जनसंख्या सभी समस्याओं की जड़

    दिनांक 30-जुलाई-2020
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प्रो.चिंतामणि मालवीय
भारत की आबादी अनियंत्रित और असंतुलित तरीके से बढ़ रही है। समस्या यह है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए कोई कानून नहीं है। कुछ दशक पहले केंद्र सरकार ने ‘हम दो हमारे दो’ का नारा दिया था। हिंदुओं ने इस पर अमल भी शुरू कर दिया, लेकिन गरीबी, अशिक्षा, अभाव और पिछड़ेपन के बावजूद एक  एमुदाय विशेष मजहब की आड़ में बढ़ती जनसंख्या के प्रति लापरवाह है

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देश की सारी समस्याओं का समाधान जनसंख्या नियंत्रण ही है।


आजादी के बाद प्रारंभिक शासक देश के समक्ष अनेक समस्याएं छोड़ गए, जिनमें अधिकतर का समाधान उसी समय आसानी से किया जा सकता था। आज वही समस्याएं विकराल विकराल रूप धारण कर देश व संविधान के समक्ष चुनौती पेश कर रही हैं। उन्हीं में एक है जनसंख्या नियंत्रण। हालांकि बाद की सरकारों ने समय-समय पर जनसंख्या नियंत्रण अभियान के साथ जनजागरण के प्रयास भी किए। इससे देश में जागरुकता आई, पर ‘हम दो हमारे दो’ का नारा केवल एक धर्म तक ही सीमित रहा। आगे चल कर यही नारा सांप्रदायिक विद्वेष का कारण बन गया, क्योंकि मुसलमान गरीबी, अशिक्षा, अभाव और पिछड़ेपन के बावजूद बच्चे पैदा करते रहे। नतीजा, मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी। इसी के साथ अपराध, अतिक्रमण, कट्टरता, गजवा-ए-हिंद का जिहादी सपना देखने वाले लोग भी बढ़े। सांप्रदायिक रूप में संगठित वोट की शक्ति ने सत्ताधीशों से इस अप्रिय, किंतु देशहितकारी निर्णय करने की हिम्मत छीन ली।

1975 में आपातकाल के दौरान संजय गांधी ने इस समस्या को गंभीरता से लिया और इस पर अंकुश लगाने की हिम्मत भी दिखाई। लेकिन वे कानून बनाकर इसका स्थायी समाधान नहीं निकाल पाए। दूरगामी निर्णय लेने की बजाए तानाशाहीपूर्ण तात्कालिक निर्णय ही लिए, जिससे आमजन नहीं जुड़ पाए। आपातकाल के दौरान बहुपक्षीय दमन ने इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया और दोष मुख्य रूप से नसबंदी पर आ गया। तभी से बाद की सरकारों के लिए जनसंख्या नियंत्रण मधुमक्खी का छत्ता बन गया, जिसमें शहद तो है, पर खुद के नुकसान का डर भी अधिक है। लिहाजा, राजनेताओं ने जनसंख्या नियंत्रण के विचार से ही दूरी बना ली। चुनावी घोषणापत्र तो दूर इसे राजनीतिक मंच पर चर्चा के लिए भी कोई स्थान नहीं मिला। यही कारण है कि आज हमारी जनसंख्या 135 करोड़ है, जो आजादी के समय 30 करोड़ थी। यानी 70 सालों में हम 105 करोड़ बढ़ गए। फिर भी राजनीतिज्ञ इसे गैरजरूरी समझते रहे, क्योंकि अनियंत्रित प्रजनन कट्टरपंथियों की जरूरत है और यही वोटों के सौदागर, अदूरदर्शी, सत्तालोभी नेताओं और राजनीतिक पार्टियों के लिए मजबूरी बन गया है। बढ़ती आबादी केवल भारत ही नहीं, समूचे विश्व के लिए चिंता का विषय है।

2019 में विश्व की आबादी 7 अरब 71 करोड़ हो गई। 1804 में विश्व की जनसंख्या  एक अरब थी और 1927 में 2 अरब यानी 123 वर्ष में दोगुनी हो गई। लेकिन 1987 में यह 5 अरब और 1999 में 6 अरब हो गई यानी मात्र 12 वर्ष में एक अरब जनसंख्या बढ़ गई। विश्व के मुकाबले भारत जनसंख्या विस्फोट के मुहाने पर है। कहने को हमारी आबादी चीन से थोड़ी कम है, लेकिन शीघ्र ही हम चीन के बराबर हो जाएंगे। लेकिन हमें इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि चीन के पास भारत से 3 गुना अधिक जमीन है। चीन का कुल क्षेत्रफल 96 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि भारत में मात्र 32.9 लाख यानी 33 लाख 50 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि ही है। लेकिन अखंड भारत से तुलना करें तो हम चीन को बहुत पहले पीछे छोड़ चुके हैं।

