मोपलाओं की हिंसा पर झूठा वामपंथी मुलम्मा

    दिनांक 09-जुलाई-2020   
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केरल के मलाबार में 1921 में हजारों हिंदुओं की हत्या, हिंदू महिलाओं के अपहरण और बलात्कार, हिंदुओं का जबरन कन्वर्जन करवाने वाले खलनायक कुंजाहम्मद हाजी पर फिल्म बनाकर उसे हीरो बनाने की वामपंथी फिल्म निर्देशक आशिक अबु की साजिश समझनी होगी


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कालीकट में आर्य समाज के शरणार्थी शिविर में शरण लिए  मजहबी हिंसा से त्रस्त मलाबार के हिन्दू परिवारों का एक ऐतिहासिक चित्र
 

इजराइल में आप हिटलर की प्रशंसा नहीं कर सकते। आखिरकार यहूदी बहुल देश में यहूदियों का नरसंहार करने वाले हिटलर और उनकी नाजी पार्टी की प्रशंसा कैसे की जा सकती है? इजराइल तो छोड़िए, आधुनिक जर्मनी में भी आप हिटलर का गुणगान नहीं कर सकते। चीन में आप तत्कालीन राजधानी नानकिंग में बदनाम नरसंहार करने वाले जापानी साम्राज्यवादियों का बखान नहीं कर सकते। ईरान में आप शियाओं की सामूहिक हत्या करने वाले सद्दाम हुसैन का समर्थन नहीं कर सकते। ये भारत में ही संभव है कि लाखों हिंदुओं पर अत्याचार करने वाले औरंगजेब और टीपू सुल्तान का गुणगान किया जाता है। उनके जन्मोत्सव मनाए जाते हैं। कालिंजर में सहस्त्रों हिंदुओं का कत्ल करने वाले शेरशाह सूरी को पाठ्यपुस्तकों में महिमामंडित किया जाता है। इस सिलसिले में नयी  कड़ी है एक निर्माणाधीन मलयालम फिल्म, वरियम कुन्नन। यह फिल्म आधारित होगी 1921 में केरल में हजारों हिंदुओं की हत्या, हिंदू नारियों के अपहरण और खंजर की नोंक पर हिंदुओं का इस्लाम में कन्वर्जन करवाने वाले खलनायक वरियम कुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी पर। फिल्म के निर्देशक आशिक अबु वामपंथी विचारों के लिए चर्चित हैं।

‘काफिरों’ पर उड़ेल दिया नफरत का तेजाब
विचित्रताओं से भरा खिलाफत आंदोलन, जिसका असफल होना निश्चित था, अंतत: शर्मनाक परिस्थितियों में धूलधूसरित हो गया। सारे अरब जगत और स्वयं तुर्की की जनता ने ही इसे नकार दिया था। मुल्ला फौज, जिसने जिहाद का नारा देकर मुसलमानों को खिलाफत के लिए उबाला था, उसे अपनी हार का बहाना बनाने के लिए कोई कुबार्नी का बकरा चाहिए था। वह और कौन हो सकता था उन 'काफिरों' के अतिरिक्त, जिनकी मदद से तुर्की में दोबारा खिलाफत कायम करने की जीतोड़ कोशिश की गई थी। इन लोगों ने दुष्प्रचार शुरू किया कि हिंदुओं ने साथ नहीं दिया इसलिए तुर्की में खिलाफत की 'शहादत' हो गई। दंगे भड़के। सबसे भयानक मंजर खड़ा हुआ केरल के दक्षिण मलाबार में, जहां  मोपला मुसलमानों ने सशस्त्र जिहाद शुरू किया।


मोपलाओं द्वारा की गई हिंसा और लूटपाट को न्यायोचित ठहराने के लिए ये भ्रम  फैलाया जा रहा है कि मोपलाओं द्वारा किया गया नरसंहार वास्तव में ब्रिटिश कृपापात्र जमींदारों के खिलाफ किया गया विद्रोह था, और ज्यादातर जमींदार हिंदू थे। यह सरासर झूठ है। मलाबार में मोपलाओं ने दस हजार गरीब हिंदुओं की हत्या क्यों की? उनके बच्चों को जिंदा क्यों जलाया? हिंदू बच्चियों और नारियों का बलात्कार और जबरन निकाह क्यों किया? इस्लाम कबूल न करने वालों को मौत के घाट क्यों उतारा?

