तिब्बत से गुजरेगी शांति की राह

    दिनांक 08-जुलाई-2020
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पाञ्चजन्य ब्यूरो

भारत की सीमा ऐतिहासिक रूप से तिब्बत से लगती है। 50 के दशक में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद से भारत-चीन संबंध लगातार बिगड़ते रहे हैं। चीन की चाल को पहचानना आसान नहीं है। लेकिन तिब्बत के निर्वासित लोगों के मन के यह आस सदा से बनी हुई है कि समस्या सुलझेगी और वे फिर से अपनी धरती पर लौटेंगे। इस सबमें भारत की महत्वपूर्ण भूमिका है। तिब्बत को गंभीरता से लेते हुए हिमालयी क्षेत्र में शांति के प्रयास करने होंगे   

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तिब्बत का पोटाला पैलेस, दलाई लामा का अधिकृत स्थान
 
  
केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के अध्यक्ष डॉ. लॉबसांग सांग्ये ने पिछले दिनों दक्षिण एशिया के विदेशी संवाददाता क्लब के साथ ‘तिब्बत और भारत-चीन सीमा विवाद के निपटारे में इसका महत्व’ विषय पर वेबीनार के जरिए विस्तृत बातचीत की। शुरू में डॉ. सांग्ये ने विषय पर अपने विचार प्रकट किए जिसके बाद क्लब के सदस्यों ने उनसे अनेक सवाल किए जिसके डॉ. सांग्ये ने तर्कपूर्ण जवाब दिए। क्लब के अध्यक्ष एस. वेंकटनारायण ने पूछा कि चीन और भारत की सेनाएं 1000 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आमने-सामने हैं और आज स्थिति विकट लग रही है। माओ त्से तुंग और उनके अन्य सहयोगी लगातार कहते थे कि तिब्बत हथेली है और लद्दाख, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नेपाल और भूटान उंगलियां। क्या इसका मतलब यह है कि चीनी भविष्य में इन स्थानों पर भी कब्जा करने की सोच रहे हैं? तिब्बत और चीन के बीच वार्ता की स्थिति क्या है? साथ ही, भारत और चीन जैसे दो परमाणु-शक्ति से लैस देशों की सेनाओं के बीच मौजूद तनाव को कैसे देखते हैं?
हम गांधीवादी अहिंसा का पालन करते हैं, हम युद्ध का त्याग करते हैं। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हमें आत्मरक्षा का अधिकार  है। अगर आप विश्व इतिहास में देखें तो पाएंगे कि भारत आक्रांता नहीं रहा है। आज भी सीमा पर अतिक्रमण चीन की तरफ से हो रहा है। तथाकथित भारत-चीन सीमा कभी भी 3,488 किमी लंबी नहीं थी; यह भारत और तिब्बत की सीमा थी जिसमें एक इंच भी भारत-चीन सीमा नहीं थी।
—डॉ. लॉबसांग सांग्ये, अध्यक्ष, केन्द्रीय तिब्बती प्रशासन 


इसके जवाब में डॉ. सांग्ये ने कहा कि विडंबना यह है कि लगभग 80,000 तिब्बती यह सोचकर बीजिंग की पहुंच से दूर निर्वासन में निकले थे कि हम कम से कम शारीरिक रूप से चीन के उत्पीड़न का शिकार होने से बच जाएंगे। लेकिन, चीन में उत्पन्न कोरोना वायरस विश्व स्तर पर फैल गया और न्यूयॉर्क तथा यूरोप में निर्वासन में रह रहे कई तिब्बतियों की इससे संक्रमित होकर मौत हो चुकी है। मतलब, दुनिया के किसी भी हिस्से में हम चीनी चंगुल से बच नहीं सकते। भारत-चीन तनाव के पीछे 'तिब्बत जिम्मेदार नहीं है' किंतु तिब्बत इसमें एक कारक है।

