‘अब झुकना नहीं प्रतिकार करना है’

    दिनांक 08-जुलाई-2020
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 रॉबर्ट ओ’ब्रायन

वुहान वायरस संक्रमण और चीन की हमेशा से देखने में आ रहीं चालबाजियों को अमेरिका ने न सिर्फ पहचाना है बल्कि कड़ा कदम उठाया है। अमेरिका ने अपने यहां चीन की कंपनियों और उसके लिए झूठा ‘प्रचार’ कर रहे लोगों या संगठनों के पर कतरे

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राबर्ट ओ’ब्रायन

आज संयुक्त राज्य अमेरिका और हमारे मित्र देशों के सामने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का उभरता कद और चुनौती गंभीर खतरा बन रहा है, लिहाजा इसका समाधान निकालना जरूरी है। राष्ट्रपति ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका अंतत: चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की हरकतों और हमारी जिंदगी पर उसके खतरों के प्रति सचेत होने लगा है। दशकों से अमेरिका के राजनीतिक दलों, कारोबारी समुदायों, शिक्षाविदों और मीडिया की धारणा यही रही है कि समय बीतने के साथ चीन पहले आर्थिक और फिर राजनीतिक रूप से ज्यादा उदार होता जाएगा और इसी नजरिए के तहत हम भी उसके लिए अपने बाजार उदारता से खोलते चले गए। यही नजरिया चीन में पूंजी निवेश, पीपुल्स रिपब्लिक आॅफ चाइना के नौकरशाहों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और यहां तक कि सैन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के कार्यक्रमों में भी बरकरार रहा। इन्हीं आधारों पर 2001 में हमने विश्व व्यापार संगठन में चीन को बड़ी रियायतों और व्यापार संबंधी विशेषाधिकारों के साथ शामिल किया। उस दौरान हमने थ्येनआनमन चौैक सहित चीन के सभी मानवाधिकार हनन के मामलों को भी नजरअंदाज कर दिया था। यही नहीं, हमने चीन की प्रौद्योगिकीय सूचनाएं चुराने वाले उस बड़े कांड को भी नजरअंदाज कर दिया जिसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पंगु बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जैसे-जैसे चीन समृद्ध और मजबूत हुआ, हमने उम्मीेद जताई कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) उदार बनेगी और अपने नागरिकों की बढ़ती लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को पूरा करेगी। हमारे ये विचार विशिष्टत: अमेरिकी विरासत के तहत अंकुरित होने वाली उत्साही भावनाएं थीं, जो हमारे नैसर्गिक आशावाद और सोवियत साम्यवाद पर मिली हमारी विजय के अनुभव से पैदा हुई थीं। पर यह हमारी बड़ी भूल थी और 1930 के दशक के बाद अमेरिकी विदेश नीति की सबसे बड़ी असफलता।

सीपीसी पर भ्रम से हुई चूक
हमसे कैसे यह गलती हो गई? चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के स्वभाव को समझने में हमसे कैसे चूक हो गई? जवाब आसान है। हमने सीसीपी की विचारधारा पर तो गौर ही नहीं किया। हमनें सीसीपी नेताओं के वक्तव्यों को सुना ही नहीं; उन्होंने अपने प्रमुख दस्तावेजों में जो लिखा था, उसे पढ़ा ही नहीं, बल्कि अपने मन में बसी धारणाओं को ही सत्य मानते रहे कि सीपीसी के सदस्य बस नाम के लिए कम्युनिस्ट हैं। दरअसल, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवाद और लेनिनवाद की बुनियाद पर गठित संगठन है, लेकिन पार्टी महासचिव शी जिनपिंग जोसफ स्टालिन की विचारधारा के अनुयायी हैं। आॅस्ट्रेलिया सरकार के पूर्व अधिकारी और पत्रकार जॉन गर्न्यू ने कहा है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वह सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी है जिसने हमेशा स्टालिन की विचारधारा का पालन किया है, उत्तर कोरिया भी कुछ हद तक इसी श्रेणी में आता है। स्टालिन उस क्रूर तानाशाह का नाम है जिसकी बेरहम नीतियों ने लगभग 2 करोड़ रूसियों और अन्यों को भुखमरी, सामूहीकीकरण, मृत्यु दंड और श्रम शिविरों के दमनकारी माहौल का ग्रास बना डाला था। 

