बदलते कश्मीर में पूर्व गोरखा सैनिकों को मिली नागरिकता

    दिनांक 09-जुलाई-2020   
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भारत सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने के एक वर्ष बाद इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। जिस क्षेत्र पर आतंकियों और अलगाववादियों ने अपनी निजी संपत्ति मानकर कब्जा जमा रखा था, अब उसी जम्मू—कश्मीर की सूरत बदल रही है। ऐसे में चाहे गोरखा योद्धा हों या फिर डोगरा, बिहारी हों बंगाली, अब हर कोई नए जम्मू—कश्मीर में बस सकता है।
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कश्मीर बदल रहा है। एक साल पहले जम्मू—कश्मीर से अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किया गया था। उसके बाद से यहां की तस्वीर तेजी से बदल रही है। इस क्रम में क्षेत्र में कार्यरत 6600 से अधिक पूर्व गोरखा योद्धाओं को यहां का नागरिकता प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। अब तक ऐसे 25 हजार लोगों को नागरिकता प्रमाण पत्र मिल चुका है। इनमें बिहार के एक आईएएस अधिकरी नवीन कुमार चौधरी भी शामिल हैं।

 भारत सरकार के अनुच्छेद 370 हटाने के एक वर्ष बाद इसके सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। जिस क्षेत्र पर आतंकियों और अलगाववादियों ने अपनी निजी संपत्ति मानकर कब्जा जमा रखा था, अब उसी जम्मू—कश्मीर की सूरत बदल रही है। ऐसे में चाहे गोरखा योद्धा हों या फिर डोगरा, बिहारी हों बंगाली, अब हर कोई नए जम्मू—कश्मीर में बस सकता है। कुछ हफ्तों पहले मीडिया में तब खलबली मची थी, जब बिहार के एक आईएएस अफसर नवीन कुमार चौधरी को जम्मू कश्मीर का नागरिकता प्रमाणपत्र मिला था। नवीन कुमार चौधरी अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं, जिन्हें ये प्रमाण पत्र मिला। पिछले कुछ महीनों में नवीन जैसे 25000 से अधिक भारतीय नागरिक हैं, जिन्हें वर्षों तक जम्मू कश्मीर में काम करने के कारण जम्मू कश्मीर की नागरिकता प्रमाण पत्र मिला है, चाहे वे सैन्य सेवा से जुड़े हों या फिर सिविल सेवा के अधिकारी हों।
जिस प्रकार से जम्मू—कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन में भारतीय नागरिकों को क्षेत्र का नागरिकता प्रमाण पत्र मिल रहा है, उससे लगता है अब हर भारतीय का जम्मू कश्मीर पर उतना ही अधिकार है, जितना उस क्षेत्र के निवासियों का। पिछले एक महीने में इस क्षेत्र में कार्यरत 6600 से अधिक गोरखा योद्धाओं को इस क्षेत्र का नागरिकता प्रमाण पत्र प्रदान किया गया है।

ये ऐतिहासिक रूप से भी बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि जब कश्मीर राज्य को डोगरा और सिख समुदायों के योद्धाओं ने इस्लामी आक्रांताओं के चंगुल से मुक्त कराया था, तब सबसे पहले गोरखा योद्धाओं को राज्य के संरक्षण के लिए तैनात किया गया था। एक बार फिर इन वीर गोरखा योद्धाओं को जम्मू-कश्मीर में बसाया जा रहा है। अब उन्हें संपत्ति खरीदने, सभी केंद्र शासित प्रदेशों में नौकरियों के लिए आवेदन करने की अनुमति मिल गई है। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार प्राप्त था, जिसके अंतर्गत भारत के अन्य किसी क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति यहां न बस सकता था, न ही किसी संपत्ति पर अपना अधिकार जमा सकता था।

यदि इस राज्य की लड़कियां किसी अन्य राज्य के युवकों से विवाह करती, तो वह उसी क्षण से जम्मू-कश्मीर में अपनी संपत्ति और अपने नागरिकता का अधिकार खो देती थीं। यानी एक भारतीय अपने ही देश के क्षेत्र में न बस सकता था और न ही संपत्ति का अधिकारी हो सकता। ऐसे में इस अधिनियम का दुरुपयोग कर पाकिस्तानी घुसपैठ या फिर इस्लामी आक्रांता अपनी मनमानी करते चले आ रहे थे।

अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से अब कश्मीर के इन पूर्व ठेकेदारों की सारी मंशाओं पर पानी फिर रहा है। ऐसे में सूबे के तमाम राजनीतिक दलों को डर सताने लगा है कि कहीं जम्मू कश्मीर की राजनीति पर इनका एकाधिकार न खत्म हो जाए और दुकानें न बंद हों जाएं। वैसे कश्मीर के इन पूर्व ठेकेदारों का भयभीत होना उचित है। वर्षों पहले कश्मीर घाटी से जिस तरह से इन लोगों ने कश्मीरी हिंदुओं भगाया, भला वह कौन भूल सकता है।