प्रेमचंद की नजर में भारत की नारी

    दिनांक 23-जुलाई-2020
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डॉ. संतोष कुमार तिवारी

मुंशी प्रेमचंद ने नारी के गुणों का सटीक विश्लेषण करते हुए लिखा है कि नारी सेवा और त्याग की मूर्ति है। वह लिखते हैं कि स्त्री पृथ्वी की भांति धैर्यवान है, शांति सम्पन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है। नारी के पास देने के लिए दया है, श्रद्धा है, त्याग है। पुरुष के पास दान देने के लिए क्या है? वह अधिकार के लिए हिंसा करता है, संग्राम  करता है, कलह करता है...। 'अधिकार' के नाम पर सदा हिंसा का सहारा लेते आ रहे कामरेड बताएं कि उनका नारी विमर्श क्या मुंशी प्रेमचंद के इस विश्लेषण से मेल खाता है, क्योंकि मुंशी जी की यह बात सांस्कृतिक मूल्यों को भी अपने में समाए हुए है तो वामपंथी बताएं कि क्या वे भारत की सांस्कृतिक धारा से उपजी इस सोच को स्वीकार करते हैं  

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अपने निधन से पूर्व मुंशी प्रेम चंद गीता प्रेस गए थे और कुछ समय बाद दोबारा दो-तीन माह तक ठहरने की इच्छा जताई थी, पर ऐसा हो न सका। मुंसी प्रेमचंद

कल्याण’ के आदि संपादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार का प्रयास रहता था कि समाज के हर वर्ग और हर क्षेत्र के विद्वान उनकी पत्रिका के लिए लिखें। पोद्दारजी ने ‘कल्याण’ को विचारधारा वाली गुटबाजी से ऊपर रखा और हिन्दी में नए-नए लेखक तैयार किए। पोद्दारजी ने महात्मा गांधी से भी हिन्दी में लेख लिखवाए। जो संत-महात्मा विरक्त भाव से साधना में लगे रहते थे, उन्हें भी लेख लिखने के लिए प्रेरित किया। कहीं-कहीं वह स्वयं जाकर उनसे प्रार्थना करते, कहीं अपने स्वजन को भेज कर तो कहीं पत्र द्वारा। जो  आध्यात्मिक विषयों पर नहीं लिखते थे, उनको  भी पोद्दारजी ने आध्यात्मिक विषयों पर लिखने के लिए प्रेरित किया। कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद सामाजिक उपन्यास और कहानियां लिखते थे, लेकिन भाईजी ने उनसे भी आध्यात्मिक लेख लिखवाया। उम्र में वह प्रेमचंद से करीब 12 वर्ष छोटे थे। प्रेमचंद ने 16 फरवरी, 1931 को भाईजी को जो पत्र लिखा था, यहां प्रस्तुत है-

प्रिय हनुमान प्रसादजी,
आपका कृपापत्र मिला। आपका यह कथन सत्य है कि मैंने तीन वर्षों में ‘कल्याण’ के लिए कुछ नहीं लिखा, लेकिन इसके कारण हैं। यह एक धर्म विषयक पत्रिका है और मैं धार्मिक विषय में कोरा हूं। मेरे लिए धार्मिक विषयों पर कुछ लिखना अनधिकार है। आप अधिकारी होकर मुझ अनधिकारी से लिखाते हैं। इसलिए अब मैं आप की आज्ञा का पालन करूंगा। ‘श्रीकृष्ण और भावी जगत्’ यह प्रसंग मेरे अनुकूल है और मैं इसी पर लिखूंगा।

