भारत—चीन विवाद— तिलमिलाई कांग्रेस का वेबुनियादी राग

    दिनांक 07-जुलाई-2020
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आशीष राय
 
भारत—चीन विवाद के वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को निशाना बनाना उसकी घ्रणित मानसिकता को दिखाता है। हकीकत में देखें तो संघ का समविचारी संगठन—स्वदेशी जागरण मंच शुरू से ही स्वदेशी सामानों के प्रयोग हेतु जनमानस तैयार करता रहा है और एक बार फिर चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए अलख जगा रखी है। ऐसे में संघ या उसके विचार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करके कांग्रेस पार्टी एक बार फिर खुद को कठघरे में खड़ा कर रही है
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गलवान घाटी में चीनी सैनिकों और भारतीय सैनिकों के मध्य खूनी संघर्ष से उपजी स्थिति पर आजकल देश में लगातार बहस चल रही है। भारत में नियमित अंतराल पर आम चुनाव होते रहते हैं और चुनावों में ऐसे संघर्ष मुद्दे भी बनते रहे हैं। भारतीय जवानों की यह शहादत भी मीडिया के पटल पर आजकल टीवी चैनलों के लिए टीआरपी बटोरने का काम कर रही है।

एक तरफ सत्ताधारी दल के लिए यह चुनौती भरा समय है तो दूसरी तरफ विपक्षी दलों के लिए एक सुनहरा मौका जिससे सत्ताधारी दल को संकट में डाला जा सके। पूर्वाग्रह से ग्रसित टेलीविजन की आक्रामक बहस नेताओं को अपनी-अपनी पार्टियों के प्रमुखों को यह दिखाने के प्रयास में है कि मेरी बहस सबसे अच्छी थी। सतही स्तर तक पहुंचती इन बहसों का परिणाम व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप तक ही सिमट जाता है। सत्ताधारी दल भाजपा ने अपने को चीनी आक्रमण विवाद में घिरता देख मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस के दो प्रमुख नेताओं पर व्यक्तिगत आरोप लगाया है कि उनके द्वारा संचालित राजीव गांधी फाउंडेशन ने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष और चीनी दूतावास से सहायता राशि प्राप्त की है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी राजीव गांधी फाउंडेशन की चेयरपर्सन के साथ ही साथ प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष की भी पदेन सदस्य हैं। यह आरोप इसलिए भी गंभीर है कि जब प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को आरोपित सहायता दी गई थी, उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राजीव गांधी फाउंडेशन के सदस्य थे।

दूसरी तरफ इन आरोपों से तिमिलाई कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं ने सत्ताधारी दल के नेताओं पर चीनी संबंधों के साथ—साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी विवाद में घेरने का प्रयास किया है। यह कोई नई बात भी नहीं है। जब भी कांग्रेस या अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा भाजपा को घेरने का प्रयास किया जाता रहा है, तब—तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी जानबूझकर निशाना बनाया जाता है।

यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मूल में जाया जाए तो यह विशुद्ध रूप से एक सांस्कृतिक संगठन है जो समाज का संगठन करने के लिए बनाया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपने बढ़ते प्रभाव के कारण सत्ता का प्रतिरोध भी झेलना पड़ा है। संघ के ऊपर प्रतिबंध भी लगाए गए। लेकिन प्रत्येक प्रतिबंध के बाद संघ मजबूती से समाज के सामने आता रहा।


महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण सभी ने संघ के कार्यों की प्रशंसा की है। संघ की प्रशंसा करते हुए 1962 की परेड में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों को परेड के लिए आमंत्रित किया था। रूस यात्रा के दौरान इंदिरा गांधी से जब वहां की मीडिया ने प्रश्न किया था कि आपके देश में कोई सामाजिक संगठन है, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम ही इंदिरा गांधी ने लिया था। यानी जब जब प्रामाणिकता की बात आती है तब तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की चर्चा नेताओं द्वारा की जाती रही है।

आज कोरोना काल में जब एक दूसरे को छूने से लोग डर रहे हैं, उस दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समविचारी संगठनों ने अनगिनत प्रकल्प चलाकर कोरोना पीड़ितों की, असहाय लोगों की, निर्धन लोगों की मदद की है। जिसकी प्रशंसा संघ विरोधी पत्रकारों ने भी अपने चैनलों पर की।

