गलवान में दबी चीन की गर्दन

    दिनांक 07-जुलाई-2020
Total Views |
पाञ्चजन्य ब्यूरो

चीन ‘वन रोड, वन बेल्ट’ परियोजना के जरिए प्राचीन रेशम मार्ग, जिससे एशिया, यूरोप और अफ्रीका आपस में जुड़े हुए थे, को फिर से तैयार कर रहा है। उसका कहना है कि इससे इस क्षेत्र में प्रगति होगी, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे चीन की विस्तारवादी नीति छिपी है। इसलिए यह रेशम मार्ग चीन विरोधी देशों के लिए फंदा से कम नहीं है। कैसे यह फंदा है, इसके जरिए चीन छोटे देशों को किस तरह अपने जाल में फंसा सकता है, वर्तमान में भारत और चीन के बीच तनाव क्यों है, दक्षिण चीन सागर में ताईवान, जापान जैसे देशों को चीन क्यों धमका रहा है, चीन हांगकांग में  लोगों को क्यों परेशान कर रहा है, इन सबके कारण पूरे विश्व में चीन को लेकर किस तरह का आक्रोश है। इन सभी विषयों को लेकर भारत की क्या पहल और नीति होनी चाहिए, इस पर चर्चा करने के लिए पाञ्चजन्य ने 27 जून को ‘शब्दोत्सव’ के सहयोग से एक वेबिनार का आयोजन किया। इसका विषय था ‘रेशम का फंदा : चीनी विस्तारवाद और विश्व में बढ़ता आक्रोश।’ इस वेबिनार का संचालन पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर और लोकसभा टीवी के वरिष्ठ पत्रकार अनुराग पुनेठा ने किया। वेबिनार में मुख्य रूप से ‘सेंटर फॉर चाइना अनालेसिस एंड स्ट्रेटेजी’ के अध्यक्ष जयदेव रानाडे और सेवानिवृत्त लेफ्टिनेट जनरल संजय कुलकर्णी ने विचार रखे। इसमें कई अन्य वरिष्ठ पत्रकारों और शोधकर्ताओं ने भी हिस्सा लिया। चर्चा की शुरुआत करते हुए हितेश शंकर ने सभी के सामने यह प्रश्न रखा कि चीनी विस्तारवाद को लेकर भारत की नीति क्या हो? वहीं वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि गलवान घाटी में जो हो रहा है, उसके पीछे सिर्फ और सिर्फ चीन जिम्मेदार है। वक्ताओं ने यह भी कहा कि चाहे चीन जो भी कर ले, गलवान में उसकी एक नहीं चलने वाली है और उसे पीछे हटना ही होगा। 

m_1  H x W: 0 x
3 जुलाई को लद्दाख के निम्मू में सैनिकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी।


तनाव के लिए जिनपिंग हैं जिम्मेदार

जयदेव रानाडे

इस वक्त गलवान में भारत और चीन की सेना आमने-सामने खड़ी है। कई दशक बाद ऐसी स्थिति आई है। इस स्थिति का दोनों देशों के रणनीतिक और कूटनीतिक संबंधों पर असर पड़ना तय है। इस गतिरोध के लिए चीन कई साल से पृष्ठभूमि तैयार कर रहा था। इस तनाव के लिए अगर किसी नेता को जिम्मेदार माना जाए तो वह निश्चित रूप से चीन के राष्टÑपति शी जिनपिंग ही होंगे। इसके कई कारण हैं। पहला यह है कि 2014 से चीन यह समझने लगा था कि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में आने लगी है और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक नई पहचान मिलने लगी है।

दूसरा कारण है कि चीन ने यह भी देखा कि भारत-पाकिस्तान में तनाव की स्थिति पैदा हो रही है, जो कि चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कोरिडोर (सीपैक) जैसी महत्वाकांक्षी परियोजना को नुकसान पहुंचा सकती है। इस कारण चीन ने हर तरफ से भारत पर दबाव बनाना शुरू किया कि भारत को पाकिस्तान के साथ तनाव को कम करना चाहिए। इसके लिए चीन ने कई कूटनीतिक प्रयास भी किए।  इसके बावूजद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम नहीं हुआ तो चीन चकराया। उसकी परेशानी भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव नहीं है, उसकी परेशानी अपने हितों की चिंता है।

