अवरोध बनती जा रही आबादी

    दिनांक 30-जुलाई-2020
Total Views |
किशोर मकवाणा

गत दिनों विश्व जनसंख्या दिवस पर अनेक संगठनों और लोगों ने बढ़ती जनसंख्या पर चिंता व्यक्त की और मांग की कि जनसंख्या को नियंत्रित करने वाला कानून बनना चाहिए। डॉ. आंबेडकर भी ऐसी मांग करते रहते थे। वे कहते थे कि देश, समाज और परिवार-हित के लिए जनसंख्या पर नियंत्रण होना ही चाहिए 

amd_1  H x W: 0

डॉ. आंबेडकर के बोल 
  • यदि आदमी को वह दर्द-व्यथा सहनी पड़ती, जो महिलाओं को प्रसव के दौरान सहन करनी पड़ती है, तो कोई भी व्यक्ति जीवन में एक बच्चे से ज्यादा वहन करने को तैयार नहीं होता।
  • जब हमने महसूस कर लिया है कि जन्म नियंत्रण ही हर तरह की प्रगति के लिए अत्यावश्यक है, तो हमें इस लक्ष्य को पाने के लिए इसके साधनों पर विचार करना होगा।
  • जब तक जनसंख्या पर सोच-समझकर नियंत्रण नहीं रखा जाएगा तब तक हमारे देशवासियों की आर्थिक स्थिति में सराहनीय सुधार नहीं हो सकता।
  • यह स्मरण रखना आवश्यक है कि मात्र समान वितरण से ही जनसामान्य के लिए स्थायी और भौतिक सुधार संभव नहीं होगा। इसके लिए परिवार सीमा के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि रोका जाना आवश्यक है।

 
भारतरत्न  डॉ. भीमराव आंबेडकर कहते थे, ‘‘यदि मेरे पिताजी की 14 के स्थान पर चार ही संतानें होंती, तो मेरे दिन अच्छे बीते होते।’’ उनके इस वाक्य से ही अंदाजा लगा सकते हैं कि वे बढ़ती जनसंख्या को देश के विकास में कितना बाधक मानते थे। वे सदैव जनसंख्या विस्फोट पर निडरता से अपने विचार रखते थे और उसके समाधान भी बताते थे। दुर्भाग्य से यह समस्या आज विकराल रूप ले चुकी है। इस संबंध में यदि डॉ. आंबेडकर के विचारों पर अमल किया जाता तो शायद यह समस्या आज इतनी बड़ी नहीं होती। हम सब यह महसूस कर रहे हैं कि आज सरकारें जो भी विकास की योजनाएं बनाती हैं, वे जनसंख्या के दबाव के कारण विफल हो रही हैं। इस बात को डॉ. आंबेडकर भी समझते थे। इसलिए वे जनसंख्या को नियंत्रित करने पर बल देते थे। इस संबंध में उनके विचारों को जानना जरूरी है। डॉ. आंबेडकर नवंबर,1938 में जनसंख्या नियंत्रण पर मुंबई असेम्बली में एक भाषण देने वाले थे। लेकिन वे किसी कारणवश असेम्बली नहीं पहुंचे तो उनके भाषण को पी. जे. रोहम ने पढ़ा। उस भाषण के मुख्य 17 बिन्दु हैं-

