बागपत के परशुरामेश्वर महादेव मंदिर में मौजूद अनोखा शिवलिंग

    दिनांक 07-जुलाई-2020   
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रामजन्मभूमि स्थान अयोध्या में खुदाई में मिला शिवलिंग भी पुरा महादेव मंदिर के शिवलिंग के समान ही है। इससे साफ हो जाता है कि पुरा महोदव मंदिर, उत्तराखंड का महाभारतकालीन शिवलिंग और अयोध्या में निकला शिवलिंग एक ही सभ्यता की देन है

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की धरती अपने भीतर कई महत्वपूर्ण रामायण, महाभारत समेत कई सभ्यताओं के अवशेष समाए हुए हैं। बागपत जनपद के सिनौली गांव में सिंधु घाटी सभ्यता के अद्भुत पुरावशेष मिल चुके हैं तो पुरा गांव स्थित परशुरामेश्वर महादेव मंदिर में प्राचीन शिवलिंग स्थित है। इस सिद्धपीठ के अनोखे शिवलिंग की ऊंचाई उज्जैन के महाकालेश्वर शिवलिंग के समकक्ष है। इसी प्रकार का शिवलिंग उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थित लाखामंडल गांव के महाभारतकालीन शिव मंदिर में मौजूद है। जबकि रामजन्मभूमि स्थान अयोध्या में खुदाई में मिला शिवलिंग भी पुरा महादेव मंदिर के शिवलिंग के समान ही है। इससे साफ हो जाता है कि पुरा महोदव मंदिर, उत्तराखंड का महाभारतकालीन शिवलिंग और अयोध्या में निकला शिवलिंग एक ही सभ्यता की देन है।

हिंडन अथवा हरनंदी नदी के किनारे पर जिला बागपत के बालैनी कस्बे से जिले से 4.5 किलोमीटी दूर पुरा गांव में भगवान शिव का एक प्राचीन परशुरामेश्वर महादेव मंदिर है। यहां प्रत्येक वर्ष शिवरात्रि और महाशिवरात्रि पर यूपी, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि राज्यों के लाखों लोग भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं भगवान परशुराम ने की थी। पुरामहादेव एक प्राचीन सिद्धपीठ है। भगवान परशुराम द्वारा स्थापित होने के कारण जगद्गुरू शंकराचार्य जी ने इसे परशुरामेश्वर महादेव का नाम दिया। पुरा महादेव मंदिर के स्थान पर प्राचीन काल में कजरी वन स्थित था। इस वन में भगवान परशुराम के पिता जमदग्नि ऋषि का आश्रम था। इस मंदिर से डेढ़ किलोमीटर दूर मेरठ जनपद में स्थित आलमगीरपुर गांव में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को खुदाई में सिंधु घाटी सभ्यता के अवशेष प्राप्त हो चुके हैं। इससे साफ है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भी पुरा महादेव मंदिर में पूजा किया करते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में पुराविदों को बैल, नंदी, मातृ देवी, बैलगाड़ी, शिवलिंग मिल चुके हैं। आलमगीरपुर का सिंधु घाटी सभ्यता का केंद्र होने के कारण स्पष्ट है कि उस सभ्यता के लोग भी पुरा महादेव मंदिर में पूजा करते थे। शिवजी को पशुपतिनाथ भी कहते हैं। कालीबंगा और अन्य खुदाई के स्थलों पर मिले पकी मिट्टी के शिवलिंगों से प्रारंभिक शिवलिंग पूजन के साक्ष्य मिले हैं। पुरा महादेव का शिव लिंग अपने आपमें अनोखा शिवलिंग है, जो अपनी ऊंचाई से महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से मेल खाता है। ये कोई एकल शिवलिंग नहीं है। उत्तराखंड के देहरादून जिले में यमुना नदी के तट पर बसा जौनसार-बावर का लाखामंडल गांव शिव मंदिर का इतिहास महाभारत से भी जुड़ा हुआ है। उसी मंदिर में हूबहू पुरा महादेव जैसे कई शिवलिंग विराजमान है। जिसकी पहचान लिंग के आधार में विशेष तरह के अनेकों कोण है। हाल ही में हुई रामजन्मभूमि की खुदाई में मिला शिवलिंग भी आधार में अनेक कोण के साथ प्राप्त हुआ है। जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पुरा महादेव मंदिर में विराजमान शिवलिंग समेत यह सभी शिवलिंग एक ही सभ्यता की देन है। जिसका संबंध रामायण काल से लेकर महाभारत काल तथा सिंधु काल तक को प्रमाणित करता है।