चीनी सोच को समझें
लेनिन-स्टालिन-माओ का साम्यवाद एक ऐसा साम्यवाद है जो सर्वसत्तावादी विचारधारा का पोषण करता है। इसमें इंसान एक सामूहिक राष्ट्र-राज्य के लक्ष्य को हासिल करने का साधन मात्र है और इसलिए लक्षित उद्देश्य हासिल करने की प्रक्रिया में इंसानों की बलि चढ़ाने में उनकी मानवीयता उन्हें धिक्कारती नहीं। मार्क्सवाद-लेनिनवाद में इंसानों का मोल नहीं, बल्कि उनका अस्तित्व राष्टÑ की सेवा के लिए है, जबकि राष्ट्र की अपने नागरिकों की सेवा की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं। ऐसे विचार आज पुराने और पिछड़े हुए दिखते हैं। जहां यूरोप में उनका उद्भव डेढ़ सदी पहले हुआ, वहीं रूस में वे एक सदी पहले लागू हुए और फिर 30 साल पहले त्याग दिया गया, क्योंकि यह इतिहास का सबसे महंगा राजनीतिक प्रयोग था जो बुरी तरह विफल रहा। लेकिन चीन के लिए यह विचारधारा चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का बुनियादी सिद्धान्त है, उसी तरह जैसे अमेरिका के लिए संविधान और अधिकार-अधिनियम प्रणाली। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी लोगों के जीवन पर पूरा नियंत्रण चाहती है, जिसका अर्थ है आर्थिक—राजनीतिक नियंत्रण, इंसानी वजूद पर नियंत्रण और यही नहीं, शायद उसके नियंत्रण की भूख व्यक्ति के विचारों पर भी हावी होने की है। 
राष्ट्र  के विस्तार के लक्ष्य के तहत परंपरागत चीनी नीति में पहाड़ों और नदियों पर नियंत्रण हासिल करने के लिए हमेशा दो साधनों को महत्व दिया गया है-पहला, हथियार और हिंसा और दूसरा, भाषा और संस्कृति। चीनी नेताओं ने हमेशा स्वीकार किया है कि शक्तिशाली बनने के लिए युद्ध के मैदान पर विजय हासिल करने के साथ सांस्कृतिक क्षेत्र को भी नियंत्रित करना जरूरी है। लेनिन, स्टालिन और माओ और आज शी के शब्दों में, दलीलों या तर्क-वितर्क से परे बंदूक की गोली की तरह हैं जो विरोधियों को परिभाषित करने, परास्त और बर्बाद करने के लिए इस्तेमाल होते हैं। मतप्रचार सीसीपी के लिए केंद्रीय भूमिका निभाता है। चीन की सत्ता राजनीतिक विचारों पर वर्चस्व कायम करने के प्रयासों को लेकर बेबाक है और आक्रामक रवैये के साथ कदम बढ़ाती है। 1989 में वैचारिक सुरक्षा के नाम पर संगठित हो रही सीपीसी पार्टी के नेताओं के लिए ये शब्दे मानो नारा बन गये। अप्रैल 2013 में पार्टी ने विचारधारा की वर्तमान स्थिति पर आधारित एक नीति जारी की जिसमें गलत सोच या दृष्टिकोण को प्रसारित करने के सभी माध्यमों या मंचों की मनाही कर दी गई।


राष्ट्रपति ट्रंप ने सीसीपी की खुफिया और सैन्य एजेंसियों तक सूचनाएं पहुंचाने वाली हुआवेई जैसी चीन की दिग्गज कंपनियों पर रोक लगाई जो हमारी निजी जानकारी हासिल कर सकती थीं। दूसरा, हुआवेई को सेमीकंडक्टर तकनीक न मिले, इसके लिए अमेरिकी प्रशासन ने प्रतिबंध लगाए। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने चीन की नौ सरकारी प्रोपेगेंडा मीडिया एजेंसियों को विदेशी मिशन घोषित कर दिया।


