मजहबी-किताबी स्वीकृति एवं ऐतिहासिक पूर्वाधार

    दिनांक 22-जुलाई-2020
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डॉ. श्रीरंग गोडबोले

तुर्की सुल्तान के प्रति लगाव केवल भारत के उलेमा तक सीमित नहीं था। 1850 के दशक से ही मुस्लिम प्रेस
और सामान्य मुस्लिमों के मानस में यह लगाव दिखता है। 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों के समय के नवजात मुस्लिम प्रेस के अध्ययन से पता चलता है कि 1875 के रूस-तुर्की युद्ध से ही मुस्लिमों में अखिल-इस्लामी
भावना बढ़ने लगी थी


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19वीं सदी के बाद के वर्षों की तुर्की के सुल्तान की घुड़सवार सेना       (फाइल चित्र)
 

किसी दीनी मुस्लिम के लिए, सिद्धांत (तालीम-व-तरबियत) विवेक पर हावी होता है? इस्लामी सिद्धांत के तीन स्रोत हैं-कुरान, हदीस (पैगंबर मुहम्मद की कथनी एवं व्यवहार का आधिकारिक विवरण) तथा सीरत (पैगंबर मुहम्मद की जीवनी) या सुन्नत (पैगंबर मुहम्मद द्वारा दी गई पद्धति या परंपरा)। व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर पर यह केवल मजहबी-किताबी स्वीकृति ही है जो मुस्लिमों के किसी भी विचार या कार्य को नैतिक या कानूनी ठहराती है। अच्छाई, न्याय परायणता, बुद्धिमानी, शील, पाप-पुण्य के संबंध में मुस्लिमों की धारणाएं इस्लाम की मजहबी किताब बारीकी से निर्धारित करती है। यह आवश्यक नहीं कि इनके इस्लामी मानक वैश्विक मानकों से मेल खाते हों; इतना ही नहीं, इनके विपरीत होने की भी सम्भावना होती है। यद्यपि इस्लामी उम्माह (दीनियों का वैश्विक इस्लामी समुदाय) स्वभावत: राष्ट्रों की सीमाओं से परे है। वास्तविकता यही है कि वह भौगोलिक सीमाओं से बंटा है, जो इस्लाम को अमान्य है। राष्ट्रीय सीमाओं से परे कोई विचार किसी देश-बाह्य अखिल-इस्लामी राजनीतिक आंदोलन में परिणत होना कोई अचरज की बात नहीं। यदि भारतीय मुस्लिम कम से कम छह वर्ष तक खिलाफत आंदोलन से प्रभावित थे तो इस आंदोलन को मजहबी-किताबी आधार था, यह माना जा सकता है। मजहबी-किताबी आधार की वैधता कालातीत होने के कारण इस आंदोलन के इतिहास में पूर्ववर्ती आधार होने का तथा भविष्य में इसे दोहराये जाने का अनुमान लगाया जा सकता है।

आगे बढ़ने से पहले, शब्द ‘पैन-इस्लाम’ (अखिल-इस्लामवाद) के बारे में जानना आवश्यक है। ‘पैन-इस्लाम’ शब्द का पहला प्रयोग फ्रांज वॉन वर्नर (उर्फ मुराद एफेंदी) द्वारा ‘तुर्किसो स्केजेन’ (‘तुर्की रेखा-चित्र’ का जर्मन अनुवाद, 1877) पुस्तक में और बाद में 1881 में फ्रांसीसी पत्रकार गेब्रियल शार्म्स द्वारा किया गया। इसके निकटतम इस्लामी पर्यायवाची शब्द, इत्तिहाद-ए-इस्लाम या इत्तिहाद-ए-दीन और उहुव वेट-ए-दीन लंबे समय से भारत, मध्य एशिया और इंडोनेशिया के ओटोमन और मुस्लिम शासकों के बीच पत्राचार में इस्तेमाल किए जा रहे थे। हालांकि ‘पैन-इस्लाम’ अपेक्षाकृत देर से निर्मित शब्द है, इस विचार की जड़ें कुरान की निम्नलिखित आयत में हैं: ‘...यह है तुम्हारा (पैगंबर और उनकी उम्मतों का) तरीका कि वह एक ही तरीका है, और (हासिल उस तरीके का यह है) कि मैं तुम्हारा रब हूं, सो तुम मुझसे डरते रहो’ (23:52)।

