दर्दमंदों का दोमुंहापन

    दिनांक 28-जुलाई-2020   
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कहने को ‘पेटा इंडिया’ पशुओं के ‘अधिकारों की रक्षा’ की बात करती है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह संस्था हिंदू विरोधी अभियान चलाती है। पशुओं की ‘रक्षा’ की आड़ में यह केवल हिंदुओं और हिन्दू धर्म को निशाना बनाती है। इस बार भी वह रक्षाबंधन पर ‘ चमड़ामुक्त राखी’ की बेतुकी बात फैला रही है। जबकि  बकरीद पर यही संस्था मुसलमानों को बकरे और बड़े जानवरों को काटने के तरीके बता रही है
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इस बार रक्षा बंधन पर ‘पेटा’ ने जारी किया  यह  हिंदू विरोधी संदेश

पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट आफ एनिमल यानी ‘पेटा’  एक ऐसा दोमुंहा अंतरराष्ट्रीय संगठन है जो कहने को पशुओं के अधिकारों की रक्षा के लिए काम करता है, पर भारत में इसकी गतिविधियां हमेशा हिंदू विरोध तक सीमित रहती हैं। खासकर, त्योहारों पर इसका हिंदू विरोधी चेहरा खुलकर सामने आ जाता है। इस बार भी रक्षाबंधन करीब आते ही इसने देश में जगह-जगह होर्डिंग लगाकर ‘चमड़ा मुक्त राखी’ का दुष्प्रचार करना शुरू कर दिया। गुजरात के एक सोशल मीडिया यूजर ने जब ऐसे ही एक होर्डिंग की तस्वीर साझा की तो बवाल मच गया। सनातनियों ने जब इस पर जोरदार विरोध जताया तो पेटा इंडिया की समन्वयक राधिका सूर्यवंशी ने घटिया दलील देकर विवाद को शांति करने की कोशिश की कि ‘रक्षाबंधन बहनों रक्षा का समय है। गायें हमारी बहनें हैं। हमारी तरह वह भी मांस, रक्त और हड्डियां से बनी हैं। वे भी जीना चाहती हैं। हमारे विचार प्रतिदिन गायों की रक्षा को लेकर हैं। हम आजीवन चमड़ामुक्त रहना चाहते हैं।’

हालांकि यह सर्वविदित है कि रक्षाबंधन का चमड़े से कोई लेना-देना नहीं है। न ही राखियों के निर्माण में चमड़े का उपयोग किया जाता है, बल्कि महाराष्ट्र की जनजातीय महिलाएं तो इस बार बांस की राखियां बनाकर देश-दुनिया को पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता का संदेश देने में लगी हैं। विरोध के बाद पेटा ने ऐसे तमाम विवादित होर्डिंग हटा दिए हैं और इसके समर्थन में अपनी वेबसाइट पर की गई टिप्पणियां भी हटा दी गई हैं। मगर पशुओं के अधिकारों की बात करने वाला यही संगठन अपनी दोहरी नीति का उदाहरण पेश करते हुए इर्द-उल-अजहा के मौके पर पशुओं के वध को प्रत्साहित करने में लगा है। ईद-उल-अजहा जिसे बकरीद भी कहते हैं, मुसलमानों का त्योहार है, जिसमें पशुओं की बलि दी जाती है। हालांकि मुसलमानों का एक वर्ग इसके तौर तरीकों को लेकर सवाल उठाता रहा है।


यह है ‘पेटा’ का असली चेहरा
पेटा ने अपनी वेबसाइट पर ऐसे लेख को तरजीह दी है, जिसमें इस्लामिक तरीके से पशुओं को जिबह करने की जानकारी दी गई है। लेख में कहा गया है, ‘जानवरों को मारते समय सावधानी से नियंत्रित करें। किसी भी प्रकार का तनाव या क्रूरता हराम है। इससे गलत तरीके से खून निकलने लगेगा और मांस भी अच्छा नहीं मिलेगा। एक जानवर को मारते समय वहां दूसरे जानवर को न रखें, ताकि वह एक-दूसरे की हत्या को देख नहीं पाएं। चाकू की धार को तेज रखें। उसे बार-बार धार दें। उसकी लंबाई ठीक रखें। इसकी लंबाई 45 सेंटीमीटर होनी चाहिए। चाकू को जानवरों को न देखने दें, नहीं तो वे डर जाएंगे। जानवर को किबला यानी पश्चिम दिशा में रखें। उसकी गर्दन को किसी छेद या नाले में रख कर उसे मारें ताकि खून वहीं बह जाए। जानवर के ऊपर खड़े न हों। अगर जानवर बड़े आकार का है तो उसकी हत्या करते समय लोगों की मदद लें, जो उसके पैरों को पकड़ सकते हैं। काफी अच्छे तरीके से जानवर की हत्या करें। तीन से ज्यादा बार वार न करें। गले के पास जितनी भी नसें हैं, उन सबको काट डालें। सांस और भोजन की नली को काट डालें। उस समय कुर्बानी की दुआ पढ़ते रहें। जानवर को हाथ-पांव मारने दें, ताकि खून जल्दी-जल्दी निकल जाए। याद रखें कि किसी की भी जान लेना सिर्फ अल्लाह के हाथ में है। हम अल्लाह द्वारा बनाई गई दुनिया का एक हिस्सा हैं, इसीलिए जिंदा रहने के लिए हम ऐसा करते हैं। दूसरे जीवों की तरह हमें भी अपना अस्तित्व बचाना है। जानवर को काटने के बाद छह मिनट तक उसका खून बहने दें। भेड़ या बकरों के मामले में पांच मिनट तक खून बहने दें। दूसरे जानवर को काटने से पहले खून को एकदम साफ कर दें, क्योंकि खून की गंध से दूसरे जानवरों को तनाव होता है। याद रखें, ये जानवर अल्लाह द्वारा बनाए हुए हैं और जन्नाह (जन्नत) जाते हैं। अगर हम उसके साथ बुरा व्यवहार करते हैं तो इसके लिए हमें जिम्मेदार ठहराया जाएगा।’