इसके तहत चीन के अंदर कम्युनिस्ट विचारधारा का अनिवार्य अध्ययन और ऐसे स्मार्टफोन एप का इस्तेमाल करने की ताकीद है जिसके जरिए शी जिनपिन के विचारों से संबंधित सामग्री का अध्य्यन और उन्हें डाउनलोड किया जा सके। यानी देश के सभी मीडिया पर पूर्ण नियंत्रण, साथ ही विदेशी अखबारों से लेकर ट्विटर, फेसबुक और व्हाट्सएप तक सूचना के सभी बाहरी स्रोतों पर प्रतिबंध। चीन ने इतना कड़ा सेंसर लगा रखा है कि वहां घटने वाली किसी भी घटना की जानकारी बाहर नहीं जा सकती। साफ है वहां नागरिक-ब्लॉगर्स से लेकर पत्रकारों, वकीलों, कार्यकर्ताओं और पंथगुरुओं तक सभी एक कैद में जी रहे हैं और उन्हें पार्टी की विचारधारा के खिलाफ एक शब्द तक कहने की आजादी नहीं। हाल ही में इस साल की पहली जनवरी से 4 अप्रैल के बीच, करीब 500 लोगों पर सिर्फ इसलिए आपराधिक कार्रवाई की गई क्योंकि उन्होंने वुहान कोरोना वायरस के बारे में खुलेआम बता दिया था, जिसे पार्टी छिपाने का प्रयास कर रही थी और जिसके कारण उसकी छवि खराब हुई। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपनी विचारधारा का समर्थन करने के लिए बाइबिल सहित तमाम पांथिक ग्रंथों की अलग ही व्याख्या पेश करती है। यहां लाखों मुस्लिम नेताओं और अन्य अल्पसंख्यकों को ऐसे शिविरों में कैद रखा जाता है जहां नई तरह की शिक्षा दी जाती है; उन्हें पार्टी की राजनीतिक विचारधारा अपनाने और पालन करने के लिए विवश किया जाता है; उनसे जबरन मजदूरी कराई जाती है और उनके बच्चों को पार्टी के अनाथालयों में पाला जाता है। यह प्रक्रिया इन शिविरों में बंदी बनाए गए लोगों के परिवार, पंथ, संस्कृति, भाषा और विरासत को नष्ट कर देती है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता न सिर्फ सूचना पर कड़ा अंकुश रखती है, बल्कि लोगों की अभिव्यक्तियों पर भी लगातार निगरानी बनाए रखती है, ताकि उन्हें कुचल सके या राज्य की सुविधानुसार ढाला जा सके।

