राफेल लड़ाकू विमानों के आ जाने से भारत की सैन्यशक्ति वैश्विक स्तर पर हुई मजबूत

    दिनांक 31-जुलाई-2020
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सूर्य प्रकाश सेमवाल
 
राफेल लड़ाकू विमानों के आ जाने से भारत की सैन्यशक्ति वैश्विक स्तर पर निश्चित रूप से और मजबूत हो गयी है। यह न केवल भारत के नादान और उत्पाती पड़ोसियों के लिए प्रभावी नकेल सिद्ध होगा बल्कि एशिया के साथ ही विश्वस्तर पर भारत की शक्ति के विस्तार व शान्ति प्रयासों में सहायक सिद्ध होगा।
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राष्ट्ररक्षासमं पुण्यं, राष्ट्ररक्षासमं व्रतम्, राष्ट्ररक्षासमं यज्ञो, दृष्टो नैव च नैव च।।
राष्ट्र रक्षा के समान कोई पुण्य नहीं, राष्ट्र रक्षा के समान कोई व्रत नहीं, राष्ट्र रक्षा के समान कोई यज्ञ नहीं। यह उस संस्कृत श्लोक का भावार्थ है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की धरती पर अंबाला एयरबेस में राफेल के पहुँचने पर उसके स्वागत में ट्वीट किया। नभः स्पृशं दीप्तम्..स्वागतम् ! वायुसेना के आदर्श ध्येय वाक्य को याद दिलाकर आकाश में व्याप्त इसकी दीप्त शक्ति का विश्वास बताया। फ्रांस के एयरबेस से चलकर यूएई के दाफ्रा एयरबेस से होते हुए 2 सुखोई विमानों की सुरक्षा निगरानी में पहले 5 राफेल विमान 29 जुलाई को अंबाला एयरबेस पहुँच गए। 

देशभर में राफेल के प्रति उत्साह, गौरव और आनंद का भाव व्याप्त था। अंबाला एयरबेस में राफेल विमानों की अगवानी के लिए भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आर के एस भदौरिया स्वयं मौजूद थे। राफेल की सफल लैंडिंग के बाद वायुसेना अधिकारियों द्वारा सम्मान स्वरूप पाँचों राफेल विमानों को वाटर सैल्यूट दिया गया। राफेल विमान को सुरक्षित लाने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले वायुसेना अधिकारी ग्रुप कैप्टन हरकीरत सिंह के साथ एयरबेस पर लैंडिंग के बाद सभी पायलटों का वायुसेना प्रमुख ने स्वागत किया। एयर चीफ मार्शल भदौरिया ने राफेल लड़ाकू विमानों को फ्रांस से भारत बिना किसी बाधा के सुरक्षित लाने के लिए पायलटों के साहस व कौशल की प्रशंसा की।
 
एक सर्वशक्तिमान योद्धा के रूप में भारतीय वायुसेना के लिए राफेल लड़ाकू विमान बहुत महत्वपूर्ण है। भारत की सामरिक व भौगोलिक स्थितियों के अनुरूप ही इसे अधुनातन व एडवांस्ड तकनीक से लैस किया गया है और भारत की आवश्यकता के मद्देनजर इसमें कुछ अतिरिक्त फीचर्स भी जोड़े गए हैं। भारत से पहले केवल फ्रांस में और मिश्र् में ही राफेल जेट का प्रयोग किया जाता रहा है।
 
