गाय और सनातन संस्कृति

    दिनांक 28-जुलाई-2020
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भरत शर्मा
‘पेटा’ जैसे संगठन गाय को लेकर भले कितना सेकुलर दुष्प्रचार करें, लेकिन सनातन विचार गोवंश को सदा से पूज्य मानता रहा है। दूध और गोपालन के विरुद्ध कुतर्क बंद होने चाहिए
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अन्तरराष्ट्रीय संगठन ‘पेटा’ कहता है कि दूध न पीएं, शाकाहारी बनें। इस संदर्भ में पश्चिम में चले शाकाहारी आंदोलन की पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। बाइबिल के अध्याय ‘जेनेसिस’ में लिखा गया है, ‘‘मनुष्य को पशु, पक्षी, जीव-जंतु और धरती को भोगने का अधिकार है।’’ अर्थात् बाइबिल मनुष्य को यह अधिकार देती है कि वह किसी भी अन्य जीव को मारे-काटे। इसके विपरीत सनातन संस्कृति कहती है कि मनुष्य की तरह अन्य जीवों में भी आत्मा है। हम सब का पुनर्जन्म होगा। इसी कारण हम प्रकृति को पूजते हैं और प्रयास करते हैं कि अन्य जीव को कष्ट न हो। लेकिन जब पश्चिम के लोग जागरूक हुए और जीव-जंतु और जानवरों की पीड़ा से उद्वेलित होने लगे तो यह भाव जगा कि मांस-भक्षण न किया जाए। इसी कड़ी में वहां यह भाव भी जगा कि गाय का दूध न पिया जाए, क्योंकि दूध निकालने में गाय को कष्ट होता है।

सनातन मान्यता : सनातन संस्कृति में मान्यता है कि गाय के जो चार थन होते हैं, उनमें से मनुष्य का अधिकार केवल दो थन के दूध पर है। बाकी दो थन के दूध पर बछड़े या बछिया को अधिकार है। दो थन इसलिए कि बछिया या बछड़े में इतनी क्षमता नहीं है कि वे चारों थन का दूध पी सकें।  केवल दो थन तक अपनी आवश्यकता को सीमित रखना और शेष को गोवंश पोषण के लिए छोड़ना, इस दो-थन से ही दुहना या दोहन शब्द बने। यदि उस दूध को न निकाला जाए तो गाय बीमार हो सकती है। इस कारण से गाय के दो थन से दूध बाहर निकाला जाता है और उस दूध का भोग मनुष्य करते हैं। केवल चार पीढ़ी पहले दूध बेचना अच्छा काम नहीं माना जाता था। सामान्यत: हर परिवार अपने दूध के लिए एक गाय पालता ही था। जैसे हम गांव से शहर में बसने लगे, गाय पालना व्यावहारिक नहीं रहा। अत: गाय का दूध खरीदना व्यवस्था हो गई।

दूध, दही और घी की विशेषता: नवजात शिशु को मां का ही दूध दिया जाता है, किंतु अन्नप्राशन के बाद अथवा मां का दूध रुकने के बाद जो सर्वाधिक सुपाच्य दूध है वह देसी गाय का ही है। भारत के लगभग हर प्रांत के भोजन में दही एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका मुख्य कारण है दही के माध्यम से हमारे पाचन-तंत्र के अंदर बसने वाले आवश्यक व अच्छे बैक्टीरिया स्वस्थ रहते हैं। आज से कुछ वर्ष पहले डालडा इत्यादि बेचने के लिए बिकाऊ विशेषज्ञ कहते फिरते थे कि देसी घी खराब है और डालडा भी घी ही है। पर आज वैज्ञानिक भी मानते हैं कि देसी नस्ल की गाय के दूध से पारंपरिक विधि से दही जमा के मक्खन बिलो कर जो घी बनाया जाता है, वह मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, त्वचा और जोड़ों में स्निगधता प्रदान करता है।

गोबर और गोमूत्र का महत्व : 1950 से 2004 के बीच अमेरिका में जो भोजन खाया जा रहा था,  उस सबमें पौष्टिक तत्व की मात्रा में गिरावट आई है। इसके कई कारण बताए गए। जैसे-अधिक उत्पादन के लिए ऐसी प्रजातियां विकसित करना जो तेजी से बढ़े, रासायनिक खाद आदि का प्रयोग। यहां बता दें कि भारत के बहुत सारे भूभाग में कम से कम 15, 000 वर्ष से खेती हो रही है, जबकि अमेरिका में 500 वर्ष पूर्व बहुत सीमित क्षेत्र में खेती होती थी। इतने वर्षों में भी हमारे भोजन के पौष्टिक तत्व लुप्त नहीं हुए। इसका कारण है देसी नस्ल की गाय के गोबर और गोमूत्र से भूमि को सिंचित करते रहने की हमारी पद्धति।

भूमि नहीं होती है बंजर: कौन-सी भूमि कब रेगिस्तान बन जाती है व क्यों, इस पर पिछले कुछ दशकों में पश्चिम में बहुत अध्ययन हुआ है। वैज्ञानिक एलन सेवरी ने पाया कि जहां गोवंश चलते हैं, चरते हैं व गोबर करते हैं, उस क्षेत्र की भूमि का रेगिस्तान होना, बंजर होना रुक जाता है और वह भूमि पुन: उपजाऊ बनने लगती है। भारत और सनातन संस्कृति पर हजार वर्षों से बाहरी लोग आक्रमण करते रहे हैं। पहले केवल तलवार से आक्रमण होते थे अब विचार से भी हो रहे हैं। ऐसे विचारों से अपनों को बचाना, हम सबका दायित्व है।