प्रेमचंद्र जयंती 31 जुलाई पर विशेष: पूर्व संस्कार

    दिनांक 30-जुलाई-2020
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मुंशी प्रेमचंद
पाप कर्म का प्रायश्चित मनुष्य को करना ही पड़ता है, भले वह कितना भी सत्पुरुष क्यों न रहा हो जीवन में। प्रस्तुत कहानी में मुंशी प्रेमचंद ने बैल जवाहिर के माध्यम से हिन्दू मान्यता में 'कर्म-फल' के दृष्टांत को ही समझाने का प्रयास किया है कि फरेब भले सकारात्मक उदृेश्य से किया गया हो, होता वह पाप ही है

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सज्जनों के हिस्से में भौतिक उन्नति कभी भूल कर ही आती है। रामटहल विलासी, दुर्व्यसनी, चरित्रहीन आदमी थे, पर सांसारिक व्यवहारों में चतुर, सूद-ब्याज के मामले में दक्ष और मुकदमे-अदालत में कुशल थे। उनका धन बढ़ता था। सभी उनके असामी थे। उधर उन्हीं के छोटे भाई शिवटहल साधु-भक्त, धर्म-परायण और परोपकारी जीव थे। उनका धन घटता जाता था। उनके द्वार पर दो-चार अतिथि बने रहते थे। बड़े भाई का सारे मुहल्ले पर दबाव था। जितने नीच श्रेणी के आदमी थे, उनका हुक्म पाते ही फौरन उनका काम करते थे। उनके घर की मरम्मत बेगार में हो जाती। ऋणी कुंजड़े साग-भाजी भेंट में दे जाते। ऋणी ग्वाला उन्हें बाजार-भाव से ड्योढ़ा दूध देता। छोटे भाई का किसी पर रौब न था। साधु-संत आते और इच्छापूर्ण भोजन करके अपनी राह लेते। दो-चार आदमियों को रुपये उधार दिये भी तो सूद के लालच से नहीं, बल्कि संकट से छुड़ाने के लिए। कभी जोर दे कर तगादा न करते कि कहीं उन्हें दु:ख न हो।
इस तरह कई साल गुजर गये। यहां तक कि शिवटहल की सारी सम्पत्ति परमार्थ में उड़ गयी। रुपये भी बहुत डूब गये! उधर रामटहल ने नया मकान बनवा लिया। सोने-चांदी की दुकान खोल ली। थोड़ी जमीन भी खरीद ली और खेती-बाड़ी भी करने लगे।
शिवटहल को अब चिंता हुई। निर्वाह कैसे होगा? धन न था कि कोई रोजगार करते। वह व्यवहार-बुद्धि भी न थी, जो बिना धन के भी अपनी राह निकाल लेती है। किसी से ऋण लेने की हिम्मत न पड़ती थी। रोजगार में घाटा हुआ तो देंगे कहां से? किसी दूसरे आदमी की नौकरी भी न कर सकते थे। कुल-मर्यादा भंग होती थी। दो-चार महीने तो ज्यों-त्यों करके काटे, अंत में चारों ओर से निराश होकर बड़े भाई के पास गये और कहा-भैया, अब मेरे और मेरे परिवार के पालन का भार आपके ऊपर है। आपके सिवा अब किसकी शरण लूं?

