ओटीटी प्लेटफॉर्मस को नियमों में बांधना बेहद जरूरी

    दिनांक 28-जुलाई-2020
Total Views |
ऋषिकेश जोशी
ओटीटी का कंटेट देखकर कभी-कभी आप यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि यह सब केवल दर्शकों से मासिक शुल्क बटोरने के लिए है, या किसी योजनाबद्ध तरीके से सांस्कृतिक आक्रमण है ?

ott_1  H x W: 0 
ओटीटी, क्या ? अगर आप ओटीटी शब्द को नहीं जानते हैं, तो आप प्रागैतिहासिक काल में रहते हैं, ऐसा कहना होगा। शाब्दिक अर्थ है “ओवर द टॉप”; इंटरनेट के माध्यम से टीवी पर फ़िल्में, सीरियल या अन्य कार्यक्रम देखना। पर आज जो चल रहा है, उसे देख कर कहना होगा कि ओटीटी का मतलब पानी सिर से ऊपर हो गया है।
इन दिनों, खासतौर पर लॉक डाउन के दौरान, बीते चार महीनों में, इंटरनेट के द्वारा सीरियल या फ़िल्में देखने में कई गुना वृद्धि हुई। सारे सिनेमा थियेटर बंद हैं, नाट्यगृह भी बंद। खेल बंद तो मैच का “लाइव टेलिकास्ट” नहीं। शूटिंग बंद होने के कारण, सीरियल और रियलिटी शो के नए एपिसोड आने बंद हुए, सारे चैनल वाले पुराने कार्यक्रम घिस-घिस कर दिखा रहे थे। अगर रामायण- महाभारत जैसे कुछ अपवाद छोड़ दें, तो दर्शकों की पुराने कार्यक्रम देखने में कोई खास रुचि नहीं थी।
ऐसी परिस्थितियों में सारे दर्शक ओटीटी एप्स पर टूट पड़े, जो भी नया मिला देख डाला, और काफ़ी कुछ मिला। खाली समय में क्या करें? यह प्रश्न भी था सामने। आजकल जब समवयस्क मित्रों आपस में चर्चा करते हैं तो किसने कौन सी सीरीज या फ़िल्म किस एप पर देखी और वह कितनी “हॉट” है !
ऐसा नहीं था कि, लॉक डाउन के पहले ओटीटी नहीं था। इंटरनेट के द्वारा टीवी पिछले कुछ वर्षों से था, सबसे पहले अमेज़ॉन फ़ायर स्टिक के माध्यम से और फिर कई और लोगों ने भी इंटरनेट वाले सेट टॉप बॉक्स देना शुरू किया। पर वह केवल माध्यम है, कार्यक्रम या “कंटेंट” एप वालों के पास थे। शुरुआती दिनों में केवल अमेज़ॉन प्राइम था,फिर आए नेटफ़्लिक्स, हॉट स्टार, एमएक्स प्लेयर, वूट, आल्ट बालाजी इत्यादी एप ।ये एप वाले अपने साथ लेकर आए बेशुमार फ़िल्में, टीवी सीरियल और अन्य कार्यक्रम।इनमें से कुछ कार्यक्रम “फ़्री” यानि निशुल्क थे और कुछ मासिक या सालाना शुल्क देकर देख सकने वाले।
पहले भारतीय भाषाओं की फ़िल्में आई, पुरानी सीरियल्स आए, फिर विदेशी फिल्में और सीरियल्स भी आ गए। दूसरी भाषा की फिल्में, टीवी सीरियल डबिंग या सब-टाईटल के साथ देखने समझने का मौका मिला, जो प्रशंसनीय कार्य था। वरना हिंदी भाषी ना तो तामिल- मलायलम की अच्छी फ़िल्में देख पाता और ना ही स्पेनिश या फ्रेंच।
हमने बात की शुल्क और निशुल्क कार्यक्रमों की। कहने की आवश्यकता नहीं कि, एप वालों के लिए मलाई शुल्क वाले कार्यक्रमों में थी, पर उसके लिए दर्शकों को आकर्षित करना भी जरूरी था। यहां पर शुरु हुआ एक कुटिल खेल जो आज बहुत बड़ा हो गया है और चिंता का कारण है।
भारतीय फिल्में और टीवी सीरियल भारतीय नियामक मंडल के दिशा निर्देश के अनुसार होती हैं। तब ही आप उन्हें सैटेलाइट टीवी या केबल के माध्यम से देख पाते हैं। पर इंटरनेट के जरिए ओटीटी पर ऐसा कोई नियम नहीं था। ऐसे में पहला कदम था विदेशी फिल्में और सीरियल जो वहां के सेंसर के हिसाब से बनीं थीं। संस्कृति और आचरण अलग होने के कारण, कई चीजें जो हमारे यहां अश्लील या अभद्र मानते थे, उनमें स्वाभाविक दिखाते हैं।
इन विदेशी सीरियल और फिल्मों ने कई दर्शकों को उन एप की ओर खींचा, जो एप वालों का उद्देश्य भी था। कई सीरियल या जिन्हें अब “वेब सीरीज़” कहते हैं, के तीन-चार सीज़न तक भी थे। दर्शक उनके दीवाने हो गए, “गेम्ज़ ऑफ़ थ्रोन” उसका ताज़ा उदाहरण है।
अब वे एप वाले खून चख चुके थे, किसी दिशा निर्देश के अभाव में, उन्होंने और आगे बढ़ कर वह दिखाना शुरु किया जो, सामन्यत: आप टीवी या सिनेमाघर में नहीं देख सकते थे। इसके लिए उन्होंने खास उस एप के लिए सीरियल बनवाना शुरु किया। अपना पैसा डाल कर नामी निर्देशक और कलाकार जोड़ कर अपने “हिसाब” से बनवाई, “एक्सक्लूसिव सीरीज़”।
फ़ार्मुला बड़ा सीधा था, वह सब दिखाइए जो टीवी/फिल्मों में नहीं दिखाया जा सकता, उसे एक कहानी के माध्यम से जोड़ दीजिए। तीन खास आकर्षण के विषय थे :
•सेक्स : ऐसे दृश्य दिखाएं कि आप “अश्लील” शब्द की व्याख्या भी भूल जाएं।
हिंसा : ऐसी हिंसा कि आपके रोंगटे खड़े हो जाएं । जैसे किसी की हत्या, कैसे की जाए, पूरा विवरण।
•धर्म : धार्मिक परंपराओं का मजाक उड़ाना या किसी धार्मिक मान्यता को तोड़ मरोड़ कर विकृत रूप में दिखाना।
इसके अलावा भाषा ऐसी कि मां- बहन की गाली, आपको बहुत सौम्य शब्द लगने लगे। पर ऊपर के तीन“आकर्षणों” के मुकाबले, भाषा का विषय गौण लगने लगेगा।
कुछ सीरीज में तीनों विषयों को कूट-कूट कर भरा था, “सेक्रेड गेम्स” उसका एक उदाहरण है। कुछ में धार्मिक पक्ष को विकृत कर दिखाया जैसे “असुर”, कुछ में हिंसा और सेक्स जैसे “मिर्ज़ापुर”। कुछ सीरीज केवल सेक्स पर आधारित होती हैं, जिसे दर्शक चटखारे लेकर देखें। यह कुछ नाम उदाहरण के तौर पर लिए हैं, पर सूची काफ़ी लंबी है।
कभी-कभी आप यह सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं, कि यह सब केवल दर्शकों से मासिक शुल्क बटोरने के लिए है, या किसी योजनाबद्ध तरीके से सांस्कृतिक आक्रमण है? क्या बायो केमिकल वॉरफ़ेयर या सायबर वॉरफ़ेयर की ही तरह “कल्चरल वॉरफ़ेयर” भी है? यहीं पर चिंता शुरु होती है।
ऐसा नहीं कि सारी ही वेब सीरीज़ इस तरह की हैं। कई बड़ी सुंदर और सहज हैं जैसे “पंचायत” या “कोटा फ़ैक्टरी”। कुछ हाल की घटानाओं पर आधारित हैं जैसे “दिल्ली क्राइम” निर्भया पर और कुछ इतिहास पर जैसे “बोस”, सुभाष जी के जीवन पर। दोनों बहुत विचारोत्तेजक थीं। यहां भी सूची लंबी है और ये नाम सिर्फ़ उदाहरण हैं।
तो अब प्रश्न उठता है कि, क्या यह सब जैसा चल रहा है, उसे चलते रहना चाहिए? या, एक जागरूक नागरिक होने के नाते, हम मांग करें कि कहीं तो लक्ष्मण रेखा खींची जाए? क्या हमारा समाज इतना परिपक्व है कि अनिर्बंधित वेब सीरीज़ को पचा सके? या, कहीं कुछ नियंत्रण आवश्यक हैं। मुझे लगने लगा है कि, उस “लक्ष्मण रेखा” की नितांत आवश्यकता है।