सतर्क रहना होगा हमें
अमेरिकियों को सचेत होने की जरूरत है। हमें सिर्फ चीन के लोगों के लिए ही नहीं, बल्कि खुद के लिए भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि वैचारिक नियंत्रण के लिए शी की महत्वाकांक्षा केवल अपने ही लोगों तक सीमित नहीं है। सीसीपी का घोषित लक्ष्य मानव जाति को एक ऐसा समुदाय बनाने की है जिसकी नियति एक समान हो। उसकी आकांक्षा पूरे विश्व को फिर से गढ़ने की है। पिछले एक दशक से चीन अपनी सीमाओं से परे कदम बढ़ाकर इंसानों के विचार को नियंत्रित करने का प्रयास सुनियोजित तरीके से कर रहा है। पार्टी ने विदेशों में अपने मतप्रचार पर अरबों डॉलर का निवेश किया है। सीसीपी दुनियाभर से चीनी भाषा के उन सभी मीडिया मंचों को खत्म करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है जो उसके खिलाफ खबरें देते हैं और वह सफलता के बेहद करीब है। अमेरिका में चीनी भाषा के लगभग हर समाचार पत्र पर या तो पार्टी का स्वामित्व है या वह पार्टी के लिए काम करता है। गौरतलब है कि यह धीरे-धीरे अंग्रेजी भाषा के मीडिया में भी प्रवेश कर रहा है। अमेरिकी शहरों में करीब एक दर्जन एफएम रेडियो स्टेशन हैं जिनके जरिए चीन समर्थक प्रोपेगेंडा बड़ी चतुराई से अपनी जगह बना रहा है। इस प्रोपेगेंडा की व्यूह रचना कितनी गठी हुई है उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने कई अमेरिकियों के मन में शंका पैदा कर दी कि 'कोरोना वायरस का संक्रमण चीन के वुहान से नहीं शुरू हुआ, बल्कि एक अमेरिकी सैनिक से वुहान पहुंचा'। सीसीपी ने एक झूठी कहानी गढ़ी कि 'उस सैनिक और उसके परिवार को मौत से बचाने के लिए निजी सुरक्षा घेरे की आवश्यकता थी और उन्हें मैरीलैंड में रखा गया है'। चीनी स्वामित्व वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म टिक-टॉक को करीब 4 करोड़ से अधिक अमेरिकी इस्तेमाल करते हैं जिसमें संभवत: बच्चे और कम आयु वर्ग के लोगों की संख्या भी अच्छी-खासी है। इस प्लेटफार्म पर उन उपयोगकर्ताओं के खातों को नियमित रूप से हटा दिया जाता था जो सीसीपी और चीन की नीतियों की आलोचना करते थे। पिछले हफ्ते ट्विटर ने हांगकांग और कोविड 19 पर प्रोपेगेंडा करने वाले सीसीपी से जुड़े करीब 23,000 खातों पर रोक लगाने की घोषणा की थी। हाल में करीब 150,000 अन्य सीसीपी खातों को भी हटाया गया है और उन खातों पर भी रोक लगाई गई है जिनका इस्तेमाल अमेरिका विरोधी सूचनाएं फैलाने और ट्विटर पर भ्रम का माहौल तैयार करने के लिए किया जा रहा था कि अमेरिका में चीन की नीतियों को समर्थन मिल रहा है। ये तो बस गिने-चुने खाते हैं जिन्हें ट्विटर ने पकड़ा, ऐसे कितने अनजान प्लेटफार्म अपनी चालें चल रहे होंगे, किसे पता!

मीडिया और कारोबारी उद्यमों पर नियंत्रण
मार्च 2020 में सीसीपी ने न्यूयॉर्क टाइम्स, द वॉल स्ट्रीट जर्नल और द वाशिंगटन पोस्ट के लिए काम करने वाले अमेरिकी पत्रकारों को निकाल दिया, जिससे वुहान वायरस पर चीन के अंदर होने वाली स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर पूरी तरह से पर्दा पड़ गया। साथ ही सीसीपी अपनी पैठ का इस्तेमाल कर अमेरिकी अधिकरियों के भाषण पर भी अंकुश लगा रही है तथा चीन और सीसीपी के संबंध में अमेरिकी लोगों को मिलने वाली सूचनाओं को प्रभावित कर रही है। जब यूनिवर्सिटी आॅफ कैलिफोर्निया, सैन डिएगो यूसीएसडी ने 2017 में अपने दीक्षांत समारोह में दलाई लामा को भाषण के लिए आमंत्रित किया था तो चीन ने सरकारी धन पर यूसीएसडी जाने वाले चीनी छात्रों पर रोक लगा दी थी। जब ह्यूस्टन रॉकेट के महाप्रबंधक ने हांगकांग के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के लिए अपना समर्थन ट्वीट किया, तो सीसीपी ने घोषणा की कि उस टीम के खेल को चीन के टीवी चैनलों पर प्रसारित नहीं किया जाएगा। साथ ही उसने अपनी आर्थिक शक्ति की धौंस दिखाकर बास्केटबॉल की अन्य टीमों और मशहूर खिलाड़ियों पर दबाव बनाया कि वे चीन के पक्ष में दलील देते हुए उस ट्वीट की आलोचना करें। मैरियट अमेरिकन डेल्टन यूनाइटेड एयरलाइंस को अपनी कॉपोर्रेट वेबसाइट से ताइवान संबंधित सभी निर्देश हटाने पड़े। मर्सिडीज बेंज ने सोशल मीडिया पर दलाई लामा के एक प्रेरक उद्धरण पोस्ट करने के लिए माफी भी मांगी। बीजिंग ने अपने पैसे की ताकत और बाजार में अपनी पैठ का इस्तेमाल कर हॉलीवुड को भी अप्रत्यक्ष ताकीद दे रखी है कि वे अपनी फिल्में ऐसे सेंसर करें कि उन्हें चीन में बगैर रोक चलाया जा सके। चीन फिल्म निर्देशकों, निर्माताओं और अभिनेताओं को भी अपनी उंगली पर नचाता है और उन पर ऐसी फिल्में बनाने का दबाव डालता है जो चीन के उजले पक्ष को दिखाएं। मिसाल के लिए टॉप गन मेवरिक की आगामी श्रृंखला में टॉम क्रूज की फ्लाइट जैकेट से जापान और ताइवान के झंडे को हटा दिया गया। एमजीएम ने रेड डॉन के 'रीमेक' में डिजिटली बदलाव करके चीन की जगह उत्तर कोरिया को हमलावर दिखाया है। 