जवाहिर की और भी खातिर होने लगी। वह पशु से देवता हो गया। रामटहल उसे पहले रसोई के सब पदार्थ खिलाकर तब आप भोजन करते। प्रात:काल उठकर उसके दर्शन करते। यहां तक कि वह उसे अपनी बहली में भी न जोतना चाहते। लेकिन जब उनको कहीं जाना होता और बहली बाहर निकाली जाती, तो जवाहिर उसमें जुतने के लिए इतना अधीर और उत्कंठित हो जाता। 

रामटहल ने कहा-इसकी कोई चिन्ता नहीं। तुमने कुकर्म में तो धन उड़ाया नहीं। जो कुछ किया, उससे कुल-कीर्ति ही फैली है। मैं धूर्त हूं; संसार को ठगना जानता हूं। तुम सीधे-सादे आदमी हो। दूसरों ने तुम्हें ठग लिया। यह तुम्हारा ही घर है। मैंने जो जमीन ली है, उसकी तहसील वसूल करो, खेती-बाड़ी का काम संभालो। महीने में तुम्हें जितना खर्च पड़े, मुझसे ले जाओ। हां, एक बात मुझसे न होगी। मैं साधु-संतों का सत्कार करने को एक पैसा भी न दूंगा और न तुम्हारे मुंह से अपनी निंदा सुनूंगा।
शिवटहल ने गद्गद् कंठ से कहा-भैया, मुझसे इतनी भूल अवश्य हुई कि मैं सबसे आपकी निंदा करता रहा हूं, उसे क्षमा करो। अब से मुझे अपनी निंदा करते सुनना तो जो चाहे दंड देना। हां, आपसे मेरी एक विनती है। मैंने अब तक अच्छा किया या बुरा, पर भाभी जी को मना कर देना कि उसके लिए मेरा तिरस्कार न करें।
रामटहल-अगर वह कभी तुम्हें ताना देंगी, तो मैं उनकी जीभ खींच लूंगा।
रामटहल की जमीन शहर से दस-बारह कोस पर थी। वहां एक कच्चा मकान भी था। बैल, गाड़ी, खेती की अन्य सामग्रियां वहीं रहती थीं। शिवटहल ने अपना घर भाई को सौंपा और अपने बाल-बच्चों को ले कर गांव चले गये। वहां उत्साह के साथ काम करने लगे। नौकरों ने काम में चौकसी की। परिश्रम का फल मिला। पहले ही साल उपज ड्योढ़ी हो गयी और खेती का खर्च आधा रह गया।
पर स्वभाव को कैसे बदलें? पहले की तरह तो नहीं, पर अब भी दो-चार मूर्तियां शिवटहल की कीर्ति सुनकर आ ही जाती थीं। और शिवटहल को विवश होकर उनकी सेवा और सत्कार करना ही पड़ता था। हां, अपने भाई से यह बात छिपाते थे कि कहीं वह अप्रसन्न होकर जीविका का यह आधार भी न छीन लें। फल यह होता कि उन्हें भाई से छिपाकर अनाज, भूसा, खली आदि बेचना पड़ता। इस कमी को पूरा करने के लिए वह मजदूरों से और भी कड़ी मेहनत लेते थे और खुद भी कड़ी मेहनत करते। धूप-ठंड, पानी-बूंदी की बिल्कुल परवाह न करते थे। मगर कभी इतना परिश्रम तो किया न था। शरीर शक्तिहीन होने लगा। भोजन भी रूखा-सूखा मिलता था। उस पर कोई ठीक समय नहीं। कभी दोपहर को खाया, कभी तीसरे पहर। कभी प्यास लगी, तो तालाब का पानी पी लिया। दुर्बलता रोग का पूर्व रूप है। बीमार पड़ गये। देहात में दवा-दारू का सुभीता न था। भोजन में भी कुपथ्य करना पड़ता था। रोग ने जड़ पकड़ ली। ज्वर ने प्लीहा का रूप धारण किया और प्लीहा ने छह महीने में काम तमाम कर दिया।
रामटहल ने यह शोक-समाचार सुना, तो उन्हें बड़ा दु:ख हुआ। इन तीन वर्षों में उन्हें एक पैसे का नाज नहीं लेना पड़ा। गुड़, घी, भूसा-चारा, उपले-ईंधन सब गांव से चला आता था। बहुत रोये, पछतावा हुआ कि मैंने भाई की दवा-दरपन की कोई फिक्र नहीं की; अपने स्वार्थ की चिंता में उसे भूल गया। लेकिन मैं क्या जानता था कि मलेरिया का ज्वर प्राणघातक ही होगा! नहीं तो यथाशक्ति अवश्य इलाज करता। भगवान की यही इच्छा थी, फिर मेरा क्या वश!