  • यह असेम्बली सरकार से अनुरोध करती है कि पारिवारिक इकाइयों को सीमित करने की अत्यधिक आवश्यकता को देखते हुए सरकार को  इसका प्रचार करना चाहिए और जन्म नियंत्रण हेतु समुचित सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए। इस समय तक शिक्षित वर्ग ने जन्म नियंत्रण की आवश्यकता को पूरी तरह महसूस कर लिया है और सौभाग्यवश हमारे देश के नेतागण भी इस बिंदु पर एकमत हैं। पं. जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती सरोजनी नायडू और रवींद्रनाथ ठाकुर जन्म नियंत्रण आंदोलन की जरूरत और अहमियत को भलीभांति जानते हैं तथा गर्भनिरोधक साधनों के पक्ष में हैं।
  • महात्मा गांधी ने भी बहुत पहले लिखा था, ‘‘पाठक से मुझे अपना वह दु:ख छिपाना नहीं जो मुझे तब होता है जब मैं इस देश में जन्म की खबर सुनता हूं। बहुत कम लोगों को उस अपार हानि के विषय में मालूम होगा जो शारीरिक, मानसिक और वित्तीय रूप से अपंग लोगों के यहां जन्म लेने वाले बच्चों के कारण हुई है। माता-पिता के साथ-साथ समाज को भी इसका दंश झेलना पड़ता है। ऐसे बच्चों के जन्म पर रोक से ऐसी माताओं की मृत्यु दर भी घटेगी जो बच्चे के जन्म लेने के समय और इसके साथ पैदा होने वाली बीमारियों की चपेट में आ जाती हैं। शिशु मृत्युदर घटेगी, जनता के स्वास्थ्य में सुधार होगा, अत्यधिक गरीबी से पीड़ित लोगों द्वारा किए जाने वाले अपराधों पर रोकथाम होगी और समाज का आध्यात्मिक उन्नति के साथ चहुंमुखी विकास होगा।’’
  •  वर्तमान में जीवन के अत्यधिक संघर्ष की वजह से बहुत से लोगों का समय पर विवाह संभव नहीं हो पाता और इस तरह उनमें विविध बीमारियां और आदतें जन्म ले सकती हैं। बहुत-सी महिलाएं  जीवनभर के लिए बेकार हो जाती हैं और बीमारी की हालत में बच्चे जनने की वजह से कई तो काल का ग्रास बन जाती हैं। अनचाहे बच्चे प्राय: उनकी माताओं द्वारा उपेक्षित कर दिए जाते हैं, जो आगे चलकर समाज के लिए बोझ बन जाते हैं। जन्मदर नियंत्रण ही एक ऐसा उपाय है, जिससे इन समस्याओं से निबटा जा सकता है। समाज किसी भी तरह अनचाहे जनन से लाभान्वित नहीं हो सकता। केवल वे बच्चे, जिनके माता-पिता उनके जन्म पर स्वागत करते हैं, समाज के लिए लाभदायक हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक महिला को गर्भधारण रोकने में सक्षम बनाना होगा। गरीबी ही अनैतिकता की जड़ है।

  • प्रोफेसर जी. टोंडलर ने 1935 में कहा था, ‘‘औसत रूप से जर्मनी में प्रत्येक परिवार के पास एक कमरा व फ्रांस में ढाई कमरे होते हैं। 1925 में बर्लिन के आंकड़े बताते हैं कि वहां 75 प्रतिशत लोगों के पास उनके कमरे नहीं हैं। परिणामस्वरूप बच्चे वयस्कों के साथ न केवल एक ही कमरे में, बल्कि एक ही बिस्तर पर सोते हैं। बहुत से बच्चे गंदगी के हालात में अत्यधिक संख्या के कारण अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं। लड़के चोरी करना सीख जाते हैं और लड़कियां वेश्या बन जाती हैं। वही हालात वियना में हैं। 14 से 18 वर्ष के बच्चों में से 20 प्रतिशत के पास सोने के लिए अपने बिस्तर भी नहीं रहते, कस्बों और गांवो में तो और बदतर हालात हैं।’’
हमारे देश में मुंबई जैसे शहरों में ऐसे ही हालात हैं। कुछ अपवादों के अलावा देखा जाता है कि जहां गरीबी होती है, वहां सभी अच्छाइयों को दरकिनार कर दिया जाता है।


यदि जनसंख्या इसी तीव्र दर से बढ़ती रही, जैसा कि हाल के बीते समय में देखने को मिला है, तो हमारी योजनाओं के धरे रह जाने की उम्मीद है। — सुभाषचंद्र बोस
 