उल्लेखनीय है कि भारत और चीन की सीमाएं कभी भी एक—दूसरे से एक इंच भी मिली हुई नहीं थीं। दो हजार साल से भी ज्यादा समय से तिब्बत हमेशा इन दो सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों के बीच 'बफर' देश की तरह था। तिब्बत हमेशा शांतिक्षेत्र था। एक बार तिब्बत के एक मंत्री ने भारत सरकार को पत्र लिखकर मदद मांगी थी कि चीनी सेना तिब्बत पर आक्रमण करते हुए कब्जा कर रही है, हमारी सहायता करें क्योंकि हमारे पास कुल 75 से 100 पुलिसकर्मी या सैनिक हैं। लद्दाख से अरुणाचल प्रदेश तक तिब्बत की ओर से कुल 75 या 100 पुलिसकर्मी ही हमारे पास हैं और यदि तिब्बत पर चीनी कब्जा हो जाता है तो इसका दबाव भारत पर भी होगा, क्योंकि चीनी सेना भारत की सीमाओं पर पहुंच जाएगी। भारत को बहुत से तनावों का सामना करना पड़ेगा। दुर्भाग्य से, तिब्बत पर चीनी कब्जा हो गया और इसके 60 वर्षों के बाद भी सीमा पर पहले से ज्यादा हिंसक तरीके से घुसपैठ जारी है। दुर्भाग्यवश हाल में ही 20 भारतीय जवान मारे गए हैं और कई और घायल हो गए हैं और क्षेत्र में तनाव बरकरार है।

भारत से नजदीकी
इसके अलावा, मूल पंचशील दस्तावेज पर शिमला समझौते में तिब्बत के प्रधानमंत्री लोनचेन शात्रा और ब्रिटिश प्रतिनिधि सर मैकमोहन ने हस्ताक्षर किए थे। भारत और पाकिस्तान के बीच शिमला समझौता बहुत प्रसिद्ध है, लेकिन तिब्बत के साथ शिमला समझौते के बारे में लोगों को पर्याप्त जानकारी नहीं है। हजारों वर्षों तक भारत और तिब्बत के बीच बहुत मजबूत संबंध था, बौद्ध धर्म भारत से आया, तिब्बती लिपि संस्कृत से आई, तिब्बती संस्कृति और जीवन मूल्यों पर चीन की तुलना में भारत का अधिक प्रभाव पड़ा। इस पर भी तिब्बत पर चीनी कब्जा हो गया। जिस समय यह सब हो रहा था उस समय भी सरदार वल्लभभाई पटेल, पं. दीनदयाल उपाध्याय और आचार्य कृपलानी जैसे कई नेताओं ने तिब्बत के पक्ष में बात की थी, लेकिन दुर्भाग्य से तत्कालीन भारत सरकार को लगा कि भारत के लिए चीन के साथ निकट राजनयिक संबंध बनाना अंतत: तिब्बत का पक्ष लेने की तुलना में अधिक लाभकारी होगा। भले, ऐसा करते हुए भी परम पावन दलाई लामा और 80,000 तिब्बतियों के भारत आने पर उन्हें सभी मानवीय सहायता प्रदान की गई। लेकिन चीन के प्रति भारत का यह विश्वास भी 1962 के युद्ध, 1967 तथा 2017 में डोकलाम और हाल ही में लद्दाख की गलवान घाटी में टूट गया।

डॉ. सांग्ये ने आगे कहा, ‘हम यह कहने की कोशिश करते रहे हैं कि भूराजनीतिक कारणों तथा ऐतिहासिक कारणों से तिब्बत अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमारा अनुभव है कि यह भारत और दक्षिण एशिया के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। तिब्बत पर कब्जे के बाद वे हथेली और पांच उंगलियों के तर्क के साथ लद्दाख, और कुछ हद तक नेपाल में अतिक्रमण कर रहे हैं। भूटान, फिर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में अभी उनकी हरकतें कम हैं। केवल इतना ही नहीं, महासागरों के मोर्चे पर उसने मालदीव से श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान और कुछ हद तक भारत को भी ऊपर, नीचे और अगल-बगल से घेर रखा है। यह सब कुछ तिब्बत पर कब्जे के बाद ही हुआ। ऐसे में यह समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इन मुद्दों का हल निकालने के लिए तिब्बत मुद्दे को हल करना जरूरी है।’

