जिहादी सोच से तैयार हुई खिलाफत की जमीन

    दिनांक 30-जुलाई-2020
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 डॉ. श्रीरंग गोडबोले

खिलाफत से पहले के दौर में भारत में कट्टर मुस्लिम तत्वों की गतिविधियां उस आंदोलन की पृष्ठभूमि उजागर कर देती हैं। जैसे, 1886 के प्रारंभ में लंदन में अंजुमन-ए-इस्लाम नामक एक अखिल-इस्लामी संस्था की स्थापना हुई जिसकी शाखाएं भारत में भी थीं। 1903 में एक भारतीय बैरिस्टर अब्दुल्ला अल-मामून सुहरावर्दी ने इस  संस्था को ‘द पैन-इस्लामिक सोसाइटी आफ लंदन’ के नाम से पुनर्जीवित किया

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अखिल-इस्लामी तत्वों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में खुद को अगुआ दिखाने की कोशिश की  

खिलाफत आंदोलन (1919-1924) मजहबी किताबों द्वारा स्वीकृत आंदोलन था, जिसका भारत मे प्रारंभ उसी समय हो गया था, जब पहले इस्लामी आक्रमणकारी ने भारत की जमीन पर कदम रखा था। आधुनिक काल में ओटोमन खलीफा की चर्चा  सूफियों, उलेमा, मध्यवर्गीय मुस्लिम बुद्धिजीवियों, मुस्लिम प्रेस और आम मुस्लिमों में 1830 के दशक के बाद से दिखाई देती है। खिलाफत आंदोलन की वैचारिक बुनियाद इसके पूर्व के 100 वर्षों में रखी गई। 1857 का संघर्ष अखिल-इस्लामवाद का एक महत्वपूर्ण विस्फोट था, लेकिन इसकी वैचारिक नींव 18वीं शताब्दी में रखी गई थी।
1857 के संघर्ष को अंग्रेजों के विरुद्ध प्रथम स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। परंतु यहां एक प्रश्न का उत्तर देने की आवश्यकता है कि यदि अंग्रेजों से स्वतंत्रता का यह संग्राम जीत लिया गया होता, तो उसके बाद भारत पर किसका शासन होना था? मुस्लिम समाज के लिए इसका उत्तर स्पष्ट था। अंग्रेजों का शासन उनके लिए दार-उल-हरब (वह क्षेत्र जहां इस्लाम प्रमुख नहीं है अथवा युद्ध का घर) था, जो गत हजार वर्षों से चले आ रहे इस्लामी शासन, दार-उल-इस्लाम (वह क्षेत्र जहां इस्लाम प्रमुख है अथवा इस्लाम का निवास) के बीच एक पीड़ादायक काल था। और केवल दार-उल-इस्लाम की पुनर्स्थापना ही मुस्लिम समाज को संतुष्ट कर सकती थी।
1857 के संघर्ष के जिहादी चरित्र और इसके खिलाफत आंदोलन के विषय मे डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर ने सत्यपरक विश्लेषण किया है-‘जिज्ञासु व्यक्ति 1857 के विद्र्रोह की जांच कर सकता है, और यदि वह ऐसा करता है तो उसे मालूम होगा कि आंशिक तौर पर चाहे कुछ भी हो, यह मुसलमानों द्वारा अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद की घोषणा ही थी; और वह बगावत, जहां तक मुसलमानों का संबंध था, विद्रोह की पुनरावृत्ति थी जो सैयद अहमद ने मुसलमानों में दशकों तक यह कहकर पैदा कर दी थी कि, अंग्रेज के कब्जा करने से भारत दार-उल-हरब बन गया था। भारत को दार-उल-हरब से दार-उल-इस्लाम में बदलने की वह बगावत एक कोशिश थी।’ एक और अधिक निकटवर्ती उदाहरण है, 1919 में अफगानिस्तान का भारत पर आक्रमण। यह उन भारतीय मुसलमानों द्वारा सुनियोजित था जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के प्रति खिलाफतियों के विरोध की भावना से प्रेरित होकर भारत को स्वतंत्र करने के लिए अफगानिस्तान की सहायता मांगी थी (डॉ.आम्बेडकर संपूर्ण वांग्मय खंड 15, पाकिस्तान या भारत का विभाजन, डॉ. बी. आर. आम्बेडकर, डॉ.आम्बेडकर प्रतिष्ठान, नई दिल्ली, पृ.297—298)।
 