जब भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में आतंकवादियों को मारने के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की तो चीन और भी परेशान हुआ। उसे लगने लगा कि अब भारत अपने हितों की रक्षा के लिए किसी से न तो दबेगा और न ही झुकेगा। तीसरा कारण है कि हाल ही में भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर नया नक्शा जारी किया, जिसमें भारत ने केवल आंतरिक सीमाओं में बदलाव किया और अंतरराष्ट्रीय सीमा को वैसा ही रखा, जो कि चीन की अपेक्षा के अनुरूप नहीं था। इस कारण चीन सीपैक को लेकर चिन्तित है। चौथा और सबसे मुख्य कारण है चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का अपने राष्टपति शी जिनपिंग से नाखुश होना

। पहली बार ऐसा देखने को मिला कि पार्टी ने शी जिनपिंग को पद छोड़ने तक के लिए कह दिया था। साथ ही शी जिनपिंग ने जो भी सपने चीन को दिखाए थे उसमें वे विफल रहे। उनका एक सपना था आने वाले समय में चीन अमेरिका का मुकाबला करने लगेगा, लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं। उल्टे चीन कई मुद्दों पर खुद ही घिर रहा है। हांगकांग में पिछले एक वर्ष से जनांदोलन चल रहा है,जो यह दर्शाता है कि चीन का खुद अपनी सीमा पर नियंत्रण नहीं है।

भारत-चीन के बीच बनी टकराव की स्थिति को डोकलाम से भी जोड़कर देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि जब से डोकलाम से चीनी सेना हटी है, तब से चीन में शी जिपपिंग को लेकर रोष है। उस रोष को कम करने के लिए गलवान घाटी में योजनाबद्ध ढंग से सब कुछ किया गया। अभी गलवान घाटी में पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की जो टुकड़ी भेजी गई है, उसको आदेश ‘सेंट्रल मिलिट्री कमीशन’ ही दे सकती है और इसके अध्यक्ष खुद शी जिनपिंग हैं। यानी गलवान में जो कुछ हुआ है, उसके पीछे सोची-समझी लंबी योजना है और इसके सूत्रधार शी जिनपिंग हैं।


जो बैठा पहाड़ पर वही बलवान 

np_1  H x W: 0

ले. ज. (सेनि.) संजय कुलकर्णी


जब से गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के संघर्ष की बात सामने आई है, तब से इस दुर्गम घाटी की चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है। ऐसे ही सियाचिन में जब  कोई घटना होती है तो मीडिया के एक वर्ग में ऐसे आलेख छपते हैं कि वहां तो कुछ भी नहीं है। फिर वहां की सुरक्षा के लिए रोजाना 3 करोड़ रु. खर्च करने की जरूरत क्या है? अभी भी पाकिस्तान और चीन की सीमा पर स्थित अनेक दुर्गम मोर्चों पर हमारे सैनिक कठिन परिस्थितियों में तैनात हैं। इनकी तैनाती पर भी कुछ लोग सवाल उठाते हैं। ऐसे लोगों को पता होना चाहिए कि देश की सुरक्षा और सामरिक क्षमता को बढ़ाने के लिए ऐसे मोर्चों का बड़ा महत्व है। दुश्मन की मंशा कभी भी बदल सकती है। चीन की मंशा बदलने की वजह से ही तो गलवान में तनाव है। पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस कहते थे कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन चीन है।

इस संबंध में सरदार पटेल भी बहुत स्पष्टता से बात करते थे।  7 नवंबर, 1950 को नेहरू को लिखे एक पत्र में सरदार पटेल ने कहा था, ‘‘चीन ही हमारा ऐसा पड़ोसी है, जो हमें नहीं बख्शेगा। एक पहाड़ पर दो शेर नहीं रह सकते हैं। तिब्बत में चीन जो कर रहा है उसे देखते हुए हमें तैयार रहना होगा।’’ उनका इशारा दुर्गम मोर्चों को दुरुस्त करने की ओर ही था। 