आज संघ समाज में विश्वास जमाने में सफल हुआ है। संघ के कार्यकर्ताओं द्वारा लगातार किए जा रहे सेवा कार्य ने समाज में उसकी विश्वसनीयता को और मजबूत किया है। संघ की सोच शुरू से यही रही है कि संघ जितना बढ़ता जाएगा, समाज में उतना ही समाहित होता जाएगा। संघ समाज में उसी तरह घुल-मिल जाएगा जैसे दूध में शक्कर। संघ के सरसंघचालक भी लगातार यह कहते रहे हैं कि संघ समाज में कोई संगठन करने के लिए नहीं बल्कि समाज का संगठन करने के लिए शुरू किया गया है। इसलिए संघ हमेशा पीछे रहकर काम करता रहा और समाज को आगे रखता रहा है। इसी सोच के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी अपने नाम से किसी सामाजिक कार्य को आगे नहीं बढ़ाया बल्कि उसके समविचारी संगठनों ने आगे आकर विभिन्न क्षेत्रों में कमान संभाल ली। सेवा क्षेत्र में सेवा भारती, मजदूरों के क्षेत्र में अखिल भारतीय मजदूर संघ, राष्ट्रीय किसान संघ, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के लिए विद्या भारती जैसे संगठनों ने समाज में एक अलग ही पहचान बनाई है। पूर्वोत्तर में एकल विद्यालय के माध्यम से वहां के नागरिकों में राष्ट्रवाद का बीज बोने का काम भी संघ के कार्यकर्ता लगातार कर ही रहे हैं।


संघ शुरू से ही सरकारी सहायता प्राप्त करने के विरुद्ध रहा है। पुरानी बात है जब अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम ने वनवासी क्षेत्रों में सेवा कार्य के लिए सरकारी सहायता की अपेक्षा की थी, परंतु सरकारी सहायता न मिलने से कार्यकर्ता निराश हो गए। तब यह बात उन्होंने तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरु जी को बताई थी। श्री गुरु जी ने यह सुनते ही ठहाका लगाते हुए जोर से कहा 'चलो अच्छा हुआ, अब जनता जनार्दन के पास जाएंगे।' श्री गुरु जी ने तब जनता से सीधे सहायता देने का आग्रह किया था और रामनवमी के दिन ही 10-12 करोड़ रुपए जमा हो गए थे और वनवासी कल्याण आश्रम ने अपना कार्य प्रारंभ कर दिया था। बताते हैं कि तभी से संघ के किसी भी समविचारी संगठन ने सरकारी सहायता प्राप्त करने का प्रयास नहीं किया।


वर्तमान चीनी संघर्ष के विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घसीटते हुए कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने एक बार फिर संघ के खातों का आडिट न कराने व गुरु दक्षिणा पर भी सवाल उठाया है। संघ विरोधियों द्वारा संघ की गुरु दक्षिणा पर प्रश्नचिन्ह पहली बार नहीं लगाया गया है। पहले भी यह सवाल खड़े किए गए थे और यह भी कहा गया कि यह राशि आयकर के अधीन है। उस समय की सरकार ने भी संघ के ऊपर दबाव बनाने के लिए गुरु दक्षिणा की राशि पर आयकर देने का नोटिस भिजवाया था। जिसे चुनौती दी गई और मुंबई (1975-1976) और पटना (1980) के आयकर अधिकरण ने सरकारी नोटिस को निरस्त कर दिया था। लेकिन पटना उच्च न्यायालय में इसके विरूद्ध अपील की गई 'आयुक्त आयकर बनाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (1994 (42) BLJR 969)' के नाम से दायर इस वाद को पारस्परिकता के सिद्धांत के आधार पर 22 फरवरी 1994 को न्यायमूर्ति के परिपूर्णन और न्यायमूर्ति  एन के सिन्हा की पीठ ने खारिज कर दिया था। इस निर्णय को आज तक उच्चतम न्यायालय में चुनौती नहीं दी गई।  यह साबित करता है कि तत्कालीन सरकार का मंतव्य केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को परेशान करना था। न्यायालय ने संघ के स्वयंसेवकों की गुरू दक्षिणा राशि को पारस्परिक सहयोग की राशि माना, जिसके माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समाज के संगठन का कार्य कर रहा है।

चीनी संघर्ष विवाद के वर्तमान परिदृश्य में सत्ताधारी दल और विपक्ष के वाद विवाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अनायास घसीटना न्यायोचित प्रतीत नहीं होता। संघ का समविचारी संगठन—स्वदेशी जागरण मंच शुरू से ही स्वदेशी सामानों के प्रयोग हेतु जनमानस तैयार करता रहा है और एक बार फिर चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए अलख जगा रखी है। ऐसे में संघ या उसके विचार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करके कांग्रेस पार्टी एक बार फिर खुद को कठघरे में खड़ा कर रही है।
(लेखक उच्चतम न्यायालय में अधिवक्ता और स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं )