कितना मुश्किल है इस्लामिक देशों में चर्च-मंदिर बनना

    दिनांक 22-जुलाई-2020   
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अपने को प्रगतिशील और सेकुलर कहने वाले तुर्की के हागिया सोफिया चर्च म्यूजियम को मस्जिद में बदलने के फैसले से सारी दुनिया निराश और गुस्से में है। हागिया सोफिया चर्च म्युज़ियम को मस्ज़िद में तब्दील करने के तुर्की के इस्लामिक कट्टरपंथी राष्ट्रपति रजब-तैयब एर्दोगन की कार्रवाई की खुली भर्त्सना की जानी चाहिए। इस निंदनीय कार्य की भर्त्सना में किसी तरह की लाग लपेट की गुंजाइश नहीं बनती है।
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अपने को प्रगतिशील और सेकुलर कहने वाले तुर्की के हागिया सोफिया चर्च म्यूजियम को मस्जिद में बदलने के फैसले से सारी दुनिया निराश और गुस्से में है। हागिया सोफिया चर्च म्युज़ियम को मस्ज़िद में तब्दील करने के तुर्की के इस्लामिक कट्टरपंथी राष्ट्रपति रजब-तैयब एर्दोगन की कार्रवाई की खुली भर्त्सना की जानी चाहिए। इस निंदनीय कार्य की भर्त्सना में किसी तरह की लाग लपेट की गुंजाइश नहीं बनती है।

अगर  इस कार्रवाई को रोका नहीं गया तो त्रासदियों का दौर ज़ारी रहेगा। इसलिए, इसे रोकने के लिए तमाम प्रगतिशील सेकुलर राजनीतिक-सामाजिक ताक़तों, ख़ासकर दुनियाभर  के मुस्लिम बुद्धिजीवियों, मजहबी विद्वानों, राजनीतिज्ञों, वैज्ञानिकों, समाज व मत सुधारकों का आगे आना आवश्यक है।

 
इस्लामिक देशों में मंदिरों-चर्चों के लिए कितना स्पेस
एक सवाल ये भी है कि क्या इस्लामिक देशों में चर्च, मंदिर, गुरुद्वारे के लिए स्पेस नहीं रहा या इनका बनना कठिन है ? हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के इस्लामाबाद शहर में एक मंदिर को बनाने के रास्ते में तमाम अवरोध खड़े हो रहे हैं। ये सबको पता है। हैरानी हो रही है कि तुर्की और पाकिस्तान के मसलों पर अब तक भारत के प्रगतिशील और सेकुलरवादी चुप हैं। याद करें कि दो-ढाई दशक पहले अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी हुकूमत द्वारा बामियान के विश्व धरोहर बुद्धमूर्तियों को तोड़ा गया था। इसी तरह से यरूसलम में मुक़द्दस अलअक्सा मस्ज़िद के अहाते का यहूदीकरण की नाज़ायज़ कोशिशें हुईं। ये सभी ग़ैरमजहबी कारनामे थे। अब इस कड़ी में तुर्की भी जुड़ गया है।

 
तुर्की के राष्ट्रपति रजब-तैयब एर्दोगन किसी कठमुल्ला से कम नहीं है। एर्दोगान अपने देश को कमाल अता तुर्क के सपनों का देश बनाने की बजाय अंधकार की तरफ लेकर जा रहे हैं। वे भारत विरोधी भी हैं। हालांकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए को हटाने के सवाल पर रजब-तैयब एर्दोगन पाकिस्तान का साथ दे रहे थे, पर भारत ने उसके शिखर पुरुष कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफ़ा कमाल पाशा का सम्मान ही किया। राजधानी दिल्ली में अतातुर्क के नाम पर एक खास सड़क कमालअतातुर्क मार्ग है। इतनी अहम सड़क का नाम अतातुर्क के नाम पर रखकर भारत ने आधुनिक तुर्की के निर्माता के प्रति अपने आदर के भाव को ही प्रदर्शित किया है।

 तुर्की के साम्राज्यवादी शासक सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय का पासा पलट कर वहाँ कमाल की सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था कायम करने का जो क्रान्तिकारी कार्य कमालअतातुर्क ने किया, उस ऐतिहासिक कार्य ने उनके नाम को सार्थक सिद्ध कर दिया। पर एर्दोगान अपने मुल्क को इस्लामिक दुनिया का एक आदर्श देश बनाने की बजाय धूल में मिला रहे हैं, जहां पर अल्पसंख्यकों के अधिकार नाम की कोई चीज नहीं होगी।

