गेशे जम्पा

    दिनांक 23-जुलाई-2020
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नीरजा माधव

तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की चौथी कड़ी

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तीस वर्षीय तेनजिन की पहली पत्नी गुजर चुकी थी। एक बेटी थी जिसकी देखरेख और गृहस्थी चलाने के लिए उसने अनाथ लोब्जंग से विवाह कर लिया था। अक्सर ही शराब पीकर वह रात में लौटता और लोब्जंग के साथ मारपीट करता। पेमा के जनम के 4—4 वर्ष बाद, एक दिन वह अपने कपड़ों का गट्ठर बांधकर घर से निकला तो फिर न लौटा। सौतेली बेटी सीरींग् का भी बोझा लोब्जंग पर ही आ पड़ा। ऐसे में लामा सोनम डक्पा ने उसे बढ़कर सहारा दिया था।
विचारों में डूबी लोब्जंग घर की चौखट पर पहुंची तो श्रृंखला टूटी। धीरे से दरवाजे की कुंडी पर उंगलियों से दस्तक दी। कौन? अंदर से एक बीमार पुरुष स्वर उभरा था। खोलो लामाजी, मैं हूं। आता हूं। कुछ देर में दरवाजा खुला था। सामने लामा सोनम डक्पा खड़े थे। सिर के खिचड़ी बालों को गूंथकर चुटिया के रूप में लपेट दिया गया था। कत्थई रंग का चीवर मुड़ा-तुड़ा था। दाहिनी कलाई में मंत्र जपने वाली धानी रंग के मोतियों वाली छोटी माला लिपटी थी। गले में शाल लपेटे लामा सोनम डक्पा का चेहरा पीला पड़ा था। क्या, तबीयत फिर भारी हो गई? लोब्जंग ने उनका मुरझाया चेहरा देखा, उचककर उनके माथे को अपनी हथेली से छुआ था। शरीर थोड़ा तप रहा था। नहीं, ठीक है। उनकी आवाज कमजोर थी। दवा ले ली थी आपने? लोब्जंग ने रसोई की ओर बढ़ते हुए पूछा। नहीं। वो खांसी वाली दवा तो कल ही खत्म हो गई थी। ओह, भगवान! मैं अभी आती हूं। लोब्जंग अपने पुराने बाक्स में कुछ ढूंढने लगी थी। आज मत जाओ। कल आना, तो लेती आना। नमक और गरम पानी दे दो। आराम हो जाएगा। लाब्जंग अपने बाक्स में कुछ बचे-खुचे फुटकर रुपये खोज रही थी। अनार का दाम चुकता करने के बाद उसके पास मात्र पंद्रह रुपये बचे थे, जिसमें वह एक किलो आलू और एक किलो आटा खरीद चुकी थी।
तुम्हारे लिए अनार ले आई हूं। कल दोपहर में जरूर ले लेना। डॉक्टर ने कहा कि कि खून बनने के लिए रोज अनार खाना जरूररी है। लोब्जंग के चेहरे पर मासूमियत थी। पेमा नहीं आया? लामा सोनम डक्पा ने पूछा। नहीं, रात हो जाएगी उसे। लोब्जंग चाय बनाने की तैयारी करने लगी। दावा अपना बैग दीवार में बने रैक में रख खुका था। वो मां से पैसे लेकर अपने कम्प्यूटर वाले सर के घर गया। दावा ने सूचना दी। शुरू हो गया आते ही, रेडियो की तरह। लोब्जंग ने झिड़का। क्यों देती हो उसे पैसे? कहीं गलत राह पर न चला जाए। सोनम डक्पा की आवाज बुझी-सी थी। अब वो जवान हो गया है। अपना भला-बुरा खुद सोच सकता है। आगे अवलोकितेश्वर जी जानें। लोब्जंग चाय के तीन प्याले लिए लामा सोनम डक्पा के पास लकड़ी की मचिया पर बैठ गई थी।
लीजिए, चाय पीजिए। ज्यादा चिंता करेंगे तो जल्दी ठीक नहीं होंगे। घर की हालत की परवाह किए बिना ही वह दोस्तों के साथ घूम-फिर रहा है। तुम समझाओ उसे। ठीक है। पहले आप स्वस्थ हो जाइए, फिर दूसरी चिंताओं में उलझिएगा। लोब्जंग ने एक हाथ में प्याला थामे दूसरे हाथ से स्रेह से लामा सोनम डक्पा का पैर सहलाया था। इन्हीं पैरों पर वह तब भी झुकी थी जब सीरींग् बेटी का विवाह टनचू ढोंडप् से किया था। उपहार में देने के लिए दो जोड़ी कपड़ों के सिवा कुछ भी न था। मठ में झाडू-पोंछा करने पर इतने रुपये ही मिल पाते थे कि वह अपना तथा पेमा और सीरींग् का पेट भर सके। विवाह के एक दिन पहले रात में लामा सोनम डक्पा आए थे उसकी छोटी-सी कोठरी में।