ऐसे दोमुंहे रवैये से समझा जा सकता है कि पेटा किस तरह पशुओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहा है? कुछ दिनों पहले इसने लखनऊ में बकरे की तस्वीर वाला एक होर्डिंग लगाया था जिस पर लिखा था ‘मैं जीव हूं, मांस नहीं।’ इस पर मुसलमानों ने हंगामा मचाया। होर्डिंग को बकरीद से जोड़ते हुए इस्लामिक सेंटर आॅफ इंडिया के अध्यक्ष मौलाना राशिद फिरंगी महली ने कहा कि बकरीद का त्योहर करीब है, तो पोस्टर लगाने का क्या मतलब? मुसलमानों की दलील थी कि कुर्बानी उनके मजहब का हिस्सा है। इस मामले में कैसरबाग थाने में पेटा के खिलाफ दो अलग-अलग शिकायतें भी दर्ज कराई गर्इं, जिसके बाद होर्डिंग हटा दिया गया। हालांकि कायदे से पेटा को इस मामले में डटे रहना चाहिए था, क्योंकि बकरीद में पशुओं की वास्तव में हत्या की जाती है, जबकि राखी के त्योहार से इसका दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं।



इस्लाम में बकरीद को लेकर एक कहानी प्रचलित है। कहते हैं, पैगंबर हजरत इब्राहीम ने अपने पुत्र हजरत इस्माइल को इस दिन खुदा की राह में कुर्बान करने का प्रयास किया तो अल्लाह ने उन्हें जीवनदान दे दिया। उसकी याद में यह त्योहार मनाया जाता है। तीन दिनों तक चलने वाले इस त्योहार के दौरान विश्वभर में अरबों की संख्या में पशुओं की बलि दी जाती है। एक न्यूज पोर्टल के लिए काम करने वाले पत्रकार ताबिश उन लोगों में शामिल हैं, जो कुबार्नी के तौर-तरीके पर सवाल उठाते रहते हैं। उनकी माने तो पशुओं की बलि का चलन इस्लाम से पहले भी था। फर्क सिर्फ इतना है कि तब देवी के समक्ष बलि देने का रिवाज था। बाद में यह कर्मकांड मक्का में होने लगा। बकरीद को हज के कर्मकांड के साथ जोड़कर देखा जाता है।

ताबिश कहते हैं कि हर वर्ष कुछ लाख ही मुसलमान वार्षिक हज में शामिल होते हैं। ऐसे में बाकी मुसलमानों को पशुओं की कुर्बानी देने की क्या जरूरत? कुरान की आयत संख्या 22:37 में कहा गया है, ‘उनका मांस न तो अल्लाह तक नहीं पहुंचेगा और न ही उनका खून, मगर जो उसके पास पहुंचेगी वह है तुम्हारी आस्था।’ यानी अल्लाह ताला भी इसके पक्ष में नहीं है। बकरीद पर पशुओं की बलि देने का विरोध करने वालों का एक और तर्क है। उनके मुताबिक, बकरीद पर पशुओं की बलि का कुरान में कहीं जिक्र नहीं है, न ही इस्लाम के पांच स्तंभों रोजा, नमाज, जकात आदि में यह शामिल है। बावजूद इसके ‘ईद-उल-अजहा’ पर पशुओं की बलि क्यों दी जाए? बहुत पहले बिहार के गया के रहने वाले ताबिश खैर ने भी बकरीद पर पशुओं की बलि देने पर वाल उठाते हुए टाइम्स आॅफ इंडिया के ‘एजेंडा’ कॉलम में एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने समय और पर्यावरण के मद्देनजर बकरीद पर पशुओं की बलि न देकर उस पैसे को गरीबों में बांटने का सुझाव दिया था। मगर उनके विचार के विरोध में मुसलमानों के एक तबके ने इतना हंगामा किया कि उन्हें देश छोड़ना पड़ा। इस समय वह डेनमार्क में हैं और वहां के बड़े साहित्यकारों में गिने जाते हैं।    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)