सकारात्मकता से हारेगा कोरोना, घबराएं नहीं सामना करें

    दिनांक 09-जुलाई-2020
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दुनिया कोरोना के कारण से प्रभावित हैं। रोजाना हम सुनते हैं यहां इतने मरीज हो गए, वहां इतने मरीज हो गए, कोरोना के चलते इतनी मौते हो चुकी हैं आदी, मैं खुद कोरोना से पीड़ित हुआ लेकिन मैंने हार नहीं मानी और मैं ठीक हो गया। पहले से यदि अभी की बात करें तो कोरोना का रिकवरी रेट बढ़ा और समाज में कोरोना से से लड़ने का संकल्प भी जगा है

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जब कोरोना संक्रमण अपनी प्रारंभिक स्थिति में था उस समय समाज में एक वातावरण बना था कि कोरोना संक्रमित होना मृत्यु का पर्याय ही है। इस कारण समाज में भय का वातावरण था। लॉकडाउन के अनेक चरण होने के बाद धीरे-धीरे समाज की मानसिकता में एक सकारात्मक परिवर्तन आया कि अब कोरोना के साथ ही जीना है। इसका अर्थ समाज कोरोना से मानसिक रूप से लड़ने के लिए भी तैयार हुआ है।
असावधानीवश अथवा अनायास घटी घटना के कारण जब कोई व्यक्ति कोरोना के प्रभाव क्षेत्र मे आता है और उसमे कोरोना के लक्षण प्रकट होते हैं, जैसे बुखार का आना, खांसी का होना आदि तब बिना संकोच परीक्षण कराना चाहिए। कोरोना की रिपोर्ट पॉजिटिव होने के बाद चिकित्सक के परामर्श अनुसार व्यवहार करना चाहिए। लक्षणों का होना एवं रिपोर्ट के आने का यह कालखंड मानसिक रूप से अपने को मजबूत करने का है कि मैं कोरोना से लडूंगा एवं जीतकर आऊंगा। अभी भी हम अनेक इस प्रकार की घटनाएं दूरदर्शन पर सुनते एवं समाचार पत्रों में पढ़ते हैं कि पॉजिटिव रिपोर्ट आने के कारण रोगी ने आत्महत्या कर ली। इसका अर्थ समाज के बड़े वर्ग में अभी भी कोरोना का भय व्याप्त है। इस डर के वातावरण से हमें बाहर आना है |
रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद होम आइसोलेशन अथवा क्वारंटाइन केंद्र पर रहने के कारण व्यक्ति अकेला हो जाता है। उस स्थिति में मैं अकेला हूं , मेरे साथ कोई नहीं है , ऐसा लगता है। परिजनों को भी लगता है कि कहीं उन्हें कोरोना न हो जाए। ऐसी परिस्थिति में यह अकेलापन और अधिक कचोटता है। हमको ऐसे में यह सोचना चाहिए कि परिवार एवं साथियों ने हमें छोड़ा नहीं बल्कि यह एक परिस्थिति है जिसके कारण चाहते हुए भी वह मेरा सहयोग नहीं कर पा रहे हैं।
कोरोना पर जीत के संकल्प में मेरा अनुभव है कि चिकित्सकों के परामर्श का पालन उचित पद्धति से किया जाए। मानसिक रूप से लड़ने का संकल्प व्यक्त हो इसके लिए आवश्यक है कि कुछ यौगिक क्रिया नियमित की जाए। शारीरिक थकान अनुभव होने के बाद भी सहजता - सरलता से जितना संभव हो प्राणायाम के अलग-अलग प्रयोगों को किया जाए। कपालभाति, अनुलोम - विलोम, भस्त्रिका, उज्जायी ,भ्रामरी एवं उद्गीत आदि सभी प्राणायाम इसमें सहायक हैं। इनके करने के कारण श्वसन क्रिया एवं फेंफड़ो को लगातार ताकत मिलती रहती है।
हमको सृजनशीलता एवं सकारात्मक भाव को जगाने के लिए सामाजिक, धार्मिक एवं प्रेरणाप्रद साहित्य का अध्ययन करना चाहिए जो रोगी को मानसिक दृष्टि से मजबूती प्रदान करता है। अपने कक्ष में श्रद्धा एवं भक्ति भाव को जागृत करने वाले धार्मिक भजन सुनने से कोरोना से लड़ने के भाव को मजबूती प्रदान होती है। प्रभु नाम स्मरण एवं ध्यान भी मानसिक मजबूती मे सहायक होता है।
समाचार पत्र , सोशल मीडिया एवं दूरदर्शन के अलग-अलग चैनलों से हमें नित नए समाचार मिलते हैं, लेकिन बहुतायत में सभी समाचार कोरोना का प्रभाव, मृत्यु संख्या, डर के कारण आत्महत्या आदि से युक्त रहते हैं। जब कोई कोरोना रोगी इन समाचारों को सुनता है तब वह अंदर से भयभीत होता है। इसलिए मेरा सुझाव है कि निराशा एवं भय उत्पन्न करने वाले समाचारों से बचा जाना आवश्यक है। संभव हो तो आइसोलेशन अवधि तक मीडिया एवं सोशल मीडिया से दूर ही रहना उचित होगा।
काढ़ा (Kwath), भाप (Steam) लेना आदि सभी विषयों को उचित परामर्श से उपयोग करते हुए हम संकल्प शक्ति के आधार पर जीतेंगे, यह मनोभाव सभी संक्रमितों का रहे। कोरोना अजेय नहीं है, हम उसको हरायेंगे और हम जीतेंगे यह मानसिकता संक्रमितों सहित संपूर्ण समाज की बननी चाहिए। हम शारीरिक दूरी रखकर , फेसकवर का उपयोग करते हुए कोरोना को हराएंगे।
( यह लेखक का अपना अनुभव है )