आरंभिक इस्लामी इतिहास में खिलाफत

उत्तराधिकारी के अर्थ में खलीफा (बहु. खुलाफा) का उल्लेख कुरान की 2.30, 4.59, 6.165, 35.39 और 38.26 आयतों में है। पहला मुस्लिम शासक कोई और नहीं बल्कि पैगंबर मुहम्मद (570-632) स्वयं थे। हालांकि उन्होंने 610 में अपने मिशन की शुरुआत की, लेकिन उन्होंने 622 में मदीना पर शासन करना शुरू कर दिया। इस प्रकार अगले दस साल के लिए वह रसूल (पैगंबर), मुबल्लिग (दीन प्रसारक), इमाम (राज्य प्रमुख), मुफ़्ती (न्यायविद) और काजी (न्यायाधीश) भी थे। न तो कुरान, न ही पैगंबर मुहम्मद ने अपने खलीफा को नियुक्त किया! इस्लाम में, पैगंबर मुहम्मद अंतिम पैगम्बर हैं (कुरान 33:40), और उनका यह स्थान अन्य कोई नहीं ले सकता। लेकिन, शासक के स्थान को अन्य मुस्लिम ले सकता है। इस बारे में कुरान का आदेश यूं है, ‘ए ईमान वालो! तुम अल्लाह-त-आला का कहना मानो और रसूल का कहना मानो और तुममें जो लोग हुकूमत वाले हैं उनका भी...’(4:59)। हदीस में एक शासक के प्रति निष्ठा के बारे में कई आज्ञाएं हैं, उदाहरण के लिए ‘जो कोई भी पृथ्वी पर अल्लाह के एक शासक को बेइज्जत करता है, अल्लाह उसे बेइज्जत करेगा’ (तिर्मिजी, मिश्कात अल मस्बीह, खंड 2, इस्लामिक बुक सर्विस, दिल्ली,पृ. 560)। पहले खलीफा अबू बक्र की उपाधि, खलीफातु रसूल अल-अल्लाह (रसूल अल्लाह का उत्तराधिकारी) थी। पहले चार खुलाफा, अबू बक्र (632-34), उमर (634-44), उथमन (उस्मान, ओटोमन 644-56) और अली (656-61) को सुन्नी मुस्लिमों द्वारा अरबी लहजे में ‘खलीफा उर-राशिदुन’ (सही सलामत निर्देशित खुलाफा) कहा गया है।

ये सभी चार खलीफा कुरेश कबीले से थे, जिसमें कि पैगंबर मुहम्मद का हाशिमी वंश भी  शामिल था। उनके शासन-काल में इस्लामी सेनाओं ने सासानी साम्राज्य को परास्त किया, बाइजेन्टिन साम्राज्य को लगभग उजाड़ दिया, दक्षिण और मध्य एशिया में अपना विस्तार किया तथा उत्तर अफ्रीका से इबेरिआ प्रायद्वीप में प्रवेश किया। पहले चार खुलाफा (632-661) की अवधि को इस्लाम का स्वर्ण युग माना जाता है। विडंबना यह है कि स्वर्ण युग के चार खुलाफा में से तीन की हत्या कर दी गई। अली के बाद, खिलाफत उमैया वंश के हाथों में चली गई, और उथमन के कबीले के ये लोग 90 वर्ष तक शासन करते रहे। 750 में अब्बासी राजवंश ने उमैया को उखाड़ फेंका और बगदाद, इराक में अपनी खिलाफत को स्थापित किया। हालांकि अब्बासियों को इस्लामी जगत में कई अन्य राजवंशों को सत्ता हस्तांतरित करने के लिए मजबूर किया गया था, लेकिन उन्होंने 1517 में मिस्र पर ओटोमन तुर्की की जीत तक, खिलाफत पर अधिकार का दावा करना जारी रखा। ओटोमन खिलाफत का दावा 1517 से 1924 तक चला। ओटोमन साम्राज्य सिर्फ एक और मुस्लिम साम्राज्य या राज्य नहीं था। 1453 में जब से सुल्तान महमद ने कांस्टेंटिनोपल (कुस्तुन्तुनिया, आधुनिक इस्तांबुल) को जीता, ओटोमन तुर्की साम्राज्य ने करीब पांच शताब्दियों तक, ईसाई यूरोपीयों के विरोध में इस्लाम का झंडा लहराया।