भवदीय,
— प्रेमचंद
(यह पत्र पोद्दारजी के निकट सहयोगी श्री गम्भीरचंद दुजारीजी की पुस्तक ‘श्री भाईजी-एक अलौकिक विभूति’, गीता वाटिका प्रकाशन, गोरखपुर, के पृष्ठ 307 से लिया गया है।)
बाद में प्रेमचंद का यह लेख ‘श्रीकृष्ण और भावी जगत्’ शीर्षक से ‘कल्याण’ के श्रीकृष्ण-अंक में पृष्ठ 305-306 पर प्रकाशित हुआ। श्रीकृष्ण-अंक अगस्त 1931 को निकला था। मुंशी प्रेमचंद ने अगस्त 1932 में निकाले जाने वाले विशेषांक ईश्वरांक के लिए भी लिखना चाहा था, परंतु बाद में वह ऐसा कर नहीं पाए। 3 मार्च, 1932 को उन्होंने गणेशगंज, लखनऊ से पोद्दारजी को एक पत्र लिखा था-
प्रिय बंधुवर,
बंदे
आपके दो कृपापत्र मिले। काशी से पत्र यहां आ गया था। हंस के विषय में आपने जो सम्मति दी, उससे मेरा उत्साह बढ़ा। मैं कल्याण के ईश्वरांक के लिए अवश्य लिखूंगा।
क्या कहें आप काशी गए और मेरा दुर्भाग्य मैं लखनऊ में हूं। भाई महावीर प्रसादजी बाहर हैं या भीतर यह मुझे ज्ञात नहीं। उनकी अनेक स्मृतियां मेरे जीवन की बहुमूल्य वस्तु हैं। वह तो तपस्वी हैं। उन्हें क्या खबर कि प्रेम भी कोई चीज है।
भवदीय,
—धनपत राय



भाईजी ऐसे तैयार करते थे नए लेखक
 
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हनुमान प्रसाद पोद्दार

नए लेखक तैयार करना कोई आसान काम नहीं है। उदाहरण के लिए, एक थे श्री नारायण स्वामी। भगवतप्राप्त संत थे। चौबीसों घंटे मौन रहते थे। बहुत अमीर घराने के उच्च शिक्षित व्यक्ति थे। परंतु तीव्र वैरागी थे। अपने पास कोई संग्रह नहीं रखते थे। रात को कोई दो-सवा दो घंटे सोते थे। बाकी समय निरंतर जप करते थे। सन् 1930 में वह ऋषिकेश में थे। पोद्दारजी स्वयं उनके पास गए। उनसे अपने अनुभव लिख कर देने की प्रार्थना की। पहले तो उन्होंने मना कर दिया, परंतु पोद्दारजी के पुन: अनुरोध पर रात्रि में कुछ समय निकाल कर लिखना स्वीकार किया। उन्होंने बताया कि मैंने जो कुछ भी लिखा है, उसे  मैंने स्वयं अनुभव करके देखा है। इसे उन्होंने उर्दू में लिखा था। पोद्दारजी ने उसका हिन्दी में अनुवाद कराया। तत्पश्चात उनके अनुभव को ‘कल्याण’ के मई 1931 के अंक में ‘एक संत का अनुभव’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया।
श्रीनारायण स्वामी के लेख का अंश इस प्रकार है-
बोलने में जितना जल्दी कहा जा सकता है, लिखने में उसकी अपेक्षा बहुत अधिक समय लगता है। इस शरीर का चैत्र शुदी 15 तारीख 20 अप्रैल सन् 1880 ई. को कायस्थ माथुर कुल के अमीर घराने और संभ्रांत वंश में मुरादाबाद में जन्म हुआ था, इस वंश के पूर्वज बादशाह के यहां किसी प्रांत में दीवान थे। तीव्र वैराग्य होने पर गृहस्थी छोड़ते समय यह ख्याल हुआ कि भीख कैसे मांगेंगे, बहुत शर्म मालूम होगी। दूसरी बात यह है कि गुरु मिलना चाहिए। इसी ख्याल में था कि भगवान ने एक साधु को मेरे पास भेजा, उन्होंने कहा, 'बद्रीनारायण से आए हैं।' उनसे मैंने बातचीत की तो कहा कि 'हमारे पास एक ऐसी जड़ी है, जिसके रोज खाने से भूख नहीं लगती। राई के दाने के बराबर रोज सुबह के वक्त जीभ पर रखकर इसका रस उतारा जाए। गरम बहुत है, बद्रीनारायण में पैदा होती है।' फिर कहा कि 'यह बात किसी से कहना नहीं, कहोगे तो इसका फल जाता रहेगा।' जड़ी लेकर मैं बहुत खुश हुआ और दूसरे रोज ही रवाना होकर हरिद्वार आया। जो सामान पास था, दे दिया और त्याग करके ऋषिकेश आ गया।  सात रोज तक वह जड़ी खाता रहा, बिलकुल भूख नहीं लगी। पर शरीर बहुत कमजोर हो गया था, बैठने उठने की ताकत भी नहीं रही थी और भजन में भी विक्षेप पड़ता था।  इस कारण उसको छोड़ दिया और यह समझकर कि भिक्षा करना साधु का धर्म है, क्षेत्र में जाकर भिक्षा मांग लाता और गंगा-किनारे बैठ कर खा लेता।
गीता प्रेस ने उनके लेख को 22-24 पृष्ठों की एक छोटी सी पुस्तक के रूप में  भी प्रकाशित किया है। कुछ लेखक स्वामी शिवानन्द (1887-1963) की तरह के भी थे। वे पोद्दारजी के पत्र या आग्रह का इंतजार नहीं करते थे और अपना लेख भेज देते थे।