दुर्गम मोर्चे हमारे लिए कितने महत्वपूर्ण हैं, इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं। 1962 की एक घटना है। चुशूल के ‘रेजांग ला’ की लड़ाई के बारे में सभी जानते हैं। वहीं मेजर शैतान सिंह ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था। वे कुमाऊं रेजिमेंट में थे। उनके नेतृत्व में 120 सैनिकों की एक टुकड़ी 2 अक्तूबर,1962 को लद्दाख पहुंची। लद्दाख पहुंचते ही उस टुकड़ी को चुशूल भेज दिया गया, जो 16,400 फीट की ऊंचाई पर है। वहां ऐसी ठंड होती है कि एक अंडा तोड़ने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में भी हमारे सैनिक कई दिन तक दुश्मन से लड़ते रहे और उन्होंने लगभग 2,000 चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया, पर हमारे भी 114 (120 में से) सैनिक बलिदान हुए। इन सैनिकों को इतनी ऊंचाई और ठंड में लड़ाई करने का कोई अनुभव नहीं था। यदि पहले ही चुशूल जैसे दुर्गम मोर्चे पर हम ध्यान देते तो शायद परिणाम कुछ और ही निकलता। 

 दूसरी घटना 1983 की है। हम लोग सियाचिन गए थे। वहां इतनी ठंड थी कि हमारी सेना ज्यादा दिन तक वहां नहीं रुक सकी। एक सैनिक तो तंबू के बाहर पहरा देते हुए बर्फ के नीचे दब गया था। सही समय पर उसके बारे में पता चला तो उसे बचा लिया गया। इसलिए सैनिक जल्दी ही वापस हो गए। इसके बाद पाकिस्तान के ‘स्पेशल सर्विस ग्रुप’ की एक टुकड़ी वहां गई। पाकिस्तान में इस ग्रुप को सबसे अच्छा माना जाता है। इसके बावजूद वह ग्रुप वहां की ठंड से परेशान हो गया। कुछ ही दिन में वह ग्रुप भी वापस हो गया।

इस वापसी पर परवेज मुशर्रफ ने अपनी पुस्तक ‘इन दी लाइन आफ फायर’ में लिखा है, ‘‘वहां इतनी ठंड थी कि हमारे सैनिक वहां नहीं रह पाए और उन्हें वापस बुला लिया गया।’’ इसके बाद पाकिस्तान ने यूरोप से ऐसे उपकरण खरीदे, जो माइनस 40 डिग्री में भी व्यक्ति को जिंदा रख सकता है। इसके बाद पाकिस्तान ने तय किया कि वह 1 मई, 1984 को सियाचिन पर कब्जा कर लेगा। इसकी जानकारी भारत को नहीं थी। संयोगवश हमारी सेना 13 अप्रैल को वहां पहुंच गई और पाकिस्तान का सपना पूरा नहीं हो पाया। यानी पहाड़ों में जो भी ऊंचाई को पकड़ेगा, वही वहां रहेगा और यह सब एक दिन में नहीं होता है। इसके लिए बरसों तक तैयारी करनी पड़ती है। इसलिए इन मोर्चों के महत्व के बारे में कोई सवाल उठाना ही नहीं चाहिए। ल्ल



‘‘गलतफहमी में जी रहा है चीन’’

m_1  H x W: 0 x
वेबिनार में जयदेव रानाडे से सवाल-जवाब हुए। प्रस्तुत हैं मुख्य प्रश्न और उनके उत्तर -

  • क्या चीन कोरोना वायरस के कारण पूरी दुनिया में बनी अपनी नकारात्मक छवि से ध्यान हटाने के लिए भारत के साथ तनाव बढ़ा रहा है?

मैं ऐसा नहीं मानता, क्योंकि ऐसी स्थिति चीन की नकारात्मक छवि को बढ़ाने में घी का ही काम करेगी, यह शी जिनपिंग को भी पता है।


  • चीन की वैश्विक नीति क्या है?

