लोकतांत्रिक देशों के लिए खतरा है चीन

    दिनांक 22-जुलाई-2020
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कर्नल (सेनि.) मूल भार्गव
 
चीन अपनी तानाशाही को सही सिद्ध करने के लिए आसपास के लोकतांत्रिक देशों को कल,बल और छल से अस्थिर करके अपने लोगों को बताना चाहता है कि लोकतंत्र विफल हो रहा है
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जब से शी जिनपिंग ने अपनी आंतरिक राजनीतिक स्थिति  मजबूत की है, तब से चीन की विदेश नीति लगातार आक्रामक होती जा रही है। चाहे ताइवान हो, हांगकांग हो, आॅस्ट्रेलिया हो या भारत, आसपास के लोकतांत्रिक देशों के प्रति उसका रवैया बेहद आक्रामक और धौंस भरा होता जा रहा है। जहां भी लोकतांत्रिक प्रणाली है, चीन प्रयास कर रहा है कि उन सरकारों को साम-दाम दण्ड या भेद से अपनी तरफ मिला लिया जाए या अस्थिर कर दिया जाए। जहां उसने पाकिस्तान, श्रीलंका, मॉरीशस जैसे देशों को कर्ज के जाल में उलझा लिया है, वहीं नेपाल को वामपंथी विचारधारा में फंसाकर, धमका कर अपने खेमे में कर लिया है।
जो देश अपने दम पर चीन के दमनचक्र से लड़ रहे हैं, उन्हें लगातार सैनिक धमकियों या कूटनीतिक चालों से दबाने और अस्थिर करने के प्रयास चीन लगातार कर रहा है। ताइवान, हांगकांग, वियतनाम और भारत इसके ताजा उदाहरण हैं। आॅस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देश, जिसने चीन के आर्थिक विकास में मित्र के रूप में खूब साथ दिया, को आज का चीनी प्रशासन खुलेआम धमकाने में बिल्कुल नहीं हिचकता। हाल ही में आॅस्ट्रेलिया के सामान पर लगे आर्थिक दण्ड इस बात का जीता जागता प्रमाण है। जापान व दक्षिण कोरिया से चीन का पुराना छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है। और अब तो चीन अमेरिका व यूरोप के देशों को भी धमकाने से गुरेज नहीं करता। हाल में अमेरिका व इंग्लैंड में चल रहे हिंसक आंदोलनों में चीन समर्थित वामपंथी गुटों का हाथ होने की प्रबल शंका है। कोरोना महामारी चीन से शुरू हुई और उसकी लापरवाही और चालाकी से पूरे विश्व में फैल गई। चीनी प्रशासन ने अपनी जनता को क्रूर दमन से दबा कर अपने यहां इस महामारी को नियंत्रण करने का दावा किया पर बाकी विश्व में इसे चुपचाप फैलने दिया जिससे स्तिथि भयावह हो गई है। इस महामारी से पूरे विश्व का सामाजिक और आर्थिक ताना-बाना तहस-नहस होने की कगार पर पहुंच गया। और जब विश्व के अन्य देशों ने इसकी तह तक जाने की कोशिश की तो चीन की तानाशाही सरकार खुलेआम धमकियों और दुर्व्यवहार पर उतर आई।

भयंकर चीनी साजिश का मुकाबला सभी लोकतांत्रिक देशों को मिलकर करना होगा, अन्यथा आने वाले दशकों में चीन की तानाशाही विश्व विनाश का रूप ले लेगी। समय आ गया है कि चीन की धौंस को एक संगठित तरीके से हराया जाए।

चीन ऐतिहासिक तौर से क्रूर तानाशाहों का अड्डा रहा है। चीनी शासक वर्ग के मूल में ही क्रूरता और हिंसा है। उसका सबसे बड़ा खामियाजा चीन के साधारण निवासी कई दशकों से भर रहे हैं। मनुष्य सिर्फ धन से ही प्रसन्न नहीं होता, स्वतंत्रता भी एक अति आवश्यक मानवीय आवश्यकता है। चीन अपनी जनता को जितना भी दबा ले, पर आने वाले समय में वहां लोकतंत्र की मांग उठेगी ही। इसी डर से वहां का वामपंथी शासन अब इस प्रयास में लगा है कि आसपास के लोकतांत्रिक देशों को अस्थिर कर विफल साबित किया जाए, ताकि वह अपनी तानाशाही को सही साबित कर सके।
 चीन द्वारा भारतीय सीमा पर अतिक्रमण की कोशिश बहुत ही खतरनाक मनोवृत्ति को दर्शाता है। चीन को लगता है कि अगर किसी भी तरीके से भारत को पहले की तरह दबा लिया जाए तो एशिया में वह आसानी से दादागिरी कर सकता है। लेकिन सौभाग्य से भारत की सेना और नेतृत्व, दोनों ही सशक्त व देशभक्त हैं। चीन को करारा जवाब देने में भारत सक्षम है।
पर भयंकर चीनी साजिश का मुकाबला सभी लोकतांत्रिक देशों को मिलकर करना होगा, अन्यथा आने वाले दशकों में चीन की तानाशाही विश्व विनाश का रूप ले लेगी। समय आ गया है कि चीन की धौंस को एक संगठित तरीके से हराया जाए। सौभाग्य से भारत व आॅस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों की हाल में हुई बातचीत ऐसा ही संकेत दे रही है। जापान, वियतनाम और दक्षिण कोरिया भी अब खुलकर इस धौंस के विरुद्ध उतर रहे हैं। आने वाला दशक इस दृष्टि से निर्णायक होगा कि विश्व में लोकतंत्र हावी होगा या चीन की तानाशाही।  इसके लिए नए आर्थिक और कूटनीतिक धुरी बनानी होगी। लोकतांत्रिक देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं की चीन पर निर्भरता घटानी होगी और अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ बेहतर तालमेल बिठाना होगा। सभी लोकतांत्रिक देश मिलकर चीन को हराएं और वहां के लोगों को भी लोकतंत्र का मीठा स्वाद चखाएं।
(लेखक समसामयिक विषयों के टिप्पणीकार हैं)