‘कल्याण’ के लेखक शिरोमणि

    दिनांक 30-जुलाई-2020
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डॉ. संतोष कुमार तिवारी

गीता प्रेस की मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ के आद्य सम्पादक हनुमान प्रसाद पोद्दार इसमें प्रकाशित किए जाने वाले लेखों का ही नहीं, बल्कि इसके लेखकों की भी पड़ताल करते थे, ताकि कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रहे। वैसे तो ‘कल्याण’ के लेखकों की सूची बहुत लंबी है, लेकिन उनमें पं. गोपीनाथ कविराज का नाम विशिष्ट है। भाईजी न केवल उनकी सलाह से विशेषांकों के विषय तय करते थे, बल्कि लेखकों के चयन में भी उनकी राय लेते थे

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हिन्दी, अंग्रेजी और बांग्ला के जानकार पं. गोपीनाथजी कविराज कल्याण के विशिष्ट लेखक थे।

गीता प्रेस की हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ अपने विशेषांकों के लिए पिछले 94वे वर्षों से प्रसिद्ध है। इसके विशेषांकों और साधारण अंकों में जो लेख छपते रहे हैं, वे पाठक के हृदय को छू जाते हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि ‘कल्याण’ के आदि सम्पादक श्री हनुमान प्रसादजी पोद्दार (1892-1971) का यह विश्वास था कि आचरण से असंतृप्त कोरे दार्शनिक सिद्धान्त प्रभावी नहीं होते। इसलिए प्रकाशनार्थ आए हुए लेखों को स्वीकृति प्रदान करने से पूर्व वे यथासम्भव लेखकों के व्यक्तिगत जीवन में उसके प्रभाव का पता लगाते थे और अंतत: कथनी-करनी में सामंजस्य के सूत्र मिलने पर ही उसे ‘कल्याण’ में स्थान देते थे। उन्होंने यह प्रतिबंध अपने ऊपर भी लागू किया और साधनामय जीवन व्यतीत करते हुए आध्यात्मिक पत्र के सम्पादक का गुरुतर दायित्व मनसा-वाचा-कर्मणा से आजीवन निभाया। (कल्याण पथ:  निमार्ता और राही: डॉ. भगवती सिंह, श्री राधा माधव प्रकाशन, गोरखपुर, पृष्ठ 271)
ऐसा ही साधनामय जीवन पोद्दारजी के बाद हुए ‘कल्याण’ के सम्पादकों का रहा, जिनमें श्री चिम्मनलाल गोस्वामी, स्वामी रामसुखदास और वर्तमान सम्पादक श्री राधेश्यामजी खेमका भी शामिल हैं। ‘कल्याण’ का लेखक मण्डल बहुत बड़ा रहा है। ‘कल्याण’ का प्रकाशन 1926 से प्रारम्भ हुआ। इसके अंकों में सभी शंकराचार्य, महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद आदि भी लिखते थे। परन्तु इनमें एक लेखक ऐसा था जिनसे पोद्दारजी अपने विशेषांकों के विषय ही नहीं तय करते थे, बल्कि अपने लेखकों के चयन में भी उनकी राय लेते थे। उस विश्वासपात्र विद्वान का नाम था- पं. गोपीनाथजी कविराज (1887-1976)। वह वाराणसी में रहते थे, जबकि ‘कल्याण’ गोरखपुर से छपता था। पंडित गोपीनाथजी कविराज के ही शब्दों में ‘आज से चालीस वर्ष पूर्व (1931) में ‘भगवत-विग्रह’ नाम का मेरा प्रथम लेख कल्याण के ‘श्रीकृष्णांक’ में निकला था। उसके बाद आगे जब कभी भी ‘कल्याण’ का कोई विशेषांक निकालने की योजना बनी, तो पोद्दारजी ने कभी स्वयं उपस्थित होकर और कभी लोकमाध्यम से उसकी विषयसूची तैयार करने में सदा मेरे परामर्श का सत्कार किया। इस प्रकार श्रीकृष्णांक, शिवांक, शक्ति-अंक, योगांक, संतांक, गो-अंक, साधनांक, वेदान्तांक, हिंदू-संस्कृति-अंक, मानवता-अंक, परलोक एवं पुनर्जन्मांक, प्रभृति प्रस्तुत हुए। (कल्याण पथ:  निमार्ता और राही, पष्ठ11)