विश्व में हर 16वां  व्यक्ति भारतीय
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की एक रपट के अनुसार  2010 से 2019 के बीच भारत की जनसंख्या 1.2 की औसत वार्षिक दर से बढ़कर 1.36 अरब हो गई है, जो चीन की वार्षिक वृद्धि दर के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा है। विश्व की जनसंख्या 2019 में 7 अरब 80 करोड़ हो गई है। इस हिसाब से देखें तो हर 16 वां व्यक्ति भारतीय है। भारत इतनी बड़ी आबादी का बोझ कब तक उठाएगा?
  • जब हमने महसूस कर लिया है कि जन्म नियंत्रण ही हर तरह की प्रगति के लिए अत्यावश्यक है, तो हमें इस लक्ष्य को पाने के लिए इसके साधनों पर विचार करना होगा। इसका एक तरीका है केवल बच्चों की पैदाइश के लिए संभोग के आनंद को जरूरी समझा जाए और जब बच्चे जनने की जरूरत न हो तो यौन संबंध के बारे में सोचा भी न जाए। आधुनिक गर्भनिरोधक का प्रयोग भी एक अन्य तरीका है। जहां तक उपरोक्त में से पहले तरीके की बात है तो अविवाहित अवस्था में ब्रह्मचर्य का पालन तो संभव है, लेकिन एक विवाहित स्वस्थ जोड़े, जिन्हें एक-दूसरे से प्रेम है, उनसे सालोंसाल ब्रह्मचर्य का पालन करने की उम्मीद रखना मानव स्वभाव के प्रति अनभिज्ञता प्रकट करने जैसा है।

amd_1  H x W: 0
बढ़ती जनसंख्या, घटते संसाधन  

  •  बहुत से देशों में और युगों-युगों से जन्मदर नियंत्रण के लिए आत्म-नियंत्रण का तरीका पूर्णत: अनुपयोगी सिद्ध हुआ है। ब्रह्मचर्य के समर्थक भी यह दावा नहीं कर सकते कि कोई सामान्य व्यक्ति जीवन भर यौन संबंध से दूर रह सकता है।
  • हिंदू ग्रंथों में वर्णित कुछ नियमों के कठोर पालन से भी आदर्श परिवार की सीमा की उपेक्षा संभव है। उदाहरण के लिए विष्णु स्मृति के 54 वें अध्याय की अष्टम पंक्ति में कुछ विशिष्ट दिनों में ही यौन संबंध को आवश्यक बताया गया है।
  •  यह मानना गलत है चूंकि बड़े परिवारों का आदर्श अभी भी समाज के सामने है, इसलिए कोई भी अपना परिवार सीमित करना नहीं चाहता है। बहुत कम लोग ही परिवार को बहुत बढ़ाने के पक्ष में हैं। सामान्य व्यक्ति अपने परिवार को सीमित करना चाहते हैं और इसके लिए वे गर्भपात, शिशुहत्या जैसे तरीके अपनाने से भी संकोच नहीं करते। 1934 में ‘पीपुल्स ट्रिब्यून’ में प्रकाशित एक विवरण में पाया गया कि मात्र शंघाई की एक सड़क पर 1933 में शिशुओं के लगभग 24,000 फेंके हुए शव उठाए गए। जबकि यही स्थिति चीन के अधिकतर भागों में पाई जाती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि बिना आधुनिक गर्भनिरोधक के ऐसी स्थितियों पर नियंत्रण लगाने का कोई चारा नहीं है।
  • कुछ लोग सोचते हैं कि यदि उनकी जाति, मजहब या क्षेत्र विशेष में लोगों की संख्या कम होती है तो उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। उन्हें डर है कि ऐसा करने से उनके दुश्मन उन पर भारी पड़ सकते हैं। सबसे पहले यह याद रखना चाहिए कि परिवार को सीमित करने के उपाय अपनाने के साथ ही जनसंख्या के बढ़ने की दर कम नहीं होती। यह दर न केवल जन्म पर निर्भर होती है, अपितु जीवित बचे रहने की दर पर भी निर्भर होती है। कई स्थानों पर किए गए वैज्ञानिक प्रयोगों से यह स्पष्ट है कि जितनी ज्यादा जन्मदर होती है, मृत्युदर भी उतनी ही अधिक पाई जाती है। और जैसे ही  जन्मदर कम होती है मृत्युदर भी कम हो जाती है। परिणामस्वरूप इससे न केवल जन्म के बाद जीवित बचे रहने की दर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, बल्कि जल्दी ही इस दर में वृद्धि भी हो जाती है।
  • यह भी याद रखा जाना चाहिए कि आधुनिक युद्धों के लिए कुछ लोग ही जरूरी हैं। आज की आधुनिक आयुध सामग्री से सुसज्जित सेना अपने से कई गुनी सेना, जो कि वैसी ही सुसज्जित न हों, को पीछे खदेड़ सकती है। प्रथम विश्व युद्ध में निम्न जन्मदर वाले देशों ने अत्यधिक जन्मदर वाले देशों को धराशायी कर दिया।
संसार में हम बहुत से समाजों को देख सकते हैं, जो संख्या में भले ही कम हों, लेकिन धन-दौलत और संस्कृति में वे विशिष्ट स्थान रखते हैं। हमारे देश में पारसी समुदाय इस बात का एक उदाहरण है। परिमाण की भूख एक लाभदायक विकल्प नहीं है।
ल्ल पश्चिमी देशों के कई उदाहरणों से हम जानते हैं कि आधुनिक गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल सभी जातियों, मजहबों और वर्गों द्वारा किया जाता है। उदाहरण के लिए, ऐसा पाया जाता है कि रोमन कैथोलिक जन्म नियंत्रण के खिलाफ हैं, कि यह तर्क निराधार है। फ्रांस एक रोमन कैथोलिक देश है, किंतु फिर भी वहां जन्मदर काफी निम्न है।