खिलाफत का मिथक
यद्यपि दीनी मुस्लिम, मजहबी किताबों में निहित उम्माह की अवधारणा से बंधा हुआ है, लेकिन कठोर ऐतिहासिक वास्तविकता यह है कि मुस्लिमों ने एक-दूसरे के गले काटे हैं या फिर एक-दूसरे पर पाखण्डी होने का आरोप लगाया है। वे अविश्वासियों से भिड़ने पर ही उम्माह के रूप में व्यवहार करने लगते हैं। पैगंबर की मृत्यु के मात्र दो दशक बाद ही, शियाओं ने अली से पहले किसी खलीफा के होने से इंकार किया। खवारिजों ने तो खिलाफत की आवश्यकता पर ही प्रश्नचिन्ह उठाया। सुन्नियों के बीच भी इस बात पर बहस जारी है कि खलीफा को कुरैश कुल से ही होना चाहिए या नहीं।

750 के बाद वैश्विक स्तर पर सर्व-सम्मत खिलाफत नहीं रही। इस्लामी साम्राज्य के केंद्र और सीमान्त में कई स्वतंत्र शासक स्व-घोषित ‘अमीर-उल-मोमिनीन’ (विश्वासियों का अगुआ) और ‘खलीफा’ बन गए। एक समय था जब इस्लामी जगत में एक साथ तीन-तीन खुलाफा थे, जो विश्वासियों की निष्ठा होने का दावा करते थे। ‘केंद्रीय’ खिलाफत की अक्षमता के बावजूद उसकी महत्ता का मिथक उस पर पदानुक्रम का आवरण ओढ़ाकर तथा अल-मावर्दी (974-1058) और अल-गजाली (1058-1111) जैसे न्यायविदों की अतिप्रशंसा से चलाया गया। 1258 में मंगोलों के हाथों बगदादी खिलाफत की समाप्ति के बाद भी यह मिथक बचा रहा। सुन्नी मुस्लिम जगत का बड़ा हिस्सा पहले काहिरा के अब्बासी खुलाफा को और उसके बाद कांस्टेंटिनोपल के ओटोमन तुर्की सुल्तानों को अपनी निष्ठा जताता रहा (द खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया,1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय के लिए प्रस्तुत शोध प्रबंध,1973, पृ.7)।

