चीनी धुन पर कांग्रेसी थिरकन

    दिनांक 08-जुलाई-2020
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उमेश्वर कुमार

1991 तक देश का बाजार छोटे-छोटे कारीगरों के अनुकूल था। उसी समय राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना हुई और कांग्रेस के शासनकाल में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर चीन के हितों को ध्यान में रखते हुए व्यावसायिक नीतियां बनाई जाने लगीं, क्योंकि चीन से इस फाउंडेशन को चंदे के रूप में मोटी रकम मिल रही थी। नतीजा, छोटे उद्योग और कारीगर बर्बाद होते चले गए
  • 2 दिसंबर, 1992 को टाइम्स आफ इंडिया ने खुलासा किया कि 31 अक्तूबर, 1992 तक फाउंडेशन को चंदा देने वालों की सूची में शेयर बाजार घोटाले के आरोपी हर्षद मेहता, उसकी कंपनी ग्रोमोर और चीन के नेता ली पेंग का नाम था। फाउंडेशन को इनसे मिले चंदे की राशि 16 करोड़ रुपये से भी अधिक थी। ली पेंग को ‘बूचर आॅफ बीजिंग’  के नाम से भी जाना जाता है, जिसके नाम तियान्मेन चौक नरसंहार दर्ज है। 1993 में फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में देश-विदेश से आए भागीदारों का पूरा खर्च एयर इंडिया और आईटीडीसी के खाते में डाल दिया गया।

  • अक्तूबर 2007 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के न्यौते पर सोनिया गांधी का पांच दिवसीय चीन दौरा हुआ। उनके साथ राहुल गांधी, तत्कालीन केंद्रीय राज्य मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण और आनंद शर्मा भी थे। उनकी मुलाकात चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ व चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अन्य प्रमुख नेताओं से हुई। इसके बाद 2007-08 में फाउंडेशन की एक कथित अध्ययन परियोजना के लिए चीन सरकार से तीन लाख डॉलर का चंदा मिला। 2005-06, 2006-07 और 2008-09 में भी फाउंडेशन को चीन सरकार और चीनी दूतावास से चंदा मिला।

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राजीव गांधी फाउंडेशन के न्यासी (बाएंं से) सुमन दुबे, पी. चिदंबरम, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी (अध्यक्ष), प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन, डॉ. अशोक गांगुली और राहुल गांधी।

इन दिनों राजीव गांधी फाउंडेशन सवालों के घेरे में है। जिस काल में और जिस तरह से राजीव गांधी फाउंडेशन में चीन से धन आया, वह राष्ट्रहित में नहीं था। 1991 में जब फाउंडेशन की स्थापना हुई थी, उसी समय देश की अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोले जा रहे थे। उस समय तक देश के कल-कारखाने, विनिर्माण भारतीय हाथों में थे। हस्तशिल्प से लेकर छोटे-छोटे कारीगरों की समाज में भूमिका थी और उनकी अर्थचर्या देश की माटी के अनुकूल थी। दीपावली के सामान देश के कारीगर बनाते थे तो होली के गुलाल भी इन्हीं के हाथों सुर्ख होते थे। कुटीर उद्योग के क्षेत्र में अगरबत्ती की अपनी जगह थी। धीरे-धीरे व्यावसायिक नीतियों में चीन के हक में परिवर्तन होने लगे और भारत से उत्पादन सिमट कर चीन की तरफ जाने लगा। विश्लेषकों की राय में राजीव गांधी फाउंडेशन का कार्यकलाप एक तरह से चीन और कॉरपोरेट की तरह था। 

राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना के उद्देश्यों का जो विवरण फाउंडेशन की वेबसाइट पर दर्ज है, हकीकत में इसके कार्यकलाप इससे काफी अलग रहे। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की दृष्टि और सपनों को पूरा करने के लिए उनके नाम से इस फाउंडेशन की स्थापना 21 जून, 1991 को की गई थी। फाउंडेशन की वेबसाइट पर बताया गया है कि 1991 से 2009 तक इसने स्वास्थ्य, शिक्षा, विज्ञान एवं तकनीक, महिला एवं बाल विकास, अपंगता सहयोग, शारीरिक रूप से निशक्तों की सहायता, पंजायती राज, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन आदि क्षेत्रों में काम किया। 2010 में फाउंडेशन ने शिक्षा क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। फाउंडेशन द्वारा संघर्षशील बच्चों को शैक्षणिक मदद, शारीरिक रूप से निशक्त युवाओं की गतिशीलता बढ़ाने और मेधावी भारतीय बच्चों को कैंब्रिज में पढ़ने हेतु वित्तीय सहायता आदि जैसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं। लेकिन फाउंडेशन के कार्यकलापों को देखा जाए तो यह बिल्कुल ही अलग लक्ष्य के साथ काम करता रहा है।

