अफगानिस्तान से अंदमान तक के लोगों का डीएनए एक

    दिनांक 30-जुलाई-2020   
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राखीगढ़ी की खुदाई से सिद्ध हुआ कि अफगानिस्तान से लेकर अंदमान तक में रहने वाले लोगों का डीएनए समान है। यानी आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे, वे भारतीय ही थे। इस खुलासे के बाद वे लोग चुप हैं, जो आर्यों को बाहरी और हमलावर बताते रहे हैं

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राखीगढ़ी में मिले एक मानव कंकाल का परीक्षण करते पुरातत्वविद्।

अब एक-एक करके वामपंथी इतिहासकारों के झूठ पकड़े जा रहे हैं। इन वामपंथियों ने बरसों तक यह बताया, ‘‘आर्य भारतीय नहीं थे, वे बाहर से भारत में आए थे।’’ उनके इस झूठ का पांव उखड़ने लगा है। कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के सिनौली से जो पुरावशेष मिले थे, वे वैदिक सभ्यता के हैं। इससे सिद्ध होता है कि आर्य भारतीय ही थे। अब हरियाणा की राखीगढ़ी में निकले कंकाल की डीएनए जांच से साबित हो गया है कि अफगानिस्तान से लेकर समूचे भारतवंशियों का डीएनए समान है।

ध्वस्त हुआ वामपंथी सिद्धांत
प्राचीन भारतीय संस्कृति से यहां के लोगों को दूर करने और उन्हें विभाजित करने के लिए वामपंथी इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को ही उलट दिया। भारत के मूल निवासी आर्यों को बाहरी बताकर उन्होंने इससे भी बड़ा जघन्य अपराध किया। हरियाणा के हिसार जनपद स्थित राखीगढ़ी में हुई खुदाई ने वामपंथियों के कुचक्र की पोल खोल दी है। यहां निकले कंकालों के जेनेटिक इंजीनियरिंग (आनुवांशकीय अभियांत्रिकी) के अध्ययन ने सारे कुचक्रों का खुलासा कर दिया है। विख्यात पुरातत्वविद् प्रो. वसंत शिंदे के नेतृत्व में हुई खुदाई ने वामपंथियों के झूठ को विश्व के सामने ला दिया है।

राखीगढ़ी में मिले मानव कंकालों के डीएनए का भारत में मिले साढ़े 12 हजार साल पुराने मानव कंकाल के डीएनए से मिलान कराया गया तो उनके जीन समान निकले। इसके साथ ही दक्षिण और मध्य भारत के लोगों के डीएनए को भी जब राखीगढ़ी में मिले मानव कंकालों के डीएनए से मिलाया गया तो उनके जीन भी समान पाए गए। इससे पुष्टि होती है कि उस समय पूरे भारत में एक ही गुणसूत्र वाले लोगों का निवास था। हैदराबाद की ‘सेंटर फॉर सेल्यूलर एंड मालेक्यूलर लैब’ में अलग-अलग जगहों के डीएनए एकत्रित किए गए। इनमें अफगानिस्तान से लेकर बंगाल, कश्मीर से अंदमान निकोबार तक के लोगों के डीएनए भी शामिल हैं। शहजाद राय प्राच्य शोध संस्थान, बड़ौत के निदेशक व वरिष्ठ इतिहासकार डॉ. अमितराय जैन बताते हैं, ‘‘अफगानिस्तान से लेकर पूर्वोत्तर तक और जम्मू-कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के भारतवंशियों का डीएनए जांच में एक समान पाया गया है। इससे साफ है कि आर्यों के बाहरी होने की बात पूरी तरह से गलत थी और वे भारत के ही मूल निवासी थे। आर्यों की ही एक शाखा ईरान चली गई थी। इन्हीं आर्यों ने पहले गांव और बाद में शहरों को विकसित किया था।

भौगोलिक परिस्थितयों से बदला रंग-रूप
भारत के लोगों का डीएनए एक होने के बाद भी रंग-रूप असमान होने पर पुरातत्वविदों का कहना है कि यह सब भौगोलिक परिस्थितियां भिन्न-भिन्न होने के कारण हुआ। भारत में विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग प्रकार का मौसम और खानपान है। इस कारण भारतीयों का रंग-रूप क्षेत्र के आधार पर अलग-अलग पाया जाता है।

आधुनिक शहर था राखीगढ़ी
इतिहासकारों का मत है कि राखीगढ़ी शहर एक समय बहुत ही विकसित था। लगभग 600 वर्ष पहले राखीगढ़ी के लोगों का मुख्य व्यवसाय खेती-बाड़ी और पशुपालन था। यहां के लोगों ने सुदूर देशों से व्यापारिक संबंध भी कायम किए थे। विदेशों से व्यापारियों का राखीगढ़ी में आना-जाना था। इसकी पुष्टि राखीगढ़ी की खुदाई में मिले पुरावशेषों से होती है। इस सभ्यता के खात्मे का कारण जलवायु परिवर्तन रहा। लगभग 2,000 ईसा पूर्व के आसपास पर्यावरण शुष्क होने लगा। इससे सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मिस्र व मेसोपोटामिया तक की सभ्यताओं का पतन हो गया।

नदी किनारे विकसित होती थीं सभ्यताएं
दुनिया की सभी बड़ी सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुर्इं। हड़प्पाकालीन सभ्यता सरस्वती नदी के किनारे पर विकसित हुई। राखीगढ़ी का विकास भी सरस्वती नदी के किनारे पर हुआ। राखीगढ़ी की खोज सबसे पहले 1963 में की गई थी। अमरेंद्र नाथ द्वारा 1997 से 1999 के बीच व्यापक उत्खनन कराया गया। यहां सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष बड़े पैमाने पर प्राप्त हुए। यहां से मातृ देवी की एक लघु मुद्रा, प्राचीर दुर्ग, अन्नागार, स्तंभयुक्त मंडप, अग्नि वेदिकाएं आदि महत्वपूर्ण पुरावशेष प्राप्त हुए। विश्व विरासत कोष की मई, 2012 की रिपोर्ट में एशिया के दस विरासत स्थल में राखीगढ़ी को भी शामिल किया गया है।

राखीगढ़ी सभ्यता ही वैदिक सभ्यता

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बागपत के सिनौली में खुदाई के दौरान मिला रथनुमा एक चित्र।

महात्मा बुद्ध संग्रहालय, गोरखपुर के उप निदेशक डॉ. मनोज गौतम का कहना है, ‘‘राखीगढ़ी की सभ्यता बहुत ही विकसित और उन्नत रही है। यहां पर खुदाई में मिले पुरावशेषों से साफ हो जाता है कि यह वैदिक सभ्यता थी। आर्य भारत के ही मूल निवासी थे और उन्होंने ही पूरे भारत को विकसित किया। बागपत के सिनौली की खुदाई से भी इसके प्रमाण दुनिया के सामने आ चुके हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा लगातार खुदाई करके प्राचीन भारतीय सभ्यता के प्रमाण जुटाए जा रहे हैं। इससे भारत की प्राचीन संस्कृति को मिथ्या बताने वालों का झूठ उजागर हो रहा है।’’
 
कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं
प्राचीन भारतीय संस्कृति को विकृत करने का षड्यंत्र बहुत गहरा है। अंग्रेजों के समय से भारतीय इतिहास को विकृत किया गया और भारत को बदनाम करने वाला झूठ इतिहास में शामिल कर लिया। इतिहास पर शोध करने वाले डॉ. कुलदीप त्यागी का कहना है, ‘‘वामपंथियों ने भारत के मूल निवासी आर्यों को आक्रमणकारी करार दे दिया। कुछ लोगों ने आर्यों को बाहरी कहा तो कई इतिहासकार उन्हें हड़प्पा सभ्यता के बाद भारत में आया बताते हैं। कुछ जगह लिखा है कि आर्यों ने उत्तर भारतीयों पर हमला करके उन्हें दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिया। इन सभी बातों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और कोई भी वामपंथी इतिहासकार आज तक अपनी बात को वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं कर पाया है। जबकि आर्यों के मूल भारतीय होने के तथ्य विज्ञान की कसौटी पर खरे साबित हो रहे हैं।’’

16 देशों के वैज्ञानिकों ने किया शोध
राखीगढ़ी पर हुए अध्ययन की शुरुआत 2008-09 में हुई। इसमें भारत के साथ 16 देशों के वैज्ञानिक शामिल हुए। इस दौरान खुदाई में 40 कंकाल मिले। इनमें से एक कंकाल पर अध्ययन किया गया। प्रारंभ में नमूनों की जांच हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला में करवाई गई। इसके बाद अध्ययन को और ज्यादा प्रमाणित करने के लिए इसमें हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी शामिल किए गए। वहां की उन्नत प्रयोगशाला में भी डीएनए नमूनों का अध्ययन किया गया। दोनों जगह पर परिणाम एक जैसे ही आए। बीरबल साहनी पुराविज्ञानी संस्थान, लखनऊ के डीएनए वैज्ञानिक डॉ. नीरज राय भी इस अध्ययन में शामिल हुए थे। उनके अनुसार, ‘‘अध्ययन के दौरान हड़प्पा के एक प्राचीन जीन समूह का मिलान मध्य एशिया, मध्य-पूर्व एशिया, पूर्वी यूरोप, पश्चिमी यूरोप आदि के लोगों से कराया, लेकिन मिलान नहीं हुआ। देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 2,500 लोगों का रक्त लेकर उनका डीएनए और राखीगढ़ी में मिले मानव कंकाल के डीएनए का मिलान किया तो डीएनए समान निकला। इससे साफ है कि आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे, बल्कि हमारे ही देश के मूल निवासी थे। डीएनए जांच में पाया गया कि राखीगढ़ी के लोग विदेशों में गए, न कि वहां के लोग यहां आकर बसे।’’
राखीगढ़ी पर हुए अध्ययन की शुरुआत 2008-09 में हुई। इसमें भारत के साथ 16 देशों के वैज्ञानिक शामिल हुए। इस दौरान खुदाई में 40 कंकाल मिले। इनमें से एक कंकाल पर अध्ययन किया गया। प्रारंभ में नमूनों की जांच हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला में करवाई गई। इसके बाद हार्वर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने भी इसकी जांच की। दोनों जगह पर परिणाम एक जैसे ही आए।

इतिहास को ठीक करने की आवश्यकता
सामाजिक कार्यकर्ता व इतिहास के जानकार पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘इतिहास की किताबों में हमें वह सब पढ़ाया गया है, जिसकी कोई जरूरत नहीं थी। वैज्ञानिक रूप से अब साबित हो गया है कि आर्य ही मूल भारतीय हैं। अब तक हमें झूठ पढ़ाया गया। अब उसे ठीक करने की आवश्यकता आन पड़ी है, ताकि नई पीढ़ी को भारत के प्राचीन समृद्ध इतिहास को पढ़ाया जा सके। अपना नया इतिहास पढ़ने से भावी पीढ़ी को भारतीय होने पर गर्व महसूस होगा।’’

आर्य-द्रविड़ संघर्ष के साक्ष्य नहीं
राखीगढ़ी के कंकालों पर हुआ अध्ययन बताता है कि आर्य भारतीय उपमहाद्वीप के ही निवासी थे। इससे पहले सिनौली में हुए अध्ययन भी सिंधु घाटी सभ्यता को ही वैदिक सभ्यता साबित कर चुके हैं। सिनौली में एक रथ और मुकुट खुदाई में मिल चुका है। अभी तक हुई खुदाई में कहीं पर भी रथ नहीं मिला था। अभी तक आर्य और द्रविड़ संघर्ष का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा सभ्यता और वैदिक कालीन सभ्यता एक ही थी। यहां के ही लोग ईरान और मध्य एशिया में व्यापार और खेती करने गए थे।

किया जाए विस्तृत अध्ययन

इतिहासकार डॉ. अमितराय जैन बताते हैं, ‘‘राखीगढ़ी और सिनौली की तरह ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों में ऐतिहासिक सभ्यताओं के अवशेष दबे हुए हैं। इन अवशेषों को जमीन के अंदर से निकाल कर बाहर लाने की आवश्यकता है। मेरठ के हस्तिनापुर में विस्तृत अध्ययन करने की जरूरत है। वहां पर पूर्व में भी प्रो. बीबी लाल को महाभारत-कालीन अवशेष खुदाई में मिल चुके हैं। अब आधुनिक तरीकों से हस्तिनापुर में उत्खनन करके महाभारतकाल की सभ्यता के नए रहस्य दुनिया के सामने उजागर करने की आवश्यकता है।’’
इन सबका एक ही निष्कर्ष है कि अब वामपंथी झूठ धराशायी होने लगे हैं। बरसों तक जिन लोगों ने भारतीयों को झूठ पढ़ाया, उन्हें अब पूरे देश से माफी मांगनी चाहिए। यदि वे ऐसा करते हैं, तो उनकी विश्वसनीयता बनी रहेगी, अन्यथा उनकी बातों को कोई गंभीरता से नहीं लेगा।