मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का ननिहाल है छत्तीसगढ़, इन दिनों है यहां उत्सव जैसा माहौल

    दिनांक 31-जुलाई-2020   
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सबसे भले और भोले लोगों का अंचल छत्तीसगढ़ अपने सम्पूर्ण समादर के साथ प्रभु श्रीराम को अपने अंतस में समेटे जिस दिन की बाट जोह रहा था, जिस दिन की शबरी प्रतीक्षा में अंचल ने, यहां से कार सेवा के लिए गए जत्थों ने जीवन के तीस वर्ष गुजारे हैं, वह प्रतीक्षा अब पूर्ण हुई है। सम्पूर्ण प्रदेश आज राममय होकर रामलला के भव्यतम मंदिर निर्माण के उत्सव में अयोध्या से दूर होते भी स्वयं को सहभागी मान रहा है।
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समृद्धि संस्कृतियों से सराबोर भारत का सांस्कृतिक ह्रदय प्रदेश छत्तीसगढ़। यहां की राजधानी रायपुर से लगभग सवा सौ किलोमीटर दूर, प्रदेश के जांजगीर-चांपा जिला मुख्यालय से लगभग 45 किलोमिटर आगे मैकल पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य शिवरी नारायण। प्रदेश की महानदी, शिवनाथ और जोंक नदी के संगम पर अवस्थित इस कस्बे में कभी एक भील बालिका रहती थी। सीधी-साधी सरल, प्रभु भक्ति में लीन। बात त्रेता युग की है। जनश्रुति है कि एक दिन उस बालिका ने देखा कि घर में उत्सव जैसा माहौल है और ढेर सारे पशु उनके यहां लाये गए हैं। मां से पूछने पर ज्ञात हुआ कि कल उसकी शादी है, जिसमें आगंतुक अतिथियों के सत्कार के लिए, उनके भोजनार्थ इस बेजुबानों को लाया गया है, परम्परा अनुसार जिसे काट कर अतिथियों को खिलाया जाएगा। किशोरी सोचने लगी कि यह कैसा उत्सव जिसमें इन निर्दोष जीवों का रक्त बहे, जिनकी अस्थि और मज्जाओं को उदरस्थ कर लिया जाने वाला आनंद क्या आनंद हुआ आखिर ? बुरी तरह विचलित और द्रवित वह बालिका अंततः रातोरात निकल पड़ती हैं घर से, तय करती हैं कि वे इन नृशंस हत्याओं का कारण नहीं बनेगी। नदी के किनारे-किनारे घनघोर वनों से आच्छादित अंचल में निकल पड़ती हैं। दंडक अरण्य में मतंग ऋषि के आश्रम में आश्रय पा बालिका अपना जीवन धन्य करती हैं, उनके ही प्रताप से शायद उस आश्रम के आसपास एक हिंसामुक्त क्षेत्र बन जाता है। आगे का इतिहास आप जानते ही हैं कि उन्हीं अबोध बालिका के हाथों के जूठे बेर ने भारत के जिस महागाथा-गौरवगाथा का निर्माण किया, उससे भला कौन ऐसा होगा जो भिज्ञ न हो! जी हां, बात माता शबरी की हो रही है, जिनके नाम पर अवस्थित कस्बा शिबरी नारायण का कण-कण आज राममय है। आज भी जहां के अद्भुत उस अद्भुत पेड़ से आप रामायण काल का साक्ष्य पा सकते हैं जिनके पत्ते बिल्कुल दोने के आकार के होते हैं। आज भी जहां आप सम्मोहित सा महानदी के किनारे खड़े होकर यह अनुभूति कर सकते हैं कि यहीं से माता शबरी की वह यात्रा शुरू हुई होगी जिसने न केवल आदिवासी सनातन शबर जनजाति को कृतार्थ कर दिया अपितु जिसने हमें भी रामरस से सराबोर कर दिया। आखिरकार मतंग ऋषि के आश्रम में प्रतीक्षारत माता शबरी के जूठे बेर की गाथा के बिना कहां हमें समानता-सद्भाव-सहकार-सौजन्य की वह मिठास मिल पाती जिसे ग्रहण कर हम सब आनंदाश्रु से लथपथ हो जाते हैं।

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मर्यादा पुरुषोत्तम, अखिल ब्रम्हांड स्वामी, महानायक, चराचर जगत के पालनहार, सनातन के प्रतीक पुरुष, असार-संसार से भव सागर से पार तक ले जाने वाले केवट के मित्र श्रीराम की गाथाओं की गवाही छत्तीसगढ़ का कण-कण देता हुआ नज़र आता है। श्री राम के एक-एक पदचाप का साक्ष्य यहां आप प्राप्त कर सकते हैं। जिस प्रदेश में दशरथ नंदन ने अपने वनवास का अधिकांश काल बिताया, वह क्षेत्र आज अपने आराध्य, उपासक, इष्ट के उनके पुनीत जन्मभूमि पर भव्य और दिव्य मंदिर का निर्माण के पर्व के बारे में सुन कर गदगद है, आह्लादित है।

