श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन के वह प्रमुख नायक जिन्होंने राष्ट्र की सुप्त पड़ी विराट चेतना को जगाया

    दिनांक 27-जुलाई-2020
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आगामी 5 अगस्त को श्रीराम जन्म भूमि का पूजन होने जा रहा है। इस दिन को देखने के लिए अनगिनत संत-महात्माओं ने संघर्ष किया और मंदिर निर्माण की लड़ाई लड़ी. जिन लोगों के संघर्ष के कारण यह शुभ अवसर आया, उनमें से कुछ लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं। आज जो शुभ अवसर आया है उसके पीछे सदियों का संघर्ष और लोगों की तपस्या है
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परमहंस राम चन्द्र दास जी महाराज
परमहंस रामचन्द्र दास जी महाराज ने श्रीराम जन्मभूमि में पूजा-अर्चना के लिए 1950 में जिला न्यायालय में मुकदमा दायर किया। जिला अदालत ने पूजा–पाठ करने की अनुमति दे दी। मुस्लिम पक्षकारों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील की। उच्च न्यायालय ने जिला आदालत के फैसले को उचित ठहराया।
दिगम्बर अखाड़ा, अयोध्या में बैठक हुई जिसमें श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन हुआ। समिति की बैठक में तय किया गया कि श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए जन-जागरण किया जाएगा। परमहंस जी ने वर्ष 1985 के अक्टूबर माह में जन–जागरण अभियान के लिए अयोध्या से 6 राम-जानकी रथों का पूजन कर विभिन्न क्षेत्रों में भेजे। परमहंस जी ने अयोध्या में घोषणा कर दी थी, “ अगर 8 मार्च, 1989 तक श्रीराम जन्मभूमि का ताला नहीं खुला तो मैं आत्मदाह करूंगा।”  इसी बीच 1 फ़रवरी, 1989 को श्री राम मंदिर का ताला खोल दिया गया।

वर्ष, 2002 के जनवरी माह में परमहंस रामचन्द्र दास जी ने अयोध्या से दिल्ली तक की चेतावनी सन्त यात्रा निकाली। सन्तों का नेतृत्व करते हुए 27 जनवरी, 2002 को प्रधानमंत्री से मुलाक़ात की। परमहंस जी ने अंतिम क्षण तक यह प्रयास किया कि राम जन्म भूमि विवाद का कोई हल निकल आये मगर ऐसा हो नहीं सका।

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महंत दिग्विजय नाथ

गोरक्षपीठ के ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ ने वर्ष, 1934 से वर्ष, 1949 तक लड़ाई लड़ी। वर्ष 1949 में विवादित जगह में जब रामलला प्रकट हुए, उसके बाद वहां पूजा-अर्चना शुरू हो गई। महंत दिग्विजय नाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद महंत अवैद्यनाथ ने राम मंदिर आंदोलन का दायित्व संभाला और  फिर राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया। इसकी पहली यात्रा महंत अवैद्यनाथ के नेतृत्व में बिहार के सीतामढ़ी से अयोध्या तक निकाली गई।


गोपाल सिंह विशारद
22/23 दिसंबर की रात सन 1949 को भगवान का प्राकटृय हुआ। उसके बाद से विवाद शुरू हुआ। मूर्ति प्रकट होने को लेकर जब विवाद शुरू हुआ तब  गोपाल सिंह विशारद आये। यही वह व्यक्ति थे, जिन्होंने पहला मुकदमा दायर किया। एक श्रद्धालु के तौर पर गोपाल सिंह विशारद ने कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी कि उनके दर्शन–पूजन में कोई व्यवधान न उत्पन्न किया जाए। कोर्ट ने इस पर स्थगन आदेश पारित कर दिया। विवाद की स्थिति उत्पन्न होते देख अयोध्या जनपद ( उस समय का फैजाबाद) के सिटी मजिस्ट्रेट ने नगर पालिका के चेयरमैन बाबू प्रिया दत्त राम को मंदिर का रिसीवर नियुक्त कर दिया और 5 जनवरी, 1950 को इनर कोर्ट यार्ड जिसमें तीनों ढांचे जो वर्ष 1992 में ढहा दिए गए और उसके सामने की जमीन रिसीवर की देख-रेख में दे दी गई। 

 