1857 से पूर्व अखिल-इस्लामी आंदोलन
जब भारत में इस्लामी शासन पतन की ओर जा रहा था, शाह वलीउल्लाह (1703-62) एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने अखिल इस्लामवाद का नारा बुलंद किया। उन्होंने एक निर्वाचित खिलाफत के प्रति निष्ठा व्यक्त करते हुए काफिरों के खिलाफ जिहाद या ‘पवित्र युद्ध’ के कर्तव्य पर विशेष जोर दिया। उनके प्रयासों ने 19वीं शताब्दी में भारत में इस्लाम की रक्षा के लिए इस्लामी विद्वानों की एक पूरी शृंखला खड़ी कर दी जिसने मुस्लिम समाज की शक्ति के क्षरण के दौर में भी इस्लाम की रक्षा का कार्य किया। शाह वलीउल्लाह का मानना था कि ‘मुस्लिम जितना अपने गैर-मुस्लिम पड़ोसियों के साथ परस्पर व्यवहार कम करेंगे उतना वे अल्लाह के बेहतर सेवक हो सकेंगे’ (द मुस्लिम आॅफ ब्रिटिश इंडिया, पी. हार्डी, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1972, पृ.29—30)। चाहे 1857 का विद्रोह हो या फिर खिलाफत आंदोलन, हिंदुओं की सहायता लेने की मुस्लिम नेताओं की भूमिका आस्था से नहीं अपितु विवशता से उत्पन्न हुई थी। 

भारत में अखिल-इस्लामी आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि मई 1913 में अंजुमन-ए-खुद्दाम-ए-काबा (काबा के सेवकों का समाज) नामक एक संस्था की स्थापना थी। लखनऊ में फिरंगी महल मदरसा के प्रभावशाली आलिम मौलाना अब्दुल बारी (1879-1926) इसके अध्यक्ष थे और एम.एच. होसैन किदवई और अली बंधु इसके अन्य महत्वपूर्ण प्रवर्तक थे। उन्होंने एक दोहरी योजना पर कार्य करने का फैसला किया जिसमे सर्वप्रथम था किसी भी गैर-मुस्लिम आक्रमण का विरोध करने के लिए मुस्लिमों को संगठित करना।

 
अखिल-इस्लामवाद का अन्य प्रवर्तक सैयद अहमद बरेलवी (1786-1831) था, जो प्रारंभ में पिंडारी लुटेरा था और विभिन्न सूफी सम्प्रदायों से संबंधित था। उसने 1826 में महाराजा रणजीत सिंह के खिलाफ जिहाद शुरू किया। जनवरी 1827 में उसे इमाम (सर्वोच्च नेता) घोषित कर बैअत (निष्ठा की शपथ, पैगंबर मुहम्मद द्वारा शुरू की गई एक प्रथा) दी  गई। उसने मुस्लिमों द्वारा हिंदू तीर्थ स्थानों की तीर्थयात्रा, हिंदू पवित्र त्योहारों में भागीदारी और ब्राह्मणों और ज्योतिषियों से परामर्श लेने की घोर निंदा की। उसके और उसके अनुयायियों के विषय में अंग्रेजों ने अनुमान लगाया था कि उसने अंतत: ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने का इरादा कर लिया था, जो सत्य ही था (हार्डी, उक्त, पृ.53-54)। अखिल-इस्लामवाद का एक अनिवार्य घटक गैर-मुस्लिमों और मुस्लिमों पर उनके प्रभाव का बहिष्कार है। सैयद अहमद बरेलवी के समकालीन हाजी शरीयत-अल्लाह (1781-1840) ने 1821 में बंगाल में फराजी आंदोलन शुरू किया था। इस आंदोलन का यह नाम  कुरान में निहित कर्तव्यों (फाराज) पर जोर देने से पड़ा। कुफ्र और बिदा (नवाचार) की अस्वीकृति इसके प्रमुख सिद्धांतों में से थे। उसके पुत्र दूदू मियां (1819-1862) ने फराजिÞयों के एक उग्रवादी भाईचारे का गठन किया। बंगाल में एक और हिंसक इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन का नेतृत्व टीटू मीर (1782-1831) ने किया, जिसने अपने अनुयायियों को दाढ़ी बढ़ाने और अपनी धोती को विशिष्ट शैली में बांधने पर बल दिया। अंग्रेजों द्वारा स्थानीय पैदल सेना भेजकर आंदोलन को समाप्त कर दिया गया (हार्डी, उक्त, पृ.55-59)। इन सभी इस्लामी या कट्टरपंथी आंदोलनों ने अपनी पूर्व-इस्लामी हिंदू प्रथाओं से भारत के मुस्लिमों को ‘शुद्ध’ करने पर जोर दिया जो कि सदियों पहले जबरन कन्वर्जन कराये जाने के बावजूद भी बच गई थीं। अंग्रेज यह महसूस कर चुके थे कि मुस्लिम एक कट्टर और मेल-जोल विरोधी समुदाय है। ब्रिटिश और वहाबी मुस्लिमों के बीच तनाव की शुरुआत 1838 में हुई थी जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और अफगानिस्तान के अमीर के बीच पहला अफगान युद्ध छिड़ा। उत्तर-पश्चिम में वहाबियों ने केवल अफगान पक्ष की ओर से युद्ध ही नहीं लड़ा, बल्कि वहां ब्रिटिश सेना के कुछ मुस्लिम सिपाहियों की वफादारी को अपनी तरफ करने का प्रयास भी किया
(द वहाबीज इन द 1857 रिवोल्ट: ए ब्रीफ रि-अप्रेसल आॅफ देअर रोल, इक्तेदार आलम खान, सोशल साइंटिस्ट, खंड 41, मई-जून  2013, पृ.17)।
 
