मीडिया से गायब होती मर्यादा

    दिनांक 30-जुलाई-2020
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सेकुलर मीडिया बिना जांच-पड़ताल खबरें छापकर समाज और देश को कर रहा है बदनाम
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दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों पर मीडिया का एक बड़ा वर्ग किसी संगठित गिरोह की तरह काम कर रहा है। जैसे ही यह तथ्य सामने आया कि कई हिंदू पीड़ितों को झूठी शिकायतों के आधार पर आरोपी बनाया गया है, ताकि पुलिस अपनी कार्रवाई में मजहबी आधार पर संतुलन दिखा सके, वैसे ही एक नया दुष्प्रचार शुरू हो गया। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने फर्जी खबर छापी कि पुलिस ने आदेश दिया है कि हिंदू आरोपियों से नरमी बरती जाए। यह मनगढ़ंत समाचार है, क्योंकि अधिकांश आरोपपत्र दाखिल हो चुके हैं। लेकिन अखबार में छपे इस झूठ के कारण अब पुलिस से लेकर न्यायालय तक पर दबाव रहेगा कि वे हिंदू आरोपियों पर कोई रहम न दिखाए, भले ही उनके खिलाफ कोई सबूत न हो। दूसरी तरफ असली साजिशकर्ताओं के गर्भवती होने जैसे आधार पर मिली जमानत को उनके दोषमुक्त होने की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।
मीडिया की रिपोर्टिंग में मजहबी आधार पर पक्षपात कोई नई बात नहीं। अब जब लोग इसको लेकर मुखर हो रहे हैं, तब भी कोई सुधार नहीं दिखता। पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की हत्या के मामले को दबाने में मीडिया भी महाराष्ट्र सरकार का भरपूर सहयोग कर रहा है। जिस हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया, उसके आरोपपत्र में हुई लीपापोती अखबारों और चैनलों की सुर्खियों से गायब रही। पीड़ित जब एक मजहब विशेष के होते हैं, उनमें मीडिया ‘ट्रायल’ करके न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। जबकि पालघर में उलटा मीडिया ही ईसाई मिशनरियों और नक्सलियों के गठजोड़ पर पर्दा डालने में जुटा है।
पालघर की ही तरह मेरठ में एक मंदिर के पुजारी कांति प्रसाद की भगवा गमछा पहनने पर हत्या का समाचार दबा दिया गया। कुछ स्थानीय अखबारों ने छापा जिससे सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को पता चल पाया। हत्यारे अनस कुरैशी को पुलिस ने पकड़ लिया। यह मामला पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर हरियाणा के मेवात तक में पाकिस्तान की तर्ज पर हो रहे इस्लामीकरण से जुड़ा हुआ है। इस पूरे क्षेत्र में हिंदू या तो डरकर जीने को मजबूर हैं या पलायन कर रहे हैं। लेकिन उनकी पीड़ा मीडिया के लिए बड़ी खबर नहीं है, क्योंकि वे हिंदू हैं। वास्तव में मीडिया इस ताक में रहता है कि पुलिस यहां के अपराधियों पर कोई कार्रवाई करे तो वे इसे ‘मुसलमानों पर अत्याचार’ का नाम देकर कोहराम मचा सकें।
बीता सप्ताह राजस्थान के राजनीतिक संकट के नाम रहा। यह विशुद्ध रूप से कांग्रेस का अंदरूनी संकट है। लेकिन मीडिया समय-समय पर इसे विपक्षी भाजपा के किसी ‘काल्पनिक षड्यंत्र’ से जोड़ता रहता है। मामले में हर किसी की भूमिका की समीक्षा हो रही है, लेकिन सोनिया गांधी का नाम लेने का साहस किसी में नहीं है। पार्टी के अंदर नेतृत्व को चुनौतियां दी जा रही हों तो क्या अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी की विफलता का विश्लेषण नहीं होना चाहिए? हर कोई जानता है कि गांधी परिवार के अंदर भी युद्ध छिड़ा हुआ है। मां, भाई, बहन के गुट बने हुए हैं। लेकिन इसकी समीक्षा तो दूर, कहीं हल्की सी चर्चा भी आपको नहीं मिलेगी। पत्रकारिता के ऐसे आलोचनात्मक तेवर सिर्फ गैर-कांग्रेसी दलों के लिए ही सुरक्षित माने जाते हैं।
चीन से विवाद के बीच मीडिया का संदिग्ध व्यवहार किसी से छिपा नहीं है। ‘द हिंदू’ ने फर्जी खबर छापी कि ईरान ने चाबहार बंदरगाह से जुड़ी रेल परियोजना से भारत को बाहर कर दिया है। बिना किसी पुष्टि के कई अन्य मीडिया समूहों ने भी इस झूठ को फैलाने में सहायता की, जबकि खुद ईरान ने इस बात का खंडन किया है। प्रश्न उठता है कि यह झूठ किसके इशारे पर छापा गया होगा? ईरान के साथ भारत का यह समझौता हमेशा से चीन और पाकिस्तान को खटकता रहा है।
दूसरी तरफ भारतीय मीडिया जाने-अनजाने नेपाल के साथ सदियों पुराने भावनात्मक संबंध पर चोट कर रहा है। यही कारण था कि नेपाल सरकार को मजबूर होकर भारतीय निजी समाचार चैनलों के प्रसारण पर रोक लगानी पड़ी। उन्होंने इसे वापस भी ले लिया, लेकिन भारतीय मीडिया को आत्ममंथन करना चाहिए कि यह स्थिति पैदा क्यों हुई? नेपाल की सरकार या प्रधानमंत्री से विरोध अपनी जगह है, लेकिन मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए। जी नेटवर्क, इंडिया टीवी, इंडिया न्यूज, एबीपी न्यूज जैसे चैनलों ने ऐसे भद्दे कार्यक्रम दिखाए जो पत्रकारिता के किसी मानदंड पर खरे नहीं कहे जा सकते।