फाउंडेशन के कामकाज और इसे मिलने वाले चंदे के तौर-तरीके को देखा जाए तो यह इस बात की ओर इंगित करता है कि इसके संबंध चीनी आर्थिक साम्राज्यवाद, साम्यवाद और अंतरराष्ट्रीय लॉबी गिरोह के साथ रहे हैं। इनका काम भारत के सरकारी कामकाज को अपने स्वार्थपरक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अपने हित में करवाने के लिए होते रहे हैं। इसके कुछ उदाहरणों की चर्चा आगे की जाएगी। राजीव गांधी फाउंडेशन की अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, सुमन दुबे, राहुल गांधी, प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन, डॉ. अशोक गांगुली, संजीव गोयनका और प्रियंका गांधी वाड्रा भी फाउंडेशन के न्यासी हैं।

राजीव गांधी न्यास का इस्लामिक गठजोड़

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भारत में इस्लामी कट्टरता फैलाने के आरोपी इस्लामिक मजहबी उपदेशक जाकिर नाइक के इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन (आईआरएफ) ने राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ) को 50 लाख रुपये का चंदा दिया था। यह चंदा साल 2011 में दिया गया था। वहीं, आरजीएफ का कहना है कि चंदा उन्हें नहीं, बल्कि उसके सहयोगी राजीव गांधी चैरीटेबल ट्रस्ट को दिया गया था। इसे कुछ महीनों में लौटा भी दिया गया था। उल्लेखनीय है कि इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन और जाकिर नाइक पर गंभीर आरोप लगे हैं। नाइक पर जहां भड़काऊ भाषण देकर मुस्लिम युवकों को आतंकी गधिविधियों में शामिल होने के लिए उकसाने का आरोप है, वहीं उसके साथियों पर कन्वर्जन कराने के भी आरोप लगे हैं। आईआरएफ प्रवक्ता ने जाकिर नाइक का उल्लेख करते हुए कहा कि पैसे आरजीएफ को ही दिए गए थे, जिसे अभी तक लौटाया नहीं गया है। हो सकता है वे लोग पैसे लौटाने के बारे में विचार कर रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक राशि नहीं मिली है।


कांग्रेस अध्यक्ष से सीधा सवाल
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कुछ दिन पहले भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने ट्वीट करके चीन से चंदा लेने के मुद्दे पर राजीव गांधी फाउंडेशन पर कुछ सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा कि आज पी. चिदंबरम कहते हैं कि फाउंडेशन पैसे लौटा देगा। देश के पूर्व वित्त मंत्री जो खुद जमानत पर हैं, उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि फाउंडेशन ने नियमों की अवहेलना करते हुए चंदा लिया, जो देशहित में नहीं था। साथ ही, उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से उन सवालों के जवाब मांगे हैं, जो फाउंडेशन की भी अध्यक्ष हैं।

  • 130 करोड़ देशवासी जानना चाहते हैं कि कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए कैसे-कैसे काम किए और किस तरह से अपने देश के साथ विश्वासघात किया है?

  • प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ), जो लोगों की सेवा और उन्हें राहत पहुंचाने के लिए होता है, उससे 2005-08 तक राजीव गांधी फाउंडेशन को धन क्यों दिया गया?

  •  राजीव गांधी फाउंडेशन को 2005 से 2009 तक चीनी दूतावास, 2006 से 2009 तक हर साल लक्जमबर्ग के टैक्स हैवन्स से दान, यह क्या इंगित करता है? गहरे वाणिज्यिक हितों वाली एनजीओ और कंपनियों ने फाउंडेशन को क्यों दान दिए?

  •  निजी भरोसे पर विदेशी शक्तियों से धन स्वीकार करना क्या राष्ट्रीय हित का बलिदान नहीं है? देश जानना चाहता है कि राजीव गांधी फाउंडेशन और चीन सरकार के बीच क्या करार हुआ?

  •   राजीव गांधी फाउंडेशन के अकाउंट्स ने कैग आॅडिट से इनकार क्यों किया? इसे सूचना के अधिकार से अलग क्यों रखा गया? राजीव गांधी फॉउंडेशन का आॅडिटर कौन है?