अब कोई खेती को संभालने वाला न था। इधर रामटहल को खेती का मजा मिल गया था! उस पर विलासिता ने उनका स्वास्थ्य भी नष्ट कर डाला था। अब वह देहात की स्वच्छ जलवायु में रहना चाहते थे। निश्चय किया कि खुद ही गांव में जाकर खेती-बाड़ी करूं। लड़का जवान हो गया था। शहर का लेन-देन उसे सौंपा और देहात चले आये। यहां उनका समय और चित्त विशेषकर गायों की देखभाल में लगता था। उनके पास एक जमुनापारी बड़ी रास की गाय थी। उसे कई साल हुए बड़े शौक से खरीदा था। दूध खूब देती थी, और सीधी इतनी कि बच्चा भी सींग पकड़ ले, तो न बोलती। वह इन दिनों गाभिन थी। वह उसे बहुत प्यार करते थे। शाम-सबेरे उसकी पीठ सहलाते, अपने हाथों से नाज खिलाते। कई आदमी उसके ड्योढ़े दाम देते थे, पर रामटहल ने न बेची। जब समय पर गऊ ने बच्चा दिया, तो रामटहल ने धूमधाम से उसका जन्मोत्सव मनाया, कितने ही ब्राह्मणों को भोजन कराया। कई दिन तक गाना-बजाना होता रहा। इस बछड़े का नाम रखा गया ‘जवाहिर’। एक ज्योतिषी से उसका जन्म-पत्रा भी बनवाया गया। उसके अनुसार बछड़ा बड़ा होनहार, बड़ा भाग्यशाली, स्वामिभक्त निकला। केवल छठे वर्ष उस पर एक संकट की शंका थी। उससे बच गया तो फिर जीवन-पर्यन्त सुख से रहेगा।
बछड़ा श्वेत-वर्ण था। उसके माथे पर एक लाल तिलक था। आंखें कजरी थीं। स्वरूप का अत्यन्त मनोहर और हाथ-पांव का सुडौल था। दिन भर कलोलें किया करता। रामटहल का चित्त उसे छलांगें भरते देखकर प्रफुल्लित हो जाता था। वह उनसे इतना हिल-मिल गया कि उनके पीछे-पीछे कुत्ते की भांति दौड़ा करता था। जब वह शाम और सुबह को अपनी खाट पर बैठकर असामियों से बातचीत करने लगते, तो जवाहिर उनके पास खड़ा होकर उनके हाथ या पांव को चाटता था। वह प्यार से उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगते, तो उसकी पूंछ खड़ी हो जाती और आंखें हृदय के उल्लास से चमकने लगतीं। रामटहल को भी उससे इतना स्नेह था कि जब तक वह उनके सामने चौके में न बैठा हो, भोजन में स्वाद न मिलता। वह उसे बहुधा गोद में चिपटा लिया करते। उसके लिए चांदी का हार, रेशमी फूल, चांदी की झांझें बनवायीं। एक आदमी उसे नित्य नहलाता और झाड़ता-पोंछता रहता था। जब कभी वह किसी काम से दूसरे गांव में चले जाते तो उन्हें घोड़े पर आते देखकर जवाहिर कुलेलें मारता हुआ उसके पास पहुंच जाता और उनके पैरों को चाटने लगता। पशु और मनुष्य में यह पिता-पुत्र सा प्रेम देख कर लोग चकित हो जाते।
जवाहिर की अवस्था ढाई वर्ष की हुई। रामटहल ने उसे अपनी सवारी की बहली के लिए निकालने का निश्चय किया। वह अब बछड़े से बैल हो गया था। उसका ऊंचा डील, गठे हुए अंग, सुदृढ़ मांसपेशियां, गर्दन के ऊपर ऊंचा डील, चौड़ी छाती और मस्तानी चाल थी। ऐसा दर्शनीय बैल सारे इलाके में न था। बड़ी मुश्किल से उसका बांधा मिला। पर देखने वाले साफ कहते थे कि जोड़ नहीं मिला। रुपये आपने बहुत खर्च किये हैं, पर कहां जवाहिर और कहां यह! कहां लैंप और कहां दीपक!
पर कौतुहल की बात यह थी कि जवाहिर को कोई गाड़ीवान हांकता तो वह आगे पैर न उठाता। गर्दन हिला-हिलाकर रह जाता। मगर जब रामटहल आप पगहा हाथ में ले लेते और एक बार चुमकार कर कहते, चलो बेटा, तो जवाहिर उन्मत्त होकर गाड़ी को ले उड़ता। दो-दो कोस तक बिना रुके, एक ही सांस में दौड़ता चला जाता। घोड़े भी उसका मुकाबला न कर सकते।
एक दिन संध्या समय जब जवाहिर नांद में खली और भूसा खा रहा था और रामटहल उसके पास खड़े उसकी मक्खियां उड़ा रहे थे, एक साधु महात्मा आकर द्वार पर खड़े हो गये। रामटहल ने अविनयपूर्ण भाव से कहा-यहां क्यों खड़े हो महाराज, आगे जाओ।
साधु-कुछ नहीं बाबा, इसी बैल को देख रहा हूं। मैंने ऐसा सुन्दर बैल नहीं देखा।
रामटहल-(ध्यान देकर) घर ही का बछड़ा है।
साधु-साक्षात् देवरूप है।
यह कहकर महात्मा जी जवाहिर के निकट गये और उसके खुर चूमने लगे।
रामटहल-आपका शुभागमन कहां से हुआ? आज यहीं विश्राम कीजिए तो बड़ी दया हो।
साधु-नहीं बाबा, क्षमा करो। मुझे आवश्यक कार्य से रेलगाड़ी पर सवार होना है। रातों-रात चला जाऊंगा! ठहरने से
विलम्ब होगा।
रामटहल-तो फिर और कभी दर्शन होंगे?
