श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण पूर्णाहुति नहीं बल्कि स्थापना बिंदु है

    दिनांक 31-जुलाई-2020
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डॉ. चंद्रप्रकाश सिंह
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से बड़ा भारत का कोई सांस्कृतिक प्रतिमान नहीं हो सकता। श्रीराम के जन्मभूमि को तोड़ा जाना भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आक्रमण था। हिन्दू समाज ने भारत के इस मानबिंदु के लिए सतत संघर्ष किया। एक क्षण के लिए वह न श्रीराम को भूल सका न श्रीराम के जन्म स्थान को।

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बारहवीं शताब्दी से लेकर बीसवीं शताब्दी तक भारत में सतत विदेशी आक्रान्ताओं के आक्रमण होते रहे। कुछ आक्रमण कर लूट-पाट और हिंसा के बाद लौट जाते थे और अनेकों ने राज्य भी किया। यह आक्रमण न केवल युद्ध के मैदान में हुए, अपितु धार्मिक, मानसिक बौद्धिक एवं आर्थिक सभी क्षेत्रों पर हुए। मुस्लिम आक्रमणकारी न केवल धन लूटने के लिए भारत आए बल्कि अपने मजहबी आस्था को आरोपित करने के लिए हिन्दू समाज का अपमान और सांस्कृतिक स्वाभिमान का मानमर्दन करने का निरंतर प्रयास करते रहे और इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय आस्था एवं श्रद्धा के स्थानों को ध्वस्त किया। सोमनाथ, श्रीराम जन्म स्थान—अयोध्या, श्रीकृष्ण जन्म स्थान, बाबा विश्वनाथ का मंदिर या छोटे-छोटे ग्रामों में स्थित हजारों मंदिर इसीलिए ध्वस्त किये गए, जिससे हिन्दू मानस में भय उत्पन्न हो और युगों-युगों से स्थापित आस्था और श्रद्धा को नष्ट कर अपने विश्वास को थोपा जा सके। मुस्लिम आक्रमणकारियों के बाद अंग्रेजों ने भी हमारी आस्था-श्रद्धा एवं परम्पराओं को खंडित करने का प्रयास किया। उन्होंने भी आर्थिक आक्रमण के साथ-साथ हमारे मानस पर विजय प्राप्त करने के लिए शिक्षा, संस्कृति सभी क्षेत्रों में बहुत चालाकी से आक्रमण किया, बल्कि उनके आक्रमण का स्वरूप ऐसा रहा कि कोल्हू के बैल की तरह आज तक हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था उन्हीं के चारों ओर घूम रही है।

 
गजनी, गोरी, बाबर, औरंगजेब, नादिर शाह, अब्दाली जैसे आक्रमणकारियों की बर्बरता के  नग्नतांडव और मिशनरी षड्यंत्र के बाद भी असीम प्रताड़ना की पराकाष्ठा को सहन करते हुए हिन्दू समाज अपने अस्तित्व को बचाए रखा। स्वतंत्रता के समय वर्तमान भारत में चौरासी प्रतिशत हिन्दू थे। वास्तव में, यह हमारी बहुत बड़ी विजय थी, जिसे हमने अपने अनवरत संघर्षों के माध्यम से प्राप्त किया, लेकिन इस संघर्ष में हमने बहुत कुछ खोया भी। भारत का हिन्दू समाज थोपे हुए विश्वास नहीं, बल्कि युग-युगांतर से चली आ रही अपनी परंपरागत अनुभूति और जीवन पद्धति के आधार पर खड़ा था, इसलिए उसे नष्ट कर पाना तो संभव नहीं हो सका, लेकिन इतने दीर्घकालिक आक्रमण का हमारे सम्पूर्ण जीवन पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। आक्रमणकारियों  से निरंतर संघर्ष की अवस्था में समाज अपनी परम्पराओं को सहज गति से आगे नहीं बढ़ा सका। आपदाकाल में अस्तित्व को बचाने के लिए रहन-सहन और समाज व्यवस्था में जो परिवर्तन हुए उसे हमारे समाज का स्वाभाव मान लिया गया। हमारी शिक्षा, संस्कार, समाज व्यवस्था में बहुत सी चीजें ऐसी हैं, जिन्हें हमने अपने बचाव के लिए अपनाया या विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा हम पर थोपी गई। वास्तव में, एक स्वतंत्र समाज का यह अर्थ होता है कि वह स्वतंत्र होते ही देश, काल एवं परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को पुनर्नियोजित कर अपने पूर्व सांस्कृतिक गति के साथ लयबद्ध हो जाये। यदि ऐसा नहीं होता तो स्वतंत्रता का कोई अर्थ नहीं है।

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15 अगस्त, 1947 को भारत का सत्ता परिवर्तन तो हो गया, लेकिन हम अपने स्वाभिमान और संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा आज तक नहीं कर सके। हमारी शिक्षा-दीक्षा, राज्य, न्याय एवं शासन व्यवस्था सब कुछ परकीयों की भौडी नक़ल है। हम परकीय शासन से मुक्त तो हैं लेकिन जिस तंत्र को हम अपना कहते हैं वास्तव में वह तंत्र हमारा नहीं है और न हम वास्तविक अर्थों में  अभी स्वतंत्र हुए हैं। हमें स्वतंत्रता के लिए अभी और संघर्ष करना होगा।
 