1941 में देश की आबादी 32 करोड़ थी, लेकिन कुछ क्षेत्रों में जनगणना नहीं होने के कारण यह 34 करोड़ मानी गई। इसमें मुसलमान 4.3 करोड़ और हिंदू 29.4 करोड़ थे। यदि 20 करोड़ पाकिस्तानी, 17 करोड़ बांग्लादेशी और अपनी 135 करोड़ की आबादी को जोड़ दें तो अविभाज्य भारत की जनसंख्या 70 वर्ष में 34 करोड़ से 170 करोड़ हो चुकी है। खासकर मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी है। 1947 में मुस्लिम आबादी 4 करोड़ थी जो 57 करोड़ हो गई है। मतलब करीब 1500 प्रतिशत यानी 15 गुना से ज्यादा, जबकि हिंदुओं की आबादी 29 करोड़ से 100 करोड़ यानी मात्र 3 गुना बढ़ी है। भारतीय उपमहाद्वीप के लिए यह खतरनाक संकेत है। आबादी के मुकाबले हमारे देश में संसाधन बहुत कम हैं। खंडित भारत में कृषि भूमि 2 प्रतिशत, पेयजल 4 प्रतिशत, पर आबादी दुनिया की 16 प्रतिशत है। इसके कारण हमारा देश समस्याओं का पुलिंदा बन गया है। आज देश में मेट्रो, ट्रेन, अस्पताल, स्कूल, ट्रैफिक, पार्किंग सब पर अप्रत्याशित बोझ है। मूलभूत जरूरतें (रोटी, कपड़ा और मकान) भी पूरी हो पा रही हैं। खाद्य पदार्थों में रासायनिक प्रभाव और मिलावट हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। हमारे जीवन से जुड़ी अधिकांश समस्याओं की जड़ कहीं न कहीं बेलगाम जनसंख्या में निहित है।
70 सालों  में  देश  की  आबादी 105 करोड़ बढ़ गई। आजादी के समय जो यह 30 करोड़ थी, जो अब 135 करोड़  हो  गई है। फिर  भी  राजनीतिज्ञ  इसे  गैरजरूरी  समझते रहे,  क्योंकि  अनियंत्रित  प्रजनन कट्टरपंथियों की जरूरत है   और  यही वोटों के सौदागर, अदूरदर्शी सत्तालोभी नेताओं और  राजनीतिक  पार्टियों  के  लिए  मजबूरी  बन  गया  है।

शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी ने 15 अगस्त, 2019 को अपने भाषण में संकेत दिया कि छोटा परिवार रखना भी एक प्रकार की देशभक्ति है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी कहा है कि भारत जैसे घनी आबादी वाले देशों को विशेष रूप से जनसंख्या नियंत्रण पर सुविचारित कदम उठाने होंगे अन्यथा कोरोना जैसी आपदाओं के भीषण परिणाम हो सकते हैं। आत्महत्या, गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, प्रदूषण, इन सब में भारत अन्य देशों से बहुत आगे है। इसी प्रकार साक्षरता में हम 168वें स्थान पर, न्यूनतम वेतन में 64वें, आर्थिक विकास में 51वें, भ्रष्टाचार में 80वें, प्रति व्यक्ति आय में 139वें और रूल आॅफ लॉ इंडेक्स में 68वें स्थान पर हैं। ऐसा नहीं है कि केंद्र व राज्य सरकारें इन समस्याओं से लड़ नहीं रही हैं, लेकिन बढ़ती आबादी के आगे उनके प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। जैसे- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक सबको मकान देने की योजना बनाई। एक करोड़ मकान बन भी गए, पर हर साल 35 लाख नए मकान की जरूरत बढ़ जाती है, क्योंकि आबादी 1 करोड़ 60 लाख की गति से बढ़ रही है और उस गति से मकान नहीं बन पा रहे।

इसी तरह, प्रधानमंत्री ने 2024 तक सभी को स्वच्छ पानी देने की योजना बनाई है, क्योंकि 60 करोड़ भारतीय गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं। इनमें ज्यादातर गरीब इलाके हैं, जहां प्रजनन दर सर्वाधिक है। अनियंत्रित प्रजनन दर से हमारा पारिस्थितिकी तंत्र भी गड़बड़ा रहा है। वन्यजीवों व वनस्पतियों की कई दुर्लभ प्रजातियां लुप्त हो गर्इं। वन्यजीव शहरी इलाकों में घुस रहे हैं। चरनाई भूमि सिर्फ कागजों में ही रह गई है। बढ़ते अतिक्रमण से वन विभाग भी त्रस्त है। कहीं बाढ़ है, तो कहीं बारिश ही नहीं हो रही है। रेगिस्तान फैलता जा रहा है। उर्वरकों का बढ़ता उपयोग मनुष्य के प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर रहा है, जिससे कैंसर जैसी घातक बीमारियां अब आम हो गई हैं।

1976 में इंदिरा सरकार ने 42वें संविधान संशोधन में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को संविधान की समवर्ती सूची में डालकर समस्या को राज्यों पर डालने की कोशिश की, पर किसी राज्य ने आज तक कानून नहीं बनाया। मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार ने दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों को सरकारी नौकरी व पंचायत चुनाव के लिए अयोग्य घोषित कर दिया, पर इससे समाज में विसंगति ही बढ़ी। जो लोग अपने बच्चों को पढ़ा कर योग्य बना सकते हैं, वे बच्चे पैदा नहीं कर रहे। वहीं, अभाव के बावजूद मजहब विशेष के लोग 8-10 बच्चे पैदा कर रहे हैं। असम सरकार ने भी तय किया है कि दो से अधिक बच्चे पैदा करने वालों को नौकरी, अन्य सुविधाओं व स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से वंचित रखेगी। इसका विरोध करते हुए आॅल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने कहा कि इस्लाम दो बच्चों की नीति में विश्वास नहीं करता। जिसे दुनिया में आना है, उसे कोई नहीं रोक सकता। इस तरह की मानसिकता सरकार के उपायों और प्रयासों पर पानी फेरने के लिए काफी है। बहरहाल, जनसंख्या नियंत्रण कानून ही देश की सारी समस्याओं का हल है। इसके लिए सख्त कानून बने, जिसमें दो से अधिक संतान पैदा करने पर न्यूनतम 10 साल की सजा का प्रावधान हो। साथ ही, उन्हें सभी प्रकार की सरकारी सुविधाओं से वंचित रखा जाए। तभी देश को बचाया जा सकता है। यही आखिरी उम्मीद है। 
     (लेखक पूर्व सांसद और मध्य प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता हैं)