  • हमारे देश के लोग यद्यपि निरक्षर हैं, किंतु इतने समझदार तो हैं कि यह देख सकें कि किसमें उनका हित है और इसलिए नि:संदेह वे गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग करेंगे। ऐसे लोगों के मामले में नसबंदी उपयोगी पाई जाएगी, इसलिए सरकार और नगरपालिकाओं को अपने-अपने चिकित्सालयों में इन सुविधाओं को उपलब्ध कराना चाहिए।
  • कुछ लोगों का मानना है कि बाल विवाह समाप्त कर देने से जनसंख्या वृद्धि रुक सकती है, लेकिन यह सिद्धांत भी आधारहीन है। सबसे पहले तो यह मालूम होना चाहिए कि लड़कियों के प्रजनन की सबसे ज्यादा प्रभावी उम्र 18 से 22 साल के बीच होती है। पश्चिमी देशों में लड़कियां इस उम्र के बाद शादी करती हैं। अर्थात् प्रजनन की सर्वाधिक प्रभावी अवधि के बाद वे विवाह करती हैं। जब हम शारदा अधिनियम के लागू करने की कठिनाइयों पर ध्यान देते हैं तो शादी की अधिकतम उम्र 14 वर्ष निर्धारित करते हुए हम आसानी से देख सकते हैं कि हमारे देश में महिलाएं  22 साल तक शादी को स्थगित करने की फिलहाल निकट भविष्य में सोच भी नहीं सकतीं।
पी. के. वत्तल ने 1931 की जनगणना के संबंध में की गई प्रजनन जांच में दो निष्कर्ष निकाले हैं-20 साल से कम उम्र में विवाह करने वाली लड़की बीस से अधिक उम्र में विवाह करने वाली लड़की की अपेक्षा कम संख्या में बच्चों को जन्म देती है।
20 साल से कम उम्र में विवाह करने वाली लड़कियों की होने वाली संतानों के जीवित बचने की संभावना 20 से अधिक उम्र में विवाह करने वाली लड़कियों की संतानों से कम होती है। इन निष्कर्षों से हमें ज्ञात होता है कि जब अधिक उम्र में शादी प्रचलन में आ जाएगी तब भी इससे जनसंख्या पर कोई प्रशंसनीय रोक नहीं हो सकती।