1857 और जिहाद
1857 के संघर्ष के विषय में हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश दृष्टिकोण को इतिहासकार थॉमस मेटकाफ द्वारा संक्षेप में यूं प्रस्तुत किया गया है, ‘यह माना जा सकता है कि विद्र्रोह की पहली चिंगारी हिंदू सिपाहियों के बीच जाग्रत हुई जो अपनी जाति व्यवस्था के उल्लंघन से आशंकित थे। लेकिन उसके बाद मुस्लिमों ने असंतोष की आग को हवा दी और खुद को आंदोलन का अगुआ बना लिया। मुस्लिमों ने इन मजहबी शिकायतों को राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के उपाय के रूप में देखा। ब्रिटिश दृष्टिकोण में यह मुस्लिम साजिश और मुस्लिम नेतृत्व था जिसने ब्रिटिश राज को नष्ट करने के उद्देश्य से एक सिपाही विद्रोह को एक राजनीतिक षड्यंत्र  में बदल दिया था (दि आफ्टरमाथ आॅफ रिवोल्ट: इंडिया 1857-1870, प्रिंसटन, 1965, पृ.298)। उत्तर प्रदेश और दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर तैनात बंगाल सेना की इकाइयों द्वारा मई-जून 1857 में विद्र्रोह के बढ़ते उभार में कस्बों की मुस्लिम आबादी से आये सशस्त्र जिहादी भी शामिल हो गए। कुछ मामलों, जैसे कि ग्वालियर की टुकड़ी के नेता मुस्लिम सिपाही थेद्; इलाहाबाद, लखनऊ और ग्वालियर में सशस्त्र जिहादियों के नेता वहाबी न होकर वास्तव में सूफी थे; में 1857 के जिहाद में शामिल होने से कुछ वहाबी नेता हिचकिचा भी रहे थे। विशेषकर उन जगहों पर जहां इस विद्र्रोह का नेतृत्व हिन्दुओं के हाथों में था वहां वहाबियों के सम्मुख नैतिक संकट खड़ा हो गया था, क्योंकि हिन्दुओं के सहयोगी और अधीनस्थ की भूमिका में कार्य करना उनके सिद्धांतों के अनुकूल नहीं था (इक्तेदार आलम खान, उक्त, पृ.18-19)।
11 मई 1857 को दिल्ली के विद्र्रोहियों के कब्जे में आने के बाद नाममात्र के मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर ने बख्त खान (मृत्यु 1859) को विद्रोही बलों का मुख्य सेनापति नियुक्त किया। बख्त खान दिल्ली में 100 जिहादियों के साथ पहुंचा था। बख्त खान रुहेला अफगानों का संरक्षक था जो अपने अमीर-उल-मुजाहिदीन, मौलाना सरफराज अली के नेतृत्व में  हांसी, हिसार, भोपाल और टोंक से दिल्ली पहुंचे थे (बख्त खान: ए लीडिंग सिपोय जनरल आॅफ 1857, इकबाल हुसैन, प्रोसीडिंग्स आॅफ द इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, खंड 46, 1985, पृ. 376)।