तिब्बत आर्यों की आध्यात्मिक भूमि मानी जाती है। हिन्दुओं के आराध्य देव शिव का निवास कैलास-मानसरोवर इसी देश में स्थित है। मुख्य रूप से बौद्धधर्मी होने के कारण तिब्बती लोग वृक्षों, जंगलों एवं जल को देवता मानते हैं। उनके आचार-विचार बहुत कुछ हमारे वैदिक धर्म के आसपास भी हैं, जिसमें संपूर्ण प्रकृति को परम सत्ता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। क्या सचमुच देवयानी? गेशे जम्पा के मन में एक कोमल से प्रश्न ने धीरे-से सिर उठाया।

लोब्जंग, इसे बेटी के लिए रखो। उपहार देना। उन्होंने एक बड़ा-सा ब्रीफकेस उसे पकड़ाया था। वह श्रद्धा और अनुग्रह से विभोर हो उठी थी। उस दिन से उनके प्रति उसकी आस्था बढ़ती गई थी और लामाजी के मन में उसके लिए अनुराग। एक दिन बड़े लामा से उन्होंने जाकर निवेदन किया था-गेला, मैं विवाह करना चाह रहा हूं। महायान में कट्टरता न होने के कारण गेला ने सहज अनुमति दे दी थी। जाओ, गृहस्थ धर्म अपना लो। परंतु अपने उद्देश्य से मत भटकना। जी! और उन्होंने भगवान बुद्ध के सम्मुख सादे ढंग से लोब्जंग को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया था।
क्या सोचने लगी, लोब्जंग? चाय पीते हुए लामा सोनम डक्पा ने उसे कुरेदा। सोच रही हूं, विवाह के पंद्रह-सोलह वर्षों में ही कितना कुछ बदल गया। मेरी छाया ही शायद अच्छी नहीं है। ऐसा क्यों सोचती हो? रोग-शोक तो लगा रहता है मनुष्य के साथ। फिर इन पंद्रह वर्षों में मैं चालीस से पचपन का भी तो हो गया। उन्होंने हंसने का प्रयास किया। अरे, तो मैं भी तो चालीस के पास आ गई। लोब्जंग ने अपनी उम्र बताई तो दावा भी  बीच में कूद पड़ा। मैं भी तो दस वर्ष का हो चुका। तीसरी कक्षा में पहुंच गया हूं। हां, तुम सबसे वृद्ध हो हमारे परविार में। लामा सोनम डक्पा हंसे थे। अरे हां, दावा के संस्थान में जो हिंदी की मैडम हैं देवयानी, वे आई थीं। घर किराए पर चाहिए उन्हें। किसी ने हमारे यहां का पता बताया था। उन्होंने लोब्जंग को सूचना दी थी।
बिना विचारे ही लोब्जंग ने इंकार किया था- परिचितों को किरायेदार नहीं बनाना चाहिए। फिर वे तो दावा की मैडम भी हैं। अरे, हर जगह एक ही फामूर्ला नहीं लागू होता है। पढ़ी-लिखी महिला हैं, दिन-भर संस्थान में रहना है। केवल एक भाई और मां रहेगी साथ। फिर दोनों कमरों का दरवाजा बाहर गेट की तरफ है। सरकारी नौकरी में हैं तो किराया समय पर मिल जाया करेगा, इसीलिए मैं चाह रहा था। लामा सोनम डक्पा ने अपनी पूरी बात रखी तो लोब्जंग को भी उचित लगा।
मैडम का भाई क्या करता है? लोब्जंग सशंकित हो उठी। शायद वह भी कहीं नौकरी में है। अभी विवाह नहीं हुआ है। लामा ने बताया था। पेमा से भी एक बार पूछना ठीक होगा? लोब्जंग ने प्रश्न किया। उसे क्या आपत्ति होगी? फिर भी  पूछना है तो पूछ लो।
लामा सोनम डक्पा के मन में पेमा के प्रति कहीं भी सौतेला भाव नहीं था। दावा उनका अपना बेटा था, परंतु पेमा को भी वे उतना ही प्यार देते थे। हालांकि पेमा का व्यवहार दिनोंदिन उनके और स्वयं लोब्जंग के प्रति भी असहिष्णु और लापरवाह होता जा रहा था। क्या जरूरत है उससे पूछने की? रख लेते हैं मैडम को किराएदार। लोब्जंग को भी पेमा से पूछना अनावश्यक लगा था।
देवयानी कक्षा में पूर्व मध्यमा के बच्चों को तिब्बत की भौगोलिक स्थिति समझा रही थी-संपूर्ण विश्व में तिब्बत सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित देश है, इसीलिए इसे दुनिया की छत कहते हैं। क्या कहते हैं? दुनिया की छत। बच्चों का समवेत स्वर गूंजा था। शाबाश। तिब्बत के पूर्व में चीन, दक्षिण में भारत और नेपाल हैं। उत्तर में रूस तथा मंगोलिया और पश्चिम में ईरान है। अब बताओ, दक्षिण में कौन से देश हैं? भारत और नेपाल। बच्चे उत्साह से चिल्ला पड़े। बहुत अच्छा! भाई, आप लोगों को तो बहुत जल्दी याद हो रहा है। अब आओ, नदियों और झीलों के बारे में जानें। तिब्बत के पूरब से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी ताछोक खबब और ल्हासा के दक्षिण से निकलने वाली क्युछु नदी से मिलकर भारत होते हुए हिंद महासागर में मिलती है। इसी प्रकार माजा खबब नदी नेपाल होते हुए भारत में गंगा के साथ मिलकर हिंद महासागर में समा जाती है। सेड्गे खबब नदी लद्दाख, कश्मीर और पाकिस्तान होते हुए अरब सागर में मिलती है। ऐसे ही तिब्बत में हजारों झीलें और तालाब भी हैं। सबसे बड़ी झील नामछो छुमो है। क्या है? देवयानी ने बच्चों से पुन: प्रश्न किया। गेशे जम्पा के कदम कक्षा के बाहर ठिठक गए थे। जबसे देवयानी ने इस संस्थान में पढ़ाना शुरू किया है, तब से उन्होंने बच्चों में एक सुखद परिवर्तन देखा है। बच्चों के मन में पढ़ने के प्रति एक नया उत्साह जागा है। तिब्बती भाषा के विशेष ज्ञान के साथ हिंदी की अध्यापिका के रूप में देवयानी को चयन समिति ने चुना था।
अब बच्चो, कुछ अन्य विशेषताओं के बारे में जानें। तिब्बत आर्यों की आध्यात्मिक भूमि मानी जाती है। हिन्दुओं के आराध्य देव शिव का निवास कैलास—मानसरोवर इसी देश में स्थित है। मुख्य रूप से बौद्धधर्मी होने के कारण तिब्बती लोग वृक्षों, जंगलों एवं जल को देवता मानते हैं। उनके आचार-विचार बहुत कुछ हमारे वैदिक धर्म के आसपास भी हैं, जिसमें संपूर्ण प्रकृति को परम सत्ता की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाता है। क्या सचमुच देवयानी? गेशे जम्पा के मन में एक कोमल से प्रश्न ने धीरे-से सिर उठाया। और उड़ती-सी दृष्टि कक्षा में खड़ी देवयानी पर डालते हुए आगे बढ़े। देवयानी बाहर उनकी उपस्थिति से अनभिज्ञ थी। तांबई रंग का सलोनापन उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में लगे पतले काजल से और भी निखर उठा था। बिना अन्य किसी साज-श्रृंगार के ही उसका सरल सौंदर्य दिपदिपा उठता।    (जारी...)