कम्युनिस्ट, चीन दुनिया के लिए घातक

    दिनांक 22-जुलाई-2020
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स्मरणिका बनर्जी 

दुनिया में जहां भी कम्युनिस्ट शासन रहा, बड़े पैमाने पर नरसंहार हुए। कम्युनिस्टों ने हमेशा अपनी विचारधारा को राष्ट्र के ऊपर रखा। कम्युनिस्ट विचारधारा किसी भी रूप में सत्ता के विरुद्ध असंतोष को पनपने नहीं देती है। भारत के साथ चीन के बिगड़ते संबंधों का कारण भी यही विचारधारा है। इसलिए न तो कम्युनिस्ट और न ही चीन पर भरोसा किया जा सकता है

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1962 के बाद चीन तीन बार भारत से भिड़ चुका है, लेकिन तीनों बार उसे मुंह की खानी पड़ी।

इतिहास साक्षी है कि भारत-चीन की सभ्यता और संस्कृति प्राचीन ही नहीं, उत्कृष्ट भी है। दोनों देशों के बीच परस्पर आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के अनेक प्रमाण मिलते हैं, लेकिन ऐसा क्या हो गया कि हालात इतने बदल गए? इसी को जोड़ने वाली कड़ी का नाम है कम्युनिज्म। दोनों देशों के बीच मौजूदा तनाव की जड़ यही ‘वाद’ है। लेकिन आज की परिस्थिति को समझने के लिए हमें अतीत में झांकना पड़ेगा।

मई 1919 के चौथे आंदोलन के बाद चीन में व्यापक रूप से मार्क्सवादी विचारों का प्रसार होने लगा था। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना 1921 में शंघाई के फ्रांसीसी रियायत में चेन डक्सीउ और ली डझाओ द्वारा की गई थी। लेकिन आधिकारिक रूप से इसकी शुरूआत जुलाई 1921 में शंघाई और जियाक्सिंग में आयोजित एक कांग्रेस के साथ हुई थी। 1934-35 के लांग मार्च के दौरान माओत्से तुंग और झू डे जैसे प्रमुख कम्युनिस्टों ने सत्ता हासिल की। कुओमितांग की हार के साथ माओत्से तुंग ने 1 अक्तूबर, 1949 में बीजिंग में पीपुल्स रिपब्लिक आॅफ चाइना की स्थापना की। चियांग काई शेख ने 1 मार्च को चीन गणराज्य के राष्ट्रपति के रूप में दोबारा काम शुरू किया। इसके बाद चीन ने 25 अक्तूबर, 1950 को तिब्बत पर हमला कर दिया।

कम्युनिस्ट चीन ने पूर्वी तिब्बत पर हमला कर चामदो पर कब्जा कर लिया। चीन सरकार ने इस हमले को ‘तिब्बत की शान्तिपूर्ण मुक्ति’ कहा, जबकि निर्वासित तिब्बत सरकार ने ‘तिब्बत पर चीनी आक्रमण’। अपनी इसी विस्तारवादी नीति के तहत पीपुल्स रिपब्लिक आॅफ चाइना ने समूचे तिब्बत पर नियंत्रण प्राप्त किया। तिब्बत की तत्कालीन स्थिति पर जवाहर लाल नेहरू को सबसे ज्यादा ध्यान देना चाहिए था, लेकिन एक तरफ वह तिब्ब्त के विरुद्ध हो गए और दूसरी तरफ इस आक्रमण में चीन का साथ दिया। नतीजा, चीन ने अक्साई चिन के माध्यम से एक सड़क का निर्माण कर लिया, जिससे उसे घुसपैठ का मौका मिल गया। इसके बावजूद नेहरू ‘पंचशील’ और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा भारतीय जनता को बेचने की बेचने की कोशिश में जुटे हुए थे। इस तरह नेहरू ने हमेशा के लिए भारत को कम्युनिस्ट चीन के आक्रमण के लिए खुला छोड़ दिया, क्योंकि उनके लिए भारत की सुरक्षा और इसके भविष्य से अधिक महत्वपूर्ण भारतीय जनता के बीच बन रही अपनी राजनीतिक छवि को बचाने की चिंता थी। यह अफसोस की बात है, लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि तिब्बत की घटना को जल्दी ही भुला दिया गया।

सबसे दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण 1942 का है, जब सीपीआई भारत छोड़ो आन्दोलन के खिलाफ थी। भारतीय कम्युनिस्टों को मॉस्को का निर्देश था कि वे कांग्रेस का विरोध करें। आजादी के कुछ माह के भीतर ही 1948 में सीपीआई ने कहना शुरू किया कि ‘यह आजादी फर्जी है’, खासकर उस समय देशवासियों का मनोबल बढ़ाने की जरूरत थी, क्योंकि भारत पुनर्निर्माण और संवेदनशील दौर से गुजर रहा था। यह भी एक ज्ञात तथ्य है कि 1962 के युद्ध के दौरान सीपीआई ने चीन का समर्थन किया था। यानी भारत में महत्वपूर्ण अवसरों पर कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ या चीन के इशारे पर ही काम किया है। 1942, 1948 और 1962 इन तमाम अवसरों पर कम्युनिस्टों ने भारतीय हितों की परवाह किए बिना मॉस्को या पीकिंग के इशारे पर काम किया।