अंग्रेज यह महसूस कर चुके थे कि मुस्लिम एक कट्टर और मेल—जोल विरोधी समुदाय है। ब्रिटिश और वहाबी मुस्लिमों के बीच तनाव की शुरुआत 1838 में हुई थी जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और अफगानिस्तान के अमीर के बीच पहला अफगान युद्ध छिड़ा। उत्तर-पश्चिम में वहाबियों ने केवल अफगान पक्ष की ओर से युद्ध ही नहीं लड़ा, बल्कि वहां ब्रिटिश सेना के कुछ मुस्लिम सिपाहियों की वफादारी को अपनी तरफ करने का प्रयास भी किया।
 
हिंदू-मुस्लिम एकता को लेकर मुस्लिमों में कोई भ्रम नहीं था। 20 मई 1857 को मौलवी मोहम्मद सईद ने मुगल बादशाह के समक्ष स्पष्ट किया, ‘जिहाद का परचम, हिंदुओं के खिलाफ महोमेदानों की भावनाओं को भड़काने के उद्देश्य से फहराया गया था।’ 14 जून 1857 को दिल्ली में अपने शिविर से पंजाब के मुख्य आयुक्त लॉरेन्स को भेजे पत्र में, मेजर जनरल टी.रीड ने लिखा, ‘वे (मुस्लिम) शहर में हरे झंडे दिखा कर प्रदर्शन कर रहे हैं और हिंदुओं को धमका रहे हैं।’ वाराणसी में 4 जून 1857 की आधिकारिक रिपोर्ट में कहा गया, ‘खबर मिली थी कि कुछ मुसलमानों ने बिशेसर के मंदिर में हरे झंडे फहराने का दृढ़ संकल्प किया था’(द सेपोय म्युटिनी एंड रिवोल्ट आॅफ 1857, आर.सी मजूमदार, फरमा केएलएम, 1957, पृ.230)।
1857 के ‘जिहाद’ के मुस्लिम अगुआओं के अखिल-इस्लामी संपर्कों का उल्लेख आवश्यक है। 1857 के जिहाद में अपनी भूमिका के लिए अभियोजन से बचने के उद्देश्य से सैयद फदल अल्वी, रहमतुल्लाह कैरानवी, हाजी इमदादुल्लाह मक्की, नवाब सिद्दीक हसन खान और मौलाना जाफर थानेसरी भारत से भाग गए। उन्होंने अखिल-इस्लामी संपर्क बनाने के लिए शाही तंत्र के बंदरगाहों, यात्रा मार्गों और संचार के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल किया था। उन्होंने हिंद महासागर होते हुए मक्का, काहिरा और कांस्टेंटिनोपल जैसे इस्लामी जगत के केंद्र स्थलों की यात्रायें कीं (फ्युजिटिव मुल्लास एंड आउटलॉड फेनाटिक्स: इंडियन मुस्लिम्स इन नाइंटीन्थ सेंचुरी ट्रांस एशियाटिक राइवलरी, सीमा अलवी, मॉडर्न एशियन स्टडीज, खंड 45, नवंबर 2011, पृ. 1337-1382; उन्हीं का मुस्लिम कॉस्मोपॉलिटनिज्म इन एज आॅफ एम्पायर, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2015 भी देखें)।

रॉलट सेडिशन कमेटी की रपट
अंग्रेज अपने शासन को उखाड़कर इस्लामी शासन स्थापित करने के प्रयासों से स्वाभाविक रूप से हैरान थे। रॉलट कमेटी रिपोर्ट के नाम से प्रसिद्ध सेडिशन (राज-द्र्रोह) कमेटी रिपोर्ट (1918) ने ‘भारत में क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े आपराधिक षड्यंत्रों के स्वरूप और उनके विस्तार’ पर प्रकाश डाला। 226 पृष्ठ की रिपोर्ट में ‘मुहम्मडन करंट’ पर एक अनुभाग है। रिपोर्ट का एक प्रासंगिक अंश निम्नलिखित है (पृ.178-179):
  1. तुर्की के साथ भारतीय मुस्लिमों की सहानुभूति क्रीमिया के युद्ध के समय से ही देखी जा सकती थी।