साधु-हां, तीर्थयात्रा से तीन वर्ष में लौटकर इधर से फिर जाना होगा। तब आपकी इच्छा होगी तो ठहर जाऊंगा! आप बड़े भाग्यशाली पुरुष हैं कि आपको ऐसे देवरूप नंदी की सेवा का अवसर मिल रहा है। इन्हें पशु न समझिए, यह कोई महान आत्मा हैं। इन्हें कष्ट न दीजिएगा। इन्हें कभी फूल से भी न मारिएगा। यह कहकर साधु ने फिर जवाहिर के चरणों पर सीस नवाया और
 चले गये।
उस दिन से जवाहिर की और भी खातिर होने लगी। वह पशु से देवता हो गया। रामटहल उसे पहले रसोई के सब पदार्थ खिलाकर तब आप भोजन करते। प्रात:काल उठकर उसके दर्शन करते। यहां तक कि वह उसे अपनी बहली में भी न जोतना चाहते। लेकिन जब उनको कहीं जाना होता और बहली बाहर निकाली जाती, तो जवाहिर उसमें जुतने के लिए इतना अधीर और उत्कंठित हो जाता, सिर हिला-हिलाकर इस तरह अपनी उत्सुकता प्रकट करता कि रामटहल को विवश हो कर उसे जोतना पड़ता। दो-एक बार वह दूसरी जोड़ी जोत कर चले तो जवाहिर को इतना दु:ख हुआ कि उसने दिन भर नांद में मुंह नहीं डाला। इसलिए वह अब बिना किसी विशेष कार्य के कहीं जाते ही न थे।
उनकी श्रद्धा देख कर गांव के अन्य लोगों ने भी जवाहिर को अन्न-ग्रास देना शुरू किया। सुबह उसके दर्शन करने तो प्राय: सभी आ जाते थे।
इस प्रकार तीन साल और बीते। जवाहिर को छठा वर्ष लगा।
रामटहल को ज्योतिषी की बात याद थी। भय हुआ, कहीं उसकी भविष्यवाणी सत्य न हो। पशु-चिकित्सा की पुस्तकें मंगाकर पढ़ीं। पशु-चिकित्सक से मिले और कई औषधियां ला कर रखीं। जवाहिर को टीका लगवा दिया। कहीं नौकर उसे खराब चारा या गंदा पानी न खिला-पिला दें, इस आशंका से वह अपने हाथों से उसे खोलने-बांधने लगे। पशुशाला का फर्श पक्का करा दिया जिसमें कोई कीड़ा-मकोड़ा न छिप सके। उसे नित्यप्रति खूब धुलवाते भी थे।
संध्या हो गयी थी। रामटहल नांद के पास खड़े जवाहिर को खिला रहे थे कि इतने में सहसा वही साधु महात्मा आ निकले जिन्होंने आज से तीन वर्ष पहले दर्शन दिये थे। रामटहल उन्हें देखते ही पहचान गये। जाकर दंडवत् की, कुशल-समाचार पूछे और उनके भोजन का प्रबन्ध करने लगे। इतने में अकस्मात् जवाहिर ने जोर से डकार ली और धम-से भूमि पर गिर पड़ा। रामटहल दौड़े हुए उसके पास आये। उसकी आंखें पथरा रही थीं। जवाहिर ने पहले एक स्नेहपूर्ण दृष्टि उन पर डाली और चित हो गया।
रामटहल घबराये हुए घर से दवाएं लाने दौड़े। कुछ समझ में न आया कि खड़े-खड़े इसे हो क्या गया। जब वह घर में से दवाइयां लेकर निकले तब जवाहिर का अंत हो चुका था।
रामटहल शायद अपने छोटे भाई की मृत्यु पर भी इतने शोकातुर न हुए थे। वह बार-बार लोगों के रोकने पर भी दौड़-दौड़ कर जवाहिर के शव के पास जाते और उससे लिपटकर रोते।
रात उन्होंने रो-रो कर काटी। उसकी सूरत आंखों से न उतरती थी। रह-रहकर हृदय में एक वेदना-सी होती और शोक से विह्वल हो जाते।