छत्तीसगढ़जनों की अतुलनीय प्रसन्नता की तुलना एकमात्र उसी आह्लाद से कर सकते हैं, जब अयोध्यावासियों को श्रीराम के अवध वापसी का सन्देश मिला था। इन्हीं स्थानों के आसपास अपने रोम-रोम में राम को बसाये रामनामी सम्प्रदाय के ऐसे दलित समुदाय मिलेंगे जिनकी आस्था के आगे बड़े-बड़े संत-तपस्वी नत-मस्तक हो जाएं। इस सम्प्रदाय के रामभक्त अपने समूचे शरीर में राम नाम का गोदना गोदाये रहते हैं। उनके वस्त्र भी (देखें चित्र) रेशे-रेशे में राम को समेटे रहते हैं। ऐसा रंग अपने श्रीराम का जो अंतिम सांस तक संग रहे। अंत तक न छूटे। प्रसंगवश यह जिक्र करना समीचीन होगा कि जहां देश भर में वामपंथी समूह के लोग सनातन के विरुद्ध षड्यंत्र करते हुए दलित-आदिवासियों को हिंदुत्व से अलग करने/बताने में जी-जान से जुटे रहते हैं, वहां प्रदेश का केवल जांजगीर जिला ही शबर जनजाति के रूप में आदिवासियों और रामनामी सम्प्रदाय के रूप में दलितों के श्रीराम भक्ति की गाथा कहता हुआ, हर वाम नैरेटिव का प्रतिकार करता हुआ दृष्टिगोचर होगा।

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भारत के हर क्षेत्र से श्रीराम का एक अलग रिश्ता है। जैसे मिथिला से जानकी जी के होने के कारण वहां लोग ‘पहुना’ के रूप में इन्हें देखते हैं, तो छत्तीसगढ़ से इनका श्रीराम का संबंध अनेक रंग समेटे है। दक्षिण कोशल कहे जाने वाले प्रदेश, जिसे माता कौशल्या की जन्मभूमि के कारण रामलला का ननिहाल माना जाता है, इस नाते श्रीराम इस अंचल के ‘भांजा’ होते हैं। क्योंकि यहां के भांजा श्रीराम होते हैं, तो यहां मामाओं द्वारा अपने भांजों के पांव छूने की प्रथा यहां लोकमानस में आप देखेंगे। जैसे मिथिला में अपने दामाद को विष्णु मानने का रिवाज है। छग की राजधानी मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी नाम के स्थान पर माता कौशल्या का मंदिर है, जिसे उनका जन्मस्थान माना जाता है। यहां भी माता कौशल्या की जन्मभूमि पर  भव्य मंदिर प्रस्तावित है।

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प्रदेश भर में राममय वातावरण के बीच समय की नजाकत को देखते हुए कांग्रेस सरकार ने भी स्वयं को रामभक्त दिखाने की कवायद शुरू कर दी है। प्रदेश के सख्त लॉकडाउन के बीच भी सभी विधि-निषेधों को धता बताते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सपरिवार चंदखुरी पहुंच कर वहां मंदिर निर्माण की बात दुहरायी। हालांकि हमेशा से बघेल की निष्ठा हिंदुत्व के प्रति वैसी रही नहीं है जैसी आज दिखाना चाहते हैं। खुद सीएम बघेल के पिता नन्द कुमार बघेल समूचे देश में घूम-घूम कर लगातार श्रीराम को अपमानित करने, सनातन भावनाओं को अपमानित करने का कार्य करते रहते हैं, जिन्हें अघोषित रूप से पुत्र बघेल का समर्थन है। इसी आशंका को बल मिलता ही है। जैसा कि पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने पाञ्चजन्य से कहा, “जिस कांग्रेस ने कदम-कदम पर राम मंदिर निर्माण में रोड़े अटकाए, जिसने प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को ही काल्पनिक कहा, श्रीराम सेतु तोड़ने के लिए जिस कांग्रेस ने एड़ी-चोटी का दम लगा दिया था, उस कांग्रेस के नेता भूपेश बघेल अगर आज भगवान राम और माता कौशल्या की बात करते हैं, तो इस अवसरवादी रवैये पर किसे भरोसा होगा आखिर। अगर सच में कांग्रेस अब श्रीराम के शरण में आना चाहती है तो उसे अपने पूर्व के ऐसे कामों के लिए माफी मांगनी चाहिए। रामभक्तों पर गोलियों की बौछार कर देने वालों की समर्थक कांग्रेस के मुंह से श्रीराम का जिक्र ठीक नहीं लगता।”