 अगर हम पीछे मुढ़कर देखें तो हागिया सोफिया को 15 सौ साल पहले यूनानी साम्राज्य में एक कैथेड्रल चर्च के तौर पर बनाया गया था। हालांकि 1453 में यूरोप में हुए आटोमन वॉर के बाद इसे मस्जिद में बदल दिया गया था। 1934 में तुर्की की कैबिनेट के फैसले के बाद इसे एक म्यूजियम में बदला गया। पर तुर्की की एक अदालत ने 86 साल बाद यह फैसला रद्द कर दिया। उसने कहा कि सेटलमेंट डीड में इसे मस्जिद बताया गया है। इसका दूसरे ढंग से इस्तेमाल कानूनी तौर पर संभव नहीं है। इसके बाद सरकार ने इसका म्यूजियम का दर्जा बदलकर मस्जिद बना दिया। जब इसे हागिया सोफ़िया चर्च म्युज़ियम बनाया गया था, तब तुर्की को अतातुर्क मुस्तफ़ा कमाल पाशा की सरपरस्ती मिली हुई थी।

फिलहाल यह यूनेस्को के वैश्विक धरोहरों में शामिल है। तुर्की के मुस्लिम लोग इसे मस्जिद में बदलने की मांग कर रहे थे, वहीं देश के सेकुलर वर्ग ऐसा करने के खिलाफ थे।


इतिहासकार डॉ. भगवान प्रसाद सिन्हा सही कहते हैं कि हागिया सोफ़िया चर्च म्युज़ियम मामूली नहीं था। यह ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों के लिए वही महत्व रखता था जो मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना का महत्व है। कैथोलिकों के लिए वैटिकन, यहूदियों के लिए यरूशलम, आम ईसाइयों के लिए बेथलहम, सिखों के लिए अमृतसर व नानकाना साहेब, हिंदुओं के लिए काशी, बौद्धों के लिए बोधगया का महत्व है। इतना ही नहीं यह पूर्वी रोमन साम्राज्य की शान व निशान की हैसियत में था। उस्मानी तुर्कों के दख़ल के बाद पुराने साम्राज्य की इस शान को मिटाने के लिए पहले शहर का नाम कुस्तुंतुनिया से बदल कर इस्ताबुल रख दिया गया और फिर कुस्तुंतुनिया की इस निशानेपाक गिरिजाघर को मस्जिद में बना दिया गया।

तुर्की के हालातों को भारत से जोड़कर भी देखें। जैसे अकबर की शासन नीतियों के कुछ विपरीत उसी मुगल वंश में औरंगज़ेब पैदा हो गया जिसने भारत के सामाजिक ताने—बाने को बर्बाद कर डाला था। उसी तरह तुर्की में मुस्तफ़ा कमाल पाशा अता तुर्क की नीति को ध्वस्त करते हुए एर्दोजन सामने आए। अतातुर्क की लगभग सभी नीतियां एर्दोजन ने उलट दीं। अतातुर्क ने मदरसों में पढ़ कर कूपमंडूक हो रहे तुर्कों को एकदम प्रगतिशील यूरोपियन बना दिया था और एर्दोजन फिर उसे अंधेरे के दौर में लेकर जा रहे हैं। वे आजकल कट्टरवादियों के दुलारे हो गये हैं।

ये सबको पता है कि पहले विश्वयुद्ध के बाद कमाल पाशा ने तुर्की में ख़लीफ़ा के पारंपरिक पद को उखाड़ फेंका। भारत में तुर्की में ख़लीफ़ा बहाली के लिये भारी आंदोलन हुए। भारत ने ख़लीफ़ा बहाली के आंदोलन में बड़ी कुर्बानियां दीं। पहले महात्मा गांधी ने खुले दिल भारतीय मुसलमानों का ख़िलाफ़त आंदोलन में साथ दिया लेकिन व्यापक हिंसा को देखते हुए हाथ खींच लिया ।

अतातुर्क से भारतीय मुसलमानों के प्रतिनिधिमंडल ने ख़ुद ख़लीफ़ा बन जाने का अनुरोध किया पर उसने ठुकरा दिया। वे अपनी प्रजा का सच्चा हितचिंतक था। उन्होंने जिस आधुनिक तुर्की का निर्माण किया वह किसी भी पश्चिमी देश को टक्कर देती थी।

 ख़ैर अब जब एर्दोजन ने हागिया सोफिया चर्च म्यूजियम को वापस मस्जिद बना दिया है तो प्रतिक्रिया तो होगी। अब यूरोप में इस्लाम के विरुद्ध नफरत फैल सकती है। कुल मिलाकर स्थिति  विस्फोटक है। अब एक ही उपाय है कि तुर्की में पुरानी व्यवस्था बनी रहे ताकि हालात हाथ से न निकले।