बकरीद पर पेटा को क्यों सांप सूंघ जाता है ?

    दिनांक 24-जुलाई-2020
Total Views |
डॉ अंशु जोशी
पेटा जैसा संगठन हमारे हर त्यौहार पर डंडा लिए खड़ा हो जाता है, लेकिन इसी पेटा को बकरीद पर सांप सूंघ जाता है, क्यों ? मासूम जानवरों का खून बहाने पर यह क्यों कुछ नहीं बोलता ? तब इसकी बोलती क्यों बंद हो जाती है ? क्यों बकरीद को भी "एनवायरनमेंट फ्रेंडली" बनाने की सलाह नहीं देता ?

lead1_1  H x W:


टीवी, फेसबुक, इंटरनेट पर, भांति-भांति के चॉकलेट्स, बिस्कुट्, मेवे और पेस्ट्रीज के विज्ञापन देख रही हूँ। रक्षाबंधन की आमद का आलम ये है कि कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच भी सभी राखी मनाने के सुरक्षित इंतज़ाम करने में जुटे हुए हैं। किसी भी त्यौहार का आगमन होते ही दादी माँ और माँ मन पर दस्तक देने लगती हैं। नाक में रसोई घर में फ़ैली घी, केसर-इलाइची-जायफल और खोये की खुशबू अनायास ही भर जाती है। मेरी दादी जिन्हें हम सब जीजी कहते थे डब्बे भर—भर के मिठाइयां बनाती थीं और इसी परंपरा को जीवित रखा मेरी माँ ने भी। हर पूजा का, हर त्यौहार का एक विशेष नैवेद्य, गुझिये, अनारसे, लडडू, शकर पारे, खाजे, गुलाब जामुन, बेसन चक्की, भाकरवड़ी, चकली और भी बहुत कुछ। और सब कुछ सब के साथ बांटने के लिये। रिश्तेदार, आस-पास के लोग, घर में काम करने वाले लोग। मैं कोशिश करती हूँ कि मेरे बेटे के पास भी ऐसी ही सुनहरी, खुशनुमा यादें हों, और संस्कार। इसीलिए मेरे त्यौहार हमेशा घर के ठेठ पकवानों के साथ मनते हैं। अब जबकि हम लोग जेट एज में रह रहे हैं, बड़ी सफाई से पैक किये, सजाये—संवारे चॉकलेट्स के डिब्बे मुझे ठेंगा दिखाते हैं, नफासत भरे अंदाज़ में गिफ्ट किये मेवे चिढ़ाते हैं, कहते हैं तुम कितनी पुरातन पंथी हो। पर फिर जब घर के बने गुझिये, लडडू खाने वालों के चेहरों पर वही बचपन वाली मुस्कराहट देखती हूँ तो सोचती हूँ कि इस मामले में पुरातन पंथी रहना ही ठीक है।

lead1_1  H x W:

ये तो हुयी मन के इमोशंस की बात। पर अब ज़रा बात इससे जुड़े कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक, सामजिक और आर्थिक मुद्दों की भी कर ली जाए। पिछले कुछ वर्षों से देख और महसूस कर रही हूँ कि चाहे रक्षाबंधन हो या दीपावली, दशहरा हो या होली, "ग्लोबल" हमारे "लोकल" में बुरी तरह से घुस आया है। भाई बहन के प्रेम का प्रतीक रक्षाबंधन दरअसल श्रावणी पूर्णिमा है, जिस दिन राखी वस्तुतः रक्षासूत्र होने के नाते बाँधी जाती है। बचपन से चौक बनाकर उस पर पाटा रख कर अपने भाइयों के हाथ में नारियल दे, सिर पर टोपी रख, उन्हें रक्षासूत्र बाँध घर की बनी मिठाई खिलाती आयी हूँ। जो पूर्णिमा होने के नाते की गयी सत्यनारायण की कथा का प्रसाद भी होती थी। भाई ग्यारह रुपये देकर गाल थपथपा देते थे और मैं उसी में निहाल हो जाती थी। आज उसी राखी का घर—घर में "ग्लोबल" रूप देख रही हूँ।  मेड इन चाइना राखी, अमेरिकन चॉकलेट और भाई से उपहार के नाम पर लैपटॉप, फ़ोन या और कोई गैजेट। भोजन में पिज़्ज़ा या बर्गर। यही हाल दीवाली के हैं, यही होली के। हमारे त्यौहार कितने हमारे बचे हैं ? और इन सबमें एक स्त्री होने के नाते हमारी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। क्या हम अपने बच्चों को हर त्यौहार से जुड़े महत्त्व और परंपरा को समझा उन्हें अपनी संस्कृति की डोर से बांधे रख पा रहे हैं ? क्या हम अपनी संस्कृति और त्योहारों का विकृत स्वरूप अपनी अगली पीढ़ियों को देना चाहते हैं ? तो हम इस पर क्यों नहीं अपनी तरफ से कुछ करते ? ग्लोबल होना अच्छा है पर ग्लोबल के नाम पर अपने घर और संस्कृति को विदेशी चीज़ों का या आदतों का गुलाम बनाना कहाँ तक ठीक है ? आज जब हम आत्मनिर्भर भारत की बात कर रहे हैं तो इस ओर भी हमें ध्यान देना ही होगा। हम जाने-अनजाने अपने तीज-त्योहारों का विदेशीकरण करके ग्लोबल शक्तियों की जेबें भर रहे हैं और अपने आस-पास की लोकल कलाओं को लुप्त होने की कगार पर पहुंचा चुके हैं।

