नेपाल नहीं समझ पा रहा कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है

    दिनांक 24-जुलाई-2020
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डॉ अंशु जोशी
नेपाल में कम्युनिस्ट शक्तियों के सत्ता ग्रहण करते ही भारत—नेपाल संबधों का काला अध्याय शुरू होता दिखाई पड़ने लगा। जहां एक ओर वामपंथी नेपाली सरकार ने कम्युनिस्ट चीन का खुल कर समर्थन और साथ देना शुरू किया वहीं भारत के साथ अपने सघन और सशक्त संबंधों की जड़ें खुद ही काटनी शुरू कर दीं। हालांकि इस सबमें नेपाल यह नहीं समझ पा रहा है कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है।

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चीन, नेपाल और भारत के त्रिकोणीय संबंधों और इसके बीच भारत-नेपाल के बीच गहराते संकट पर चर्चाएं चल ही रही थीं कि नेपाल के प्रधान मंत्री ने भारत के कण—कण में बसे श्री राम की अयोध्या पर विवादित बयान देकर संकटों का एक नया ही अध्याय शुरू कर दिया। ओली ने एक ओर अयोध्या को नेपाल में स्थित बता दिया तो वहीं दूसरी ओर भारत के कई हिस्सों को नेपाली नक़्शे का हिस्सा बना कर पूरे विश्व के सामने पेश कर दिया। आखिर ये क्या हो रहा है और क्यों ? नेपाल और भारत के बीच सदियों से बहुत सशक्त सांस्कृतिक सम्बन्ध रहे हैं। यहां तक कि विश्व राजनीति के पटल पर नेपाल की छवि हमेशा भारत के छोटे भाई के रूप में प्रस्तुत की गयी और मान्य भी रही है। सुदूर दक्षिण से यहां पहुंच श्री आदि शंकराचार्य द्वारा श्री पशुपतिनाथ जी की स्थापना हो या यहां की हिन्दू बहुल जनसँख्या के साथ भारत के सांस्कृतिक सम्बन्ध, नेपाल और भारत हमेशा 'दो राष्ट्र, एक संस्कृति' के रूप में देखे जाते रहे हैं। किन्तु आज जो स्थिति दिखाई पड़ रही है वह एक सुनियोजित वैचारिक तथा राजनीतिक षड़यंत्र का नतीजा है।
 
नेपाल के माध्यम से चीन भारत पर अपना शिकंजा कसने की तैयारी में है। नेपाल में कम्युनिस्ट शक्तियों के सत्ता ग्रहण करते ही भारत—नेपाल संबधों का काला अध्याय शुरू होता दिखाई पड़ने लगा। जहां एक ओर वामपंथी नेपाली सरकार ने कम्युनिस्ट चीन का खुल कर समर्थन और साथ देना शुरू किया वहीं भारत के साथ अपने सघन और सशक्त संबंधों की जड़ें खुद ही काटनी शुरू कर दीं। हालांकि इस सबमें नेपाल यह नहीं समझ पा रहा है कि वह भविष्य का तिब्बत बन सकता है। पिछले कुछ समय में भारत चीन के बीच तनातनी की स्थिति उत्पन्न होने पर नेपाल ने न सिर्फ चीन का साथ दिया, भारत को अपने कूटनीतिक महत्व के कई निर्णयों के माध्यम से कई नकारात्मक सन्देश दिए। नेपाली सरकार ने जहां एक ओर अपने सभी नेपाली विद्यालयों में मंदारिन (चीनी) भाषा पढ़ना अनिवार्य कर दिया तो दूसरी ओर भारतीय मीडिया का प्रसारण रोक दिया, हालांकि यह रोक बाद में हटा ली गयी। आर्थिक मोर्चे पर नेपाल ने चीन के साथ कई समझौते किये हैं और यहीं सबसे बड़ा संकट दिखाई पड़ता है। चीन नेपाल में इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के नाम पर जो पैसा लगा रहा है, वह भविष्य में नेपाल के अपने भविष्य के लिए भी खतरनाक है और भारत के लिए भी। लगभग 10 अन्य विकासशील या पिछड़े देशों को इस प्रकार पैसा उधार दे कर चीन पहले ही श्रीलंका का हम्बनटोटा पोर्ट हथिया चुका है और पाकिस्तान के ग्वादर पर भी कब्ज़ा जमा चुका है। चीन ने नेपाल के साथ फरवरी, 2020 में चीन-नेपाल ट्रांजिट प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किये हैं जिससे नेपाल को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए अब भारत पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। चीन की काली नज़र नेपाल पर सिर्फ भारत की वजह से नहीं है। और नेपाल हाल फिलहाल चीन से पूरी तरह से प्रभावित नज़र आ रहा है। 

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हालांकि भारत ने अपनी तरफ से हमेशा नेपाल की आर्थिक तथा अन्य सहायता करने का प्रयास किया है पर चीन की तुलना में भारत का नेपाल में निवेश या सहायता कम है। इसका कारण दोनों के उद्देश्यों में अंतर भी हो सकता है। जहां चीन नेपाल पर अपना वर्चस्व जमाना चाहता है, तो वहीं भारत नेपाल के विकास में बिना किसी नकारात्मक उद्देश्य से सहायता करता आया है।  भारत द्वारा 2017—18 में नेपाल को प्रदान की गयी 374 करोड़ की आर्थिक सहायता 2019—20 में बढ़ाकर 1050 करोड़ कर दी गयी है। इसके अलावा भारत ने नेपाल में कई अस्पताल, विद्यालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं को जुटाने के लिए निर्माण की घोषणा कर काम भी शुरू कर दिया है।  इसके बावजूद नेपाली सरकार का नकारात्मक रवैया यहाँ वामपंथी विचारधारा के फैलने का एक परिणाम कहा जा सकता है।

 नेपाल के कई कम्युनिस्ट नेता भारत के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे संस्थाओं से पढ़ कर यहां पहुंचे हैं। ज़ाहिर सी बात है वामपंथ की पाठशाला से ग्रहण की गयी ट्रेनिंग भारत के विरोध में ही इस्तेमाल होगी। चीन से बढ़ते सुरक्षा, राजनीतिक और कूटनीतिक संकटों के बीच नेपाल से खट्टे होते संबंधों पर भारत को गहन विश्लेषण कर कदम उठाने होंगे। द्विपक्षीय सकारात्मक वार्ताओं के अलावा कहीं न कहीं नेपाल को कड़े सन्देश भी दिए जाने चाहिए क्योंकि वर्तमान नेपाली सरकार से भारत को सहयोग दिया जाना अपेक्षित नहीं है। साथ ही नेपाल को यह भी समझाने की आवश्यकता है कि विचारधारा के नाम पर वह आज भले ही चीन का साथ दे ले, पर भविष्य में यह उसके अपने अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है।


हाल फिलहाल में वैश्विक स्तर पर चीन को कोविड—19 फ़ैलाने का न सिर्फ गुनहगार माना जा रहा है बल्कि अमेरिका जैसी शक्ति से उसे कड़े विरोध का सामना भी करना पड़ रहा है। भारत के अमेरिका के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों की दृष्टि से देखें तो भारत न सिर्फ चीन बल्कि नेपाल को भी अपनी तरफ से कड़े सन्देश दे सकता है कि भारतीय सीमाओं में किसी भी प्रकार की घुसपैठ बर्दाश्त नहीं की जाएगी। 
(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं)