गेशे जम्पा

    दिनांक 07-जुलाई-2020
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नीरजा माधव

तिब्बती शरणार्थियों की एक बड़ी संख्या हमारे भारत देश में है। चीन की विस्तारवादी नीति के परिणामस्वरूप एक अहिंसक धार्मिक देश तिब्बत पराधीन हो गया। 1959 में इसका चरमोत्कर्ष देखने को मिला जब तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष परम पावन दलाई लामा को अपने लाखों अनुयायियों के साथ अपना देश छोड़ भारत में शरण लेनी पड़ी। अपने देश को आजाद कराने की उम्मीद लिए अपनी निर्वासित सरकार को भारत के हिमाचल प्रदेश में पीठासीन किया। तब से लेकर आज तक जब भी तिब्बत में आजादी की आग भड़की, उसकी आंच भारत और चीन के सम्बन्धों ने भी महसूस की, क्योंकि भारत में रह रहा तिब्बती समुदाय तिब्बत में रह रहे चीनी सत्ता से संघर्षरत तिब्बतियों की सबसे बड़ी ताकत बने रहे। 19वीं सदी के अन्त तक तिब्बत स्वतंत्र था। तिब्बत के प्रति सहानुभूति रखते हुए भी भारत ने चीन की नीतियों पर सरकारी तौर पर कभी कोई आपत्ति नहीं की। लगभग यही नीति विश्व के तमाम देशों की रही। अब परिणाम यह हुआ कि तिब्बत पर अधिकार जमाने के बाद चीन भारत की सीमा में भी घुसपैठ करने लगा। तिब्बत के राजनीतिक, सांस्कृतिक और मानवीय अधिकारों के प्रश्न पर छाई वैश्विक चुप्पी को तोड़ने और उन्हें स्वाधीनता दिलाने की जद्दोजहद करता है सुप्रसिद्ध लेखिका नीरजा माधव द्वारा लिखा भारत में हिन्दी साहित्य का पहला उपन्यास-गेशे जम्पा। प्रस्तुत है इस उपन्यास की दूसरी कड़ी

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मां....ताशी नींद में ही हाथ उठाकर कुछ पकड़ना चाह रहा था। कुछ क्षण पहले स्वप्न की हंसी अब रुलाई में परिवर्तित हो गई थी। वह सुबक रहा था स्वप्न में। गेशे जम्पा ने धीरे-से हवा में उठा उसका हाथ अपने हाथ में थाम लिया था। ताशी आश्वस्त हो गया।

मां मानव-जीवन की कैसी नेमत होती है जो नींद से लेकर जागृति तक, गर्भ से लेकर वृद्धावस्था के बाद मृत्यु के द्वार तक साथ नहीं छोड़ती। स्मृति हो या स्वप्न, पीड़ा हो या आनंद, सभी क्षणों में मां साथ खड़ी हो जाती है, संदेह या विदेह। इस समय भी ताशी की मां उसके स्वप्न में थी और गेशे जम्पा की मां उनकी स्मृति में। हृदय तड़प उठा मां को याद कर। कैसी होगी मां? किस हाल में होगी? कितने वर्षों से कोई समाचार भी तो न मिला मां का। एकाएक वर्षों की जमी बर्फ पिघलने लगी थी और ममता की धुंधलाई तस्वीर स्पष्ट हो उठी।

मां का चेहरा आंसुओं से तर था-रात भर उन्हें सीने से चिपकाए रोती रही थीं। मां के सीने से वे इस तरह चिपके थे मानो कोई दैत्य उन्हें पकड़ने आ रहा हो। मां की हिचकियां बढ़ती गईं तो वे भी फफककर रो पड़े थे। मां-बेटे का करुण क्रंदन सुनकर पिताजी भी उठकर बैठ गए थे। उन्होंने अपना चुक-टू हटाकर एक ओर कर दिया और धीरे-से अपना हाथ मां की बांह पर रख दिया। मां की सिसकियां हृदय विदीर्ण करने वाले अस्फुट स्वर में बदल गई थीं-मैं नहीं जिंदा रह पाऊंगी अपने जम्पा के बिना। मत भेजिए आप उसे भारत।