u_1  H x W: 0 xपरम पावन दलाई लामा के साथ डॉ. लॉबसांग सांग्ये

चीन ने सदा दिया धोखा
‘चीन कहता है कि तिब्बत उसका आंतरिक मुद्दा है, तो भारत को भी कहना चाहिए कि तिब्बत उसका आंतरिक मुद्दा है। चीनी प्रधानमंत्री तीन बार भारत आए और उन्होंने भारत सरकार से परम पावन दलाई लामा को तिब्बत भेजने के लिए कहा। भारत सरकार को तिब्बती लोगों को वास्तविक स्वायत्तता देने का आश्वासन दिया था तथा कहा था कि तिब्बती लोगों की स्वीकृति के बिना कोई सुधार लागू नहीं किया जाएगा, दलाई लामा की स्थिति और अधिकार समान रहेंगे, सब कुछ शांति से निपट जाएगा। भारत सरकार को दिए इन सभी आश्वासनों का उल्लंघन हुआ है। चीन ने तिब्बत का हिंसक दमन किया और हिंसक रूप से उस पर कब्जा किया। साथ ही, वहां वास्तविक स्वायत्तता कभी लागू नहीं हुई। आप हांगकांग में जो देख रहे हैं, वह स्पष्ट रूप से ‘एक देश दो प्रणालियां’ व्यवस्था का उल्लंघन है। ठीक ऐसा ही तिब्बत में हुआ था, क्योंकि हमें भी ‘एक देश दो प्रणालियां’ का वादा किया गया था। इस बारे में 23 मई, 1951 को 17-बिंदुओं वाले समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। भारत सरकार और तिब्बत से वादों के इन दस्तावेजों को लागू नहीं किया गया। हमें धोखा दिया गया। भारत की सीमा से लेकर आसपास के देशों तक फैला अपना देश हमने खो दिया। उल्लेखनीय है कि न केवल भू-वैज्ञानिक दृष्टि से, बल्कि पर्यावरणीय रूप से भी, तिब्बत एशिया का जलस्तंभ है। दुर्भाग्य से, चीन ने संयुक्त राष्ट्र के जल बंटवारा समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए वह अपने पड़ोसियों के साथ पानी साझा करने के लिए बाध्य नहीं है, तिब्बत से निकलने वाली नदियों को चीनी क्षेत्रों की ओर मोड़ सकता है। ऐसा होने पर पूरे क्षेत्र में तबाही मच सकती है। इसके अलावा एशिया में लिथियम तिब्बत में ही उपलब्ध है जिसका उपयोग मोबाइल बैटरियों में किया जाता है। चीन मंगोलिया में भी ऐसे दुर्लभ मृदा तत्वों का खनन करता है और इसीलिए अपने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को सस्ते में बेच पाता है, जबकि अन्य देशों की लागत अधिक होती है। इन सभी कारणों से, पूरे दक्षिण एशिया और भारत के लिए तिब्बत बहुत महत्वपूर्ण है।'


ल्हासा और ब्रिटिश राज के बीच हुआ था पंचशील समझौता
मूल पंचशील दस्तावेज पर शिमला समझौते में तिब्बत के प्रधानमंत्री लोनचेन और ब्रिटिश प्रतिनिधि सर मैकमोहन ने हस्ताक्षर किए थे। इस पंचशील समझौते के साथ ही एक व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसे हर 10 साल में नवीनीकृत किया जाता था। उस समझौते में व्यापार मार्ग और तीर्थयात्रा मार्ग शामिल थे और हर 10 साल पर-1924, 1934 और 1944 में-ल्हासा और दिल्ली के बीच इसका नवीनीकरण होता था। 1954 में इसका नवीनीकरण दिल्ली और बीजिंग के बीच हुआ था। भारत तब स्वतंत्र देश था। पंचशील की प्रस्तावना में पांच बिंदु हैं जिससे इसे पंचशील कहा जाता है, लेकिन विवरण देखें तो इसका संबंध व्यापार और तीर्थयात्रा से है।