  •  आपने मेहुल चोकसी से दान क्यों लिया और उसे ऋण क्यों दिया गया? फाउंडेशन का मेहुल चोकसी से क्या संबंध है? उसे बैंक से ऋण दिलाने में किस प्रकार से मदद की?

  •  कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ चाइना के बीच क्या संबंध है? दोनों के बीच क्या सहमति है? हस्ताक्षरित और अहस्ताक्षरित एमओयू क्या हैं?

  • आरसीईपी का हिस्सा बनने की क्या जरूरत थी? चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 36.2 अरब अमेरिकी डॉलर कैसे हो गया?

  • उल्लेखनीय है कि आरसीईपी यानी मुक्त व्यापार के लिए क्षेत्रीय व्यापार सहयोग समझौता भारतीय किसानों, एमएसएमई क्षेत्र और कृषि के हित में नहीं है और इस वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसमें शामिल नहीं हुए।

स्थापना के साथ ही इस संस्था के कार्यकलाप सवालों के घेरे में रहे। 24 जुलाई, 1991 को तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने 1991-92 के केंद्र्रीय बजट से 100 करोड़ रुपये का आबंटन इस ट्रस्ट के लिए कर दिया। यानी आम जनता से कर के रूप में ली गई इतनी बड़ी रकम को गैर-सरकारी संगठन को दे दिया गया। सरकार की सरपरस्ती देख और आयकर से छूट वाले इस फाउंडेशन में चंदा धड़ल्ले से आने लगा। अंदरखाने यह कहा जाने लगा कि यह वह खिड़की है जिसके जरिए लॉबी समूह अपनी चाहतें पूरी कर सकते हैं। 28 जुलाई को वित्त राज्य मंत्री रामेश्वर ठाकुर ने राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में बताया कि फाउंडेशन को जून 1992 के अंत तक 203 लोगों के जरिए 10.77 करोड़ रुपये की राशि मिली।

2 दिसंबर, 1992 को टाइम्स आॅफ इंडिया ने खुलासा किया कि 31 अक्तूबर, 1992 तक फाउंडेशन को चंदा देने वालों की सूची में शेयर बाजार के महाघोटाले के मुख्य अभियुक्त हर्षद मेहता, उसकी कंपनी ग्रोमोर और चीन के नेता ली पेंग का नाम था। इन लोगों के चंदे की रकम 16 करोड़ रुपये से भी अधिक थी। ली पेंग को ‘बूचर आॅफ बीजिंग’ (बीजिंग का कसाई) के नाम से भी जाना जाता है, जिसके नाम तियान्मेन चौक नरसंहार दर्ज है। 1993 में फाउंडेशन द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में देश-विदेश से आए भागीदारों का पूरा खर्च एयर इंडिया और आईटीडीसी के खाते में डाल दिया गया। इसी प्रकार देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर भी बड़े चंदे का सरकारी दबाव बनाया गया। 1995 से स्टील अथॉरिटी आॅफ इंडिया (सेल) ने फाउंडेशन को एक करोड़ रुपये का चंदा दिया। जब फाउंडेशन की स्थापना हुई थी, उसी समय सेल के पास चंदे की उगाही का संदेश भेज दिया गया था। सांस्कृतिक स्तर पर भी नफरत फैलाने में फाउंडेशन की भूमिका रही। धुर वामपंथी और सीपीआई (एमएल) से संबंध रखने वाले कांचा इलैया की पुस्तक ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिंदू’ को फाउंडेशन ने प्रायोजित किया। इसमें ब्राह्मण विरोधी कार्टून भी छापे गए थे।

देशवासियों के साथ धोखा

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जेपी नड्डा, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा

‘पीएमएनआरएफ संकट में लोगों की मदद करने के लिए बनाया गया था, लेकिन यूपीए कार्यकाल में राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ) को पैसे दान किए जा रहे थे। पीएमएनआरएफ के बोर्ड में कौन बैठा था? सोनिया गांधी। आरजीएफ का अध्यक्ष कौन है? सोनिया गांधी। पूरी तरह से निंदनीय, नैतिकता की उपेक्षा, प्रक्रियाओं और पारदर्शिता को लेकर किसी को फिक्र नहीं थी। भारत के लोगों ने संकट के समय अपने जरूरतमंद नागरिकों की सहायता के लिए अपनी मेहनत की कमाई पीएमएनआरएफ में दान किया था। इस सार्वजनिक धन को परिवार द्वारा संचालित एक फाउंडेशन में हस्तांतरित करना न केवल एक संगीन धोखाधड़ी है, बल्कि भारत के लोगों के साथ एक बड़ा धोखा भी है।