अशोक सिंघल
श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के माध्यम से राष्ट्र की सुप्त पड़ी विराट चेतना एवं सोए हुए हिंदू पौरुष को जगाने का काम श्रद्धेय श्री अशोक सिंहल ने किया। संघ की कार्ययोजना से अशोक सिंघल जी 1983 में विश्व हिन्दू परिषद में भेजे गए और 1984 में विहिप के सयुंक्त महामंत्री बनाए गए. उसी वर्ष अशोक सिंघल जी ने राम जन्म भूमि के मुद्दे को उठाया। उन्होंने सन, 1983 में दिल्ली के विज्ञान परिषद में प्रेस कांफ्रेंस करके पहली बार विहिप के बैनर से यह मांग की कि काशी, मथुरा और अयोध्या को मुक्त कराया जाएगा। सन, 1984 में राम जन्म भूमि के लिए पहली एकात्मता यात्रा निकाली गई। इसके बाद अशोक जी ने राष्ट्र के जागरण के लिए गो माता, गंगा माता और भारत माता के प्रति लोगों को जागरूक करने के  लिए कई प्रदेशों से रथ यात्राएं निकाली। यह सभी रथ यात्राएं दिल्ली में आकर एकत्र हुईं।

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इस बीच वर्ष, 1986 में सिविल कोर्ट के आदेश पर राम मंदिर का ताला खोला गया। वर्ष, 1989 में प्रयागराज के कुम्भ में देवरहा बाबा एवं रामचंद्र परमहंसदास जी की उपस्थिति में यह तय हुआ कि गांव–गांव में शिला पूजन कराया जाएगा। सबसे पहला शिला पूजन बद्रीनाथ में हुआ। पूरे  भारत में पौने तीन लाख गावों से पूजन करने के बाद शिलायें मंगाई गईं। इन शिलाओं को मंदिर निर्माण में लगाया जाने का संकल्प लिया गया था। 9 नवम्बर, 1989 को विहिप ने अयोध्या में शिलान्यास किया। 29 मई, 1990 को प्रबोधिनी एकादशी को कारसेवा करने का फैसला लिया गया। अयोध्या में भारी संख्या में कारसेवक पहुंचे। इस मौके पर अशोक सिंघल जी भी अयोध्या पहुंच गए और सबको चौंका दिया। पुलिस ने अयोध्या में उन्हें गिरफ्तार कर लिया। अंततः ढांचा ढहाया गया। उसके बाद से आखिरी सांस तक उनकी यही इच्छा थी कि जन्म भूमि पर भव्य राम मंदिर का निर्माण हो। उनका संकल्प अब यकीनन पूरा हो रहा है।


 ठाकुर गुरूदत्त सिंह
 अयोध्या स्थित कार्यशाला में इन दिनों हलचल तेज है। पत्थर तेजी से तराशे जा रहे हैं। कार्यशाला में काफी बड़े आकार की दो तीन तस्वीरें लगी हुई हैं। इसमें से एक तस्वीर है—ठाकुर गुरदत्त सिंह की। यह जानना काफी दिलचस्प है कि कौन थे ठाकुर गुरुदत्त सिंह? 22/23 दिसंबर, 1949 को जब भगवान राम लला प्रकट हुए थे, उस समय ठाकुर गुरुदत्त सिंह फैजाबाद के सिटी मजिस्ट्रेट थे। हिन्दू विरोधी सरकार ने तत्काल मूर्ति हटवाने का आदेश दिया था मगर उन्होंने इस आदेश को मानने से इन्कार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।


कोठारी बन्धु

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कोलकाता निवासी राम कोठारी और शरद कोठारी दोनों भाइयों ने अयोध्या में ढांचे पर चढ़कर झंडा फहराया था। ढांचे की सुरक्षा के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने गोली चलाने का आदेश दिया था। 2 नवंबर, 1990 को अयोध्या में पुलिस की गोली से कोठारी बंधुओं की मृत्यु हो गई थी। अयोध्या में गोली चलने से ठीक पहले वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा को बिहार के समस्तीपुर में रोक दिया गया था। उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया था। उस समय जो फोटो अखबारों में प्रकाशित हुई थीं, उसमें राम कोठारी, ढांचे के ऊपर हाथ में भगवा झंडा थामे खड़े दिख रहे हैं और शरद कोठारी उनके बगल में हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हनुमान गढ़ी के पास भी पुलिस ने गोली चलाई थी, जिसमें कुछ लोगों की मृत्यु हुई थी। कोठारी बंधुओं के पिता का वर्ष, 2002 और मां का वर्ष, 2016 में देहांत हुआ। कोठारी बंधुओं का परिवार मूल रूप से बीकानेर का रहने वाला था। वर्ष, 1990 की कारसेवा के समय राम कोठारी 22 वर्ष और शरद 20 वर्ष के थे। उनकी बहन पूर्णिमा शरद से एक साल छोटी हैं।