क्या मैं जी पाऊंगा उसके बिना। शौक तो नहीं है न मुझे। विवशता तो तुम भी समझ रही हो न? वे भी सिसक पड़े थे।
नहीं, मैं नहीं भेजूंगी। कैसे जी पाऊंगी उसके बिना? हे भगवान, क्या करूं? मां ने दोनों हाथ निढाल-से अपने तकिये पर गिरा लिए थे। उनकी विह्वलता चरम पर थी।

देखो, जम्पा के जीवन की रक्षा के लिए ही तो हम वहां भेज रहे हैं। केवल वही तो नहीं जा रहा है? उसके साथ ल्ह-छोंड् और छु-शो-ग्य-पोन गांव के बच्चे भी तो जा रहे हैं। पिताजी मां को समझा रहे थे। पर उनकी भी आवाज भीगी थी।

अरे, मैं कैसे मन को समझाऊं जम्पा के पिताजी। नन्हा-सा मेरा बच्चा कैसे चढ़ेगा शो-ला और खारू-ला की चढ़ाई? कैसे पार करेगा युम्-डोग्-छो? आह नियति..। मां उठकर बैठ गई थीं और अपनी छाती पीट रही थीं। जम्पा भी उठकर बैठ गए थे। मां को रोता देख वह भी जोर-जोर से रोने लगे थे। पिताजी ने उन दोनों को अपने सीने से चिपका लिया और स्वयं भी सुबकने लगे थे। मस्तिष्क ने सोचने से मना कर दिया था और तीनों हिचक-हिचककर रो रहे थे। नन्हे जम्पा को कई दिन पूर्व से ही आभास हो गया था कि मां और पिताजी उन्हें कहीं भेजने की तैयारी में हैं।

मां जरा-सी धूप होते ही उनके नए पुराने स्वेटर और छु-पा को घर से बाहर उपत्यका में बिखरे छोटे-छोटे पत्थरों पर सुखने के लिए डाल आतीं। कभी-कभी उन कपड़ों को उठाकर नाक के पास ले जाकर सूंघतीं और फिर उलट-पुलटकर फैला देतीं। इस क्रिया में हरदम ही उनकी आंखें डबडबाई-सी रहतीं। नन्हे जम्पा को संदूक में रखे कपड़ों की महक से छींके आने लगती हैं। नाक से पानी गिरते-गिरते लाल सुर्ख हो जाता है पूरा चेहरा। इसीलिए जम्पा के चुक-टू और छुपे को मां नियमित रूप से धूप दिखाती थीं। किसी वैद्यजी ने बताया था। गरम चाय में नमक और सुगंधित घी डालकर उसके लिए हमेशा थर्मस में भरकर रखतीं ताकि रोग बढ़ने न पाए।

मां, आज मेरे सब कपड़े क्यों निकाल रही हो? नन्हे जम्पा की उत्सुकता रुक नहीं पाई थी। ऊं..आं..। और मां मूक-सी बस उनके चेहरे की ओर एकटक देखती रह गई थीं।
क्या हुआ मां? तुम कुछ बोलतीं क्यों नहीं? उनकी जिद से मां का मौन मुखर हुआ था आंसुओं में।

तुम क्यों रो रही हो मां? कोन्-चोग् भैया की याद आ रही है?
मां ने अस्वीकार में सिर हिलाया था। आंसुओं के कारण गले से आवाज नहीं निकल रही थी।

फिर क्यों रो रही हो? चिनये दीदी याद आ रही है या मग्-पा? नन्हे जम्पा आकुल हो पूछ रहे थे पर मां की सिसकियों के कारण उन्हें कोई उत्तर नहीं मिल पा रहा था। अक्सर उन्होंने मां को कोन्-चोग् भैया और चिनये दीदी के लिए तड़पते-बिलखते देखा था। एकांत के क्षणों में मां बैठकर उन लोगों के पुराने कपड़े अपनी गोद में रख लेतीं और उन्हें सूंघ-सूंघकर रोती रहतीं।