  •  ऐसा दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया जाता है कि महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता से जनसंख्या वृद्धि कम होगी, लेकिन यह भी सही नहीं है। आर्थिक स्वतंत्रता में कामेच्छा को शांत करने की शक्ति नहीं होती। अब भी निम्न वर्गों की महिलाएं अपनी कमाई से अपने परिवारों की मदद करती हैं। लेकिन इस बात से परिवार को सीमित करने में कोई मदद नहीं मिलती।
कुछ लोगों का मानना है कि यद्यपि जन्म नियंत्रण औषधीय और स्वास्थ्यकर कारणों से हो सकता है, फिर भी इसकी जरूरत आर्थिक कठिनाइयों को हल करने में नहीं होती। वे मानते हैं कि हमारे देश में आर्थिक और कृषि विकास की अत्यधिक संभावना है और इन दिशाओं में किए जाने वाले प्रयासों से हमारे देश के लोगों के स्तर में प्रशंसनीय सुधार होगा, किंतु बारीकी से जांचने करने पर यह दृष्टिकोण भी उतना प्रभावी और मान्य नहीं लगता। पर्याप्त पूंजी और धनी ग्राहकों के अभाव में हमारे उद्योगों का विकास भी अवरोधक होगा। इसी तरह उपजाऊ भूमि, वर्षा और खाद की कमी कृषि उत्पादन की बढ़त में बाधा डालती है।

  •  जनसंख्या की अत्यधिक वृद्धि से हमारा देश जंगल और चारागाह भूमियों की कमी से पीड़ित है। कनाडा में कृषि योग्य भूमि का 34.3 प्रतिशत भाग चारागाह के लिए सुरक्षित है। यह अनुपात का प्रतिशत फ्रांस में 21.5, इटली में 18.3, जर्मनी में 14.3 है, जबकि हमारे देश में यह सिर्फ 1.6 प्रतिशत है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि हमारे पशु  कितने संकुचित स्थानों में रहते हैं। कुछ लोग जापान और चीन में प्रति एकड़ चावल के विशाल उत्पादन की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि हमारे यहां भी फसलों के उत्पादन में बढ़त की संभावनाएं हैं। किंतु वे यह भूल जाते हैं कि जापान में सालभर पर्याप्त वर्षा और पर्याप्त खाद की उपलब्धता है, जो कि इस विस्तीर्ण वन क्षेत्र के कारण है। इसके अलावा वहां की जलवायु चावल की फसल के लिए उपयुक्त है।
  • हालांकि यह स्वीकार करने योग्य बात है कि स्वशासन से हमारी जनसंख्या का कल्याण हो सकता है, किंतु जब तक हमारी जनसंख्या पर सोच-समझकर नियंत्रण नहीं रखा जाता तब तक हमारे देशवासियों की आर्थिक स्थिति में सराहनीय सुधार नहीं हो सकता। कई स्वाधीन राष्ट्रों के उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि स्वशासन मात्र से हमारे देश के लोगों की दशा में चहुंमुखी सुधार नहीं लाया जा सकता। गरीबी की वजह से हमारे देश में लोगों को पौष्टिक भोजन उपलब्ध नहीं होता। इस पर भी पूर्ण स्वास्थ्य के लिए आवश्यक स्तर कायम रखने में बहुतेरों को कठिनाई महसूस होती है।
  •  जन्मदर आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य ऐसी दशाओं का निर्माण करना है जिनसे प्रत्येक देश की जन्मदर अनुकूल रूप से घट जाए, ताकि वहां उपलब्ध संसाधनों से जनसंख्या का भरण-पोषण हो सके। कुछ लोग सोचते हैं कि आधुनिक वैज्ञानिक खोजों से मनुष्य के लिए खाद्य समस्या का हल मिल चुका है और मात्र कुवितरण की समस्या के कारण वर्तमान आर्थिक कठिनाइयां अस्तित्व में हैं। संपत्तियों के उचित वितरण से हर कहीं बहुतायत उपलब्ध होता है। निसंदेह संपत्तियों का वितरण न्यायोचित नहीं है और प्रत्येक निष्पक्ष सार्वजनिक कार्यकर्ता को इस गलत दिशा में न्याय पाने के लिए पूरा प्रयास करना चाहिए। किंतु यह स्मरण रखना आवश्यक है कि मात्र समान वितरण से ही जनसामान्य के लिए स्थायी और भौतिक सुधार संभव नहीं होगा। इसके लिए परिवार सीमा के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि रोका जाना आवश्यक है। यदि जन्मदर नियंत्रण के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण नहीं किया जाता है तो उनके समस्त प्रयास निष्फल जाएंगे।
इन बातों का निष्कर्ष यही है कि अधिक जनसंख्या सरकार की सभी योजनाओं को धराशायी कर देती है। परिवार भी सुखी नहीं रहता और गरीबी भी बढ़ती है। इसलिए समाज और परिवार के हित में जरूरी है जनसंख्या नियंत्रण।