 पहले उन्होंने पुलिस थाना जलाया, शस्त्र लूटे, कुछ अंग्रेजों की हत्या की और फिर उनकी तलवारें निहत्थे हिंदुओं की गर्दनों पर चलने लगीं। उनकी नजर में अंग्रेज और स्थानीय हिंदू, दोनों ही 'काफिर' थे, जिनसे तुर्की के भ्रष्ट और लाखों के हत्यारे  मुस्लिम बादशाह को गद्दी से हटाने का बदला लिया जाना था। उन्हें 'दारुल इस्लाम' कायम करना था और इसके लिए 'काफिरों के खिलाफ जिहाद' जरूरी था। अगस्त 1921 में कत्लेआम का दौर शुरू हुआ, जो अगले कई महीनों तक चलता रहा। 10 हजार हिंदुओं को मार डाला गया। हिंदू महिलाओं को लूट का माल समझा गया। उनके अपहरण-बलात्कार और जबरन निकाह की बाढ़ आ गई। हिंदुओं के लिए नारा दिया गया 'इस्लाम या मौत'। एरनाड और वल्लुवनाड़ तालुका में सबसे ज्यादा क्रूरता हुई।
मोपला जिहाद में हिंदुओं पर की गई क्रूरता के बारे में तैयार की गई रिपोर्ट में एक घटना के बारे में बतलाया गया कि सात महीने की गर्भवती महिला को पेट चीर कर मार डाला गया। वह महिला मृत पड़ी थी और उसके चीरे गए पेट में से मृत शिशु की देह बाहर झांक रही थी। इसी प्रकार दुधमुंहे बच्चों को उनकी माताओं से छीनकर उन्हीं के सामने टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया। मोपलाओं की असीमित क्रूरता और हिंसा की व्यापकता न सिर्फ ब्रिटिश दस्तावेजों में बल्कि डॉ आंबेडकर, एनी बेसेंट, नीलाम्बुर की रानी, स्वामी श्रद्धानंद, डीवी गुंडप्पा जैसी ख्यातिनाम हस्तियों की लेखनी द्वारा विस्तार से दर्ज की गई है। महीनों तक मलाबार के हिंदू जिहाद की इस आग में झुलसते रहे।

हैवानियत का सूत्रधार कुंजाहम्मद हाजी
 इन सबके केंद्र में था, वरियमकुन्नथ कुंजाहम्मद हाजी, जिसे 'स्वतंत्रता सेनानी' बतलाकर यह फिल्म बनाई जा रही है। 4 अक्तूबर 1921 को मद्रास मेल से प्रकाशित एक रिपोर्ट मोपला नरसंहार में कुंजाहम्मद हाजी की भूमिका पर प्रकाश डालती है। रिपोर्ट कहती है, ‘कई रपटें बतलाती हैं कि कुंजाहम्मद हाजी और चेम्ब्रासेरी तंगल के बीच यह तय हो गया था कि मोपलाओं के प्रभाव वाले सभी गांवों में हिंदुओं को मार डाला जाए यदि वे इस्लाम कुबूल नहीं करते। ऐसी घटनाएं सामने आई हैं जब हिंदुओं को मारने के पहले, उनकी लाशें गाड़ने के लिए उनसे गड्ढे खुदवाए गए। मोपलाओं की हिंसा को रोकने के लिए सेना की टुकड़ी और पुलिस की तैनाती हुई। जिस किसी ने भी पुलिस या सेना की मदद करने या मदद लेने की कोशिश की उसके खिलाफ पैशाचिक हिंसा की गई। एक रपट के अनुसार, चेम्ब्रासेरी तंगल ने सेना को दूध आपूर्ति करने वाले एक हिंदू को खाल उतरवाकर मार डाला। मेलात्तुर, मेल्मुरी, करुवराकुंडू और तोवूर जैसे ग्रामों में हिंदुओं का समूल नाश कर दिया गया और लड़कियों तथा स्त्रियों को अगवा कर ले जाया गया।’