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उस दिन से जवाहिर की और भी खातिर होने लगी। वह पशु से देवता हो गया। रामटहल उसे पहले रसोई के सब पदार्थ खिलाकर तब आप भोजन करते। ...उनकी श्रद्धा देख कर गांव के अन्य लोगों ने भी जवाहिर को अन्न-ग्रास देना शुरू किया। सुबह उसके दर्शन करने तो प्राय: सभी आ जाते थे।

प्रात:काल लाश उठायी गयी, किन्तु रामटहल ने गांव की प्रथा के अनुसार उसे चमारों के हवाले नहीं किया। यथाविधि उसकी दाह-क्रिया की, स्वयं आग दी। शास्त्रानुसार सब संस्कार किये। तेरहवें दिन गांव के ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। उक्त साधु महात्मा को उन्होंने अब तक नहीं जाने दिया था। उनकी शांति देने वाली बातों से रामटहल को बड़ी सांत्वना मिलती थी।
एक दिन रामटहल ने साधु से पूछा-महात्मा जी, कुछ समझ में नहीं आता कि जवाहिर को कौन-सा रोग हुआ था। ज्योतिषी जी ने उसके जन्मपत्रा में लिखा था कि उसका छठा साल अच्छा न होगा। लेकिन मैंने इस तरह किसी जानवर को मरते नहीं देखा। आप तो योगी हैं, यह रहस्य कुछ आपकी समझ में आता है?
साधु-हां, कुछ थोड़ा-थोड़ा समझता हूं।
रामटहल-कुछ मुझे भी बताइए। चित्त को धैर्य नहीं आता।
साधु-वह उस जन्म का कोई सच्चरित्र, साधु-भक्त, परोपकारी जीव था। उसने आपकी सारी सम्पत्ति धर्म-कार्यों में उड़ा दी थी। आपके सम्बन्धियों में ऐसा कोई सज्जन था?
रामटहल-हां महाराज, था।
साधु-उसने तुम्हें धोखा दिया, तुमसे विश्वासघात किया। तुमने उसे अपना कोई काम सौंपा था। वह तुम्हारी आंख बचाकर तुम्हारे धन से साधुजनों का सेवा-सत्कार किया करता था।
रामटहल-मुझे उस पर इतना संदेह नहीं होता। वह इतना सरल प्रकृति, इतना सच्चरित्र मनुष्य था कि बेईमानी करने का उसे कभी ध्यान भी नहीं आ सकता था।
साधु-लेकिन उसने विश्वासघात अवश्य किया। अपने स्वार्थ के लिए नहीं, अतिथि-सत्कार के लिए ही सही, पर था वह विश्वासघाती। रामटहल-संभव है दुरावस्था ने उसे धर्म-पथ से विचलित कर दिया हो।
साधु-हां, यही बात है। उस प्राणी को स्वर्ग में स्थान देने का निश्चय किया गया। पर उसे विश्वासघात का प्रायश्चित करना आवश्यक था। उसने बेईमानी से तुम्हारा जितना धन हर लिया था, उसकी पूर्ति करने के लिए उसे तुम्हारे यहां पशु का जन्म दिया गया। यह निश्चय कर लिया गया कि छह वर्ष में प्रायश्चित्त पूरा हो जायगा। इतनी अवधि तक वह तुम्हारे यहां रहा। ज्यों ही अवधि पूरी हो गयी त्यों ही उसकी आत्मा निष्पाप और निर्लिप्त हो कर निर्वाणपद को प्राप्त हो गयी।
महात्मा जी तो दूसरे दिन विदा हो गये, लेकिन रामटहल के जीवन में उसी दिन से एक बड़ा परिवर्तन दिखाई पड़ने लगा। उनकी चित्त-वृत्ति बदल गयी। दया और विवेक से हृदय परिपूर्ण हो गया। वह मन में सोचते, जब ऐसे धर्मात्मा प्राणी को जरा से विश्वासघात के लिए इतना कठोर दंड मिला तो मुझ जैसे कुकर्मी की क्या दुर्गति होगी! यह बात उनके ध्यान से कभी न उतरती थी।