श्रीगुरुजी गोलवलकर की विनम्रता

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माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्रीगुरुजी (1906-1973) ने पोद्दारजी को 25 दिसंबर, 1949 को नागपुर से एक पत्र लिखा-
श्रद्धेय भाईजी,
मैं लेखक नहीं हूं। न ही मैंने बहुत अध्ययन किया है। परंतु आपने ‘कल्याण’ के हिन्दू संस्कृति विशेषांक के लिए मुझे कुछ लिखना ही चाहिए, यह आग्रह किया। आपके प्रति मेरे हृदय में जो सादर श्रद्धा है तथा आपका मुझसे जो प्रेम है, उसी से बाध्य होकर मैंने कुछ लिखने का साहस किया है। विषय बहुत विशाल और लेख की स्वयं निर्धारित मयार्दा बहुत छोटी होने से विवेचन त्रुटित हो रहा है। कह नहीं सकता कि आप उसे पसंद करेंगे या नहीं। यदि ठीक न जंचे तो उसे छोड़ दीजिएगा।   
आपका स्नेहाकांक्षी,
— मा. स. गोलवलकर
(श्री भाईजी-एक अलौकिक विभूति, पृष्ठ 311)



महावीर प्रसाद द्विवेदीजी का दु:ख


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पोद्दारजी जब किसी से लिखने के लिए कहते थे, तो उनके शब्दों में बहुत आत्मीयता होती थी।  पत्र पाने वाला व्यक्ति यह कहने में बहुत दु:ख का अनुभव करता था कि वह नहीं लिख पाएगा। यहां प्रस्तुत है हिन्दी के महान साहित्यकार, पत्रकार एवं युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजी (1864-1938) का पत्र। यह पत्र दौलतपुर (रायबरेली) से 16 फरवरी, 1931 को पोद्दारजी के नाम लिखा गया। उम्र में द्विवेदीजी पोद्दारजी से कोई 28 वर्ष बड़े थे। द्विवेदीजी ने लिखा-
श्रीमत्सु सादरं निवेदनम्,
कृपा पत्र मिला। लज्जा से सिर नत हो गया। आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा कर्तव्य होना चाहिए। मैं चाहता हूं कि आपके लिए कुछ लिखूं। पर दिमाग पक-सा रहा है। कुछ सूझता नहीं। ... इस समय तो मैं और भी कष्ट में हूं-
  1. मेरे पुत्र स्थानीय भानजे को 15 दिन हुए 6 माह का जेल हो गया। (आचार्य द्विवेदी नि:संतान थे। उन्होंने अपने भांजे को गोद लिया था, जो आजादी की लड़ाई में जेल भी गए।)
  2. उसकी बहू को आठ रोज से सतत ज्वार है।
  3. मेरे पैर में क्षत(घाव) हो जाने से चल फिर नहीं सकता।
‘एकस्य दु:खस्य’ वाला मसला है। अतएव-
टहल न कहु मों ते बनिआई, छ्महु छमा मंदिर तुम भाई।
आपका
म. प्र. द्विवेदी    
(श्री भाईजी-एक अलौकिक विभूति, पृष्ठ 307-308)



