न चीन बदला, न चीनी मीडिया

    दिनांक 08-जुलाई-2020
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नम्रता हसीजा

चीन भारत के साथ प्रत्यक्ष लड़ाई नहीं चाहता, क्योंकि उसके लिए भारत एक बड़ा बाजार है, जिसे वह कतई खोना नहीं चाहता। इसलिए वह सीमा विवाद को तूल देकर भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है। इसमें सरकारी नियंत्रण वाला आधिकारिक मीडिया उसका साथ दे रहा है। दोनों का रवैया वैसा ही है, जैसा डोकलाम विवाद के समय था
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वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के सैनिक डटे हुए हैं।


भारत और चीन के बीच 3800 किलोमीटर से अधिक लंबी सीमा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कही जाती है। हालांकि दोनों देश एक-दूसरे के दावों को सही नहीं मानते हैं और शांति कायम रखने के लिए यथास्थिति बनाए हुए हैं। पूर्वी लद्दाख में कई स्थानों पर सीमा विवाद चल रहा है, जिसमें दौलत बेग ओल्डी, गोगरा, गलवान घाटी, चुशूल, पैंगोंग त्सो, डेमचोक और उत्तरी सिक्किम में नाकु-ला शामिल है। इस बार सीमा उल्लंघन  पिछले अतिक्रमणों से अलग है। इससे लगता है कि हालिया दुस्साहस की तैयारी चीन लंबे समय से कर रहा था। चीन का पूरा जोर गलवान घाटी को अपना क्षेत्र घोषित करवाने पर है।

इस बार केवल चीनी सेना ही नहीं, बल्कि चीनी मीडिया का रवैया भी अलग है, जैसा 2017 में डोकलाम के समय था। 6 मई को जब सीमा विवाद शुरू हुआ तब चीन का आधिकारिक मीडिया इस मुद्दे पर चुप रहा। 15 जून के बाद जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा, तब चीन के समाचारों में इस मामले ने तूल पकड़ा। हालांकि ज्यादातर चीनी भाषी मीडिया इस मुद्दे पर अभी तक चुप ही है। अभी तक सिर्फ पीपुल्स डेली में चीनी भाषा में एक लेख आया है जो 18 जून को छपा था। यह लेख भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई वार्ता को लेकर है। वहीं, 15 जून से 19 जून तक ग्लोबल टाइम्स ने 15 लेख छापे, जबकि 6 मई से लेकर 15 जून तक सिर्फ 4 लेख ही छापे थे। इसमें ग्लोबल टाइम्स में 19 जून को छपा वह कार्टून भी शामिल है, जिसमें भारत का माखौल उड़ाते हुए यह दशार्या गया कि किस तरह से अमेरिका भारत को चीन से युद्ध करने के लिए उकसा रहा है। इसमें संपादक ने भारत को आगाह करते हुए लिखा है कि चीन को समझने में भारत गलती कर रहा है और भारत का अभिजात्य वर्ग मौजूदा संकट को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।

इसके अलावा, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के पश्चिमी थिएटर कमांड के प्रवक्ता कर्नल झांग शुइली का एक लेख शिन्हुआ में छपा। इसमें 20 भारतीय सैनिकों के बलिदान का जिक्र करते हुए भारत को बातचीत का रास्ता अपनाने की धमकी भरी सलाह दी गई थी। दूसरे लेख में विदेश मंत्री वांग यी और एस.जयशंकर के साथ हुई बातचीत को छापा गया। 16 जून को इसे दोबारा छापा गया। इस तरह, ग्लोबल टाइम्स ने लगातार भड़काऊ लेख छापे। दिलचस्प बात यह है कि चीनी सरकार जानती है कि ज्यादातर भारतीय चीनी भाषा नहीं पढ़ सकते। इन लेखों में चीन के इरादे जाहिर होते हैं। चीन की धमकी को दो तरह से समझा जा सकता है-लेखों तथा वीडियो के जरिए।  मीडिया के जरिये चीन मनोवैज्ञानिक युद्ध दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। उसने एक वीडियो जारी किया, जिसमें पीएलए के सैनिकों को सीमा के पास अभ्यास करते हुए दिखाया गया ताकि पाठक, दर्शक चीन की ताकत को भारत से बेहतर मान सकें। 18 जून को छपे एक लेख में 1962 के युद्ध का लेखा-जोखा दिया गया कि चीनी सेना किस तरह भारतीय सेना से बेहतर है। साथ ही, चीनी लोगों को विवो और वी-चैट के जरिए समझाया गया कि पीएलए की ताकत आज भी भारत से अधिक है। ये तमाम लेख तीन मुख्य बिंदुओं पर केंद्रित हैं। पहला, संकट भारत की वजह से है। दूसरा, अमेरिका भारत को चीन के साथ युद्ध के लिए उकसा रहा है। तीसरा, भारत में उठ रही चीनी सामान के बहिष्कार की आवाजें अंततोगत्वा भारत-चीन संबंधों को और खराब करेंगी।