‘कल्याण’ के विशेषांकों में मेरे निबन्ध अवश्य रहे, इस विषय में पोद्दारजी का एकान्त आग्रह रहता था और अब तक है। काशी दूरस्थ है। अत: इन्होंने मेरे सन्निकट एक ऐसे बंगभाषी सज्जन को नियुक्त कर रखा था, जो प्रतिदिन मेरे यहां आकर ‘कल्याण’ के लिए निबन्ध संग्रह करते थे। वे थे मेरे अति परिचित दिवंगत सतीशचन्द्र गुहा। गुहा महोदय पहले मेरे सिगरा-स्थित घर के पास ही रहते थे, किन्तु बाद में मेरे घर में ही रहने लगे थे। उन्हें किसी प्रकार की आर्थिक असुविधा न भोगनी पड़े, इस हेतु पोद्दारजी ने उनके लिए मासिक वृत्ति की व्यवस्था कर दी थी। इससे ‘कल्याण’ के निमित्त सामग्री-संकलन का कार्य अनवरत निर्बाध रूप से चलता रहता था। विशेषांकों के अतिरिक्त ‘कल्याण’ के अन्य साधारण अंकों में भी मेरे रचित अनेक निबन्ध प्रकाशित होते रहे हैं।’ (कल्याण पथ:  निमार्ता और राही, पृष्ठ 11)
पं. गोपीनाथजी कहते हैं, कल्याण के सम्बन्ध में मुझे एक बात स्मरण हो रही है। मेरे पूज्य गुरुदेव परमहंस विशद्धानन्दजी महाराज ने मुझसे इस मासिक पत्र की कई बार भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। वे कहते थे इस प्रकार की धार्मिक पत्रिका के बहुत प्रचार से मनुष्य जीवन की भावशुद्धि होती है और धर्म के प्रति उनका मन आकृष्ट होता है, जिससे अन्त में परमकल्याण  संपादित होता है।  (कल्याण पथ:  निमार्ता और राही, पृष्ठ 12)
पं. गोपीनाथजी दूसरे लेखकों से ‘कल्याण’ के लिए लिखवाते भी थे। ज्?योति नामक एक महात्मा थे। गोपीनाथजी ने कमरा बन्द करके उनसे लिखवाया था। (कल्याण पथ:  निमार्ता और राही, पृष्ठ 273)
‘कल्याण’ के सम्पादक पोद्दारजी ने अपनी वसीयत में जिन लेखकों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया था, उनमें पं. गोपीनाथजी कविराज भी शामिल हैं। (भाईजी: पावन स्मरण, द्वितीय संस्करण, गीता वाटिका प्रकाशन, गोरखपुर, पृष्ठ 561)
पं. गोपीनाथजी कविराज कौन थे
 
 

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पं. गोपीनाथ की जन्मशती पर 7 सितम्बर, 1988 को जारी डाक टिकट।

पं. गोपीनाथ को लोग सम्मान से कविराज कहते थे। वह काशी राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में 1923 से 1937 तक प्राचार्य रहे। वह सरस्वती भवन ग्रन्थमाला के सम्पादक रहे और 1968 से जीवन के आखिरी समय तक  ‘आनन्द वार्ता’  नामक त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया। 1934 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘महामहोपाध्याय’ ‘तांत्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि’  के   लिए 1964 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (संस्कृत) और 1964 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। वह अपने समय के सभी आध्यात्मिक ऋषियों और विद्वानों के संपर्क में थे, चाहे वह श्री अरविन्दो हों या मां आनन्दमयी