  2. कट्टर मुहम्मडंस के एक छोटे और अस्पष्ट रूप से परिभाषित समूह के बीच, भारत में वर्तमान ब्रिटिश शासन को हटाकर एक नए इस्लामी साम्राज्य को स्थापित करने की इच्छा विद्यमान रही है।

  3. ‘रेशमी पत्र आन्दोलन’ नामक एक षड्यंत्र का पता लगा था। इसका उद्देश्य उत्तर-पश्चिम सीमा पर हमले के द्वारा भारत से ब्रिटिश शासन को नष्ट करना था, जिसके साथ ही साथ पूरक के रूप में इस देश में मुहम्मडन विद्रोह भी होना था।

  4. एक परिवर्तित सिख मौलवी उबैदुल्लाह सिन्धी ने अगस्त 1915 में तीन साथियों अब्दुल्ला, फतेह मुहम्मद और मुहम्मद अली के साथ उत्तर-पश्चिम सीमांत क्षेत्र को पार किया। इन लोगों ने देवबंदी मौलवियों के माध्यम से भारत भर में एक अखिल-इस्लामी  और ब्रिटिश विरोधी आंदोलन को फैलाने की योजना बनाई थी।

  5. उबैदुल्लाह सिन्धी एक तुर्को-जर्मन मिशन के सदस्यों से मिला। हेजाज (तटीय अरब का वह हिस्सा जहां मक्का-मदीना हैं) के तुर्क सैन्य गवर्नर गालिब पाशा से जिहाद का घोषणा-पत्र लेकर मौलवी मुहम्मद मियां अंसारी 1916 में भारत लौटा था।

  6.  ‘अल्लाह की सेना’ में भारत के रंगरूटों की भर्ती कराने तथा इस्लामी मुल्कों का गठबंधन बनाने की योजना थी। इसका मुख्यालय मदीना में होना था और स्थानीय सैन्य मुखियाओं के नेतृत्व में अधीनस्थ मुख्यालय कांस्टेंटिनोपल, तेहरान और काबुल में स्थापित किए जाने थे।

विदेश स्थित भारतीय मुस्लिमों की भूमिका
विदेशों, विशेष रूप से ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय मुस्लिमों ने अखिल-इस्लामी भावनाओं को भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1886 के प्रारंभ में लंदन में अंजुमन-ए-इस्लाम नामक एक अखिल-इस्लामी संस्था की स्थापना हुई जिसकी शाखाएं भारत में भी थीं। 1903 में एक भारतीय बैरिस्टर अब्दुल्ला अल-मामून सुहरावर्दी (1875-1935) ने इस लगभग मरणासन्न संस्था को ‘द पैन-इस्लामिक सोसाइटी आॅफ लंदन’ के नए नाम से पुर्नजीवित किया। सोसायटी ने तुर्की के साथ सीधे संपर्क स्थापित करने और अपनी पत्रिका ‘पैन-इस्लाम’ के माध्यम से तुर्की और इस्लाम को प्रभावित करने वाले सवालों पर मुस्लिम भावनाओं को उभारने का काम किया। जब सितंबर 1911 में इटली ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों की मिलीभगत से ओटोमन शासित त्रिपोली पर धावा बोल दिया तो भारत के मुस्लिमों में आक्रोश फैल गया। लंदन मुस्लिम लीग ने भी तुर्की की सहायता के लिए अपने कार्यकर्ताओं को लामबंद करने की धमकी दी। त्रिपोली में पीड़ितों को सहायता पहुंचाने के उद्देश्य से रेड क्रिसेंट सोसाइटी की स्थापना की गई। लाहौर से लेकर मद्र्रास तक मुस्लिम समाज के दोनों वर्गों, सुन्नियों और शियाओं ने चंदा दिया। और इस अहसान का बदला चुकाने के लिए सुन्नियों ने उत्तरी फारस के रूसी कब्जे वाले शहर मशहद में इमाम अली रजा के मकबरे पर रूसी बमबारी की निंदा करने में शिया समुदाय का भरपूर साथ दिया (खिलाफत मूवमेंट इन इंडिया 1919-1924, मुहम्मद नईम कुरैशी, लंदन विश्वविद्यालय के लिए प्रस्तुत शोध प्रबंध, 1973, पृ. 19-23)।