भारत और चीन के बीच व्यापार और शांति के लिए बने दस्तावेज पंचशील ने ही धोखाधड़ी और विश्वासघात के बीज बोए। भारत और चीन के बीच इस समझौते के पांच साल बाद 1959 में तिब्बत पर कब्जा हुआ और आठ साल बाद 1962 में भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ। उस युद्ध में, चीनी सेना की आपूर्ति का रास्ता कलकत्ता बंदरगाह के माध्यम से हो कर सिक्किम-नाथुला दर्रे के रास्ते तिब्बत के अंदर पहुंचा था। तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद, भारत और चीन के बीच शांति सुनिश्चित करने के इरादे से हुए पंचशील समझौते का उल्लंघन करते हुए युद्ध हुआ।

इसके बाद मुनीश गुप्ता के प्रश्न पर कि भारत और चीन के बीच तिब्बत का मुद्दा आज किस स्थिति में है, क्या इस मुद्दे को भुला दिया गया है, डॉ. सांग्ये ने कहा कि चीनी रणनीति हमेशा तिब्बत के मुद्दे को दबाने और गायब कर देने की रही है। तिब्बत का मुद्दा उठाते ही वे इसे एक-चीन नीति का उल्लंघन बताने लगते हैं। हम इसके उलट मध्यमार्गी रवैया अपनाते हैं, जिसका उद्देश्य चीनी संविधान के दायरे के भीतर वास्तविक स्वायत्तता हासिल करना है जिससे एक-चीन नीति का उल्लंघन न हो। अमेरिकी सरकार भी इस नीति से सहमत है क्योंकि 2011 के बाद राष्ट्रपति ओबामा और परम पावन दलाई लामा के बीच हुई मुलाकात के बाद व्हाइट हाउस ने एक बयान जारी करके कहा था कि वे एक-चीन नीति को मानते हुए भी मध्यमार्गी रुख का समर्थन करते हैं। भारत में निर्वासित तिब्बतियों की सबसे बड़ी आबादी और निर्वासित प्रशासन है। परम पावन स्वयं को भारत का बेटा कहते हैं। इन सभी कारणों से भारत तिब्बत का मुद्दा उठा सकता है। शी जिनपिंग ने भी स्वयं आधिकारिक रूप से कहा था कि चीन की सुरक्षा और स्थिरता तिब्बत की सुरक्षा और स्थिरता पर निर्भर करती है इसलिए तिब्बत की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए सुरक्षा बलों का बढ़ाया जाना जरूरी है। तिब्बत चीन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन साथ ही यह भारत के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में भारत सरकार को तिब्बत का मसला उठाना चाहिए। कुछ ही दिनों पहले संयुक्त राष्ट्र के 50 मानवाधिकार विशेषज्ञों के दल ने एक बयान जारी कर कहा है कि हमें तिब्बत और हांगकांग तथा सिंक्यांग जैसे चीन के दूसरे हिस्सों में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच करनी चाहिए। विभिन्न कारणों से पूरी दुनिया तिब्बत और भारत के बारे में चर्चा कर रही है और यहां बहुत कुछ दांव पर लगा है। 

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अक्तूबर 1954 के इस ऐतिहासिक चित्र में हैं (बाएं से) चाउ एन लाई, पंचेन लामा, माओ और दलाई लामा