झूठ और कुतर्क
सामान्य तौर पर प्रश्न उठता है कि जब इतने स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं, और सबसे बढ़कर मलाबार के हिंदू, जिन्होंने अपने बड़े-बुजुर्गों से उस दौर के किस्से सुने हैं, यह सब सुनते-सुनाते जिनकी उम्र गुजरी है, आज मौजूद हैं, तब किस तरह मलाबार के हत्यारों को महिमामंडित किया जा रहा है? वास्तव में इस तरह की मनमानी करने वाला गिरोह दो स्तरों पर काम करता है। एक समूह धौंस के साथ, हो-हल्ला मचाकर, विरोध के स्वरों को दबाकर, ग्लैमर जगत की चकाचौंध में मुद्दे को कहीं गुम कर देता है। दूसरा समूह विमर्श को भटकाने के लिए झूठ और कुतर्क गढ़ता है। इसलिए मोपला जिहादियों के समर्थन में भी बौद्धिक व्यभिचार शुरू हो गया है। कुतर्क दिए जा रहे हैं कि 'बहुत सारे स्वतंत्रता सेनानी ‘रिलीजन’ से बहुत गहराई से जुड़े थे, जैसे कि गांधी जी। गांधी जी की राजनीति गहराई से उनकी मजहबी प्रतिबद्धता से जुड़ी थी...।' क्या गांधी या तिलक की धार्मिकता की तुलना मोपलाओं के मजहबी उन्माद से की जा सकती है? क्या 'वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीर पराई जाने रे..' की तुलना 'इस्लाम या मौत' से की जा सकती है? लेकिन कुंजाहम्मद हाजी और उसके अनुयायी मोपलाओं द्वारा की गई पैशाचिक क्रूरताओं के लिए भी फरेब गढ़ा जा रहा है। जैसे कि 'जहां तक हिंसा की बात है, इसे एक दृष्टिकोण से देखना ठीक नहीं होगा। मुस्लिमों का एक मजहबी दृष्टिकोण था और राजनैतिक दृष्टि से स्थानीय और वैश्विक दृष्टिकोण भी था...'। यानी जो हिंसा की गई, वह मजहब के नाम पर हुई, इसलिए उसे हिंसा न कहकर 'एक समूह विशेष का भ्रमपूर्ण आचरण' मान लिया जाए।

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वरियम कुन्नन फिल्म में हत्यारे मोपला हाजी की भूमिका में पृथ्वीराज सुकुमारन (दाएं) और फिल्म के निर्देशक आशिक अबु

मोपलाओं द्वारा की गई हिंसा और लूटपाट को न्यायोचित ठहराने के लिए ये भ्रम  फैलाया जा रहा है कि मोपलाओं द्वारा किया गया नरसंहार वास्तव में ब्रिटिश कृपापात्र जमींदारों के खिलाफ किया गया विद्रोह था, और ज्यादातर जमींदार हिंदू थे। यह सरासर झूठ है। इसी ठगी का नाम तो वामपंथी बुद्धिजीविता है। मलाबार के गरीबों में हिंदुओं की संख्या बहुत ज्यादा थी। फिर मोपलाओं ने दस हजार गरीब हिंदुओं की हत्या क्यों की? यदि मोपलाओं का गुस्सा जमींदारों के प्रति था तो उन्होंने गांव—गांव गरीब हिंदू किसानों, हिंदू श्रमिकों की हत्याएं क्यों की? उनके बच्चों को जिंदा क्यों जलाया? हिंदू बच्चियों और नारियों का बलात्कार और जबरन निकाह क्यों किया? इस्लाम कबूल न करने वालों को मौत के घाट क्यों उतारा? ऐसे सवालों के ये लोग कोई उत्तर नहीं देते। उलटे, ऐतिहासिक तथ्यों को झुठलाते हुए एक फर्जी इतिहास मोपला जिहादियों और कुंजाहम्मद हाजी के चारों ओर गढ़ लिया गया है।