अमेरिकी लोगों पर शिकंजा
सीसीपी अमेरिकावासियों पर हावी होना चाहती है। पार्टी यहां लोगों के सबसे अंतरंग डाटा, शब्द, कार्य, खरीदारी, पता, स्वास्थ्य दस्तावेजों, सोशल मीडिया पोस्ट, बातचीत आदि सब इकट्ठा कर रही है और लोगों के दोस्तों, परिवार और परिचितों के नेटवर्क की ब्योरेवार सूचना तैयार कर रही है। सीसीपी हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, दूरसंचार और यहां तक कि मूल कंपनियों को सब्सिडी देकर अपना लक्ष्य पूरा करती है। हुआवेई और जेडटीई जैसे कारपोरेशन अपने प्रतिस्पर्धियों को पछाड़ने के लिए कम पैसे में दुनिया भर में अपने उपकरण लगाते हैं, बेशक उन्हें नुकसान ही क्यों न उठाना पड़े। इसके पीछे उनका उद्देश्य दरअसल टेलीकॉम हार्डवेयर के अमेरिकी निमार्ताओं के कारोबार को बर्बाद करना है। वास्तव में नोकिया और एरिक्सन के लिए आज समय बहुत मुश्किल बन गया है। वे ऐसा क्यों करते हैं? इसके पीछे सीपीसी का उद्देश्य टेलीकॉम हार्डवेयर या सॉफ्टवेयर का मुनाफा नहीं, बल्कि आपका डाटा है और वे उस डाटा को प्राप्त करने के लिए अपने उत्पादों को आपके इस्तेमाल के लिए आसान कीमतों में उपलब्ध कराते हैं।

सूचनाओं की चोरी 
जब चीनी पार्टी आपका डाटा नहीं खरीद सकती तो वह इसे चुरा लेती है। 2014 में सीसीपी ने 8 करोड़ अमेरिकियों की संवेदनशील जानकारी इकट्ठी करने के लिए ऐन्थम स्वास्थ्य बीमा की वेबसाइट को हैक कर लिया था; 2015 में कार्मिक प्रबंधन के कार्यालय को हैक किया गया जहां संघीय सरकार के लिए काम करने वाले 2 करोड़ अमेरिकियों से संबंधित सुरक्षा मंजूरी से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं; 2017 में इक्विफैक्स को हैक करके 14.5 करोड़ अमेरिकियों के नाम, उनकी सामाजिक सुरक्षा संख्या और क्रेडिट स्कोर की जानकारी चुरा ली गई; 2019 में सीसीपी ने मैरियट को हैक करके 38.3 करोड़ मेहमानों की जानकारी हासिल कर ली जिसमें उनके पासपोर्ट नंबर तक शामिल थे। 2016 में एक चीनी कंपनी ने एक 'डेटिंग एप' ग्रिनडर को भी खरीद लिया जिसके जरिए उपयोगकतार्ओं की एचआईवी संबंधी जानकारी भी हासिल की जा सकती थी। अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताते हुए उस पर रोक लगा दी। 