amd_1  H x W: 0
 ऐसा है भारत में जनसंख्या का बोझ 

मुंबई में अस्पृश्य विद्यार्थी सम्मेलन (जनता सामयिक, 17 दिसंबर, 1938) में उन्होंने कहा, ‘‘आप में से अधिकांश अविवाहित होंगे। कुछ की शादी हुई होगी। किंतु शादी हो जाने के पश्चात्  आप लोग क्या करेंगे? आप पर इस बारे में बहुत जिम्मेदारी है। मैं आपके पिताजी का उदाहरण न लेते हुए अपने ही पिताजी का उदाहरण लेता हूं। उन्हें कुल मिलाकर 14 संतानें हुर्इं तथा उनमें से मैं 14वां रत्न हूं। मैं जब एलफिस्टन कॉलेज में पढ़ रहा था तब मेरी अवस्था बहुत दयनीय थी। मेरे पैरों में चप्पल तक नहीं थी। आप लोगों ने   एलफिस्टन कॉलेज में मुल्लर साहब की तस्वीर देखी होगी। उन्होंने मुझे अंतिम दो वर्ष तक कमीज दी थी। मैं सोचता हूं कि यदि मेरे पिताजी की 14   के स्थान पर चार ही संतानें होंती, तो मेरे दिन अच्छे बीते होते।’’ डॉ. आंबेडकर छात्रों को शादी करने के बाद कम बच्चे पैदा करने की सलाह देते हुए कहते हैं, ‘‘आगे चलकर आप लोग क्या करेंगे। मुझे लगता है कि अधिकांश लिपिक ही बनेंगे। आपको अधिकतर  50-60 रु. वेतन मिलेगा और फिर यदि आपको 14 बच्चे हुए, तब उन बच्चों का क्या होगा? उनकी जिम्मेदारी क्या समाज पर डालोगे? इसका आप अच्छी तरह विचार कीजिए। आप लोग संन्यास नहीं लोगे, किंतु यदि किसी ने लिया तो वह बहुत ही उत्तम होगा (छात्र हंसते है)! हंसिए मत, यह महत्वपूर्ण बात है। मुझे पांच संतान हुई, जिसमें से चार का देहांत हो गया। यदि ये बच्चे जीवित रहे होते, तो फिर उनकी शिक्षा, भोजन, निवास आदि का भार मुझ पर पड़ा होता तथा वह सब मेरे लिए कष्टदायक हुआ होता। मुझे एक ही लड़का है। मुझ पर उसकी जिम्मेदारी है। उसकी 10 प्रतिशत जिम्मेदारी भी यदि आपने अपने बच्चों पर निभाई तो तब बहुत अच्छा होगा। यह समाज के हित की बात होगी। यदि आपको 5-6 बच्चे हुए, तब उनको शिक्षा किस प्रकार दोगे? उनकी परवरिश कैसे करोगे? मुझे लगता है यह चढ़ता क्रम न होकर उतरता क्रम होगा। अत: स्त्री-पुरुष का पशु की तरह जीना मनुष्यता के लिए कलंक है।’’
इन विचारों से लगता है कि डॉ. आंबेडकर राष्ट्र-हित, समाज-हित और परिवार-हित, तीनों दृष्टि से जनसंख्या नियंत्रण चाहते थे।
जनसंख्या राष्ट्र के लिए घातक बने इससे पहले सख्त कदम उठाकर इस पर नियंत्रण करना बहुत जरूरी है। यदि हम डॉ. आंबेडकर के सपनों का भारत चाहते हैं तो जनसंख्या को नियंत्रित करना ही होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनुच्छेद-370 समाप्त हुआ और अब अयोध्या में श्रीराम मंदिर भी बनने जा रहा है। शायद नियति ने जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की जिम्मेदारी भी नरेंद्र मोदी को ही दी है।     (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)