संडे गार्डियन लाइव के 17 जून, 2020 में प्रकाशित खबर के अनुसार, 1958 में एक चीनी सैन्य मिशन को भारत के प्रमुख रक्षा प्रतिष्ठानों का दौरा करने करने की अनुमति दी गई थी। जब 1975 और 1977 के बीच देश में आपातकाल लागू हुआ तो एक बार फिर कम्युनिस्टों ने खुले तौर पर अपने नापाक मंसूबों के तहत इंदिरा गांधी का समर्थन किया। नवंबर 1962 में चीन ने अक्साई चिन से लेकर पूर्व में अरुणाचल प्रदेश तक कब्जा करना चाहा था, इसे लेकर लद्दाख के रेजांग दर्रे पर दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक लड़ाई हुई थी, जिसमें मेजर शैतान सिंह दुश्मन के ठिकानों को तबाह करने में सफल रहे। 13वीं कुमाऊं रेजीमेंट के जवानों ने अपना बलिदान देकर लद्दाख को चीन के चंगुल से छुड़ाया। इनमें मेजर शैतान सिंह भी शामिल थे, जिन्हें सेना ने ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया। कम्युनिज्म के कहर से आज भी दुनिया का कोई देश अछूता नहीं है। द इंडियन एक्सप्रेस में 14 जुलाई, 2009 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, 1990 में सीपीएम के कुछ कार्यकर्ताओं ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम के दो पार्षदों का अपहरण कर लिया था। पार्टी के तत्कालीन महासचिव नंबूदरीपाद ने केरल के तत्कालीन राज्य सचिव अच्युतानंदन को ‘इस मुद्दे को सुलझाने’ के लिए कहा था।

वन इंडिया डॉट कॉम में 15 जून, 2017 को प्रकाशित एक खबर के मुताबिक, अच्युतानंदन उस समय सीपीएम पोलित ब्यूरो के सदस्य थे। उन्होंने भारतीय सैनिकों के लिए रक्तदान शिविर का आयोजन करने का सुझाव दिया था, लेकिन उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। यह इस बात का प्रमाण है कि कम्युनिस्टों ने हमेशा अपनी विचारधारा को राष्ट्र के ऊपर रखा। हाल ही में भारत-चीन युद्ध के संदर्भ में वाम मोर्चा के अध्यक्ष और सीपीएम के वरिष्ठ नेता बिमान बसु ने अमेरिकी गठबंधन के समर्थन में बात की और कहा कि कुछ स्वतंत्रता बनाए रखना जरूरी नहीं था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कम्युनिज्म की भूमिका अप्रासंगिक है। कम्युनिस्ट क्रांति के बाद समाजवाद का पतन हुआ। इसी के साथ सोवियत रूस में लेनिन, स्टालिन, चीन में माओ जे डांग, कम्बोडिया में पोल पॉट जैसे कम्युनिस्ट नेताओं के नेतृत्व में बर्बरपूर्ण तरीके से कई नरसंहारों की पुनरावृत्ति की। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जो कम्युनिस्टों की करतूत की कहानी कहते हैं। किसी भी रूप में सत्ता के विरुद्ध असंतोष को पनपने नहीं देना ही कम्युनिज्म का एकमात्र उद्देश्य है। 1979 में पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्टों का मरिचझापी नरसंहार जलियांवाला बाग से कम बर्बर नहीं था। कम्युनिस्टों ने बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था। इसी तरह, शहरी नक्सलवाद के रूप में कथित वामपंथी बुद्धिजीवियों ने ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’, ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी’ जैसे देश को तोड़ने वाले नारों का समर्थन करते हुए उसे बढ़ावा दिया।

कम्युनिज्म और चीन सारी सीमाएं लांघ चुका है। भारतीय कम्युनिस्टों को राष्ट्रीय संप्रभुता के महान रक्षक के रूप में देखना हास्यास्पद है। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए अब सही राह चुनने समय आ गया है। केवल चीनी उत्पादों का बहिष्कार ही पर्याप्त नहीं है, वास्तव में हमें अपनी मातृभूमि, अपने देश के प्रति सम्मान और सबसे ऊपर सरहद पर वीर गति पाने वाले सैनिकों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करनी होगी। इसके बाद शायद भारतवासियों से चीनी उत्पाद का बहिष्कार करने का अपील करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। चीन ने 1962 में अक्साई चिन, 1963 में काराकोरम दर्रा, 2008 में टिया पंगनाक और छाबजी घाटी, 2009 में डूम चेले, 2012 में डेमजोक, 2013 में राकी नूला पर कब्जा कर लिया, इसलिए नहीं कि हमारी सेना युद्ध में पराजित हुई, बल्कि इसलिए कि उस समय की सरकार अक्षम थी। वह चीन के साथ सख्ती से निपटने में नाकाम रही। आज वही चीन 2017 में डोकलाम और अब पैंगोंग त्सो व गलवान घाटी पर कब्जा करने में असफल रहा, क्योंकि केंद्र में नरेंद्र्र मोदी की सशक्त सरकार है। (लेखिका इतिहास की प्राध्यापिका हैं)