पहली रणनीति से यह समझना मुश्किल नहीं है कि खुद को पीड़ित दिखाना और सारा दोष विरोधी पर मढ़ने का चीन का रवैया पुराना है। दूसरा, इन लेखों का उद्देश्य भारतीयों के चरित्र पर निशाना साधना है कि वह उतने ईमानदार नहीं हैं जितना फिल्मों में दिखाया जाता है। इसे सही साबित करने के लिए बाकायदा एक लेख लिखा गया। इसमें एक घटना का जिक्र किया गया है कि चीन के विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले एक भारतीय छात्र ने सोशल मीडिया पर चीन के खिलाफ कुछ लिखा था, जिससे चीनी नागरिक नाराज हो गए और उसे माफी मांगनी पड़ी।

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पूर्वी लद्दाख में भारतीय सैनिकों के साथ झड़प में चीन के 40 से अधिक सैनिक मारे गए।

इसी तरह, 17 जून को छपे एक लेख में यह स्थापित करने की कोशिश की गई कि ज्यादातर चीनी नागरिक सीमा विवाद पर भारत के रवैये से नाराज हैं, जबकि उस समय करीब 7.30 करोड़ की तादाद वाला हैशटैग (#IndoChinaBorder)  ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा था। लेकिन चीनियों को भारतीयों की एकतरफा आलोचना करते दिखाया गया। कुल मिलाकर चीन ने यह बताने की कोशिश की कि भारत ने एलएसी पार कर चीन की ‘संप्रभुता’ पर हमला किया है। साथ ही, यह भी दिखाने का प्रयास किया कि चीन एक शांतिप्रिय देश है।

17 जून को ही ग्लोबल टाइम्स के एक लेख में छपा कि मौजूदा परिस्थिति में भारत और अमेरिका की दोस्ती सामरिक दृष्टि से हिंद-प्रशांत के लिए महत्वपूर्ण हो गई है। यह कदम चीन का मुकाबला करने के लिए उठाया जा रहा है, लेकिन इससे पूरे इलाके की शांति को नुकसान पंहुच रहा है। चीन की तरफ से दी जा रही तीसरी धमकी पर खासा ध्यान देने की जरूरत है, जो उसकी कमजोर कड़ी को दिखाती है। हालांकि इसमें भी भाषा और तेवर भारत को चेतावनी देने वाले हैं। लेकिन इस धमकी में छिपे तमाम पक्षों पर गौर करने पर पता चलता है कि डोकलाम संकट के समय चीनी व्यापारी मुश्किल में आ गए थे और सरकार ने उन्हें हर परिस्थिति के लिए तैयार रहने की सलाह दी थी। चीनी व्यापारी परेशान हैं कि अगर दोनों देशों के बीच में सीमा विवाद बढ़ा तो भारतीय जनता का गुस्सा उनके लिए बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। चीन के लिए भारत एक बड़ा बाजार है, जहां करीब 40 करोड़ मध्यमवर्गीय भारतीय चीनी माल खरीदते हैं। 19 जून को एक अन्य संपादकीय में चीनी सामान का बहिष्कार करने के आह्वान करने पर पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह और पूर्व भारतीय मेजर रंजीत सिंह की आलोचना की गई है। यह भी लिखा गया कि हर साल भारत में इस तरह के नारे उठते हैं और इनको जानबूझकर हवा दी जाती है। इसके बावजूद भारत इस स्थिति में नहीं है कि वह चीन से आने वाले सामान को रोक सके, क्योंकि भारत के लिए ऐसे सामान बनाना न केवल असंभव है, बल्कि इतनी कम कीमत पर पश्चिमी देशों से भी नहीं खरीद सकता। इन लेखों के अलावा ग्लोबल टाइम्स के संपादक हू शिजिन (जो पीपुल्स डेली के पूर्व उपसंपादक रह चुके हैं) ने ट्विटर पर भारत के खिलाफ धावा बोला। उन्होंने कई ट्वीट कर चीनी नागरिकों से सरकार के साथ देने की भावनात्मक अपील की। लेकिन अतिभावुकता मे वह यह भी बता गए कि सीमा पर हिंसक मुठभेड़ में कई चीनी सैनिक भी हलाक हुए हैं। विवो और वी-चैट में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि चीनी नागरिक अपने सैनिकों की कुशलता के लिए चिंतित हैं। कई लोग अपने सगे-संबंधी और नजदीकी रिश्तेदारों के सकुशल लौटने के लिए प्रार्थना करते नजर आए।
15 जून के बाद पूर्वी लद्दाख सीमा पर जब भारत-चीन के बीच बीच तनाव बढ़ा, तब चीन के समाचारों में इस मामले ने तूल पकड़ा। हालांकि ज्?यादातर चीनी भाषी मीडिया इस मुद्दे पर अभी तक चुप ही है। अभी तक सिर्फ पीपुल्स डेली में चीनी भाषा में एक लेख आया है जो 18 जून को छपा था। यह लेख भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच हुई वार्ता को लेकर है। वहीं, 15 जून से 19 जून तक ग्लोबल टाइम्स ने 15 लेख छापे, जबकि 6 मई से लेकर 15 जून तक सिर्फ 4 लेख ही छापे थे।