बगैर अनुमति विदेशी दान लेना अपराध

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रविशंकर प्रसाद,केंद्रीय कानून मंत्री

फॉरेन कॉन्ट्रिब्यूशन एंड रिलेशन एक्ट-1977 के मुताबिक, कोई राजनीतिक दल, कोई संगठन सरकार को जानकारी दिए बिना विदेश से दान नहीं प्राप्त कर सकता है। यह कानून भी इन्हीं के समय में बना था। जब राजीव गांधी फाउंडेशन कांग्रेस का एक्सटेंशन ही था, तब इन्होंने सरकार से अनुमति क्यों नही ली थी? अगर यह मान भी लिया जाए कि राजीव गांधी फाउंडेशन एक शैक्षणिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन है, तब भी सरकार को यह बताना होता है कि आपने पैसा चीन एम्बेसी से क्यों लिया? अगर लिया तो उसका क्या इस्तेमाल क्या? राजीव गांधी फाउंडेशन ने न सिर्फ पैसे लिए, बल्कि कानूनों का उल्लंघन भी किया है। ऐसे में भाजपा जानना चाहती है कि आखिर क्या पक रहा था? कानून में प्रावधान है कि अगर कोई इस कानून का उल्लंघन करता है तो इसके लिए 5 साल तक की सजा हो सकती है, ऐसे में देश इसका जवाब चाहता है।


 
भगोड़े मेहुल चोकसी से लिया चंदा

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फाउंडेशन को भगोड़े कारोबारी मेहुल चोकसी ने 2014-15 में चंदा दिया था। भाजपा का दावा है कि 2015 में चोकसी के खिलाफ कर्नाटक में फजीर्वाड़े का एक मामला दर्ज किया गया था, लेकिन उसके देश से फरार होने तक कोई चार्जशीट दायर नहीं की गई। वहां इस दौरान कांग्रेस की सरकार थी। भाजपा ने सवाल किया कि क्या आरजीएफ को चंदे का मतलब ‘प्रोटेक्टशन मनी’ नहीं है? आरोपों के अनुसार, आरजीएफ की सालाना रिपोर्ट में नवसिराज एस्टेट्स प्राइवेट लिमिटेड का नाम चंदा देने वालों में शामिल है। मेहुल चोकसी इस कंपनी में निदेशक है। उल्लेखनीय है कि मेहुल चोकसी और उसका भांजा नीरव मोदी 14 हजार करोड़ रुपये के पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में मुख्य आरोपी हैं। इस घोटाले के उजागर होते ही चोकसी 2018 में देश से फरार हो गया था और एंटीगा की नागरिकता ले ली थी।

दान देने वालों की सूची
राजीव गांधी फाउंडेशन को दान देने वालों की सूची बहुत लंबी है। इसमें चीन सरकार, चीनी दूतावास, लक्जमबर्ग दूतावास, भारत सरकार का गृह मंत्रालय, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष, जेआरडी टाटा ट्रस्ट, दायचे बैंक, फोर्ड फाउंडेशन, जर्मन टेक्निकल कॉरपोरेशन के अलावा भारतीय कॉरपोरेट जगत की बेशुमार कंपनियां शामिल हैं। इनमें से कई आज भी रकम का खुलासा किए बगैर दान दे रही हैं। फाउंडेशन की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार सरकारी क्षेत्र की कंपनियां भी दान देने में पीछे नहीं रही हैं, इनमें हुडको, आॅयल इंडिया लिमिटेड, ओएनजीसी, सेल, भारतीय स्टेट बैंक, बैंक आॅफ महाराष्ट्र, आईसीआईसीआई और आईडीबीआई शामिल हैं। कंपनियों में कुछ प्रमुख नाम हैं- अल्काटेल साउथ एशिया, अम्बुजा सीमेंट, एपीजे प्राइवेट लिमिटेड, भारत फोर्ज, भारती फाउंडेशन, डीसीएम श्रीराम, जेनपैक्ट, गोदरेज, जीटीएल, जीवीके, महिंद्रा एंड महिंद्रा, ओमैक्स, रैनबक्सी, एसआरएफ, टाटा स्टील, टीवीएस मोटर, उषा मार्टिन, वर्सिला आदि