lead1_1  H x W:

बड़ी ही चालाकी से हमें अपनी ही रसोई, अपने ही बाज़ार और अपनी ही संस्कृति से काटने का काम हो रहा है, उस पर ये पेटा जैसे संगठन हमारे हर त्यौहार पर डंडा लिए खड़े हो जाते हैं। वसुंधरा के प्रति अपना कर्त्तव्य समझते हुए हमने होली भी आर्गेनिक कर ली (जो वस्तुतः प्राचीन समय में होती ही थी) और दीपावली भी। गणेश जी भी आर्गेनिक कर लिए और दशहरा भी। पर अब इनसे जाकर कोई ये पूछे कि बकरीद पर इन्हें सांप क्यों सूंघ जाता है ? मासूम जानवरों का  खून बहाने पर ये क्यों कुछ नहीं कहते? क्यों बकरीद को भी "एनवायरनमेंट फ्रेंडली" बनाने की सलाह नहीं देते ?

ll_1  H x W: 0

कोरोना वायरस के प्रकोप के बीच हम सभी अपनी जीवन शक्ति के साथ-साथ उस शक्ति को भी बचाये रखने की कोशिश कर रहे हैं जिसे "आशा" कहा जाता है। आशा ही तो है जो जीवन को उमंग, ऊर्जा और प्रेरणा देती है। शायद इसी आशा को बनाये रखने के लिए विभिन्न त्यौहार मनाये जाते रहे हैं। हर त्यौहार अपने आप में विशिष्ट होता है, दूसरों से अलग। और इसी में उसका आनंद है। मेरी कई सहेलियां कहती हैं कि नौकरी के साथ रसोई में पकवान बनाने का समय कहाँ से लाएं ? मैं उत्तर में हमेशा मुस्कुरा कर कह देती हूँ कि समय निकालना पड़ता है। न आजकल पहले की तरह बड़े—बड़े परिवार रह गए हैं, न उतना काम। थोड़ा समय प्रबंधित कर बड़ी आसानी से घर में शुद्धता के साथ पकवान बनाये जा सकते हैं। अपने आस-पास महिला गृह उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सकता है। अपने लोकल बाज़ार से भारत में बनी चीज़ें आराम से खरीदी जा सकती हैं। ऑनलाइन आर्डर के समय भी इसी बात का ध्यान रखा जा सकता है। सबसे बड़ी बात, पेटा जैसे संगठनों से विचलित हुए बिना, अपने त्यौहार बिना किसी हीन भावना के हर्षोल्लास से मनाये जा सकते हैं। एक स्त्री होने के नाते हमारे पास वह शक्ति, वह उत्तरदायित्व है जिससे हम अतीत की डोर को वर्तमान और भविष्य से बाँध सकती हैं। इसलिए, आधुनिक बनिए, ग्लोबल बनिए पर अपनी पहचान की कीमत पर नहीं।
(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं