गेशे जम्पा

    दिनांक 30-जुलाई-2020
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 नीरजा माधव

तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी।  भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की पाचवीं कड़ी

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गेला, ताशी देलेक। कक्षा के सामने से गुजरते हुए गेशे जम्पा को देखकर देवयानी ने अंदर से ही अभिवादन किया। गेशे जम्पा ने सिर को धीरे-से झुकाकर उसके अभिवादन का स्वीकार और प्रत्युत्तर दोनों जतलाया था। अभिवादन के पश्चात गेशे जम्पा ने पुन: सिर झुका लिया और तेज पग धरते आगे बढ़ गए थे। उन्हें अपने मन में उठते किंचित दुर्बल भावों पर क्षोभ हो रहा था। उनके मन में मंत्र-जाप चल रहा था और पग भिक्षुणी लोये दोलमा के कक्ष की ओर बढ़ रहे थे। धर्मशाला से आए बच्चों का हालचाल लेना जरूरी था। उन्हें तो तिब्बती भाषा के अलावा अभी कुछ भी नहीं आता। यहां रखने के लिए हिंदी जानना जरूरी है। देवयानी अच्छी तरह सिखा सकती है। पर इसके लिए उसे अलग से समय देना पड़ेगा। सुबह दस से पहले तो शायद ही वह आ पाए। शाम तक तो संस्थान के अन्य अध्यापक और कर्मचारी जा चुके होते हैं। केवल मठ में रहने वाले बच्चे, भिक्षुणी दोलमा और वे स्वयं होते हैं। क्या तैयार होगी देवयानी?
गेशे जम्पा के मन में पुन: विचारों का मंथन शुरू हो गया था। यही सोचते हुए वे दोलमा के कक्ष में सामने पहुंचे थे। माई, क्या कर रही हो? गेशे जम्पा का शांत मद्धिम स्वर सुनकर दोलमा ने भीतर से ही उत्तर दिया-आ जाइए, गेला। ताशी और छुंग्ची यहीं हैं।
गेशे जम्पा ने भीतर प्रवेश किया। ताशी दोलमा के गले में अपनी दोनों बाहें लपेटे हुए था। बगल में ही बिस्तर पर बैठी लगभग बारह वर्षीया छुंग्ची एकटक दोलमा के चेहरे की ओर निहार रही थी। इन्हें कहानी सुना ही थी, गेला। दोलमा ने गेशे जम्पा को आसन पर बैठने का संकेत करते हुए बताया। अच्छा, अच्छा। वे बैठ गए। फिर आगे क्या हुआ? ताशी ने दोलमा को टिहोका दिया। आप इनकी कहानी पूरी कर लो। गेशे जम्पा हंस पड़े थे। ...बस, कहानी यहीं खतम। भिक्षुणी दोलमा ने दोनों हाथ हिलाये।
माई, आपकी सेवा को तिब्बत के लोग कभी नहीं भूल पाएंगे। दोलमा की ममता से भावुक  गेशे जम्पा बोल पड़े। कैसी सेवा, गेला! असली सेवा तो आप कर रहे हैं। नहीं माई, आपका योगदान कहीं से भी नकारने योग्य नहीं है। बूढ़ी दोलमा की आंखें
छलछला उठीं।
हां माई, तिब्बत में रहने वाले तिब्बतियों को हम लोगों का बहुत सहारा है। हमें वे अपनी शक्ति मानते हैं। वहां दमनकारी शासन के खिलाफ जो लोग संघर्षरत हैं उन्हें इधर रह रहे लोगों का बहुत बड़ा विश्वास है। सुना है चीनी उपनिवेशवाद के खिलाफ प्रदर्शन करने वालों की हत्या और गिरफ्तारी अभी जारी है। चिंतित दोलमा की निगाहें सामने टंगी भगवान बुद्ध की तस्वीर पर जम गई थीं।
हां, स्वतंत्रता प्रेमी हजारों तिब्बती अभी तक जेलों में बंद हैं। तिब्बती मठों और विहारों में भिक्षुओं की संख्या जहां 8-8 हजार हुआ करती थी, वहीं अब उंगलियों पर गिने जाने योग्य दो-चार भिक्षु ही रह पाते हैं वहां। अब तो धर्मोपदेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। गेशे जम्पा का स्वर दुखी था।
जिस तरह भारत की जनता हमें स्नेह दे रही है उसी प्रकार विश्व के अन्य कई देश भी हमारे साथ सहानुभूति रख रहे हैं, पर सभी का एक साथ सहयोग न मिलने के कारण हमारा हर वर्ष प्रतीक्षा में ही बीता जा रहा है। न जाने कब आएगा वह वर्ष। ये बूढ़ी आंखें देख भी पाएंगी या नहीं? दोलमा ने नि:श्वास छोड़ते हुए कहा। गेला, क्या हम फिर कभी अपने घर नहीं लौट सकेंगे? छुंग्ची एकाएक पूछ बैठी। वह कब से चुपचाप बैठी गेशे जम्पा और भिक्षुणी दोलमा के बीच चल  रहे गंभीर वार्तालाप को सुन रही थी। क्यों, किसने कहा? गेशे जम्पा ने छुंग्ची से तिब्बती भाषा में पूछा। वो बगल वाले कमरे में जो लामा मिग्मर रहते हैं न, वही कह रहे थे।
क्या कह रहे थे?
कह रहे थे, जो एक बार तिब्बत छोड़कर आ जाता है वह फिर कभी वापस नहीं जा पाता। लेकिन आते समय मेरे पिताजी तो कह रहे थे कि जब मैं बड़ी हो जाऊंगी तो फिर उनके पास चली जाऊंगी। क्या मैं अब कभी नहीं जा पाऊंगी गेला? छुंग्ची रुंधे गले से पूछ रही थी। ताशी के चेहरे पर भी भय की छाया नाच उठी। मैं मां के पास जाऊंगा। मां...। वह रुआंसा हो उठा। जाओगे बेटा, जरूर जाओगे। एक दिन जरूर चलना है तिब्बत। हम सब चलेंगे। वहां धूमधाम से लोसर मनाएंगे। अच्छा-अच्छा खाएंगे। पहाड़ों पर सैर करेंगे। दोलमा ताशी को बहलाने लगी। छुंग्ची आश्वस्त नहीं हो पाई थी। उसने आगे जोड़ा-
लामा मिग्मर कह रहे थे कि वे जब छोटे थे तब अपने मां-पिता के साथ तिब्बत छोड़कर आ रहे थे। नेपाल के बार्डर पर ही सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया। मां-पिता को जेल में बंद कर दिया गया था और उनको तथा उनके दोनों बड़े भाइयों को एक गाइड के साथ रवाना कर दिया गया। आज तक उनके मां-पिताजी नहीं आए। पता नहीं जीवित हैं भी या नहीं। गेला, क्या मेरे मां-पिताजी को भी जेल में बंद कर दिया जाएगा? नन्ही पेम्पा किसके पास होगी? छुंग्ची भयभीत हो रो पड़ी। माई, मठ के सभी बच्चों और लामाओं को बता दीजिए कि वे इस तरह की बातें न करें। गेशे जम्पा ने एक निर्देश दिया। लेकिन गेला, किसी को उसका अतीत याद करने से कैसे रोका जा सकता है? दोलमा दुखी स्वर में बोल पड़ी। मैं इतना निष्ठुर नहीं माई कि उन्हें अपने स्वजनों और स्वदेश की बातें करने से मना कर रहा हूं। परंतु इस तरह की बातों से अवसाद भर जाएगा मन में। उद्देश्य ठंडा पड़ जाएगा। अपनी भावनाओं को संयमित करना सिखाइए उन्हें। अच्छा समय कभी भी आ सकता है।
आज पश्चाताप होता है माई कि अन्य राष्ट की तरह तिब्बत ने भी अपने कूटनीतिक संबंध सभी देशों से क्यों नहीं स्थापित किए? अलग-थलग रहना ही एक तरह से स्वतंत्र तिब्बत की नीति थी। आज उसी का कुफल हम भुगत रहे हैं। 1959 में दमन के विरोध में विश्वभर में आंदोलन नहीं चल पाया। गेशे जम्पा के स्वर में कसक थी।
वास्तव में हमारी जनता पूरी तरह से धार्मिक आचार-विचार वाली थी। राजनीतिक जागरूकता न थी सबमें। दमन के बाद भी कुछेक देश विश्व भर में कहते रहे कि यह चीन और तिब्बत का आंतरिक मामला है। देर पर देर होती गई और स्थिति बद से बदतर। भिक्षुणी दोलमा के स्वर में भी पीड़ा थी। हम लगातार अहिंसात्मक ढंग से सत्य की अभिव्यक्ति करते रहेंगे। अपनी मुक्ति-साधना में हम कभी तो सफल होंगे ही। मैं तो यहां तक कहती हूं गेला कि पूरे विश्व को ही एक राष्टÑ बना दिया जाए, हमें कोई आपत्ति नहीं। हम पृथकतावदी नहीं हैं, बशर्ते हमारी जाति, हमारी संस्कृति सुरक्षित रहे उसमें। चीन के अधीन रहने में भी हमें कोई अपमान महसूस न होता यदि हमें भी मनुष्य समझकर व्यवहार किया जाता। हमारी भाषा, धर्म, संस्कृति और रीति-रिवाज सुरक्षित रहते तो। पर हमें तो मनुष्य के न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित रखा जाता है। इसलिए भी मुक्ति के अलावा कोई रास्ता नहीं गेला। भिक्षुणी की आवाज में आवेश था।                                              
सत्य को हमेशा के लिए नहीं दबाया जा सकता और यही हमारी मुक्ति-साधना का भी आधार है। गेशे जम्पा उठ खड़े हुए थे। उनके पग मंथर गति से आगे बढ़ रहे थे। चीवर के ऊपर ओढ़ी गई कत्थई शाल का एक छोर पीछे फर्श पर लटक रहा था। दोपहर का सूरज अपनी गुनगुनी गरमाहट से पक्षियों को आनंदित कर रहा था। मठ के परिसर में खड़े विशाल पीपल के वृक्ष पर उनका कलरव वातावरण की निस्तब्धता को भंग कर रहा था।
नाव वाले ने पंचगंगा घाट के ठीक सामने उस पार रेती में नाव किनारे लाकर लगा दी थी। पेमा अपने साथियों के साथ उतरकर सधे कदमों से दूर तक फैले गंगा के रेतीले मैदान पर चलने लगा। साहब रुकूं या...! क्या बे, हम लोग क्या तैरते हुए आएंगे? तुमसे आने-जाने दोनों का तय हुआ था न? डोलकर बोला। अरे बाबूजी, चालीस रुपये में दोनों तरफ कैसे होगा? तो क्या चालीस हजार चाहिए? पेमा का दूसरा साथी गुर्राया। कितने साल पुरानी नाव है? पेमा ने प्रश्न किया। जी, दस साल। रोज कितनी सवारियां मिल जाती हैं? डोलकर ने प्रश्न किया तो नाव वाला थोड़ा अचकचा गया। पेमा और बाकी के दोनों लड़के फुंग्चु तथा शीतल पटेल तो उसे आजकल के रंगरूट जैसे लगे थे। पुरानी हिप्पीकट जीन्स और ढीली शर्ट के ऊपर सिर के कुछ बड़े-बड़े बाल और शीतल के एक कान में महिलाओं की तरह छोटा-सा चमकीला टाप्स था। परंतु डोलकर का चीवर और दुशाला देखकर नाव वाले ने समझा था कि यह कोई संन्यासी है। (जारी...)