चीन विश्व में अलग-अलग देशों से उसकी ताकत देखकर बर्ताव करता है। जैसे कि पिछले दिनों उसने फिलीपींस, जापान और भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ अमेरिका से सोच-समझकर शांति से बर्ताव किया। चीन के लिए सबसे बड़ा बाजार यूरोप और अमेरिका है और चीन इस बात को समझ चुका है कि कोरोना वायरस से उठे आक्रोश के कारण जल्दी ही यूरोप और अमेरिका के बाजारों में चीन का कारोबार 80 प्रतिशत खत्म हो जाएगा। अमेरिका ने चीन के लिए अपना बाजार बंद करना शुरू भी कर दिया है। यानी अमेरिका चीन के विरुद्ध खुलकर आ गया है। भारत, चीन के लिए एक ऐसा बाजार है जिसका किसी भी देश ने आज तक शोषण नहीं किया है और चीन इसमें अपनी पहुंच देखता है। चीन को यह लगता था कि भारत अपनी सीमा पर चीन से टकराव की मुद्रा में नहीं आएगा और पीछे हट जाएगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा। चीन को यह भी लगता है कि चीन के बिना भारत प्रगति नहीं कर सकता, यह उसकी बहुत बड़ी गलतफहमी है।

  •  चीन केवल भारत ही नहीं, बल्कि जापान, वियतनाम, आस्ट्रेलिया आदि देशों से भी टकरा रहा है। इसके कारण क्या हो सकते हैं?


चीन समझता है कि यही वह समय है जब वियतनाम और जापान को अपने दबाव में लिया जा सकता है। इसलिए वह उन दोनों से आएदिन टकरा रहा है। भारत के साथ टकराव की स्थिति भी इसीलिए बनी हुई है। चीन समझता है कि भारत को पीछे धकेल कर वह बाकी छोटे देशों को यह संदेश दे सकता है कि इस क्षेत्र के एक बड़े देश को उसने सबक सिखा दिया है, इसलिए बाकी देश आत्मसमर्पण कर दें। यह अति-विश्वास की वजह से भी हो सकता है और यह भी हो सकता है कि चीन समझता हो कि अमेरिका और भारत अभी कोरोना वायरस से परेशान हैं और कुछ नहीं कर पाएंगे। लेकिन चीन को यह संदेश अभी तक पहुंच चुका है कि भारत मजबूती से चीन को टक्कर दे रहा है और पीछे हटने का तो कोई मतलब ही नहीं है। यही वजह है गलवान घाटी में हुए टकराव के बाद भी चीन ने अभी तक अपने नुकसान की कोई जानकारी नहीं दी है, क्योंकि यह चीन के लिए अपमानजनक साबित हो सकता है।


  • अभी जो कुछ हो रहा है, वह संयोग नहीं है, यह चीन की एक साजिश लगती है। इस संदर्भ में आपका क्या कहना है?

इस संबंध में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन दो बातें तो हैं। एक यह कि वुहान में चीन की दो लैब हैं और इनमें जानवरों पर शोध होता है। वेइबो (चीनी ट्विटर) की एक खबर के अनुसार उनमें से एक लैब के मुख्य अधिकारी के पास डिग्री तो है लेकिन लैब की कोई जानकारी नहीं है। इस लैब के जानवरों को बाजार में बेच भी दिया जाता है। हालांकि अब इंटरनेट से इस तरह की जानकारी हटा ली गई है। दूसरी बात यह भी है कि अमेरिका ने कुछ समय पहले अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन अपनी लैब में सुरक्षा नियमों का पालन नहीं कर रहा है। इस आरोप में कुछ दम भी लग रहा है। मालूम हो कि कोरोना वायरस का पहला मामला 19 नवम्बर, 2019 को आया था, फिर भी उसने 30 जनवरी तक पूरे विश्व से इसे छुपा कर रखा। वुहान सड़क, रेल, हवाई सभी मार्गों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि वहां के अलावा चीन के और किसी भी शहर में कोरोना वायरस नहीं फैला। वायरस वुहान से निकलकर इटली, तुर्की, अमेरिका, भारत जैसे देशों तक पहुंच गया, लेकिन वह चीन के दूसरे शहरों में नहीं पहुंचा।  यह विचार करने वाली बात है।