देश बड़ा या चीनी पैसा

    दिनांक 28-जुलाई-2020
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प्रवीण सिन्हा
चीन की हरकतों को देखते हुए 59 चीनी ऐप को प्रतिबंधित करने के बाद सरकार ने देशवासियों से चीनी समानों का बहिष्कार करने की अपील की है। इसका असर चारों ओर दिख रहा है, लेकिन भारतीय खेल जगत विशेषकर बीसीसीआई और कुछ क्रिकेट खिलाड़ी या स्टार खिलाड़ी मोटी कमाई के लोभ में आज भी चुप्पी साधे हुए हैं। सवाल है कि क्या राष्ट्र प्रेम पर पैसे की चकाचौंध हावी है?
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समूचा देश चीनी सामान का बहिष्कार कर रहा है, लेकिन चीनी कंपनियों से होने वाली मोटी कमाई के चक्कर में बीसीसीआई, कुछ क्रिकेटर और अन्य खिलाड़ियों ने चुप्पी साध रखी है।


चीन की तमाम बदमिजाजियों पर लगाम कसने में भारत सरकार की पहल काफी हद तक सफल रही है। प्रधानमंत्री का नारा ‘वोकल फॉर लोकल’ रंग ला रहा है। चीनी ऐप को प्रतिबंधित करने के बाद देश में चीनी कंपनियों और चीनी उत्पादों का बहिष्कार जारी है। लेकिन भारतीय खेल जगत अब तक चुप्पी साधे हुए है। विश्व की सबसे शक्तिशाली और अमीर क्रिकेट संस्था भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) ने भी इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया है।

बीसीसीआई की चुप्पी संशय पैदा करती है कि कहीं चीनी कंपनियों की अकूत प्रायोजन राशि उसके देशभक्ति की राह में बड़ी बाधा तो नहीं है? वह भी तब, जबकि बीसीसीआई के दो शीर्षस्थ अधिकारियों का सीधे तौर पर भाजपा के साथ संबंध है और शायद ही कोई उनकी पहल का विरोध करेगा। फिर भी बीसीसीआई अगर चीनी कंपनियों की प्रायोजन राशि के कारण ऊहापोह में है तो मात्र 50-100 क्रिकेट खिलाड़ियों को हर साल करोड़पति बनाने के लिए राष्ट्रहित को ताक पर रखने का अधिकार उसे नहीं दिया जा सकता है।

बीसीसीआई के अलावा भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली और पीवी सिंधू जैसी कुछ स्टार खिलाड़ियों सहित कबड्डी प्रीमियर लीग को मिलने वाली भारी-भरकम प्रायोजन राशि चीनी कंपनियों से ही आती हैं। लेकिन इनमें से किसी ने भी अपनी ओर से चीनी कंपनियों के बहिष्कार की आवाज नहीं उठाई है। इन्हें शायद शायद इंतजार है कि सरकार की ओर से कोई दिशानिर्देश जारी हो ताकि वे चीनी कंपनियों से नाता तोड़ने की घोषणा कर सकें। एक लोकतांत्रिक देश में किसी व्यक्ति पर कोई आदेश थोपा नहीं जा सकता है, लेकिन देश का एक जिम्मेदार नागरिक या देश की अमीर संस्था होने के नाते क्या इनकी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है? ऐसा संभवत: इसलिए हो रहा है कि बीसीसीआई का चीनी कंपनियों या निवेशकों के साथ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गहरा नाता है और चीन विरोधी जनभावनाओं के उभरने से उनका सबसे बड़ा आर्थिक नुकसान होगा।