जैसा कि उपरोक्त वर्णित है कि छत्तीसगढ़ का एक-एक कण रामरस से आप्लावित है। बात चाहे भांजे राम की हो, शबरी के राम की, शबरी नदी की बात हो शिबरीनाराण की या उस सिहावा की जहां आदिकवि वाल्मीकि द्वारा ‘रामायण’ की रचना होना बताया जाता है या फिर सम्पूर्ण दंडकारण्य जिसे आज हम ‘बस्तर’ के रूप में जानते हैं। श्रीराम के वनवास का अधिकांश समय छत्तीसगढ़ के वन्य प्रांतर में ही गुजरा था। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने चार वर्ष पूर्व 2016 में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने राम वनगमन मार्ग में आने वाले महत्वपूर्ण स्थानों को जोड़ने 'धार्मिक पर्यटन वनगमन मार्ग" नाम से सड़क बनाने के लिए प्रोजेक्ट बनाया था। इस मार्ग का अधिकांश हिस्सा छत्तीसगढ़ से होकर ही जाना है।


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एक सरकारी दस्तावेज़ के अनुसार– ‘छत्तीसगढ़ में कोरिया जिले की गवाई नदी से होकर सीतामढ़ी हरचौका नामक स्थान से प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया था। इस दौरान उन्होंने 75 स्थलों का भ्रमण करते हुए सुकमा जिले के रामाराम से दक्षिण भारत में प्रवेश किया था। उक्त स्थलों में से 51 स्थल ऐसे है, जहां प्रभु श्रीराम ने भ्रमण के दौरान रुककर कुछ समय व्यतीत किया था।’ वर्तमान छत्तीसगढ़ में राम वन गमन पर्यटन परिपथ को विकसित करने के उद्देश्य से प्रथम चरण में 9 स्थलों का चयन किया गया है। इन स्थलों में सीतामढ़ी-हरचौका (कोरिया), रामगढ़ (अम्बिकापुर), शिवरीनारायण (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार), चंदखुरी (रायपुर), राजिम (गरियाबंद), सिहावा-सप्तऋषि आश्रम (धमतरी), जगदलपुर (बस्तर), रामाराम (सुकमा) शामिल हैं। एक अखबार में प्रकाशित रपट के अनुसार-,‘श्रीराम कोरिया से रामगढ़ विश्रामपुर, मैनपाट, धरमजयगढ़, लक्ष्मण पादुका, चंद्रहासिनी चंद्रपुर, शिवरीनारायण, कसडोल होते हुए तुरतुरिया में श्रीराम वाल्मिकी आश्रम पहुंचे थे। वहां से सिरपुर, फिंगेश्वर, राजिम, पंचकोशी, मधुबन, रुद्री होते हुए सिहावा श्रृंगी ऋषि सप्तऋषि आश्रम पहुंचे थे। उसके बाद नारायणपुर राकसहाड़ा, चित्रकोट, बारसूर, गीदम होते हुए कुटुमसर पहुंचे। फिर शबरीनदी के किनारे सुकमा रामारम होते हुए कोंटा, इंजरम, सबरी नदी भद्राचलम के किनारे पर्ण कुटी में रहे।’

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इस तरह दुनिया के सबसे भले और भोले लोगों का अंचल छत्तीसगढ़ अपने सम्पूर्ण समादर के साथ प्रभु श्रीराम को अपने अंतस में समेटे जिस दिन की बाट जोह रहा था, जिस दिन की शबरी प्रतीक्षा में अंचल ने, यहां से कार सेवा के लिए गए जत्थों ने जीवन के तीस वर्ष गुजारे हैं, वह प्रतीक्षा अब पूर्ण हुई है। सम्पूर्ण प्रदेश आज राममय होकर रामलला के भव्यतम मंदिर निर्माण के उत्सव में अयोध्या से दूर होते भी स्वयं को सहभागी मान रहा है। छत्तीसगढ़ का जर्रा-जर्रा, यहां की कला-संस्कृति, रीति-रिवाज़, भोजन-भजन, आचार-व्यवहार... सब श्रीराम से प्रारंभ और उन्हीं के साथ संपन्न होता है। सनातन संस्कृति का ननिहाल अगर आप छत्तीसगढ़ को कहना चाहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। कौशलेन्द्र श्रीराम इस दक्षिण कोशल के प्राण हैं।