महाभारत में व्याघप्रस्थ था बागपत का नाम
बागपत जनपद की स्थापना महाभारतकाल से जुड़ी है। बागपत का प्राचीन नाम व्याघ्रप्रस्थ है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने कौरवों से पांडवों के लिए मांगा था। बागपत जनपद में बरनावा गांव में स्थित लाक्षागृह को महाभारत काल का साक्षी बताया जाता है। महाभारत ही नहीं बल्कि सिंधु सभ्यता के साक्षी बागपत में शायद कोई ऐसी जगह हो जहां इतिहास और संस्कृति का अनमोल खजाना न छिपा हो। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा सिनौली गांव में कराए उत्खनन से सिंधुकालीन मृदभांड, डिश ऑन स्टैंड, कंकाल, तांबे की तलवार, विशाल रथ व कब्र आदि निकलने से साबित हो गया कि बागपत सिंधुकालीन के अलावा ताम्रनिधि सभ्यता का भी साक्षी रहा। साथ ही बागपत के रटौल कस्बे में 1978-79 व 1990 में खुदाई में गुप्तकालीन सुंदर अंकरणयुक्त स्तंभ, स्थानक विष्णु मूर्ति, गणेश, शिव-पार्वती मूर्ति, श्रीफल हस्तामातृका मूर्ति, दुर्गा, शिशु गोद लिए माता देवी मूर्ति और शक्ति माता समेत नौ मूर्ति मिलना बागपत की प्राचीनता साबित करता है। रावण उर्फ बड़ागांव में मंशा देवी का प्राचीन मंदिर है। इस गांव की स्थापना लंकापति रावण ने की थी और मंदिर का इतिहास भी रावण से जुड़ा है। इस मंदिर में भगवान विष्णु की दशावतार की गुप्तकालीन मूर्ति मौजूद है। गुप्तकाल के मंदिर के खंभे आज भी सुरक्षित है।

बड़ागांव में खुदाई में कुषाणकालीन सभ्यता के अवशेष भी निकल चुके हैं। यहां पर जैन धर्म के तीर्थंकरों की प्रतिमाएं भी निकल चुकी है। बालैनी में महर्षि वाल्मीकि का आश्रम हुआ करता था। पुरा गांव के परशुरामखेड़ा में 800 ईसवीं पूर्व के भूरे रंग के ठीकरे निकल थे। किशनपुर में राम और लक्ष्मण काल का रामताल आज भी मौजूद है। सिघावली अहीर गांव में खुदाई के दौरान कुषाणकालीन सिक्के निकल चुके हैं। जौनमाना गांव में खुदाई में 12वीं शताब्दी के 28 सिक्के मिल चुके हैं। सिक्कों पर एक ओर भाला लिए घुड़सवार तो वहीं दूसरी तरफ बैठे बैल का चित्र है। बामनौली, रंछाड़ व बावली के जंगल के टीलों में कुषाण, महाभारत, गुप्तकालीन और मध्य और राजपूत कालीन अवशेष जैसे मृण मूर्तियां, चित्रित मृदभांड़ व मिट्टी के आभूषण और ईंटें मिल चुकी हैं। कुर्डी, काकौर और जागोस तथा खेकड़ा में भी समय-समय पर खुदाई में मृदभांड मिलते रहे। इससे साबित हो जाता है कि बागपत जनपद सिंधु कालीन सभ्यता का बड़ा केंद्र रहा है।