भारत में खलीफा-सुल्तान की साठगांठ
711 में सिंध पर अरबों की विजय के प्रारंभिक दिनों से ही भारत केंद्रीय खिलाफत के इस मिथक से कुछ मात्रा में परिचित हुआ। लगभग पूरे मुगल-पूर्व काल में, सुल्तानों के विधिक अधिकार का स्रोत और स्वीकृति पहले बगदाद के अब्बासी खुलाफा पर और बाद में काहिरा-स्थित उनके निष्क्रिय उत्तराधिकारियों पर निर्भर मानी जाती थी। गजनी के महमूद (998-1030), शम्स-उद्-दीन इल्तुतमिश (1211-1236), मुहम्मद बिन तुगलक (1325-1351) जैसे सुल्तानों ने विशेष रूप से खलीफा का मानपत्र पाने का सफल प्रयत्न किया। यहां तक कि कुछ प्रांतीय सुन्नी राजवंशों, जिन्होंने दिल्ली से स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, ने अब्बासी खुलाफा से मान्यता की प्रार्थना की, जिनके नाम इनके सिक्कों पर भी दिखाई देते हैं। दिल्ली की सल्तनत से स्वतंत्रता प्राप्त कुछ प्रांतीय सुन्नी राजघराने अब्बासी खुलाफा के नाम से राज्य करते थे। इन खुलाफा के नाम उनके सिक्कों पर अंकित हुआ करते थे। यह प्रथा 1526 में मुगलों के आगमन तक जारी रही, जिनका शासन, लगभग उसी समय प्रारंभ हुआ जब खिलाफत का काहिरा से कांस्टेंटिनोपल ‘स्थानांतरण’ हो रहा था। यद्यपि दोनों साम्राज्यों के बीच राजनयिक आदान-प्रदान 18वीं शताब्दी के अंत तक जारी रहा, परन्तु मुगलों ने अन्य स्वतंत्र शासकों की तरह (जैसे, शिया फारस), कभी भी ओटोमन तुर्कों के ‘वैश्विक खिलाफत’ के  दावे को स्वीकार नहीं किया। जैसे ही मुगल शासन लड़खड़ाने लगा, इस स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव आ गया। ओटोमन तुर्कों के प्रति भारत के मुस्लिमों का लगाव 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में शुरू होने के थोड़े प्रमाण हैं। दिल्ली के प्रसिद्ध मुहद्दिस (हदीस के ज्ञाता) शाह वलीउल्लाह (1703-62) ने अपने ग्रंथ ‘तफहिमात-इ-इलाहियाह’ (यानी अल्लाह का आदेश) में तुर्की सुल्तान को दो बार अमीर-उल-मोमिनीन के रूप में संबोधित किया। 1789 में ओटोमन खलीफा अब्दुल हमीद प्रथम से शाही अलंकरण प्राप्त करने के टीपू सुल्तान के प्रयत्न में यही बात उजागर होती है (कुरैशी, उक्त, पृ.8-9)।



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सर सैयद अहमद खान: भारत में खिलाफत के मिथक को लोकप्रिय बनाने
की कोशिश में जुटे मध्यमवर्गीय मुसलमानों के अगुआ रहे      (फाइल चित्र)

1919 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत भारत में हुई, ऐसा आभास हो सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में इस्लामी शासन के शुरुआती दिनों से उसके लिए मजहबी-किताबी स्वीकृति एवं ऐतिहासिक पूर्वाधार था। केंद्र्रीय  खिलाफत के मिथक को सुल्तानों और बादशाहों, उलेमा और बुद्धिजीवियों तथा सामान्य मुस्लिम जनता ने जीवित और पुरस्कृत किया। अखिल-इस्लामवाद की यह भावना भारत तक ही नहीं, बल्कि अधिकांश मुस्लिम जगत में प्रचलित थी। भारत का खिलाफत आंदोलन खिलाफत की बहाली हेतु चले एक लंबे संघर्ष की मात्र एक कड़ी थी।

भारत के उलेमा का पुराना तुर्की लगाव
ओटोमन खिलाफत के संबंध में भारत के उलेमा (आलिम का बहुवचन, इस्लाम का ज्ञाता) की भूमिका 1840 के दशक में निश्चित हुई। 1841 में मक्का में स्थानांतरण के बाद वलीउल्लाह के पोते शाह मुहम्मद इश्हाक (1778-1846) ने सर्वप्रथम ओटोमन राजनीतिक नीतियों का समर्थन किया। तब से वलीउल्लाह को मानने वाले उलेमा का रुझान वैश्विक खिलाफत पर ओटोमन दावेदारी के सक्रिय समर्थन का रहा। 1850 के दशक के प्रारंभ से ही स्वयं ओटोमन तुर्क अपने भारत स्थित दूतों के द्वारा खिलाफत पर तुर्की के सुल्तान की दावेदारी को बढ़ावा दे रहे थे। भारत के गवर्नर-जनरल लॉर्ड डलहौजी (1812-1860) ने 1854 में ही भारत के मुसलमानों में ‘अमीरुल मोमिनीन’ के प्रति सहानुभूति पाई, इसमें कोई आश्चर्य नहीं, बल्कि एक कांसुलर रिपोर्ट में यह भावना 1835 या 1836 से होने का संकेत मिलता है।

तुर्की के मजहबी अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों के कारण से 1854 में जब क्रीमिया का युद्ध छिड़ा, तब भारत, विशेषकर पश्चिमी सीमा-क्षेत्र के सभी मुस्लिमों में बड़ी रुचि और उत्तेजना पाई गई। इस्लामी शासन के बचे-खुचे अवशेष जैसे ही भारत से 1858 में लुप्त हुए, कांस्टेंटिनोपल से संबंध और घनिष्ठ हुए। ब्रिटिशों के प्रतिशोध से बचने के लिए भारत के उलेमा, जो एक केंद्र-बिंदु की खोज में थे, ओटोमन खलीफा की ओर देखने लगे। रहमतुल्लाह कैरानवी (1818-91), हाजी इमदादुल्लाह (1817-99), अब्दुल गनी (मृत्यु 1878), मुहम्मद याकूब (जन्म 1832) और खैरुद्दीन (1831-1908) मक्का चले गए और कुछ ने कांस्टेंटिनोपल का दौरा भी किया। करामत अली जौनपुरी जैसे ब्रिटिश-निष्ठा के पक्षधर उलेमा भी ‘ब्रिटिश कौम और अपने दीन के निजामे हुक्मरानी (मजहबी प्रमुख) के बीच मित्रता’ के आधार पर ही अपनी भूमिका रखते थे (कुरैशी, उक्त, पृ.8-9)।

भारतीय मुस्लिम मानस में खिलाफत
तुर्की सुल्तान के प्रति लगाव केवल भारत के उलेमा तक सीमित नहीं था। 1850 के दशक से ही मुस्लिम प्रेस और सामान्य मुस्लिमों के मानस में यह लगाव दिखता है। 19वीं शताब्दी के अंतिम दशकों के समय के नवजात मुस्लिम प्रेस के अध्ययन से पता चलता है कि 1875 के रूस-तुर्की युद्ध से ही मुस्लिमों में अखिल-इस्लामी भावना बढ़ने लगी। अगले चार दशकों में भारत में ब्रिटिश शासन के प्रति उनकी भूमिका में यह भावना मौलिक होकर दृढ़ हो गई। इन चार दशकों में तुर्की-यूनानी युद्ध (1896), त्रिपोली पर इतालवी छापा (1911) और बाल्कन युद्ध (1912-14) जैसी घटनाएं हुईं (समीक्षा: द खिलाफत मूवमेंट: रिलीजियस सिम्बोलिज्म एंड पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन, गेल मिनाल्ट; शरीफ अल-मुजाहिद द्वारा समीक्षा; पाकिस्तान होराइजन, खंड 39, क्रमांक 2, 1986, पृ.8)। इन दिनों भारतीय मुसलमान खुतबे में इस्लाम के खलीफा की लंबी उम्र, समृद्धि और जीत के लिए प्रार्थना कर रहे थे (खुतबा-मस्जिद से शुक्रवार दोपहर की नमाज के समय इस्लामी शासक की संप्रभुता को स्वीकार करते हुए पढ़ी जाने वाली प्रशस्ति) और 1870 से प्रेस तथा सार्वजनिक मंचों से इस हेतु दलीलें प्रस्तुत कर रहे थे (अल-मुजाहिद, उक्त पृ.81)। सर सैयद अहमद (1817-98) जैसे मध्यम-वर्ग के मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने केंद्रीय तुर्की खिलाफत के मिथक को लोकप्रिय किया।

