'मेक इन चाइना' का जवाब 'मेक इन इंडिया' से देंगे तभी बनेंगे आत्मनिर्भर

    दिनांक 27-जुलाई-2020
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डॉ जसपाली चौहान
आत्मनिर्भर तो हम भारतीय परिश्रम, भारतीय प्रतिभा तथा स्थानीय स्तर पर बने लोकल उत्पादों के दम पर ही बन सकते हैं। तभी हमारी आयात पर निर्भरता कम हो पाएगी। हमें मेक इन चाइना का जवाब मेक इन इंडिया से देना होगा। हमें लोकल के लिए वोकल बनना ही होगा। देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना ही होगा।

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आत्मनिर्भरता आज समय की मांग बन चुकी है। हम भी आत्मनिर्भर होना चाहते हैं। हम स्वदेशी का आंदोलन चलाते हैं, विदेशी का बहिष्कार करते हैं और इस तरह से हो जाना चाहते हैं आत्म निर्भर। परन्तु आत्मनिर्भरता की हकीकत पर जब हम विचार करते हैं, तो पाते हैं कि यह कार्य इतना सरल भी नहीं है, क्योंकि हम दूसरों पर कुछ ज्यादा ही निर्भर हैं। हमारा दवाई उद्योग, हमारे चिकित्सा-उपकरण, हमारा सौर-ऊर्जा उद्योग,मोबाइल और मोटर पार्ट्स का उद्योग और खिलौना उद्योग सहित विभिन्न चीजों में हम पूरी तरह से चीन पर निर्भर हैं। इसके बाद हमारे रत्न- आभूषण, भारी मशीनें, स्टील, प्लास्टिक, वनस्पति तेल जैसे उत्पादों के लिए हम संयुक्त अरब, जापान, दक्षिण कोरिया और मलेशिया पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में कैसे बन पाएंगे आत्मनिर्भर हम ? हम स्वयं उत्पाद करते नहीं है।

दूसरों के भरोसे रहते हैं। विदेशी को तवज्जो देते हैं। उसका देशज विकल्प ढूंढना नहीं चाहते हैं। अपने उत्पादन को हीन मानते हैं। आयातित विदेशी वस्तुओं के साथ अपनी प्रतिष्ठा को जोड़कर चलते हैं। इसलिए लोकल के लिए वोकल कभी बने नहीं, फिर कैसे दे पाएंगे अपनी अर्थव्यवस्था को गति ? एक बड़ी चुनौती ब्राण्ड के मोर्चे पर भी है। गुणवत्ता के मामले में आज भी दुनिया हमारे उत्पादों पर भरोसा नहीं करती है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को हम अपेक्षित संख्या में आकर्षित नहीं कर पाए हैं। उन्हें उचित माहौल नहीं दे पाए हैं, जिससे कि वह भारत में आकर उत्पाद कर सके। फिर कैसे मिल पाएगा भारतीय ब्रांड को वैश्विक मंच ? वर्तमान सरकार ने उन्हें उचित माहौल देखकर आकर्षित करने के लिए ऋृण सुविधाओं को काफ़ी सरल बनाया है।
 
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आत्म निर्भरता की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान लघु सूक्ष्म एवं मध्यम उद्योग धंधों का होता है। यह ईकाइयां बड़े पैमाने पर रोजगार मुहैया करवाती है, जिससे आम आदमी के हाथ में पैसा आता है तथा उसकी क्रय शक्ति बढ़ती है और फिर बाजार में मांग उत्पन्न होती है। यह अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाती है, परंतु अभी तक यह ईकाइयां महंगी ब्याज दर तथा ऋृण व्यवस्था के कठोर नियमों के कारण विशेष योगदान नहीं दे पाईं। सरकार ने अब इनके लिए भी सस्ती ब्याज दरों पर सरल नियमों के साथ गारंटी मुक्त ऋृण की व्यवस्था की है । ताकि ये ईकाइयां अपना उत्पाद बढ़ाएं, जिससे स्थानीय विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा मिल सके। बड़ा  राहत पैकेज भी इनको दिया है, जो इन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए सरकार की ओर से उठाया गया एक महत्वपूर्ण एवं सराहनीय कदम है।

यह राहत पैकेज हमारे किसान, श्रमिक, लघु उद्यमी, स्टार्ट अप्स से जुड़े नौजवान सभी के लिए नए अवसरों का दौर लेकर आएगा। नवाचार की दृष्टि से भी हम अच्छी स्थिति में नहीं हैं। यह कमी तभी पूरी होगी जब हम विश्व अर्थव्यवस्था के साथ कदम बढ़ाएंगे। यद्यपि अतीत में महामारियों ने ही नवाचार को गति देने का काम किया है और नए विचारों के साथ बदलाव को मुमकिन बनाया है। करोनाकाल में वर्क फ्रॉम होम जैसी व्यवस्था हमारे देश में भी एक सामान्य सी बात हो गई है। यह व्यवस्था आर्थिक दृष्टि से किफायती भी है।हम सचमुच में आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं तो हमें सर्वप्रथम आयातित वस्तुओं का देशज विकल्प ढूंढना होगा। आयातित प्रत्येक वस्तु का उत्पादन स्वयं अपने देश में करना होगा।

बेशक हम इसके कुशल उत्पाद में सक्षम हो या न हों। देश को उन क्षेत्रों में भी संसाधन उपलब्ध कराने होंगे, जहां उत्पादकता कम है तथा कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले क्षेत्रों को और अधिक संसाधन मुहैया कराने होंगे ताकि लाभ की स्थिति बनी रहे। हम विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बात करते हैं, परंतु हम तुरंत प्रभाव से विदेशी सामान का शत-प्रतिशत बहिष्कार भी आज की परिस्थिति में नहीं कर सकते हैं। हमें तब तक वैश्विक आपूर्ति संख्या का हिस्सा बने रहना होगा जब तक कि यह हमारी उत्पादकता में इजाफा करते हैं।

अन्तत: आत्मनिर्भर तो हम भारतीय परिश्रम, भारतीय प्रतिभा तथा स्थानीय स्तर पर बने लोकल उत्पादों के दम पर ही बन सकते हैं। तभी हमारी आयात पर निर्भरता कम हो पाएगी। हमें मेक इन चाइना का जवाब मेक इन इंडिया से देना होगा। हमें लोकल के लिए वोकल बनना ही होगा। देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना ही होगा। परंतु भारत उत्पाद का हब तभी बन पाएगा, जब देश का प्रत्येक व्यक्ति यह तय करेगा कि हम भारत में ही बनी चीजों का उपयोग करेंगे। तभी हमारी अर्थव्यवस्था को गति मिल पाएगी। यदि हमारे अंदर संकल्प शक्ति आत्म बल और आत्मविश्वास है तो हम अवश्य ही आत्मनिर्भर बनेंगे। आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में वैश्विकरण का बहिष्कार नहीं है अपितु दुनिया के विकास में मदद की मंशा है। हमारी संस्कृति तो वसुधैव कुटुंबम की संकल्पना में विश्वास रखती है और भारत जो कि दुनिया का ही हिस्सा है, ऐसे में उसकी प्रगति दुनिया की प्रगति में योगदान देगी।
(लेखिका दिल्ली,भाजपा की शिक्षा प्रकोष्ठ की संयोजिका हैं)