यह मात्र दो-तीन वर्ष पूर्व की बात थी। उस समय जम्पा लगभग सात वर्ष के थे। उन्हें कोन्-चोग् भैया और चिनये दीदी अच्छी तरह याद थे। मग्-पा तो अक्सर घर से बाहर ही रहते थे। मग्-पा का वास्तविक नाम छेरिंग था पर मां और पिताजी उन्हें मग्-पा ही कहकर संबोधित करते थे, इसलिए उनसे सुन-सुनकर नन्हे जम्पा भी उन्हें मग्-पा ही कहते थे। लंबे, छरहरे, अति सुंदर मग्-पा नन्हे जम्पा को बहुत प्यार करते थे। दाहिने कान के पास त्वचा के रंग का ही एक बड़ा-सा मस्सा बातें करते समय अलग से हिलता रहता। पहले जम्पा उसे देखकर दूर हट जाते थे, पर धीरे-धीरे मग्-पा के चेहरे के साथ उसका सामंजस्य बैठा लिया था उन्होंने। मग्-पा की यह विशिष्टता आज तक याद थी उन्हें। कहानी सुनाते समय उनकी स्निग्ध हंसी और मोतियों-से सफेद दांत जम्पा को बहुत अच्छे लगते। अक्सर वे पूछ बैठते-मग्-पा, आपके दांत किसने बनाए?

मेरी मां ने। और मग्-पा उदास हो उठते। माता-पिता की चर्चा होते ही अक्सर मग्-पा को उदास होते जम्पा ने देखा था। उनके बाहर रहने पर मां अक्सर जम्पा और कोन्-चोग् भैया को बताती थीं—

मग्-पा के पिताजी एक छीछ्या (चरागाह) का निर्माण करवा रहे थे, पर उसके निर्माण में बहुत बाधाएं आ रही थीं। तब उन्होंने चमदो के देवता के सम्मुख दो प्रतिज्ञाएं कीं-एक, वे चमदो विहार में बुद्ध की प्रतिमा को सुनहरे रंग से पुतवा देंगे और दूसरी, विहार के पास की अधिष्ठात्री देवी के प्रांगण में सभी लामाओं को भोजनदान देंगे। उस समय तक छेरिंग का विवाह चिनये के साथ हो चुका था। निर्माण पूरा हो जाने पर जिस दिन विहार में लामाओं को भोजन देने का प्रबंध किया जा रहा था, उसी समय चमदो पर चीनी सैनिकों ने बलपूर्वक कब्जा कर लिया था।

यह 1950 के आसपास की घटना थी। छेरिंग के माता—पिता मारे गए थे और चिनये लापता हो गई थी। छेरिंग भागकर अपनी ससुराल पहुंचे थे। तभी से वे मग्-पा (घर जमाई) की तरह रहने लगे थे। परंतु उनकी दिनचर्या बदल चुकी थी। चीन के दमन के खिलाफ उन्होंने एक संगठन बना लिया था, जिसका नेतृत्व वे स्वयं करते थे। कोन्-चोग् भैया भी उन्हीं के साथ थे। बाद में पता चला था कि बहुत-से लोग बंदी बनाकर किसी जेल में डाल दिए गए थे। मग्-पा किसी तरह देश छोड़कर भाग निकले थे। खुफिया तंत्र हाथ धोकर उनके पीछे पड़ा हुआ था। भयवश लोग अपने-अपने बच्चों को दूसरे देशों में भेजने लगे थे।

मां...ताशी चौंककर नींद से जाग उठा था। जम्पा का अतीत जहां का तहां रुक गया। सो जाओ बेटा, सो जाओ। गेशे जम्पा उसके सिर पर थपकी देकर सुलाने की चेष्टा करने लगे थे।

नहीं, मुझे मां के पास जाना है। मां...। ताशी मचलकर रोने लगा था। घड़ी रात के ग्यारह बजा रही थी। ताशी को चुप करा पाने में असमर्थ जम्पा ने उसे गोद में उठा लिया और लोये दोलमा के कक्ष की ओर बढ़े थे।

माई, आप इसे संभालिए। किसी तरह चुप कराइए। दरवाजा खोलते ही गेशे जम्पा ने ताशी को दोलमा की गोद में देते हुए कहा। क्या हुआ? अभी तक यह सोया नहीं? दोलमा की आंखों में नींद भरी थी। नहीं, सोया था, पर अभी अभी जाग उठा। शायद स्वप्न देख रहा होगा।  ... (जारी)