‘स्वतंत्रता सेनानी’ या जिहादी हत्यारा
मोपला बगावत का स्वतंत्रता संग्राम से कोई लेना-देना नहीं था। वास्तव में खिलाफत आंदोलन का ही देश से कोई लेना-देना नहीं था। कांग्रेस इसे मुसलमानों को अपनी तरफ करने का मौका मानकर आंदोलन में उतरी थी, और मुस्लिम कट्टरपंथी मध्ययुगीन नखलिस्तान को इतिहास की धूल में से दोबारा अवतरित करने का ख्वाब देख रहे थे। और मोपला मुसलमान तो 'इस्लाम के दुश्मन' काफिरों के सर काटने और खंजर की नोंक से इस्लाम की लकीर खींचने निकले थे। आखिर ये कैसा स्वतंत्रता संघर्ष था जो एक सुदूर देश के मुस्लिम बादशाह की गद्दी को सुरक्षित करने के लिए लड़ा जा रहा था? अंग्रेजों से मुस्लिमों और मोपलाओं की दुश्मनी कुल—मिलाकर इतनी ही थी कि उन्होंने तुर्की के खलीफा को पदच्युत कर दिया था। ये कैसा स्वतंत्रता संघर्ष था, जिसकी असफलता के बाद हजारों निर्दोष हिंदुओं के सर काटे गए, घर जलाए गए, हिंदू महिलाओं का शील भंग किया गया?

लेकिन वामपंथी, वाम-लिबरल गिरोह और कट्टरपंथी मुस्लिम नेतृत्व इस फिल्म और इतिहास के इन खलनायकों के समर्थन में कूद पड़ा है। माकपा नेता एम. स्वराज ने केरल विधानसभा में बोलते हुए मोपलाओं और कुंजाहम्मद हाजी को ‘सच्चा देशभक्त’ बतलाया। देश के बड़े-बड़े अंग्रेजी समाचार पत्रों ने हाजी को ‘महान देशभक्त’, ‘सेकुलर’ और ‘मानवतावादी’ बतलाना शुरू कर दिया है। वामपंथी प्रचार तंत्र उसके द्वारा की गई हत्याओं को ‘ब्रिटिश जासूसों के खिलाफ की गई कार्रवाइ’ बतला रहा है। वामपंथी समाचार पोर्टल एक और टेक लगा रहे हैं कि ‘चूंकि हाजी मुस्लिम था, इसलिए उस पर फिल्म बनाने का विरोध किया जा रहा है’।

आशिक अबु की इस फिल्म की घोषणा होने के बाद दो अन्य फिल्मकारों ने कुंजाहम्मद हाजी को ‘ऐतिहासिक नायक’ बतलाते हुए उस पर फिल्म बनाने की बात कही है। नाटककार इब्राहिम वेंगारा ने ‘दि ग्रेट वरियम कुन्नन’ और नामचीन निर्देशक कुंजू मुहम्मद ने ‘शहीद वरियम कुन्नन’ नाम से फिल्म बनाने का ऐलान किया है। ऐसे में  सिनेमा जगत से प्रतिरोध की एक सशक्त आवाज उठी। निर्देशक अली अकबर ने ‘1921’ नामक फिल्म बनाने की घोषणा की है, जिसमें कुंजाहम्मद हाजी के असली खूनी चरित्र और वास्तविक ऐतिहासिक तथ्यों को दिखाया जाएगा। फिलहाल इस पूरे प्रसंग ने देश में दशकों से चली आ रही छद्म सेकुलर राजनीति और हिंदू-द्वेषी बौद्धिक फरेब को उघाड़कर रख दिया है।
    (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)