकास एक समय में बसपा से टिकट मांग रहा था, जबकि उसकी पत्नी ऋचा दुबे समाजवादी पार्टी की आजीवन सदस्य है। उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री एवं प्रवक्ता सिद्धार्थ नाथ सिंह कहते हैं, ‘‘इन राजनीतिक दलों (सपा और बसपा) को यह बताना चाहिए कि उनके साथ विकास दुबे के किस तरह के संबंध थे। किस वजह से विकास दुबे की पत्नी को चुनाव में टिकट दिया गया था?’’
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बता दें कि समाजवादी पार्टी ने विकास दुबे की पत्नी को जिला पंचायत के चुनाव में टिकट दिया था। ऐसे में समाजवादी पार्टी के  अध्यक्ष अखिलेश यादव को कानून एवं व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले आत्ममंथन करना चाहिए कि ऐसी क्या वजह है आपराधिक छवि के लोगों का संबंध सपा से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से निकल आता है।

विकास भी राजनीति में आकर ‘माननीय’ बनना चाहता था। वह जानता था कि यदि वह एक बार जन प्रतिनिधि बन गया तो पुलिस उस पर जल्दी हाथ नहीं डालेगी। इसके लिए वह सपा और बसपा दोनों दलों में टिकट के लिए प्रयास कर रहा था। हाल ही में उसका एक पुराना वीडियो भी वायरल हुआ है। उसमें विकास कह रहा है, ‘‘अब यह बहन जी (मायावती) के ऊपर है कि वह मुझे कहां से प्रत्याशी बनाती हैं।’’

मुख्तार के कारनामे  
गाजीपुर जनपद में जन्मे मुख्तार अंसारी के दादा मुख्तार अहमद अंसारी कांग्रेसी नेता थे। मुख्तार के पिता वामपंथी विचारधारा से प्रभावित थे। यानी मुख्तार को राजनीति विरासत में मिली थी। मुख्तार ने राजनीति और अपराध का मिश्रण तैयार कर खूब कारनामे किए। मुख्तार ने 1988 में अपराध की दुनिया में प्रवेश किया। एक हत्या का आरोप लगा, लेकिन साक्ष्य के अभाव में बरी हो गए। 1990 के आस-पास गाजीपुर जनपद में सरकारी ठेकों पर बृजेश सिंह के गिरोह ने कब्जा करना शुरू कर दिया था। इन्हीं ठेकों पर कब्जा बनाए रखने को लेकर मुख्तार और बृजेश की दुश्मनी शुरू हुई जो आज भी चल रही है। धीरे-धीरे मऊ, गाजीपुर, वाराणसी और जौनपुर जनपद में मुख्तार का दबदबा कायम हो गया। अपराध जगत में स्थापित हो जाने के बाद मुख्तार ने राजनीति में प्रवेश किया। 1996 में मुख्तार पहली बार विधानसभा पहुंचे।

उत्तर प्रदेश में अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ दशकों पुराना है। फूलन देवी आपको याद होगी। सामूहिक नरसंहार की दोषी फूलन देवी को मुलायम सिंह ने पहले तो जेल से रिहा करवाया और इसके बाद संसद पहुंचा दिया। उस समय वरिष्ठ पत्रकार अरुण शौरी ने लिखा था, ‘‘अब फूलन देवी लोकसभा में पहुंच कर बताएंगी कि अपराधियों से निपटने के लिए बनने वाला कानून कैसा होना चाहिए!’’

2002 के आस-पास मुख्तार और बृजेश पर कई जानलेवा हमले हुए मगर दोनों ही सुरक्षित बच गए। उसी दौर में मुख्तार को भाजपा नेता कृष्णानंद राय का बढ़ता कद अखरने लगा। 2002 के विधानसभा चुनाव में कृष्णानंद राय ने मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट पर मुख्तार के भाई अफजाल अंसारी को हराया। इसके बाद तो मुख्तार और कृष्णानन्द राय की दुश्मनी बढ़ती गई। 2005 में मऊ जनपद में साम्प्रदायिक दंगा हुआ। उस दंगे का आरोपी मुख्तार को बनाया गया। इस मामले में मुख्तार ने गाजीपुर जनपद न्यायालय में आत्मसमर्पण किया। आरोप है कि मुख्तार ने जेल में बंद रहने के दौरान ही कृष्णानंद राय की हत्या करवाई। मगर इस मामले में मुख्तार को न्यायालय ने बरी कर दिया। मुख्तार और अफजाल ने अपना राजनीतिक सफर बहुजन समाज पार्टी के साथ शुरू किया मगर इन लोगों की निकटता समाजवादी पार्टी से भी बनी रही। मुख्तार ने जेल में रहते हुए बसपा के टिकट पर वाराणसी से 2009 का लोकसभा चुनाव लड़ा मगर भाजपा के डॉ. मुरली मनोहर जोशी से करीब 17,000 मतों से पराजित हो गए। 2010 में एक ठेकेदार की हत्या के गवाह की हत्या कर दी गई थी। इस हत्या का आरोप मुख्तार पर लगा। इसके बाद 2010 में बसपा से दोनों भाई निष्कासित कर दिए गए। बसपा से निकाले जाने के बाद मुख्तार, अफजाल और सिग्ब्तुल्लाह अंसारी ने एक नई राजनीतिक पार्टी ‘कौमी एकता दल’ का गठन किया। मुख्तार इस समय पंजाब की जेल में बंद है।

अतीक का अन्याय

प्रयागराज जनपद में पले-बढ़े अतीक अहमद का बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगा। युवावस्था में अतीक ने रेलवे में ठेकेदारी शुरू की। यही वह दौर था जब किसी न किसी विवाद में अतीक के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने लगी। ठेकेदारी में कोई बाधा न आए इसके लिए दबंगई की जरूरत थी। कुछ समय के बाद एक दौर ऐसा भी आया जब अतीक के सामने पड़ने से लोग कतराने लगे। माना जाता है कि अपराध के बल पर ही अतीक ने काफी संपत्ति अर्जित की। इसके बाद अतीक ने राजनीति में प्रवेश करने का इरादा बनाया। 1989 में अतीक पहली बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधानसभा पहुंचने में सफल रहा, लेकिन वह समाजवादी पार्टी से निकटता भी बढ़ाने लगा।

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बाहुबली विजय मिश्र

सपा के टिकट पर ही वह इलाहाबाद पश्चिम से पांच बार विधायक रहा। 2004 में वह सपा के टिकट पर सांसद चुना गया। बाद में इलाहाबाद पश्चिम से अतीक ने अपने छोटे भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ (जिन पर लगभग 30 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं) को चुनाव लड़ाया, लेकिन वह बसपा के राजू पाल से हार गया। राजू पाल के ऊपर भी कई आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। विधायक बनने के बाद राजू पाल के ऊपर जानलेवा हमले होने लगे। अंतत: 25 जनवरी, 2005 को उनकी हत्या कर दी गई। इस मामले में अतीक और उसके भाई अशरफ को जेल भेज दिया गया, लेकिन कुछ महीने के बाद अतीक को इलाहाबाद उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई। राजू पाल की हत्या के बाद हुए उप चुनाव में अशरफ ने जेल से ही चुनाव लड़ा और फिर विधायक बना।

अतीक पर 50 से ज्यादा गंभीर मामले पहले से ही दर्ज हैं। मगर 2002 में प्रयागराज जनपद के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक (नगर) लालजी शुक्ल ने एक ही दिन में अतीक के खिलाफ 111 एफआईआर दर्ज कराई थी। हालांकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन सभी को रद्द कर दिया था। 2007 में बसपा की सरकार बनी तब अतीक और अशरफ के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई। अभी अतीक अमदाबाद जेल में बंद है। उसके पांच बेटे हैं। बड़ा बेटा उमर सीबीआई के एक मुकदमे में फरार है। सीबीआई ने उसके सर पर ढाई लाख का ईनाम घोषित किया है।

विजय भी कम नहीं
बाहुबली विधायक विजय मिश्र पर करीब 58 मामले दर्ज हैं। कहा जाता है कि 1980 के आसपास विजय मिश्र ने भदोही जनपद में पेट्रोल पम्प और ट्रक चलवाने का व्यवसाय शुरू किया था। कुछ वर्ष बाद वे कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलापति त्रिपाठी के संपर्क में आए। कहा जाता है कि उन्होंने ही विजय को चुनाव लड़ने की सलाह दी। 1990 में विजय ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए। फिर वे राजीव गांधी के भी संपर्क में आए। राजीव गांधी की हत्या के बाद वे मुलायम सिंह यादव के संपर्क में आए। 2000 में विजय ने भदोही जिला पंचायत में सपा का झंडा लहराया। 2002 में विजय भदोही जनपद की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से सपा के टिकट पर विधायक बने। 2017 तक वे सपा के विधायक रहे। 2017 में उन्हें सपा ने टिकट नहीं दिया तो वे निषाद पार्टी से टिकट लेकर चुनाव लड़े और विधायक निर्वाचित हुए।

दाऊद  ऐसे बना अपराधी 
कुख्यात अपराधी दाऊद इब्राहिम को अपराध जगत में पैर पसारने का मौका तब मिला जब हाजी मस्तान राजनीति में चला गया था। मस्तान के राजनीति में सक्रिय होने के बाद पूरे गिरोह का जिम्मा दाऊद इब्राहिम संभालने लगा। दाऊद के पिता इब्राहिम कास्कर पुलिस में सिपाही थे। 1980 में जब दाऊद 25 वर्ष का था तब पहली बार उसके खिलाफ चोरी का मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मुकदमे में उसे गिरफ्तार करके जेल भेजा गया। जैसे-जैसे समय बदलता गया दाऊद का अपराध बढ़ता गया। उस दौर में हाजी मस्तान गिरोह की पठान गिरोह से दुश्मनी चल रही थी। इस दुश्मनी में मस्तान गिरोह की तरफ से दाऊद इब्राहिम काफी ताकतवर होता चला गया। इस दुश्मनी में पठान गिरोह ने दाऊद के भाई सब्बीर कास्कर की हत्या कर दी थी। दाऊद ने उस हत्या का बदला लिया और उसके बाद अपराध के जरिए धन अर्जित करने लगा। दाऊद हथियारों और विस्फोटक पदार्थों की तस्करी बड़े पैमाने पर कर रहा था। इसके साथ ही वह सट्टा, ‘मनी लांड्रिंग’ और हवाला का कारोबार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करने लगा था।

