किसके इशारे पर नाच रहा सेकुलर मीडिया

    दिनांक 07-जुलाई-2020
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चीनी झुकाव वाले मीडिया की भारत-भूटान संबंधों में दरार की शरारती कोशिश

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दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, मुख्यधारा मीडिया का सांप्रदायिक चरित्र भी हर दिन सामने आ रहा है। एनडीटीवी की तो विशेषज्ञता ही दंगाइयों के पक्ष में रिपोर्टिंग की रही है। उसका सदुपयोग वह दिल्ली के दंगाइयों को बचाने के लिए भी कर रहा है। चैनल ने दिल्ली पुलिस के आरोप पत्र में एक  मुस्लिम डॉक्टर का नाम होने पर एक रिपोर्ट दिखाई। इसमें उस डॉक्टर को मसीहा की तरह पेश किया, जबकि पुलिस ने पूरे तथ्यों के आधार पर बताया है कि दिलबर नेगी हत्याकांड में दंगाइयों को भड़काने में वह डॉक्टर भी शामिल था। चैनल पर जो रिपोर्ट दिखाई गई उसमें एकतरफा तरीके से मुस्लिम घायलों को दिखाया गया। जिस 22 साल के दिलबर नेगी की हत्या का यह मामला है उसकी तस्वीर तक नहीं दिखाई। डॉक्टर दोषी है या नहीं, यह तय न्यायालय को करना है, लेकिन एनडीटीवी ने न्यायिक प्रक्रिया पर दबाव डालने का खेल शुरू कर दिया।

दंगों में दिल्ली पुलिस ने कई ऐसे लोगों को भी आरोपी बनाया है, जिनके मकान और दुकान जलाए गए हैं। इनमें से अधिकांश वह लोग हैं जो घनी मुस्लिम आबादी के बीच में रहते हैं और उन पर घर-बार छोड़कर चले जाने का दबाव है। ऐसे कई लोग हमले के दौरान आत्मरक्षा करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें भी आरोपी बना दिया। चूंकि वे हिंदू हैं इसलिए उनके परिवारों के दुख-दर्द में सेकुलर मीडिया को कोई रुचि नहीं है। दूसरी तरफ टाइम्स आॅफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस और इंडिया टुडे जैसे मीडिया समूह लगातार ऐसे झूठ फैला रहे हैं जिनसे यह माहौल बनाया जा सके कि दिल्ली पुलिस की जांच वास्तव में मुसलमानों के विरुद्ध है। यही कारण है कि दंगाइयों की फंडिंग सऊदी अरब से होने की रिपोर्ट भी दबा दी गई। शायद इसी फंडिंग का असर है कि इंडियन एक्सप्रेस ने कांस्टेबल रतनलाल के मामले में चार्जशीट की बातों को ही तोड़मरोड़कर छापा।

अपने इस स्तंभ में हम अक्सर बताते रहते हैं कि किस तरह समाचार एजेंसी पीटीआई पिछले कुछ समय से फेक न्यूज का एक बड़ा स्त्रोत बनकर उभरी है। समाचार एजेंसियों से उम्मीद की जाती है कि वे पूरी जांच-परख के बाद ही कोई समाचार जारी करेंगी। लेकिन पीटीआई ने इन सारी मर्यादाओं को ताक पर रख दिया। हाल ही में उसने भारत में चीन के राजदूत से साक्षात्कार किया। ये बिल्कुल ऐसा था जैसे ग्लोबल टाइम्स के लिए हो। यह स्थिति तब है जब पीटीआई की सबसे बड़ी ग्राहक प्रसार भारती है। क्या मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर भारत सरकार की सहायता से चलने वाली समाचार एजेंसी को दुश्मन देश के प्रोपेगेंडा का औजार बनने दिया जा सकता है? अब जाकर प्रसार भारती ने एजेंसी से संबंधों की समीक्षा शुरू की है। पत्रकारों की संस्था इंडियन फेडरेशन आॅफ वर्किंग जर्नलिस्ट (आईएफडब्लूजे) ने भी माना है कि पीटीआई की निष्पक्षता संदिग्ध है।

जहां तक मीडिया पर 'विदेशी प्रभाव' की बात है यह मात्र पीटीआई तक सीमित नहीं है। हर मीडिया समूह में अच्छी-खासी संख्या में ऐसे लोग भरे पड़े हैं, जिनकी निष्ठाएं संदिग्ध हैं। यही कारण है कि अक्सर चैनलों और अखबारों में भारत के नक्शों में कश्मीर गायब होता है। सीएनएन-न्यूज18 चैनल ने तो पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को 'आजाद कश्मीर' करार दिया। नवभारत टाइम्स और प्रभात खबर समेत कुछ समाचार पोर्टलों ने एक अफवाह उड़ाई कि भूटान ने भारत जाने वाला पानी रोक दिया है। इस समाचार में कोई तथ्य नहीं था, फिर भी अगर इसे छापा गया तो इसके पीछे की मंशा समझी जा सकती है। भूटान सरकार को वक्तव्य जारी करके भारतीय मीडिया में चल रहे इन समाचारों का खंडन करना पड़ा कि हमने पानी नहीं रोका है और हम भारत को अपना मित्र मानते हैं।

कोरोना वायरस को लेकर स्वामी रामदेव के पतंजलि आयुर्वेद की दवा पर भी मुख्यधारा मीडिया ने मर्यादाएं तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह बात स्पष्ट अनुभव की जा सकती है कि मीडिया किसी ताकतवर 'फार्मा लॉबी' के दबाव में है। उसमें स्वामी रामदेव और आयुर्वेद को लेकर एक पूर्वाग्रह है। वास्तव में देखें तो इस मामले में कोई विवाद था ही नहीं। नियामक कानूनों के तहत जो औपचारिकताएं होती हैं वही हुईं। लेकिन हौव्वा ऐसा बनाया गया कि लोगों के मन में पतंजलि की दवा को लेकर अविश्वास पैदा हो जाए। अच्छी बात है कि मीडिया का यह चरित्र अब आम लोग भी पहचानने लगे हैं।