महामहोपाध्याय श्री गोपीनाथ कविराज  का जन्म 7 सितम्बर, 1887 को ढाका (अब बांग्लादेश में) जिले के धमरई गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम बैकुण्ठनाथ बागची था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा ढाका और जयपुर में हुई। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा हासिल की। बाद में वह वाराणसी के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय में 1923 से 1937 तक प्राचार्य रहे। इससे पहले वह 1914 से वहां पुस्तकालयाध्यक्ष थे। वह सरस्वती भवन ग्रन्थमाला के सम्पादक भी रहे। ‘तांत्रिक वाङ्मय में शाक्त दृष्टि’ के लिए उन्हें 1964 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (संस्कृत) से सम्मानित किया गया। 1934 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने ‘महामहोपाध्याय’ और 1964 में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया। उनकी जन्मशती पर 7 सितम्बर, 1988 को भारत सरकार ने डाक टिकट भी जारी किया।  
अपने समय के सभी आध्यात्मिक ऋषियों और विद्वानों से उनका निकट सम्पर्क था। पारसी धर्मगुरु मेहरबाबा से भी आपका सम्पर्क था। श्री अरविन्दो तथा मां आनन्दमयी और ऐसे ही न जाने कितने आध्यात्मिक शिखर-पुरुष उनके सम्पर्क में थे। अपने जीवन के अंतिम सात वर्ष वह मां आनन्दमयी के आश्रम में ही रहे। उन्होंने 1968 से जीवन के आखिरी समय तक ‘आनन्द वार्ता’ नामक त्रैमासिक पत्रिका का सम्पादन किया।
डॉ. भगवती प्रसाद सिंह ने उन पर एक पुस्तक लिखी -‘मनीषी की लोकयात्रा (महामहोपाध्याय पं. गोपीनाथ कविराज का जीवन दर्शन)’। आध्यात्मिक लोगों को यह पुस्तक उतनी ही रोचक और अदभुत लगेगी, जितनी कि परमहंस योगानन्द द्वारा विरचित ‘योगी कथामृत’। डॉ. भगवती प्रसाद सिंह गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी के विभागाध्यक्ष थे, और पं. गोपीनाथ कविराज के शिष्य भी थे। इसे पं. गोपीनाथजी की अधिकृत जीवनी कहा जा सकता है, क्योंकि इस पुस्तक का पहला संस्करण 1968 में  निकला, जब वह जीवित थे। इसमें उनके हस्ताक्षर भी हैं। इसके बाद आठ वर्ष तक यानी 1976 तक वह जीवित रहे। 2005 तक ‘मनीषी की लोकयात्रा’ के आठ संस्करण निकले। संस्कृत महाविद्यालय में उनके शिष्यों में श्री चिम्मनलालजी गोस्वामी भी थे, जो कि बाद में ‘कल्याण’ और ‘कल्याण-कल्पतरु’ के सम्पादक भी रहे। गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित रामचरितमानस की टीका का अंग्रेजी में अनुवाद चिम्मनलालजी ने ही किया था।
डॉ. गोपीनाथजी कविराज के निधन पर ‘कल्याण’ के जुलाई 1976 के अंक में निम्नलिखित श्र्द्धांजलि-पंक्तियां प्रकाशित
हुई थीं: 
‘सम्मानीय महामहोपाध्याय पं. श्री गोपीनाथजी कविराज का नवासी वर्ष की आयु में विश्वनाथ नगरी वाराणसी में पुण्यसलिला गंगाजी के सानिध्य में 12 जून, 1976 को सायंकाल काशी-लाभ हो गया। आप तंत्र-मंत्र के उद्भट विद्वान, वैष्णव-शैव-शाक्त धर्म के उत्कृष्ठ मर्मज्ञ, दार्शनिक तथा योगशास्त्र और प्राच्य विद्या के विशेषज्ञ थे। आपने विभिन्न विषयों पर अनेकों पुस्तकों की रचना की है। आपका गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के साथ चिरकाल से घनिष्ठ स्नेह-सम्बन्ध रहा। ‘कल्याण’ के उत्साही विद्वान लेखक होने के साथ ही आप समय-समय पर उचित और बहुमूल्य परामर्श देते रहते थे। आपके निधन से विद्या-क्षेत्र की एक महती क्षति हुई है। हम गीता प्रेस और ‘कल्याण’-परिवार की ओर से उनके प्रति श्र्द्धांजलि अर्पित करते हैं।’-सम्पादक
वह केवल तंत्रशास्त्र के ही ज्ञाता नहीं थे, बल्कि वेद-वेदांग, न्याय, सांख्य-योग, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, दर्शन सहित तमाम शास्त्रों के ज्ञाता थे। भारतीय शास्त्र ही नहीं सूफीवाद व ईसाई रहस्यवाद का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। पं. गोपीनाथजी कविराज पारिवारिक व्यक्ति थे। उनकी पत्नी और एकमात्र पुत्र की जीवन लीला उनके जीवनकाल में ही समाप्त हो गई थी। अन्तिम दिनों में उनको कैंसर हो गया था। परलोकगमन के समय उनके परिवार में उनकी विधवा पुत्री और उसका एक बेटा और दो बेटियां थीं।  
(लेखक झारखण्ड केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)


