सकारात्मकता को बनाएं साथी

    दिनांक 21-जुलाई-2020
Total Views |
रामानंद  
वैश्विक महामारी के कारण इन दिनों लोग अपने घरों में बंद हैं। बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं, जो अकेले रह रहे हैं। अकेलापन से लोगों में एक अजीब बैचेनी और निराशा घर कर रही है। इस हालत में हमारी सकारात्मक सोच ही हमें बचा पाएगी। इसलिए चाहे जो भी परिस्थिति आए सकारात्मकता का साथ न छोड़ें

eee_1  H x W: 0

कोरोना वायरस, जो कुछ माह पूर्व तक हमारे परिवेश में कहीं दूर-दूर तक नहीं था, का प्रभाव अब हमारे जीवन का स्थाई भाव बन गया है। हमारी चर्चाओं में, हमारी कल्पनाओं में कोरोना शामिल हो चुका है। हमारी शब्दावलियां कोरोना और इससे उपजी परिस्थितियों से पटी पड़ी हैं।

तमाम देश समाज, जो पहले इसको कोई कारक नहीं मान रहे थे आज वे नतमस्तक हो गए हैं। दुनिया का शायद ही कोई देश हो जिसकी सामाजिक मन-स्मृति में इस वायरस को लेकर कोई नकारात्मक बात न हो। यूरोप हो या अमेरिका या विश्व पटल पर अपनी पहचान को लेकर अड़ा चीन सब इसके प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव का परिणाम भुगत रहे हैं। अब सभी राष्ट्र इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि कैसे इससे बचने के लिए दवाई जल्दी से जल्दी बने। अमेरिका, भारत और चीन सहित कई देश इस महामारी से बचने हेतु दवाई पर काम कर रहे हैं, मगर यह कार्य अभी शुरुआती दौर में है। इसलिए दवाई की खोज और उसका उत्पादन तथा उसके सभी तक पहुंचने में अभी काफी समय है। सभी राष्ट्रों में इस महामारी ने वहां की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में परिवर्तन लाया है। इस वायरस ने अगर किसी पहलू को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तो वह व्यक्ति का सामाजिक पहलू है। वायरस ने व्यक्ति के समाजीकरण की गति और स्वरूप पर विशेष प्रभाव डाला है। बहुत से राष्ट्रों में समाज का व्यवहार व चरित्र दोनों बदल गए हैं।

भारत में भी पलायन के फलस्वरूप समाज के व्यवहार का परीक्षण भी हुआ और इसमें परिवर्तन भी। इस महामारी ने लोगों को घरों में कैद कर दिया है। इस कारण लोगों की उपस्थिति समाजीकरण वाले स्थानों पर नगण्य हो गई है। इस महामारी की प्रवृत्ति लोगों को सामूहिकता की भावना से विमुख कर रही है। लगातार ‘लॉकडाउन’ के कारण लोगों के सामाजिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने की स्मृतियां भी क्षीण होने लगेंगी, क्योंकि लोगों का सार्वजनिक स्थानों पर जाना बंद या बहुत सीमित हो गया है। एक समाज के रूप में हम अपनी कई आवश्यकताओं के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हैं। लोगों से मिलना, परस्पर व्यवहार और संवाद सामाजिक जीवन का अभिन्न अंग है। मगर इस बीमारी के अचानक आगमन ने इन सब प्रक्रियाओं को रोक दिया है। हम तकनीक, विशेष रूप से मोबाइल फोन और अन्य माध्यमों को समाज में व्यक्तिवादिता को बढ़ाने का कारक मानते थे मगर इस महामारी ने इस प्रक्रिया को सहसा बढ़ा दिया है।