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अमेरिका में हुआवेई का दफ्तर

अब सवाल है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी आखिर इस डाटा को कैसे इस्तेमाल करेगी? उसी तरह जैसे यह चीन की सीमाओं के अंदर करती है; किसी पर निशाना साधने, किसी को मक्खन लगाने, किसी को समझाने-बुझाने, किसी को प्रभावित करने, तो किसी को डरा-धमकाकर अपना काम कराने या अपना हित साधने के लिए, जिससे पार्टी के सरोकारों और लक्षित उद्देश्यों की पूर्ति हो सके। प्रचार का ऐसा दक्ष कौशल चीन के पास है कि उसे रोकना टेढ़ी खीर है, क्योंकि उसे किसी सरकारी अधिनियम के तहत प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी आपसे संबंधित सभी सूचनाओं को अपने पास इकट्ठा करना चाहती है, वैसे ही जैसे चीन में रहने वाले लगभग हर व्यक्ति के बारे में उसके पास जानकारी मौजूद है। प्रोपेगेंडा और प्रभाव बढ़ाने वाली गतिविधियों के अलावा, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी अपनी शर्तें लागू करने के लिए कारोबार का सहारा लेती है।

वैश्विक दादागिरी
जब आॅस्ट्रेलिया ने कोरोना वायरस की शुरुआत से संबंधित जानकारी के लिए स्वतंत्र जांच की मांग की तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने आॅस्ट्रेलिया के सभी प्रकार कृषि उत्पादों की खरीद बंद करने और चीन के छात्रों और पर्यटकों पर आॅस्ट्रेलिया जाने की रोक लगाने की धमकी दे डाली। आॅस्ट्रेलिया उसके दबाव में नहीं आया तो चीन ने इस धमकी पर अमल करते हुए आॅस्ट्रेलिया के जौ उत्पादों के आयात पर 80 फीसदी शुल्क लगा दिया। अंतरराष्ट्रीय संगठन भी चीन की योजना में शामिल हो गए। चीन विभिन्न विश्व संगठनों में प्रभावशाली भूमिका में है। आज संयुक्त राष्ट्र की 15 विशिष्ट एजेंसियों में चार का नेतृत्व चीन के पास है। सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्यों में बाकी के चार देशों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस को मिलाकर भी देखें तो चीन जितना नेतृत्व उनके पास नहीं। इन नेताओं के जरिये पीपुल्स रिपल्बिक आॅफ चाइना इन अंतरराष्ट्रीय संगठनों को चीन की भाषा बोलने और इनके प्रतिष्ठानों में चीनी दूरसंचार उपकरण लगाने के लिए बाध्य करता है।