अखिल इस्लामवाद और भारत के मुसलमान
1830 के दशक से भारतीय मुसलमानों के तुर्की से लगाव को समझने के लिए तीन विशेषताओं को रेखांकित किया जाना चाहिए। पहली, अखिल-इस्लामवाद के तत्व से लगाव भारत के मुसलमानों तक सीमित नहीं था। 17वीं शताब्दी के प्रारंभ से मध्य एशिया, इंडोनेशिया और मलेशिया में अखिल इस्लामवादी आंदोलनों में तुर्की से जुड़ाव स्पष्ट था। दूसरी, तुर्की खिलाफत का मिथक, सुल्तान अब्दुल-अजीज (1861-76) और उसके उत्तराधिकारी अब्दुल-हमीद द्वितीय (1876-1909) जैसे तुर्की के सुल्तानों द्वारा, तुर्की की आंतरिक उथल-पुथल और बाहरी यूरोपीय अतिक्रमण के विरुद्ध उनकी स्थिति को मजबूत करने के लिए प्रचारित किया गया था। साथ ही, अरबों में राष्ट्रवादी आकांक्षाओं को प्रबल होने से रोकना भी इसका उद्देश्य था। इसमें उन्हें यूरोपीय शक्तियों द्वारा सहायता भी मिली, जिन्होंने आॅस्ट्रिया-हंगरी (1908), इटली (1912) तथा यूनान और बुल्गारिया(1913) के साथ की गई संधियों के द्वारा सुल्तान के दावों को स्वीकार किया। तीसरी, अन्य मुस्लिम देशों की भांति ओटोमन खिलाफत को मुस्लिमों को एकत्र करने में सहायक समझकर शियाओं ने सुन्नियों का साथ दिया। इस दिशा में बदरुद्दीन तैय्यबजी (1844-1906) और मुहम्मद अली रोगे जैसे बोहरा नेताओं ने उनके अंजुमन-इ-इस्लाम (बम्बई) संगठन के माध्यम से अगुआई की। हैदराबाद (दक्खन) के चिराग अली (1844-1895) और उसके बाद अमीर अली (1849-1928), आगा खान (1877-1957), मिर्जा हसन इस्पहानी, मुहम्मद अली जिन्ना (1876-1948) और अन्य नेताओं ने इसी दिशा को लेकर आगे काम किया (कुरैशी, उक्त , पृ. 15)।
1919 में खिलाफत आंदोलन की शुरुआत भारत में हुई, ऐसा आभास हो सकता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत में इस्लामी शासन के शुरुआती दिनों से उसके लिए मजहबी-किताबी स्वीकृति एवं ऐतिहासिक पूर्वाधार था। केंद्रीय खिलाफत के मिथक को सुल्तानों और बादशाहों, उलेमा और बुद्धिजीवियों तथा सामान्य मुस्लिम जनता ने जीवित और पुरस्कृत किया। अखिल-इस्लामवाद की यह भावना भारत तक ही नहीं, बल्कि अधिकांश मुस्लिम जगत में प्रचलित थी। 3 मार्च 1924 को तुर्की गणराज्य की वृहत असेंबली ने खिलाफत को, जिसे कमाल अतातुर्क ‘सभ्य और सुसंस्कृत जगत में मजाक का पात्र’ मानते थे, समाप्त कर दिया गया।

भारत का खिलाफत आंदोलन खिलाफत की बहाली हेतु चले एक लंबे संघर्ष की मात्र एक कड़ी थी। मुस्तफा साबरी एफेंदी (1869-1954); अंतिम तुर्क शेख-उल-इस्लाम,1924; अबुल आला मौदूदी, 1903-79, संस्थापक, जमात-ए-इस्लामी, 1967; तकि-उद्दीन अल-नभानी (1909-79), हिज्बुल तहरीर या पार्टी आॅफ लिबरेशन, जॉर्डन, 1925; सैयद कुत्ब, 1906-66; मिस्र का मुस्लिम ब्रदरहुड, 1964; मुल्ला मुहम्मद उमर, 1960-2013; तालिबान, 1996; अबू बकर अल-बगदादी,1971-2019; आईएसआईएस, 2014 आदि उन कुछ प्रमुख लोगों या गुटों में से हैं, जो 1924 के बाद खिलाफत के कट्टर समर्थक रहे। ध्यान रहे, खिलाफत पुन:स्थापन की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है। (क्रमश:..)                                                                                 
(लेखक इस्लाम, ईसाइयत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धि आंदोलन और पांथिक जनसांख्यिकी पर अनेक   पुस्तकों के रचयिता हैं)