श्रद्धेय अशोक सिंहल जी सदैव कहा करते थे कि 15 अगस्त 1947 को महर्षि अरविन्द ने कहा था, “ हमें अभी राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। सांस्कृतिक स्वतंत्रता के लिए एक और आन्दोलन करना पड़ेगा। इस स्वतंत्रता आन्दोलन का मन्त्र ‘वंदे मातरम्’  था उस स्वतंत्रता आन्दोलन का मन्त्र क्या होगा यह अभी हमें स्पष्ट प्रतिध्वनित नहीं हो रहा है।” अशोक जी कहा करते थे श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन ही वह आन्दोलन है और ‘जय श्रीराम’ का मन्त्र ही वह मन्त्र है।
 
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वास्तव में, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम से बड़ा भारत का कोई सांस्कृतिक प्रतिमान नहीं हो सकता। श्रीराम के जन्मभूमि को तोड़ा जाना भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आक्रमण था। हिन्दू समाज ने भारत के इस मानबिंदु के लिए सतत संघर्ष किया। एक क्षण के लिए वह न श्रीराम को भूल सका न श्रीराम के जन्म स्थान को। सत्ता के हस्तानान्तरण के बाद स्वाभाविक रूप से उन स्थानों की पुनर्प्रतिष्ठा की जानी चाहिए थी, जिन्हें विदेशी आक्रान्ताओं ने तोड़ा था, लेकिन जब नेतृत्व का मानस ही विदेशी हो चुका हो तब भला यह कैसे संभव था। उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ स्वदेशी आचार-विचार, व्यवहार और ज्ञान-विज्ञान का तिरस्कार और विदेशी को स्वीकार करना था। इसलिए भारत स्वतंत्र होते हुए भी वैचारिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सका।

भारत का समाज ठीक प्रकार से न अपने महापुरुषों को जान सका और न ही संस्कृति और परंपरा को। श्रीराम और श्रीकृष्ण के साथ ही रामायण और महाभारत को काल्पनिक बताया जाने लगा। जो ग्रन्थ युगों-युगों से हमारे समाज का दिशाबोध कराते रहे वे मिथक घोषित कर दिए गए। सत्तर और अस्सी का दशक आते-आते तो भारत का पढ़ा लिखा समाज विदेशी के सम्मोहन और स्वदेशी के प्रति हीन भावना के कारण घोर आत्मविस्मृति का शिकार हो चुका था। ठीक इसी समय श्रीराम जन्मभूमि आन्दोलन प्रारंभ हुआ। गांव-गांव और नगर-नगर में न केवल श्रीराम के जीवन की चर्चा की धूम आ गयी अपितु शताब्दियों तक हिन्दू समाज पर हुए बर्बर आक्रमणों से भी समाज अवगत होने लगा। श्रीराम का अद्भुत व्यक्तित्व और प्राचीन संस्कृति की गौरवमयी गाथा ने उनकी तन्द्रा को तोड़ा। विश्व हिन्दू परिषद् और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक संरचना और नगर-नगर से लेकर गांव-गांव तक फैलकर विभिन्न मत—पंथ के संतों के प्रबोधन और मार्गदर्शन ने सम्पूर्ण समाज को झकझोर कर रख दिया।
 

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श्रद्धेय अशोक सिंहल जी विभिन्न मत-पंथों को एक-एक आध्यात्मिक साम्राज्य कहा करते थे। इन आध्यात्मिक साम्राज्यों के एक साथ आ जाने मात्र से हिन्दू समाज सोये हुए सिंह की तरह जागृत हो गया। श्रीराम जन्मभूमि का आन्दोलन दुनिया के इतिहास में किसी राष्ट्र के राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए किया गया अद्वितीय अहिंसक आन्दोलन है।
 
श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण इसकी पूर्णाहुति नहीं बल्कि स्थापना बिंदु है। यह आन्दोलन वास्तविक अर्थों में अभी आगे चलना है। अभी हमारे काशी विश्वनाथ एवं श्रीकृष्ण जन्मभूमि जैसे स्थानों की पुनर्प्रतिष्ठा होनी बाकी है। अभी सम्पूर्ण व्यवस्था का भारतीयकरण बाकी है। अभी जन-जन के मन में बसे हुए श्रीराम को जन-जन के जीवन में उतारना बाकी है। अभी भारत को श्रीराम के आदर्शों पर शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक नव-कलेवर प्रदान करना बाकी है। अभी भारत को उसकी स्वयं की रीति-नीति, परम्परा और प्रकृति का बोध कराना बाकी है।

यह राष्ट्रीय चेतना का पड़ाव है न की मंजिल। 1947 में लोगों ने पड़ाव को ही मंजिल समझ लिया, जिसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, लेकिन अब लक्ष्य तक पहुंचने के पूर्व रुकना नहीं है। श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा का मानबिंदु है, लेकिन इसके अन्य आयाम अभी शेष हैं। उन्हें पूर्ण किये बिना आन्दोलन की पूर्णाहुति नहीं हो सकती। वैसे यह श्रीराम के पद चिन्हों पर चलने वाला एक सतत आन्दोलन है।
चरैवेति-चरैवेति
  
(लेखक अंरुधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ, प्रयाग के निदेशक एवं श्री अशोक सिंहल जी के निजी सचिव रहे हैं)