बलूचिस्तान और सिंध में तेज होगी आजादी की खूनी लड़ाई,बलोच और सिंधी सशस्त्र आंदोलनकारियों ने मिलाए हाथ

    दिनांक 27-जुलाई-2020   
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मजहबी आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान और संक्रमण के आतंकवाद के पोषक चीन के लिए बुरी खबर है। बलूचिस्तान और सिंध की आजादी के लिए छापामार युद्ध लड़ रहे बलोच और सिंधी सशस्त्र आंदोलनकारियों ने हाथ मिला लिए हैं। अब ये पाकिस्तान से आजादी पाने में एक-दूसरे की मदद करेंगे और साझी रणनीति के तहत काम करेंगे।
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पाकिस्तान में बलूचिस्तान और सिंध की आजादी की लड़ाई में खून-खराबे का दौर तेज होने की भूमिका तैयार हो गई है। दोनों इलाकों की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे सशस्त्र आंदोलनकारी अब एक साथ आ गए हैं। बलूचिस्तान की आजादी के लिए हथियारबंद आंदोलन चला रहे संगठन ब्रास (बलोच राजी अजोई संगर) और एसआरए (सिंध रिवॉल्यूशनरी आर्मी) ने गठजोड़ बनाने की घोषणा की है। दोनों संगठन अब पाकिस्तान से आजादी के लिए मिलकर संघर्ष करेंगे।

ब्रास बलूचिस्तान की आजादी के लिए छापामार लड़ाई लड़ रहे चार हथियारबंद संगठनों- बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट, बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी, बलोच रिपब्लिकन गार्ड और बलोच रिपब्लिकन आर्मी- का संयुक्त संगठन है और पिछले कई सालों से बलूचिस्तान की आजादी के लिए संघर्ष कर रहा है। इसने पाकिस्तानी फौज और सीपीईसी से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने वाले पाकिस्तानी और चीनी नागरिकों पर बड़े-बड़े हमले किए हैं। दूसरी ओर, एसआरए सिंध की आजादी के लिए हथियारबंद संघर्ष कर रहा है। मिली जानकारी के मुताबिक इन दोनों संगठनों के वरिष्ठ नेताओं की किसी गोपनीय जगह पर हुई बैठक में पाकिस्तान से आजादी के लिए मिलकर लड़ने का फैसला किया गया।

साझा दर्द, साझी लड़ाई

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ब्रास के प्रवक्ता बलोच खान ने कहा कि बलूचिस्तान और सिंध, दोनों इलाके पाकिस्तान के जुल्म का सामना कर रहे हैं। दोनों जगहों पर फौजी मनमानी और मानवधिकारों का खुला उल्लंघन हो रहा है। सबसे बड़ी बात है कि पाकिस्तान इन दोनों इलाकों की पहचान को खत्म करने पर तुला हुआ है, इसलिए हमने अपने साझे दर्द का साझा इलाज करने का फैसला लिया। बलोच खान ने कहा, “ हमने एक साथ मिलकर पाकिस्तान से आजादी की मुहिम चलाने, साझी रणनीति पर चलते हुए साझी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है।” बलूचिस्तान और सिंध एक बड़ी ही उन्नत सभ्यता की विरासत की डोर से बंधे हैं और दोनों के राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक रिश्ते हजारों साल पुराने हैं। इस बात को महसूस करते हुए ब्रास और एसआरए ने साथ आने का फैसला किया। बलोच खान कहते हैं, “ पाकिस्तानी कब्जे में घुट रहे इन दोनों मुल्कों के लिए मिल-जुलकर जद्दोजहद करना आज की वक्ती जरूरत थी।”   

सीपीईसी का खेल खूब समझते हैं

पाकिस्तान और चीन, दोनों की नीतियां विस्तारवादी हैं और वे किसी भी तरह इन इलाकों के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना चाहते हैं और सीपीईसी (चीन पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर) इसका उदाहरण है। सिंध और बलूचिस्तान हिंद महासागर तक रास्ता देते हैं और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हर्मुज जलडमरूमध्य तक समुद्री रास्ता भी मुहैया कराते हैं। चीन जो सीपीईसी पर निवेश कर रहा है, उसके पीछे उसके अपने हित हैं। दक्षिण चीन सागर पर अपना अवैध कब्जा बताने वाले चीन के लिए सीपीईसी ऑक्सीजन की तरह है और इसी कारण वह इसे पूरा करना और हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित कर लेना चाहता है। इस कारण भी पाकिस्तान ने हाल के वर्षों में बलूचिस्तान में फौजी जुल्म बढ़ा दिए। लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई लड़ रहे बलूच और सिंधी लड़ाके भी जानते हैं कि सीपीईसी वह नस है जिसे दबाने से चीन और पाकिस्तान, दोनों तिलमिला उठते हैं। इसी कारण आजादी की लड़ाई लड़ रहे आंदोलनकारियों ने चंद वर्षों के दौरान सीपीईसी पर तैनात सुरक्षा बलों और सीपीईसी से जुड़ी परियोजनाओं पर काम करने वाले पाकिस्तानियों और चीनियों पर अक्सर जानलेवा हमले किए। बलोच खान कहते हैं, “ इतिहास के इस दौर में हम एक और कब्जे के खिलाफ जद्दोजहद कर रहे हैं। वक्त आ गया है जब सिंधी और बलोच मिलकर कब्जा करने वाले इस पाकिस्तानी सूबे (पंजाब) को शिकस्त दें और अपने-अपने इलाकों को आजाद कराएं।”