इस महामारी में यह आवश्यक है कि हम भौतिक दूरी बनाकर रखें, क्योंकि इसी के माध्यम से ही हम इस महामारी को अपने से दूर कर सकते हैं। भारत जैसे देश में जहां जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है और संसाधन कम, वहां भौतिक दूरी को कायम करने के एकमात्र उपाय के रूप में ‘लॉकडाउन’ को अपनाया गया है, क्योंकि सामान्य साधनों से भौतिक दूरी को कायम करना संभव नहीं है। इस महामारी के दौर ने एक बात और स्पष्ट की है कि इस प्रकार के दौर में जब आर्थिक, सामाजिक अनिश्चितता बढ़ रही है, ऐसे समय में व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सहायता की और भी ज्यादा आवश्यकता है, जो ‘लॉकडाउन’ की परिस्थितियों में संभव नहीं है। इस समय हमारे समाज में ऐसी बहुत बड़ी जनसंख्या है, जिसको भावनात्मक सहायता की आवश्यकता है। वरिष्ठ नागरिक, बच्चे, अकेले रह रहे परिवार, शहरों में अटके मजदूर सभी एक अनिश्चितता और नकारात्मकता  के दौर से गुजर रहे हैं। इनको आवश्यक वस्तुएं फिर भी प्राप्त हो जा रही हैं, क्योंकि इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कई सारे समूह कार्य कर रहे हैं, मगर इनको भावनात्मक सहयोग तथा मनोवैज्ञानिक सहायता देने हेतु बहुत कम संस्थाएं कार्य कर रही हैं।

तकनीक, जिसे भौतिक दूरी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार माना जा रहा था, संकट की इस घड़ी में बहुत सहायक सिद्ध हो रही है। हमें तकनीक की सहायता से भौतिक दूरी कायम करते हुए सामाजिक और भावनात्मक दूरी को कम करना होगा।

इस कठिन समय में जब शासन स्वयं लोगों को एकांत के लिए प्रेरित कर रहा हो और भौतिक दूरी को बढ़ाने के संस्थागत प्रयास हो रहे हैं, ऐसे समय यह आवश्यक है कि सामाजिक संस्थाएं आगे निकल कर आएं और भौतिक दूरी और  सामाजिक दूरी में भेद स्पष्ट करते हुए, समाज में फैल रही सामाजिक दूरी को कम करने का प्रयास करें, क्योंकि सामाजिक दूरी, भावनात्मक दूरी बढ़ाने का कार्य कर रही है।

अब जब केंद्र सरकार ने एक वृहद् राहत पैकेज घोषित कर दिया है और यह उम्मीद की जा रही है कि लोगों की आर्थिक गतिविधियों में कुछ गति आएगी, मगर अर्थव्यवस्था को अपने पूर्व की अवस्था में आने में कुछ माह अवश्य लगेंगे। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी आर्थिक विकास की दर नकारात्मक रहने की संभावना जताई है। ऐसे समय में जब सामाजिक और आर्थिक जगत से नकारात्मक संकेत मिल रहे हों तो हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी सकारात्मकता को बरकरार रखना है।

हर समाज में सभी प्रकार के लोग होते हैं। किसी को समाज का सकारात्मक पहलू दिखाई पड़ता है, तो किसी को समाज का नकारात्मक पहलू। नकारात्मक कहानियां भी समाज में कही जा रही हैं, जिनमें कुछ सत्य और कुछ अनुमान और कल्पना आधारित हैं, मगर ऐसे समय में आशा और सद्भावना आधारित सकारात्मक कहानियां भी आवश्यक हैं। इस हालत में ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं का सामने आना आवश्यक है, जो आशा और संभावना की कहानियां लोगों को सुनाएं, जो केवल यथार्थ के नाम पर अंधकार की बात न करें, अपितु लोगों को उजाले की राह भी दिखाएं। भारतीय समाज में बहुत से ऐसे लोग हैं, जो आशा और संभावना की कहानियां सुनाना जानते हैं। हमारे देश में ऐसे बहुत से अनौपचारिक संस्थान हैं, जो लोगों को प्रेरित करते हैं। ऐसे सभी समूहों और व्यक्तियों की सहायता ली जानी चाहिए, जो समाज में उत्साह और नव सृजन के बीज बो सकें।                          
 (लेखक ‘सेंटर आफ पॉलिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस’ के निदेशक हैं)