सीएए के नाम पर झूठ और दंगा फसाद करने वालों को क्यों नहीं दिखता अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में हिन्दू—सिखों पर होता अत्याचार

    दिनांक 28-जुलाई-2020
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डॉ अंशु जोशी
भारत में अल्पसंख्यकों के नाम पर विशेष दर्जे का आनंद उठाने वाले और बहुसंख्यकों से भी ज़्यादा मिले विशेषाधिकारों के बल पर ऐश करने वाले मजहबियों को अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में हो रहे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार क्यों नहीं दिखाई देते? क्यों भारत में इन सिखों के अधिकारों के लिए कभी शाहीन बाग़ पर धरने नहीं दिए गए ? सीएए के नाम पर भारत में झूठ फ़ैलाने और दंगा फसाद कराने वालों ने क्यों नहीं अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अपने भाई-बंद-मित्रों की मदद से वहां की सरकार से अपील करने की कोशिश की कि सिखों और हिन्दुओं के साथ मानवीय व्यवहार हो?

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गत दिनों 11 सिखों का पहला समूह अफ़ग़ानिस्तान से भारत सुरक्षित पहुँच गया। विगत पच्चीस मार्च को एक बर्बर आतंकवादी हमले में काबुल स्थित एक गुरुद्वारे में पच्चीस सिखों की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी गयी थी। इसके बाद से ही अफ़ग़ानिस्तान में रह रहे सिख समुदाय के लोगों ने भारतीय सरकार से घर वापसी के लिए सहायता माँगी थी। भारतीय सरकार ने न सिर्फ त्वरित कार्रवाई शुरू की, जिहादियों की बन्दूक का निशाना बन रहे सिखों को सुरक्षित भारत वापसी हेतु तैयारी भी प्रारम्भ कर दी। आज अफ़ग़ानिस्तान में बरसों से बसे सिखों का पहला दल अपने वतन वापस आ गया है। पर इससे जुड़े कुछ मुद्दे हैं, जिन पर हम सबको ध्यान देना चाहिए। पहले तो ये समझने की ज़रूरत है कि अफ़ग़ानिस्तान में सिख कोई दस, बीस या पचास साल पहले जाकर नहीं बसे थे। सदियों पुराना इतिहास है अफ़ग़ानिस्तान में बसे सिखों का।

सिख पंथ के प्रणेता गुरु नानक देव जी सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत में अफ़ग़ानिस्तान गए और सिख पंथ के अनुयाइयों को वहाँ बसाया। तबसे सिख यहाँ फलते-फूलते रहे। सत्तर के दशक में लगभग दो लाख से अधिक सिख यहां बसे हुए थे। पर शीत युद्ध के अंत के बाद से जब अफ़ग़ानिस्तान जिहादियों के लिए रंगभूमि बनना प्रारंभ हुआ, इन सिखों पर विपदा टूट पड़ी। निर्मम हत्याओं, अपनी बहन-बेटियों के बलात्कारों, उनके जबरिया मत परिवर्तन कराने के बाद निकाह एवं कई सामजिक, आर्थिक और मानवीय चुनौतियां झेलने के बाद कई सिख पलायन करने लगे। इस दौरान कई जिहादियों की गोली का शिकार हो गए और जो बचे वे कम होते होते मात्र आठ सौ रह गए। किसी ज़माने में साठ से ज़्यादा गुरुद्वारे थे अफ़ग़ानिस्तान में पर जिहादियों ने इन्हें अपना निशाना बना इन्हें ध्वस्त तो किया ही, यहां कितने ही सिखों की बर्बर ह्त्या भी की।

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प्रश्न यह उठता है कि भारत में अल्पसंख्यकों के नाम पर विशेष दर्जे का आनंद उठाने वाले और बहुसंख्यकों से भी ज़्यादा मिले विशेषाधिकारों के बल पर ऐश करने वाले मजहबियों को अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में हो रहे अल्पसंख्यकों पर अत्याचार क्यों नहीं दिखाई देते ? क्यों भारत में इन सिखों के अधिकारों के लिए कभी शाहीन बाग़ पर धरने नहीं दिए गए ? सीएए के नाम पर भारत में झूठ फ़ैलाने और दंगा फसाद कराने वालों ने क्यों नहीं अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में अपने भाई-बंद-मित्रों की मदद से वहां की सरकार से अपील करने की कोशिश की कि सिखों और हिन्दुओं के साथ मानवीय व्यवहार हो ? मार्च में जब काबुल स्थित गुरुद्वारे में जिहादियों ने आतंक का खूनी खेल खेला, भारत के तमाम तथाकथित सेकुलर, प्रबुद्ध पत्रकार, लेखक, अभिनेता, नेता मौन रहे। आतंकवादियों तक के मानविक अधिकारों की बात करने वाला एक वर्ग पाकिस्तान और अफगानिस्तान मेंं हिन्दुओं, सिखों और अन्य अल्पसंख्यकों की दुर्दशा पर चुप रह जाते हैं तो लगता है इस देश में गज़ब का जिहादी-नक्सली गठबंधन तैयार हुआ है।
 शायद भारत के तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग द्वारा रची गयी अल्पसंख्यक होने की परिभाषा और उससे जुड़े अधिकार सार्वभौमिक हैं ही नहीं। और शायद यही कारण है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम पर ये तमाम बुद्धिजीवी हा-हुसैन करने में लग गए। कितनी सरल सी बात है, भारत ने अपनी नागरिकता देने के लिए अपने पड़ोसी देशों के "अल्पसंख्यकों" के लिए दरवाज़े खोले। ज़ाहिर है अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में हिन्दू, सिख, जैन या बौद्ध ही अल्पसंख्यक होंगे न। पर यहां भी तमाम तार्किक सीमाओं के परे जाकर विखंडनकारी शक्तियों ने शाहीन बाग़ रचे। इन शाहीन बाग़ियों का एक ही उद्देश्य है, इस राष्ट्र को खंड—खंड में तोड़ना, इस देश में जिहाद को पालना-पोसना। उस पर राष्ट्र के कुछ जयचंदों का साथ मिलने पर ये और सुगमता से नयी-नयी अफवाहें गढ़ते है। पिछले दिनों हम सबने कई मासूम बच्चों के वीडियो देखे, जिनके मन में भारत सरकार और हिन्दुओं के विरुद्ध ज़हर भरा गया था। विडम्बना ये है कि इस ज़हर को लेकर ये पूरी उम्र जिहाद का शिकार बनेंगे। जो लोग सत्य और तर्क के परे जाकर सोचते हैं, उसका कोई इलाज है ही नहीं।

बहरहाल अफ़ग़ानिस्तान में फंसे सिखों को लेकर कोविड—19 के समय में भारत सरकार द्वारा उठाये गए त्वरित तथा दूरदर्शी कदम सराहनीय हैं। अफ़ग़ानिस्तान सरकार द्वारा भारत सरकार की सहायता की भी प्रशंसा करनी होगी। असली युद्ध लम्बा है, एक पूरी मानसिकता के साथ है, जिहाद के साथ है, आतंकवाद के साथ है और इसका सामना सशक्त तकनीक, कड़ी नातियों और दूरंदेशी सामरिक योजना के समग्र प्रयोग से ही किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण है ये सब करने की इच्छाशक्ति, जो वर्तमान सरकार में दिखाई पड़ती है। 
(लेखिका जेएनयू में सहायक प्राध्यापक हैं)