सिद्धिभूमि ज्ञानगंज (सूर्य विज्ञान)
गोपीनाथ कविराज ने संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी और बांग्?ला में कई पुस्तकें लिखीं। उनमें से एक थी ‘सिद्धिभूमि ज्ञानगंज (सूर्य विज्ञान)’। मूल पुस्तक बांग्ला में लिखी गई है। इसका हिन्दी अनुवाद हुआ। इस पुस्तक में लिखा है ‘ईश्वर के राज्य में प्रवेशाधिकार के लिए शिशु होना आवश्यक है। शिशु अर्थात निर्मल, निश्छल, पूर्वाग्रहरहित। एक अबोध, प्रकृत शिशु अवस्था की प्राप्ति द्वारा ही महाशक्ति का आविर्भाव हो सकता है। अत: प्रकृत शिशुभाव की प्राप्ति करनी होगी। यह होना कैसे संभव है? देहात्माबोध का संस्कार कैसे समाप्त होगा?’
वाल्मीकि रामायण (किष्किंधा काण्ड) में एक ऐसे अलौकिक स्थान की चर्चा है ‘जहां वानरगण सीतान्वेषण करते-करते पहुंचे थे। यह एक गुफा थी जिसका मुख खुला हुआ था। इसमें प्रवेश करना दुष्कर था। इसका नाम था ऋक्षबलि। इस स्थान को सामान्य दृष्टि से देख पाना भी संभव नहीं था:- कथं चेदं वनं दुर्ग युष्माभिरूपलक्षितम। जैसे राजराजेश्वरी स्थान, ज्ञानगंज आदि को सामान्य दृष्टि से लक्ष्य नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार यह ऋक्षबलि भी उलक्षित स्थान है।’  जो शिशु तुल्य होते हैं, जो भगवत्इच्छा के सम्मुख पूर्ण आत्मसमर्पण कर देते हैं, उन्हें ही ज्ञानगंज और ऋक्षबलि जैसे स्थान दिखाई देते हैं।

ईश्वर में विश्वास
1932 में ‘कल्याण’ के ईश्वरांक (1932) में पं. गोपीनाथ कविराज ने ईश्वर की सत्ता पर एक लम्बा लेख लिखा था। शीर्षक था: ‘ईश्वर में विश्वास’। इसमें उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर की शक्ति है। उस शक्ति का आधार सब में सर्वत्र एक प्रकार का नहीं होता। ‘जो आधार जितना निर्मल होता है, जिसकी धारणाशक्ति जितनी अधिक होती है, उसमें उसी हिसाब से शक्ति का विकास होता है। ज्ञान और क्रिया दोनों क्षेत्रों में एक ही नियम है। अव्यक्त ज्ञान शक्ति जैसे अनन्त है, वैसे ही अव्यक्त क्रिया शक्ति भी अनन्त है।’