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दाऊद इब्राहिम , सोहराबुद्दीन शेख

 मुम्बई बम धमाके के बाद दाऊद का नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुख्यात हुआ। 12 मार्च, 1993 को मुम्बई में लगातार 12 बम विस्फोट हुए। इसमें 257 लोग मारे गए थे और 713 लोग घायल हुए थे। इस मामले में अबू सलेम समेत 100 से अधिक अभियुक्तों को सजा हो चुकी है। दाऊद अभी भी फरार है।

सोहराबुद्दीन का अंत
उज्जैन के समीप झिरन्या नामक छोटे से गांव का रहने वाला सोहराबुद्दीन शेख 26 नवंबर, 2005 को गुजरात पुलिस की गोलियों का शिकार हुआ। सोहराबुद्दीन एक रसूखदार खानदान से ताल्लुक रखने वाले अनवरुद्दीन शेख के पांच बेटों में दूसरा था। देश की स्वतंत्रता के पहले झिरन्या के शेख परिवार के पास ‘ठाकुर’ की सम्मानजनक पदवी थी और वे 1,000 बीघा से अधिक जमीन के मालिक थे। बाद में भी इनका रसूख कायम रहा और अनवरुद्दीन की पत्नी जेबुनिसा लम्बे समय तक गांव की सरपंच भी रही। सोहराबुद्दीन की अपराध कथा 1989 में शुरू हुई जब वह शरीफ खान उर्फ छोटा दाऊद के संपर्क में आकर नशीले पदार्थ की तस्करी में शामिल हुआ। बाद में सोहराबुद्दीन, अब्दुल लतीफ शेख, जो 1993 के बम विस्फोट में शामिल था और गुजरात का रहने वाला था, के गिरोह में शामिल हो गया। लतीफ के साथ सोहराबुद्दीन अवैध हथियारों के धंधे में शामिल हो गया। 1994-95 में गुजरात पुलिस ने अवैध हथियारों के खिलाफ अभियान छेड़ा तो लतीफ ने दाऊद इब्राहिम द्वारा बड़ी संख्या में भेजे गए हथियार सोहराबुद्दीन को सौंपे। सोहराबुद्दीन ने उन हथियारों को अपने गांव के एक कुंए में छिपा दिया।


कानूनी खामियों का फायदा
उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता प्रवीण कुमार गिरी बताते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया का अगर ठीक ढंग से पालन किया जाए तो अपराधी के बचने की गुंजाइश नहीं रहती है। एफआईआर दर्ज होने के बाद विवेचक पर प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। विवेचक का यह कर्तव्य है कि वह साक्ष्य संकलन में किसी भी प्रकार की कोताही न करे। विवेचक द्वारा संकलित साक्ष्यों पर ही मुकदमा आगे बढ़ता है। लेकिन ऐसे मामलों में अपराधी गवाहों को डरा-धमका देते हैं। नतीजा होता है कि गवाह पलट जाता है और अपराधी बरी हो जाता है।  और देखा जाता है कि अक्सर गवाह मुकर जाते हैं और विवेचक के काम पर पानीअपराधी बच निकलता है। 


गुजरात पुलिस ने छापा मारकर उन हथियारों को, जिनमें बड़ी संख्या में एके-47, और एके-56 जैसी आॅटोमैटिक राइफल और हथगोले थे, बरामद किया। सोहराबुद्दीन के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून ‘टाडा’ के तहत कार्रवाई की गई थी। करीब 5 साल जेल मे बंद में रहने के बाद उसे उच्चतम न्यायालय से 2000 में जमानत मिली। इसके बाद उसने राजस्थान में संगमरमर के व्यापारियों के अपहरण और वसूली का काम जोर-शोर से किया। दरअसल, उसका छोटा भाई नवाबुद्दीन राजस्थान में संगमरमर के धंधे में था इसलिए सोहराबुद्दीन ने उस ओर रुख किया। इसी दौरान 2004 में उदयपुर के हमीद लाला हत्याकांड सहित अनेक हत्याओं और वसूली में उसकी संलिप्तता पाई गई। राजस्थान सरकार ने उस पर 25,000 रु. का ईनाम भी घोषित किया था।   

चाहे बाहुबल से नेता बने लोग हों या फिर कुख्यात बदमाश, ये लोग हमारी व्यवस्था में मौजूद कमजोरियों का फायदा उठाते हैं। इसलिए व्यवस्था को ठीक करने की जरूरत है।
(‘इनपुट’ महेश शर्मा)