एक अन्य प्रश्न के जवाब में डॉ. सांग्ये का कहना था कि हम गांधीवादी अहिंसा का पालन करते हैं, हम युद्ध का त्याग करते हैं। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय कानून की पृष्ठभूमि में देखें तो हमें आत्मरक्षा का अधिकार है। अगर आप विश्व इतिहास में देखें तो पाएंगे कि भारत आक्रांता नहीं रहा है। आज भी सीमा पर अतिक्रमण चीन की तरफ से हो रहा है। तथाकथित भारत-चीन सीमा कभी भी 3,488 किमी लंबी नहीं थी; यह भारत और तिब्बत की सीमा थी जिसमें एक इंच भी भारत-चीन सीमा नहीं थी। नेहरू के बाद सबसे पहले 1988 में राजीव गांधी और 2008 में वाजपेयी चीन की यात्रा करने वाले प्रधानमंत्री थे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य प्रधानमंत्री भी चीन गए हैं। इन यात्राओं के दौरान चीन सरकार से मिले आश्वासनों से भारतीय नेताओं को लगता था कि कम से कम कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान तो सीमा पर शांति रहेगी। ऐसा नहीं हुआ, इससे समझ आ जाना चाहिए कि चीन सरकार क्या कर सकती है। अक्तूबर 2019 में शी जिनपिंग ने भारत का दौरा किया और प्रधानमंत्री मोदी के साथ कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें एक समझौता यह भी था कि 2020 दोनों देशों के राजनयिक संबंधों का 70वां वर्ष है तो इसका जश्न मनाने के लिए दोनों राष्ट्रों के बीच 70 विभिन्न गतिविधियां और आयोजन होंगे। लेकिन चीन ने भारत को कोरोना वायरस से लड़ने में मदद देने के बजाय सीमा में घुसपैठ और जवानों की हत्या का 'तोहफा' दिया है। यह बात हमने 60 साल पहले समझ ली थी, भारत को भी इस घटनाक्रम से सच समझ लेना चाहिए।

क्या तिब्बतियों में स्वायत्तता हासिल करने के लिए चीन के साथ समझौता करने के बारे में पुनर्विचार हो रहा है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि पिछले 60 वर्षों में चीन के प्रति यह रुख व्यावहारिक कारणों से विकसित हुआ है, क्योंकि चीन दशकों से एक-चीन नीति की मांग करते हुए दावा करता है कि चीन की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता से समझौता नहीं किया जा सकता है और संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र के अनुच्छेद 2 की धारा 4 के अनुसार भी सदस्य देशों, उनके अधिकार क्षेत्रों और संप्रभुता को किसी अन्य सदस्य देश द्वारा चुनौती नहीं दी जा सकती है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र और अन्य मंचों पर तिब्बतियों द्वारा स्वतंत्रता की मांग के रास्ते पूरी तरह बंद नहीं होते, तो भी बेहद संकीर्ण रह जाते हैं। परम पावन दलाई लामा का कहना है कि यदि चीन सरकार तिब्बती लोगों को वास्तविक स्वायत्तता प्रदान करती है, तो यह हमारे और चीन, दोनों ही के लिए जीत जैसी स्थिति होगी। हमारा कहना है कि तिब्बती लोगों का दमन समाप्त होना चाहिए और उन्हें वास्तविक स्वायत्तता दी जानी चाहिए। इसके बाद ही हम तिब्बत की स्थिति पर बातचीत करेंगे। हां, तिब्बतियों की युवा पीढ़ी स्वतंत्रता की मांग करती है...जब मैं छोटा था तो मैं भी यही करता था। स्वतंत्रता की मांग करने वाले युवा कहते हैं कि यह हमारा ऐतिहासिक अधिकार है। यही सच है कि ऐतिहासिक रूप से तिब्बत स्वतंत्र देश था। अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर तिब्बतियों को आत्मनिर्णय का अधिकार है। उल्लेखनीय है कि 2002-2010 के दौरान परम पावन दलाई लामा के दो दूत चीन गए थे, उन्होंने कई तिब्बती स्थानों का दौरा किया, लेकिन इस प्रयास में भी अधिक सफलता नहीं मिली। हमारी कोशिश रही है कि इस मसले का हल शांतिपूर्ण बातचीत के माध्यम से हो जाए। सवाल है कि क्या चीन सरकार ऐसा करेगी!