‘‘चीन की कथनी-करनी में अंतर है’’

    दिनांक 07-जुलाई-2020
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वेबिनार में सेवानिवृत्त लेफ्टिनेट जनरल संजय कुलकर्णी से अनेक सवाल पूछे गए। प्रस्तुत हैं मुख्य प्रश्न और उनके उत्तर-
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  •  इस समय भारत के पास एस-400 मिसाइल सिस्टम नहीं है और चीन के पास है। यदि कुछ होता है तो इससे हमारी सुरक्षा पर कोई असर पड़ सकता है क्या?

    एस-400 की जो क्षमता है, उसे देखते हुए कह सकते हैं कि उसकी कमी हमें खलेगी, लेकिन कोई बड़ी चिंता की बात नहीं है। हमारे पास बहुत-सी ऐसी मिसाइलें हैं, जो चीन को चुनौती अच्छी तरह दे सकती हैं।


  •  ऐसी खबरें आ रही हैं कि चीन ने फिंगर-8 से आगे भारत की तरफ फिंगर-4 तक सड़क बना ली है। क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि चीन ने फिंगर-4 पर  कब्जा कर लिया है?
    चीन मानता रहा है कि एलएसी फिंगर-4 (भारत के हिस्से में है) से होकर गुजरती है और भारत कहता है कि एलएसी फिंगर-8 (चीन के हिस्से में है) से होकर जाती है। इसलिए हम लोग पेंगोंग झील के किनारे-किनारे फिंगर-8 तक और चीनी फिंगर-4 तक ‘पेट्रोलिंग’ करते रहे हैं। पेंगोंग झील की लंबाई 135 किलोमीटर है। इसके 90 किलोमीटर पर चीन का कब्जा है और 45 किलोमीटर पर भारत का कब्जा है। इस झील पर दोनों देश के सैनिक नाव के जरिए भी ‘पेट्रोलिंग’ करते हैं। जब भी चीनी नाव फिंगर-4 के पास आती है तो हमारे सैनिक चेताते हैं कि वापस जाओ, हमारे इलाके में आ चुके हो। इस तरह का तालमेल बरसों से चल रहा था, पर अब चीन कुछ हरकतें करने लगा है, जो ठीक नहीं है।


  •     अभी चीन और भारत के बीच जो तनाव है, वह कैसे कम हो सकता है?
    बरसों की मेहनत के बाद भारत और चीन के बीच संबंध बने थे और अच्छे संबंध हो गए थे। एलएसी पर दोनों देशों के सैनिक बहुत ही सामान्य स्थिति में मिलते थे, लेकिन 2016 के बाद संबंध बिगड़ने शुरू हुए। कई दशक बाद अग्रिम चौकियों पर चीन के लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर मंडराते देखे गए। डोकलाम के बाद यह तनाव और बढ़ गया। अभी तो दोनों के रिश्ते बहुत ही खराब हैं। निकट भविष्य में भी संबंध ठीक होने के लक्षण दिख नहीं रहे हैं।   



क्या है रेशम का फंदा!

 2013 से चीन ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के अंतर्गत पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारा (सीपैक) बना रहा है। यह प्राचीन रेशम मार्ग पर बन रहा है और यह पाकिस्तान अधिक्रांत कश्मीर से होकर गुजरता है। इसलिए भारत इस परियोजना का विरोध कर रहा है। भारत इसे अपनी संप्रभुता का हनन और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन बताता रहा है। इसके माध्यम से सड़कों, रेल, बंदरगाह, पाइपलाइनों और अन्य बुनियादी सुविधाओं को जमीन और समुद्र होते हुए एशिया, यूरोप और अफ्रीका से जोड़ने का विचार है।

असल में चीन इसके माध्यम से एशिया के साथ-साथ विश्व पर भी अपना अधिकार कायम करना चाहता है। इसके साथ ही वह दक्षिण एशिया एवं हिंद महासागर में भारत के प्रभुत्व को कम करना चाहता है। यही नहीं, इस परियोजना के द्वारा चीन सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते करके उन्हें आर्थिक सहायता एवं ऋण उपलब्ध कराकर उन पर मनमानी शर्तें थोपना चाहता है, ताकि उन देशों के बाजारों पर चीन का प्रभुत्व बना रहे। इसलिए इसे रेशम का फंदा कहा जा रहा है।


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लद्दाख के पास तैनात भारतीय सेना।

  •  चीन की मंशा तो 1960 से ही खराब है। फिर भी हम उसके प्रति सजग क्यों नहीं हो पाते हैं?
 चीन जो कहता है, वह करता नहीं है और जो नहीं कहता है, उसे हमें समझना पड़ेगा। उसकी कथनी और करनी में बहुत फर्क है। इसे एक उदाहरण से समझिए। एक बार अमेरिका के राष्टपति बराक ओबामा चीन आए। उनके स्वागत में जगह-जगह बैनर लगाए गए थे, उनमें लिखा था- ‘वेलकम वुबामा।’ अमेरिका ने कहा कि उनका नाम ‘वुबामा’ नहीं, ‘ओबामा’ है। लेकिन चीन ने ‘वुबामा’ ही लिखा। इसके पीछे की मंशा बहुत ही घातक है। ‘वुबामा’ का मतलब है ‘काले लोगों का नेतृत्व करने वाला’। यानी चीन ने राष्टपति ओबामा का स्वागत नहीं किया, एक काले नेता का स्वागत किया। इसी तरह नेहरू जी जब चीन गए तो उनके स्वागत में लिखा गया-‘वेलकम नीलू’। और जब राजीव गांधी चीन गए तो लिखा गया- ‘वेलकम दी ग्रैंड सन आॅफ नेहरू’। यानी चीन ने भारत के प्रधानमंत्री का भी स्वागत नहीं किया, उसने नेहरू परिवार के एक सदस्य के नाते राजीव गांधी का स्वागत किया। इसलिए चीन की चाल और हरकत को समझने की जरूरत है।

  •  कुछ दिन पहले अमेरिका ने हिंद प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर की सुरक्षा के लिए कुछ नीतियों की घोषणा की है। इससे चीन को किस तरह की परेशानी आने वाली है?

निश्चित रूप से यह चीन के लिए परेशानी का कारण है। दक्षिण चीन सागर में अमेरिका के 3,65,000 सैनिक सबसे आधुनिक हथियारों के साथ तैनात हैं। दूसरी ओर पूर्वी चीन सागर में जापान भी चीन को चुनौती दे रहा है। ताईवान भी चीन से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार बैठा है। इसलिए चीन जबर्दस्त दबाव में है। यह भारत के लिए अच्छा अवसर है। भारत पूरी दृढ़ता से अपनी बात रखे। भारत से केवल एक बार चीन को झटका लग जाए तो वह समझ जाएगा कि भारत किस मिट्टी का बना है।

  • गलवान में जो हो रहा है, उसके बारे में सेना और सरकार के अलावा किसी को भी नहीं पता होता है, फिर भी मीडिया में वहां की खबरें आ रही हैं? इस पर आपकी क्या राय है?

मैं बरसों तक फौज में रहा हूं। इसके बावजूद मुझे भी ऐसी खबरें नहीं पता चलती हैं, लेकिन देख रहा हं कि लेह में बैठकर पत्रकार गलवान घाटी की खबरें भेज रहे हैं। यह देश की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। ऐसे मामले में मीडिया को संयम बरतना चाहिए।