इन लेखों में बार-बार मुख्य रूप से 1962 के युद्ध का हवाला दिया गया ताकि भारतीयों को डराया जा सके। साथ ही, चेतावनी भी दी गई कि चीन आज भी ताकतवर है। 2017 के डोकलाम संकट के वक्त भी यही तरीका आजमाया गया था। हालांकि इस बार इन लेखों में सीधा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला न कर यह सलाह दी गई कि सीमा पर विवाद और तनाव से भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है। 17 जून को छपे इसी लेख में यह भी दावा किया गया कि प्रधानमंत्री मोदी के तमाम प्रयासों के बावजूद अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आ पाई है। वहीं, 19 जून को एक चीनी महिला फौजी के ट्विटर हैंडल से प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा हमला करवाया गया कि वह भारतीय मीडिया को यह नहीं बता रहे हैं कि 15 जून की झड़प में कितने भारतीय सैनिक मारे गए। दिलचस्प बात यह है कि इस महिला फौजी को ट्विटर पर कई चीनी राजदूत फॉलो करते हैं, जिसमें कराची में चीनी काउंसिल जनरल और कोलकाता स्थित चीनी दूतावास के शीर्ष अधिकारी भी शामिल हैं। एक दिन में कई ट्वीट कर कहा गया कि भारत को कश्मीर से बाहर निकल जाना चाहिए।  पिछले कुछ समय में चीनियों के लिए ट्विटर साइबर युद्ध का नया मैदान बन गया है। यहां पर प्रवक्ता जाओ जैसे स्वयंभू कमांडर लगातार झूठ फैला रहे हैं कि चीनी ताकत और दबाव के चलते भारत को अपने सैनिकों को वापस बुलाने पर मजबूर होना पड़ा। यह भी कहा गया कि भारतीय सैनिक एलएसी पार कर चीनी क्षेत्र में दाखिल हुए और चीन को नुकसान पहुंचाया। इस प्रकार से चीनी साइबर योद्धाओं ने भारत के खिलाफ प्रचार में हर तरह के हथकंडे अपनाए, पर प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा उसका जिक्र नहीं किया। मौजूदा सीमा विवाद भारत की राजनीतिक सत्ता को स्पष्ट संकेत के लिए खड़ा किया गया। चीन की प्रभावशाली थिंक टैंक चाइनीज मॉडल एंड स्टडीज (सीएएसएस) ने अपने लेख में पूरी गलवान घाटी के ऐतिहासिक आधिपत्य पर चीनी कब्जे की वकालत करते हुए एक लेख लिखा कि यह इलाका चीन का है और श्योक नदी के पास भारतीय सेना की गतिविधि चीन के क्षेत्र में अतिक्रमण की तरह है।

चीन केवल भारत के बड़े और प्रभावशाली बाजार के कारण सीधी लड़ाई नहीं कर रहा है। अगर उसे इस बाजार की चिंता न हो तो उसकी कारगुजारियां कहीं अधिक होंगी। संभवत: बाजार की क्षमता और अंतरराष्ट्रीय दबाव ही चीन को ‘ग्रेट चाइनीज नेशन’ बनाने से रोक रही हैं।
(लेखिका चीन विश्लेषण और रणनीति केंद्र में शोध सहायक हैं)