रंग लाई डॉ. अल्लाह नजर बलोच की अपील

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इसी साल अप्रैल में इस बात के संकेत मिलने लगे थे कि आने वाले समय में बलूचिस्तान और सिंध की आजादी के लिए लड़ाई लड़ रहे आंदोलनकारी एक साथ आ सकते हैं। सिंध के इतिहास में गुलाम मुर्तजा शाह सैयद को बड़ी इज्जत से देखा जाता है। शुरू में पाकिस्तान के समर्थक रहे जी.एम. सैयद को आखिरकार अहसास हो गया कि सिंध की सभ्यता और संस्कृति की रक्षा पाकिस्तान के साथ रहकर नहीं की जा सकती और इसके लिए सिंध को पाकिस्तान से आजाद होना पड़ेगा। इसी मंशा के साथ उन्होंने जीयै सिंध मुत्ताहिदा महाज़ नाम की सिंधी राष्ट्रवादी पार्टी बनाई थी। उन्होंने एक आजाद सिंधुदेश की कल्पना की और इसके लिए जीवन भर काम करते रहे।

17 जनवरी, 1904 को जन्मे जी.एम. सैयद का 25 अप्रैल, 1995 को इंतकाल हुआ था। इस साल 25 अप्रैल के मौके पर जी.एम. सैयद की कुर्बानी को याद करते हुए बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट के नेता डॉ. अल्लाह नजर बलोच ने कहा था, “अगर सिंधियों को अपने वजूद की हिफाजत करनी है तो उसे पाकिस्तान से आजाद होने के लिए हथियारबंद आंदोलन करना पड़ेगा। यह अफसोस की बात है कि बलूचिस्तान और सिंध जैसी प्राचीन सभ्यताओं को एक ऐसे मुल्क ने बंधक बना रखा है जिसकी खुद की न कोई सभ्यता है और न संस्कृति। लोकतंत्र की आड़ में फौजी हुकूमतों ने दुनिया भर में जो किया, वही पाकिस्तान में भी हो रहा है। आज सिंध इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। उसे वो हर तरीका अपनाना होगा जो उसे आजादी दिला सके।

आज सिंध का वही हाल है जो बलूचिस्तान का है। हम ऐसे मुल्क के गुलाम हैं जिसने बंगालियों का नरसंहार किया और नतीजा यह हुआ कि वह हिस्सा उनके हाथ से जाता रहा। अब वे वही सब बलूचों और सिंधियों के साथ कर रहे हैं। अगर हमने उन्हें नहीं रोका तो हमारी नस्लें खत्म हो जाएंगी। किसी जुल्मी हुकूमत से निजात पाने का हक बलूचों को भी है और सिंधियों को भी। इसमें शक नहीं कि हथियार उठाकर आजादी की लड़ाई लड़ने का फैसला करना एक मुश्किल काम होता है, लेकिन जब दुश्मन वहशी हो, हर तरह का जुल्म कर रहा हो, तो इस तरह का फैसला लेना वक्ती जरूरत होती है और सिंध के लोगों को जी.एम. सैयद की आजाद सिंधुदेश की ख्वाहिश को पूरा करने के लिए हाथों में हथियार ले लेना चाहिए। इसके अलावा कोई रास्ता नहीं। सिंध के लोग भी उस मुकाम पर पहुंच गए हैं, जहां से दो ही रास्ते निकलते हैं। एक, पाकिस्तान में रहकर अपनी हैसियत को मिटा देना और दूसरा, उससे आजादी पाकर खुद को, आने वाली नस्लों को बचा लेना।”

डॉ. अल्लाह नजर बलोच की इस अपील के बाद से ही माना जा रहा था कि आने वाले समय में बलूचिस्तान और सिंध की आजादी के लिए हथियारबंद आंदोलन कर रहे संगठनों में किसी तरह का तालमेल हो सकता है। इन दोनों संगठनों के एक साथ आने का सीधा मतलब है कि अब खून-खराबे का दौर तेज होने वाला है।