(यह पत्र श्री अच्युतानंद मिश्र द्वारा संपादित पुस्तक ‘पत्रों में समय संस्कृति’, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, के पृष्ठ 40 से लिया गया है। उपन्यास सम्राट प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय था। उन्होंने अपने समय की प्रख्यात पत्रिका ‘हंस’ का सम्पादन किया था।)
मुंशी प्रेमचंद से भाईजी का बड़ा प्रेम संबंध था, जो दिन प्रति दिन प्रगाढ़ होता चला गया। उन्होंने अपने निधन के पूर्व पोद्दारजी के पास गोरखपुर रहने की इच्छा भी प्रकट की थी। परंतु यह संयोग बन नहीं सका। उनका निधन अक्तूबर 1936 को हुआ। पोद्दारजी ने ‘कल्याण’ के दिसंबर 1936 के अंक में ‘विनाशी जगत’ शीर्षक से लिखा-
‘प्रेमचंदजी हिन्दी जगत् के एक उज्ज्वल रत्न थे। उनके हृदय में वस्तुत: प्रेम की प्रबलता थी। अभी कुछ ही महीनों पूर्व आप गीता प्रेस में पधारे थे। तब यह कह गए थे कि मैं कुछ समय बाद यहां पुन: आकर महीने-दो महीने  ठहरूंगा। उस समय यह कौन जानता था कि इतने ही दिनों में आपका शरीर वियोग हो जाएगा और हम लोगों को आपके दर्शन भी नहीं होंगे। विधाता का विधान कौन जानता है?’
शायद प्रेमचंद को गीता प्रेस का वातावरण अपनी साहित्य साधना के लिए उपयुक्त लगा था। उनके निधन के करीब 12 वर्ष बाद ‘कल्याण’ के नारी-अंक (1948) में मुंशी प्रेमचंद को फिर याद किया गया। इस अंक के पृष्ठ संख्या 312 पर ‘नारी का वास्तविक स्वरूप’ शीर्षक से मुंशीजी के विचार छपे, जो कि इस प्रकार थे- 
‘मेरे विचार से नारी सेवा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी कुबार्नी से अपने को बिल्कुल मिटाकर पति की आत्मा का एक अंश बन जाती है। आप कहेंगे ‘मर्द अपने को क्यों नहीं मिटाता? औरत से ही क्यों इसकी आशा करता है? मर्द में वह सामर्थ्य ही नहीं है। वह तेज प्रधान जीव है। ... स्त्री पृथ्वी की भांति धैर्यवान है, शांति सम्पन्न है, सहिष्णु है। पुरुष में नारी के गुण आ जाते हैं तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरुष के गुण आ जाते हैं तो वह कुलटा हो जाती है। नारी के पास देने के लिए दया है, श्रद्धा है, त्याग है। पुरुष के पास दान देने के लिए क्या है? वह देवता नहीं, लेवाता है। वह अधिकार के लिए हिंसा करता है, संग्राम करता है, कलह करता है ...। मुझे खेद है कि हमारी बहिनें पश्चिम का आदर्श ले रहीं हैं, जहां नारी ने अपना पद खो दिया है और स्वामिनी से गिर कर विलास की वस्तु बन गई है।’
नारी के बारे में मुंशी प्रेमचंद के ये विचार विशुद्ध भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म पर आधारित हैं। इनका किसी पंथ, संप्रदाय या गुटबाजी से लेना-देना नहीं है, जोकि ‘कल्याण’ की नीति रही है। इसीलिए इन्हें ‘कल्याण’ के नारी-अंक में
स्थान मिला।
(लेखक झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)