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तूफ़ान का पर्याय माना जाने वाला राफेल एक मिनट में 60 हजार फुट की ऊंचाई तक आसानी से पहुँच सकता है। दो इंजन वाला राफेल लड़ाकू विमान किसी भी तरह के मिशन में भेजा जा सकता है। एक या दो पायलट वाले इस लड़ाकू विमान की लंबाई लगभग 15 मीटर के आसपास होती है। राफेल 24,500 किलोग्राम तक के वजन को ढोने के साथ भी आसानी से उड़ान भरने में सक्षम है। राफेल की अधिकतम गति 2200 से 2500 किमी. प्रतिघंटा है और इसकी रेंज 3700 किलोमीटर है। राफेल के अंदर ईंधन क्षमता 4700 किलोग्राम है। यह विमान इलेक्ट्रानिक स्कैनिंग रडार से थ्रीडी मैपिंग कर वास्तविक समय में अपने लक्ष्य की वास्तविक स्थिति जानने में समर्थ होता है। थाले आरबीई-2 रडार और थाले स्पेक्ट्रा वारफेयर सिस्टम लगा होता है। इसके साथ ही इसमें ऑप्ट्रॉनिक सेक्योर फ्रंटल इंफ्रा-रेड सर्च और ट्रैक सिस्टम भी लगा है। किसी भी मौसम व भौगोलिक स्थिति के बीच भी लंबी दूरी के खतरे को भी समय रहते भांपने में सक्षम है। नजदीकी और आमने-सामने की लड़ाई में राफेल एक साथ कई टारगेट पर दृष्टि रख सकता है। इसी प्रकार राफेल जमीनी सैन्य ठिकाने के साथ ही किसी विमानवाहक पोत से भी उड़ान भरने में समर्थ है।

अपने जिस विशेष गुण और ताकत के लिए राफेल की चर्चा होती है वह है इसमें लगने वाले घातक एमबीडीए एमआइसीए, एमबीडीए मेटेओर, एमबीडीए अपाचे, स्टोर्म शैडो एससीएएलपी मिसाइलें। राफेल शत्रु के लिए सबसे बड़ा विनाशक इसलिए भी सिद्ध होता है क्योंकि इसमें 30 एमएम की तोप से 2500 राउंड गोले दागे जा सकते हैं। राफेल आकाश व धरती दोनों का ही राजा कहलाता है। यह लड़ाकू विमान 1900 किलोमीटर प्रति घंटे की तेज गति से उड़ सकता है तो ठीक इसी तरह 300 किलोमीटर की रेंज से हवा से जमीन पर परमाणु हमला करने में सक्षम है। यह बहुत कम ऊंचाई पर उड़ान के साथ हवा से हवा में मिसाइल दाग सकता है।

बहुत ऊंचाई पर स्थित एयरबेस से भी राफेल में उड़ान भरने की क्षमता है। ठंडे मौसम में भी यह विमान तेजी से काम करने में समर्थ है। राफेल लड़ाकू विमान में ऑक्सीजन जनरेशन सिस्टम लगा है और लिक्विड ऑक्सीजन भरने की जरूरत नहीं पड़ती है। हवा में ही रिफ्यूलिंग की सुविधा के साथ राफेल में 60 घंटे अतिरिक्त उड़ान की गारंटी है। भारत और फ्रांस दोनों देशों के बीच हुए समझौते के तहत जहां फ्रांस ने भारतीय पायलटों को राफेल उड़ाने का प्रशिक्षण दिया वहीं अगले 50 वर्ष तक के लिए फ्रांस राफेल के विनिर्माण, तकनीक और अन्य सभी प्रकार का सहयोग देगा।

राफेल सौदे की पृष्ठभूमि
वायु सेना को अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कम से कम 42 लडा़कू स्क्वाड्रंस की जरूरत थी, लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता घटकर महज 34 स्क्वाड्रंस रह गई थी। नए संचार व तकनीक से लैस विश्व में भारतीय वायु सेना को पांचवीं पीढ़ी के अधुनातन अपडेटेड विमानों की आवश्यकता बहुत पहले से ही थी। वायुसेना की ओर से ऐसी मांग आने के बाद 126 लड़ाकू विमान खरीदने का सबसे पहले प्रस्ताव अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार ने रखा था। अटल जी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार का कार्यकाल पूरा होने के बाद यूपीए सरकार के रक्षामंत्री ए.के. अंटोनी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया। 

भारतीय वायुसेना ने कई विमानों के तकनीकी परीक्षण और मूल्यांकन किए और अमेरिका के बोइंग एफ/ए-18 ई/एफ सुपर हॉरनेट, फ्रांस का डसॉल्ट राफेल, ब्रिटेन का यूरोफाइटर, अमेरिका का लॉकहीड मार्टिन एफ-16 फाल्ककन, रूस का मिखोयान मिग-35 और स्वीडन के साब जैस 39 ग्रिपेन जैसे लड़ाकू विमानों के बीच 2011 में यह घोषणा की कि राफेल और यूरोफाइटर टाइफून उसके मानदंड पर खरे उतरे हैं। 2012 में राफेल को एल-1 बिडर घोषित किया गया और इसके मैन्युफैक्चर दसाल्ट एविएशन के साथ समझौते पर चर्चा चली लेकिन आरएफपी अनुपालन और लागत संबंधी कई पेंच होने की वजह से 2014 तक यह वार्ता अधूरी ही रही। यूपीए सरकार के दौरान इस पर समझौता नहीं हो पाया, क्योंकि विशेषकर तकनीकी हस्तांतरण के मामले में दोनों पक्षों में गतिरोध उत्पन्न हो गया था।

2014 में जब केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राजग सरकार सत्ता में आयी तो उसने भारतीय वायुसेना की शक्ति को गति देने के लिए लड़ाकू विमान खरीद की अटल जी की पहल को गति देने के लिए ठोस प्रयास शुरू किये। पीएम मोदी की फ्रांस यात्रा के दौरान 2015 में भारत और फ्रांस के मध्य राफेल विमान की खरीद को लेकर समझौता किया गया। इस समझौते के अंतर्गत भारत ने फ्रांस से यथाशीघ्र 36 तैयार राफेल विमान प्राप्त करने की बात कही। समझौते के अनुसार दोनों देश विमानों की आपूर्ति की शर्तों के लिए एक अंतर-सरकारी समझौता (आईजीए) करने को सहमत हुए। समझौते की शर्त यह थी कि फ़्रांस राफेल विमानों की आपूर्ति भारतीय वायु सेना की आवश्यकताओं के अनुरूप उसके द्वारा तय समय सीमा के भीतर करेगा और साथ ही विमान के साथ जुड़े सारे सिस्टम और हथियारों की आपूर्ति भी वायुसेना द्वारा तय मानकों के अनुरूप होगी। यह भी तय हुआ कि लंबे समय तक राफेल विमानों के रखरखाव की जिम्मेदारी फ्रांस की होगी। सुरक्षा मामलों की कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद दोनों देशों के बीच 2016 में आईजीए हुआ। सितंबर 2016 में भारत ने फ़्रांस के साथ 36 रफ़ाल विमानों के लिए करीब 59 हज़ार करोड़ रुपये के सौदे पर हस्ताक्षर किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर, 2016 में कहा था, '' रक्षा सहयोग के संदर्भ में 36 रफ़ाल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर ये खुशी की बात है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ वित्तीय पहलुओं को छोड़कर समझौता हुआ है।

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राफेल लड़ाकू विमानों के आ जाने से भारत के सैन्यशक्ति वैश्विक स्तर पर निश्चित रूप से और मजबूत हो गयी है। यह न केवल भारत के नादान और उत्पाती पड़ोसियों के लिए प्रभावी नकेल सिद्ध होगा बल्कि एशिया के साथ ही विश्वस्तर पर भारत की शक्ति के विस्तार व शान्ति प्रयासों में सहायक सिद्ध होगा।


 समझौते पर दस्तखत होने के करीब 18 महीने के भीतर विमानों की आपूर्ति शुरू करने की बात थी, यानी 18 महीने के बाद भारत में फ्रांस की तरफ से पहला राफेल लड़ाकू विमान दिया जाएगा। राफेल सौदे पर हस्ताक्षर करने वाले तत्कालीन रक्षामंत्री दिवंगत मनोहर पर्रिकर ने गोवा में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में राफेल के विषय में कहा था, ''इसका टारगेट अचूक होगा। रफ़ाल ऊपर-नीचे, अगल-बगल यानी हर तरफ़ निगरानी रखने में सक्षम है। मतलब इसकी विजिबिलिटी 360 डिग्री होगी। पायलट को बस विरोधी को देखना है और बटन दबा देना है और बाक़ी काम कंप्यूटर कर लेगा। इसमें पायलट के लिए एक हेलमेट भी होगा।''

रफाल सौदे में कांग्रेस ने राजनीति करते हुए यूपीए के समय में तय कीमत से ज्यादा मूल्य चुकाने का केंद्र सरकार पर आरोप लगाया। संसद से सड़क तक और शीर्ष अदालत तक भी अनावश्यक रूप से राफेल मामला पहुँचाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने 59 हजार करोड़ रुपये में 36 लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले में अदालत की निगरानी में जांच की मांग करने वाली जनहित याचिकाओं को दिसंबर, 2018 में खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर, 2018 को सौदे की जांच की याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि राफेल की खरीद में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर संदेह करने की कोई गुंजाइश नहीं है। अदालत ने अपने फैसले पर पुनर्विचार की याचिकाओं को खारिज करते हुए सौदे को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद पर विराम लगा दिया था। अपनी आदत के अनुरूप कांग्रेस फिर भी नहीं मानी और 2019 के लोकसभा चुनाव में, राफेल सौदे में धांधली के आरोप लगाते हुए उसने इसे चुनावी मुद्दा बनाया, जिसका जवाब फिर कांग्रेस को देश की जनता ने भी बखूबी दिया।
 
तत्कालीन रक्षामंत्री अरुण जेटली ने संसद में कांग्रेस के प्रदर्शनों के बीच कहा था कि वास्तव में मोदी सरकार ने जो सौदा किया है, वह संप्रग के समय किये गये करार से 20 फीसद सस्ता है। कैग की एक रिपोर्ट में भी व्यापक तौर पर सरकार के रुख का समर्थन करते हुए कहा गया था कि संप्रग सरकार के समय विमान की जिस कीमत पर चर्चा हुई थी, राजग ने उससे 2.86 प्रतिशत सस्ती दर पर सौदा किया है। एनडीए सरकार ने दावा किया कि यह सौदा उसने यूपीए से ज्यादा बेहतर कीमत में किया है और करीब 12,600 करोड़ रुपये बचाए हैं। समझौते में 'मेक इन इंडिया'की शर्त को शामिल किया गया है ,जिसमें स्पष्ट है कि फ्रांसीसी कंपनी भारत में मेक इन इंडिया को बढ़ावा देगी।

अक्तूबर, 2019 में डसॉल्ट एविएशन ने पहले राफेल जेट को रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में भारतीय वायुसेना के सुपुर्द किया था। डसॉल्ट की ओर से भारतीय वायुसेना पायलट और सभी सपोर्टिंग स्टॉफ को एयरक्रॉफ्ट और वैपन सिस्टम की पूरी ट्रेनिंग दी गयी। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने दशहरे के मौके पर फ्रांस में राफेल की शस्त्र पूजा की। विमान पर रोली से ॐ अंकित किया, कलावा बांधा...अक्षत छिड़के...नारियल रखा..और राफेल के पहियों के नीचे नींबू भी रखे थे जो किसी नयी चीज के लिए हमारी परंपरा में एक आदर्श रस्म है। कुल मिलाकर इसमें सभी भारतीयों की यह भावना निहित थी कि भारत के इस शक्तिशाली लड़ाकू विमान राफेल पर किसी की बुरी नजर न लगे।
 
राफेल लड़ाकू विमानों के आ जाने से भारत के सैन्यशक्ति वैश्विक स्तर पर निश्चित रूप से और मजबूत हो गयी है। यह न केवल भारत के नादान और उत्पाती पड़ोसियों के लिए प्रभावी नकेल सिद्ध होगा बल्कि एशिया के साथ ही विश्वस्तर पर भारत की शक्ति के विस्तार व शान्ति प्रयासों में सहायक सिद्ध होगा।