जब आस्ट्रेलिया ने कोरोना वायरस की शुरुआत से संबंधित जानकारी के लिए स्वतंत्र जांच की मांग की तो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने आस्ट्रेलिया के सभी प्रकार के कृषि उत्पादों की खरीद बंद करने और  चीन के छात्रों और पर्यटकों पर आस्ट्रेलिया जाने की रोक लगाने की धमकी दे डाली। आस्ट्रेलिया उसके दबाव में नहीं आया तो चीन ने इस धमकी पर अमल करते हुए आस्ट्रेलिया के जौ उत्पादों के आयात पर 80 फीसदी शुल्क लगा दिया।
उदाहरण के लिए, जिआओ हू लिन ने अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ का काम संभालते ही हुआवेई की बिक्री बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। इंटरनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन के सचिव फौंग लियो ने आमसभा की बैठक में ताईवान को तो हिस्सा लेने से रोक दिया, पर संगठन पर चीन की पैठ को लेकर कोई सवाल नहीं उठाया। पार्टी ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में चीन की सदस्यता को ढाल बनाकर सिंक्यांग और हांगकांग में हो रहे अत्याचारों के लिए चीन पर उंगली नहीं उठने दी। सीसीपी की पहुंच न केवल उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों तक सीमित है जिनकी अध्यक्षता चीन के पास है बल्कि ऐसे अन्य संगठनों के प्रमुखों को भी चीन अंगूठे के नीचे रखता है जिन्होंने वुहान वायरस के मामले में चीन के हितों को साधकर मानवीय जीवन को अत्येधिक क्षति पहुंचाई है, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन के महासचिव टेड्रोस। जनवरी के मध्य तक ट्रेडोस दावा करते रहे कि यह वायरस मनुष्य से मनुष्य में नहीं फैलता। एक ओर तो टेड्रोस ने अंतरराष्ट्रीय यात्रा प्रतिबंधों का विरोध किया, वहीं वुहान के लोगों की घरेलू यात्रा पर लगाए गए प्रतिबंधों की तारीफ की। दूसरे शब्दों में, वुहान के लोग वायरस लेकर विदेश तो जा सकते थे, लेकिन बीजिंग या शंघाई नहीं। जैसा हम देख रहे हैं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों में सीसीपी के इस तरह के मतलबी हथकंडे न केवल अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बन चुके हैं। 

वक्त फैसले का
अच्छी बात यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में हमें पता है कि सीसीपी क्या कर रही है और हम उसकी आलोचना भी करने लगे हैं। हम इसका सामना करने के लिए हर मोर्चे पर निर्णायक फैसले ले रहे हैं। सबसे पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने सीसीपी की खुफिया और सैन्य एजेंसियों तक सूचनाएं पहुंचाने वाली हुआवेई जैसी चीन की दिग्गज कंपनियों पर रोक लगाई जो हमारी निजी जानकारी हासिल कर सकती थीं। दूसरा, हुआवेई को सेमीकंडक्टर तकनीक न मिले, इसके लिए अमेरिकी प्रशासन ने प्रतिबंध लगाए। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने चीन की नौ सरकारी प्रोपेगेंडा मीडिया एजेंसियों को विदेशी मिशन घोषित कर दिया। ये संगठन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र हैं और इन तथाकथित मीडिया संगठनों के विदेशी मिशन घोषित होने से इन पर अपनी गतिविधियों की जानकारी देने और वीजा संबंधी शर्तें लागू हो गईं। तीसरे, राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन के दमनकारी अभियान में शामिल होने के कारण चीन के 21 सरकारी प्रतिष्ठानों और 16 कंपनियों पर भी प्रतिबंध लगाए। उइगर समेत अन्य अल्पसंख्यकों को स्वैच्छिक हिरासत में रखा गया है, उन पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है और उनके दमन में लिप्त चीनी अधिकारियों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके साथ ही प्रशासन ने उइगर बंधुआ मजदूरों से काम कराने वाली कंपनियों के उत्पादों के अवैध आयात पर प्रतिबंध लगा दिए हैं। चौथा, राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन के प्रदर्शनकारियों के 'चुनाव की आजादी की रक्षा' के नाम पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद से किनारा कर लिया है। उन्होंने विश्व स्वास्थ्य संगठन से भी अमेरिका को अलग कर लिया है, क्योंकि इस वैश्विक महामारी के दौरान संगठन चीन से सवाल पूछने के बजाय उसका महिमामंडन करता रहा।
  भ्रष्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन को हर साल 40 करोड़ डॉलर देने की अपेक्षा अब अमेरिका और इसके उदार करदाता अपने पैसे सीधे वहां देंगे जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी यानी दुनियाभर के विकासशील देशों में काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों को। पांचवां, राष्ट्रपति ट्रंप ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की चालाकियों पर भी अंकुश लगाया है जो अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को अमेरिकी तकनीक, बौद्धिक संपदा और सूचना चुराने के लिए छात्र वीजा पर अमेरिका के कॉलेजों में दाखिला दिलाने के लिए हमेशा आगे रहा है। छठा, राष्ट्रपति ने अमेरिका के संघीय कर्मचारियों के सेवानिवृत्ति फंड से चीन के सैन्य ठेकेदारों और पांथिक अल्पसंख्यकों पर निगरानी के लिए उपकरण बनाने वाले निर्माताओं समेत चीनी कंपनियों में निवेश पर रोक लगाने की पहल की। राष्ट्रपति अमेरिकी शेयर बाजार में अब भी सूचीबद्ध चीन की कंपनियों की अस्पष्ट खाता प्रणाली की जांच कर रहे हैं और इसी हफ्ते रक्षा विभाग अमेरिका में कारोबार कर रही उन चीनी कंपनियों का ब्योरा कांग्रेस के सामने रखने वाला है जिनके पीपुल्स लिबरेशन आर्मी से संबंध हैं ताकि लोगों को मालूम हो सके कि वे किसके साथ कारोबार कर रहे हैं। ये कदम तो बस शुरुआत हैं।  चीन की अनुचित कारोबारी गतिविधियों की सजा के तौर पर अमेरिका ने जिस तरह उस पर शुल्क लगाए हैं, वैसे और भी कदम उठाए जाएंगे।   