लेकिन एक बदनीयत देश को आर्थिक झटका देने की खातिर बीसीसीआई या चंद स्टार खिलाड़ियों की इतनी जिम्मेदारी तो बनती ही है कि तात्कालिक निजी आर्थिक नुकसान को परे रखकर राष्ट्रहित में सरकार के साथ खड़े हों। बीसीसीआई हो या कोई भी स्टार खिलाड़ी, उन्हें बखूबी पता है कि अगर आज वो चीनी कंपनियों का परित्याग करेंगे तो अगले ही दिन उन्हें प्रायोजित करने के लिए कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां कतार में खड़ी होंगी। हो सकता है कि उन्हें अभी की तुलना में थोड़ा कम आर्थिक फायदा हो। लेकिन भारतीय खेल जगत पर अरबों-खरबों रुपये लगाकर चीन ने जो बादशाहत हासिल कर ली है, उसे तोड़ने में भारतीय खेल जगत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
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इसमें कोई शक नहीं है कि बीसीसीआई ने विश्व क्रिकेट जगत को धनाढ्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्रिकेट के रोमांच को उन्होंने खेल प्रेमियों के आगे कुछ इस तरह परोसा है कि क्रिकेट शृंखला या विश्व की संभवत: सबसे महंगी लीग आईपीएल देश में एक उत्सव का सा माहौल पैदा कर देती है। इस क्रम में टीम इंडिया या आईपीएल में खेलने वाले क्रिकेटर न केवल महानायक का दर्जा हासिल कर लेते हैं, बल्कि महज 4-5 वर्षों में करोड़ों रुपये भी कमा लेते हैं। यह बहुत अच्छी बात है, लेकिन उन्हें (बीसीसीआई और स्टार खिलाड़ियों को) यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के खेल प्रेमियों के बीच उनकी लोकप्रियता की वजह से ही उनकी कीमत चीनी कंपनियों ने करोड़ों में आंकी है।

विकल्प तलाशने की जरूरत

यह सच है कि भारत खेल सामग्रियों और खेल उपकरणों के मामले में चीन पर काफी निर्भर है। लेकिन उसका विकल्प देश-विदेश में मौजूद है। भारत में काफी हद तक विश्व स्तरीय खेल सामग्रियों का उत्पादन होता है। टेबल टेनिस, बैडमिंटन, फुटबॉल, वालीबॉल व बास्केटबॉल सहित कुछ खेल उपकरणों और विभिन्न कोर्ट के टर्फ के मामले में भारतीय खेल जगत चीन पर इसलिए ज्यादा निर्भर है, क्योंकि वह अपेक्षाकृत सस्ते दामों पर ये सामान उपलब्ध कराता है। चीन के कुछ सस्ते सामान विश्वस्तरीय हैं तो कुछ पर इतना भी भरोसा नहीं कि कब तक चलेगा। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि सस्ता सामान टिकाऊ होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। कोर्ट के चीनी टर्फ 5-6 साल चलते हैं, उससे थोड़े अधिक दाम पर दूसरे देशों से बेहतर टर्फ आयात किए जा सकते हैं। हालांकि चीनी समर्थक तबका यह साबित करने में जुटा हुआ है कि चीनी कंपनियों से करार तोड़ने या सामान आयात करने से भारतीय खेल जगत पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगा। लेकिन सच यही है कि चीनी वर्चस्व तोड़ने के लिए भारतीय खेल जगत को देश में तमाम खेल उपकरणों या सामग्रियों के तैयार होने तक 10 से 30 प्रतिशत तक अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा।
चीन से आने वाले इन तमाम खेल सामग्रियों को 10 से 20 प्रतिशत की अधिक लागत पर विश्व के अन्य देशों से आयात किया जा सकता है या भारत में ही उत्पादन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देश भी भारत से खेल सामग्रियों का आयात करते हैं तो देश में खेल सामग्रियों के उत्पादन को बढ़ाकर आत्मनिर्भरता भी बखूबी बढ़ाई जा सकती है। कुछ ऐसे खेल सामग्री जिन पर चीन का दबदबा है, उन्हें जापान, कोरिया, अमेरिका सहित कुछ यूरोपीय देशों से आयात करने का विकल्प हमेशा खुला है।