हलचल की आहट
जब अक्तूबर 1912 में बाल्कन राज्यों ने संयुक्त होकर तुर्की पर हमला किया तो इसके विरुद्ध भारत के मुस्लिमों के बीच त्वरित और कटु आक्रोश फैल गया। उलेमा ने अपने आपसी मतभेदों को किनारे कर दिया। कवि और मजहबी विद्वान शिबली नुमानी ने ‘इस्लाम खतरे में है’ का राग अलापना शुरू कर दिया। उसके युवा अनुयायी अबुल कलाम आजाद ने घोषणा की कि जिहाद का समय आ गया है। संयुक्त प्रान्त के पत्रकार शौकत अली (1875-1958) ने कॉमरेड समाचार पत्र में एक स्वयंसेवक दल को गठित करने के लिए अपील जारी की। कॉमरेड के संपादक और उनके भाई मुहम्मद अली (1878-1951) ने इस बात पर बल दिया कि अलीगढ़ विश्वविद्यालय के लिए एकत्र किया गया धन तुर्की को उधार के रूप में दिया जाए। डॉ. मुख्तार अहमद अंसारी (1880-1956) के नेतृत्व में  एक अखिल भारतीय चिकित्सा मिशन दिसंबर 1912 के अंत में कांस्टेंटिनोपल पहुंचा। मिशन युवा तुर्क नेताओं के साथ ही मिस्र के राष्ट्रवादियों के साथ भी संपर्क स्थापित करने में सफल हुआ। इस समय मेसीडोनिया के मुस्लिम शरणार्थियों के लिए अनातोलिया में एक पुनर्वास कॉलोनी, मदीना में एक विश्वविद्यालय, एक इस्लामी बैंक और एक सहकारी समिति की स्थापना प्रस्तावित की गई। इस परियोजना को कॉमरेड समाचार पत्र द्वारा सक्रिय रूप से समर्थन प्रदान किया गया और भारत के मुस्लिमों को तुर्की सुरक्षा बांड खरीदने के लिए भी प्रोत्साहित किया।
भारत में अखिल-इस्लामी आन्दोलन की महत्वपूर्ण उपलब्धि मई 1913 में अंजुमन-ए-खुद्दाम-ए-काबा (काबा के सेवकों का समाज) नामक एक संस्था की स्थापना थी। लखनऊ में फिरंगी महल मदरसा के प्रभावशाली आलिम मौलाना अब्दुल बारी (1879-1926) इसके अध्यक्ष थे और एम.एच. होसैन किदवई और अली बंधु इसके अन्य महत्वपूर्ण प्रवर्तक थे। उन्होंने एक दोहरी योजना पर कार्य करने का फैसला किया जिसमे सर्वप्रथम था किसी भी गैर-मुस्लिम आक्रमण का विरोध करने के लिए मुस्लिमों को संगठित करना और तुर्की को एक शक्तिशाली मुस्लिम शक्ति के रूप में इतना सशक्त करना ताकि मुस्लिमों के पाक स्थानों पर एक स्वतंत्र और प्रभावी मुस्लिम प्रभुत्व बनाए रखा जा सके।
तुर्की से धनाढ्य आगंतुक भारत आये जिन्हें कथित तौर पर भारत में परेशानियां उत्पन्न करने के उद्देश्य से भेजा गया था। ऐसा भी बताया जाता था कि तुर्की सरकार कथित तौर पर हैम्बर्ग में एक जर्मन फर्म के साथ भारतीय मुस्लिमों को उपलब्ध कराने के लिए राइफलों की खरीद हेतु बातचीत कर रही थी (कुरैशी, उक्त, पृ. 22-29)। जुलाई 1914 में जब सर्बिया और आॅस्ट्रिया के बीच संघर्ष के रूप में प्रथम विश्व युद्ध आरम्भ हुआ उस समय भारत की ऐसी स्थिति थी। यह एक बारूद का पिटारा था जिसमें कभी भी विस्फोट हो सकता था। (क्रमश:..)                                                       
(लेखक इस्लाम, ईसाइयत, समकालीन बौद्ध-मुस्लिम संबंध, शुद्धि आंदोलन और पांथिक जनसांख्यिकी पर अनेक   पुस्तकों के रचयिता हैं)