झुकेंगे नहीं, जवाब देंगे
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह अच्छी तरह समझते हैं कि शांति की स्थायी स्थापना के लिए शक्ति का होना जरूरी है। हम दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश हैं, हम सीसीपी के आगे नहीं झुकेंगे, अब तक लिए गए कदम यही दर्शा रहे हैं। ट्रंप प्रशासन सीसीपी की अनिष्टकारी गतिविधियों का मुकाबला कर रहा है। वह इस बात का खुलासा करेगा कि सीसीपी की सोच क्या है, और न केवल चीन, हांगकांग और ताईवान बल्कि पूरी दुनिया के लिए उसकी योजना क्या है। जिस तरह सीसीपी हमारे लोगों और सरकारों के साथ धूर्तता कर रही है, हमारी अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान पहुंचा रही है और हमारी संप्रभुता के साथ खिलवाड़ कर रही है, अमेरिका अपने मित्र देशों और सहयोगियों के साथ मिलकर उसका मुकाबला करेगा। पीपुल्स रिपब्लिक आॅफ चाइना के प्रति अमेरिकी उदासीनता और सरल व्यवहार के दिन अब खत्म हुए। हम अपने सिद्धांतों पर खरे उतरेंगे, खासतौर पर अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में, जिसके बारे में मार्क्सवादी—लेनिनवादी विचारधारा की सोच एकदम उलट है और सीसीपी उसी पर अमल कर रही है। राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में हम विचारों की विविधता को प्रोत्साहित करेंगे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देंगे, अमेरिकियों की निजी सूचनाओं की सुरक्षा करेंगे और सबसे बढ़कर इस सोच को बुलंद करेंगे कि सभी महिला-पुरुषों को आजादी, जीवन और खुशहाली का अधिकार ईश्वर ने दिया है और उन्हें इसे पाने का पूरा हक है।

सीसीपी चीन नहीं
हमारे मन में चीन के लोगों के प्रति गहरा सम्मान और प्रशंसा है। एक देश के तौर पर अमेरिका की चीन से लंबी ऐतिहासिक मित्रता रही है, लेकिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का मतलब चीन या वहां के लोग नहीं है। जैसा कि हाल के व्यापार सौदे ने बताया, हमारी सरकारों के लिए चीन के साथ लाभप्रद रिश्ता बनाना संभव है और हम चीन के साथ अच्छे संबंध चाहते भी हैं, लेकिन इन शर्तों पर नहीं जो बीजिंग अभी थोपना चाह रहा है। एक अमेरिकी होने के नाते मैं आश्वस्त हूं कि जैसे हम अपने इतिहास के दौरान बड़े से बड़े संकट से उबरने में कामयाब रहे, वैसे ही सीसीपी की चुनौतियों का भी हम सफलतापूर्वक सामना कर पाएंगे।
(25 जून 2020 को एरिजोना में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट ओ'ब्रायन के वक्तव्य के संपादित अंश)