2005-07 में तो चंदा देने वालों की सूची और भी दिलचस्प हो गई। इस सूची में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष, गृह मंत्रालय, आयरलैंड दूतावास, चीन सरकार, लक्जमबर्ग दूतावास, फोर्ड फाउंडेशन, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार मंत्रालय और लघु उद्योग मंत्रालय भी शामिल हो गए। 2007 के बाद से चीन के साथ राजीव गांधी फाउंडेशन की अंतरंगता लगातार बढ़ती रही। 3 दिसंबर, 2007 को भारत और चीन में आर्थिक स्वतंत्रता विषय पर एक पैनल चर्चा हुई। अक्तूबर 2007 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के न्यौते पर सोनिया गांधी का पांच दिवसीय चीन दौरा हुआ जिसमें उनके साथ राहुल गांधी, केंद्रीय राज्य मंत्री पृथ्वीराज चौहान और आनंद शर्मा भी थे। वहां उनकी मुलाकात चीन के राष्ट्रपति हू जिंताओ के अलावा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के अन्य प्रमुख नेताओं के साथ हुई। इसके बाद 2007-08 में फाउंडेशन की एक कथित अध्ययन परियोजना के लिए चीन सरकार से तीन लाख डॉलर का चंदा मिला। इसका उद्देश्य भारत और चीन में तकनीक हस्तांतरण पर अध्ययन करना था। इसके बाद से चीन के कथित अध्ययन का सिलसिला शुरू हो गया और साथ ही शुरू हुआ देश की नीतियों में तोड़-मरोड़ जिसका आर्थिक लाभ चीन को मिलता गया। 2005-06, 2006-07 और 2008-09 में भी फाउंडेशन को चीन सरकार और चीनी दूतावास से चंदा मिला। 2005-06 में फाउंडेशन को चीन के 21 सेंचुरी इंटरनेशनल स्कूल से भी रकम मिली। 2007-08 में हांगकांग एंड शंघाई बैंकिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड से फाउंडेशन को चंदा मिला। 

चीन मालामाल, स्थानीय कुटीर उद्योग बर्बाद
2006 में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और कमलनाथ वाणिज्य मंत्री। तब कमलनाथ ने चीन जाकर एक ऐसा समझौता किया, जिसने भारत के कई गृह उद्योगों को बर्बाद कर दिया। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार कमलनाथ के समय लगभग 250 वस्तुओं के आयात पर शुल्क 40 से 200 प्रतिशत तक घटा दिया गया। ये वैसी वस्तुएं थीं, जिनका अपने देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन होता था। इनमें बांस, लकड़ी, मिट्टी के सामान आदि शामिल थे। नतीजा यह हुआ कि सस्ते आयात से यहां के कुटीर उद्योग चौपट हो गए। दरअसल, चीन सरकार ने जब राजीव गांधी फाउंडेशन को एक करोड़ रुपये दिए, उसके 10 दिन के बाद ही कमलनाथ चीन गए थे। बिहार, यूपी, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय जैसे बहुत से राज्य ऐसे थे, जहां के किसान बांस की खेती करके अपना गुजारा करते थे। बांस का उपयोग न सिर्फ अगरबत्ती बनाने में होता था, बल्कि दूसरी तमाम चीजें भी बनाई जाती थीं। उधर, चीन भी बांस का बहुत ज्यादा उत्पादन करने लगा। तब उसने कमलनाथ पर दबाव डालकर बांस के आयात पर लगने वाले ड्यूटी को खत्म करवा दिया और भारत में चीन सरकार के दबाव में कांग्रेस सरकार ने बांस को पेड़ की श्रेणी में ला दिया अर्थात अगर किसी किसान को अपना बांस काटना है तो उसे वन विभाग और दूसरे तमाम सरकारी विभागों से जरूरी अनुमति लेनी पड़ेगी।

कांग्रेस सरकार के इस कदम ने लाखों किसानों को बर्बाद कर दिया और भारत में बांस उगा कर गुजारा करने वाले किसान और तमाम कुटीर उद्योग नष्ट हो गए। उसके बाद अगरबत्ती बनाने वाले, खिलौने बनाने वाले सब चीन के बांस पर निर्भर हो गए। नरेंद्र मोदी सरकार ने बाद में संसद ने यह बयान दिया कि हम बांस को फिर से फसल और घास की श्रेणी में रखेंगे। किसान जब चाहे तब बांस को काट सकते हैं। उन्हें बांस काटने के लिए या पूरे भारत में कहीं भी ले जाने के लिए वन विभाग के प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं होगी। मोदी सरकार ने चीन से आने वाले बांस पर एंटी डंपिंग ड्यूटी भी लगा दी। इस तरह, बांस उगाने वाले किसानों की हालत सुधरने लगी है। कांग्रेस के समय चीन के साथ इस तरह के कई समझौते हुए जो राष्ट्रहित में नहीं थे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)