‘‘वह बिंदु आ सकता है जब हमें सरकार का समर्थन वापस लेना पड़े’’

    दिनांक 12-अगस्त-2020
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लालकृष्ण आडवाणी
 1990 में अयोध्या आंदोलन को गति देने के लिए वरिष्ठ भाजपा नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक राम रथयात्रा शुरू की थी। उसी यात्रा के दौरान 27 सितंबर, 1990 को पाञ्चजन्य के तत्कालीन संपादक तरुण विजय ने उनसे बातचीत की। वह बातचीत 7 अक्तूबर, 1990 के अंक में प्रकाशित हुई थी, उसे यहां पुन: प्रकाशित किया जा रहा है-

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1990 में राम रथयात्रा के दौरान लोगों का अभिवादन स्वीकार करते श्री लालकृष्ण आडवाणी


 क्या आपको रथयात्रा में इतने विशाल जनसहयोग की कल्पना थी?
आपको याद होगा कुछ समय पूर्व मैंने पाञ्चजन्य को दिए साक्षात्कार में स्पष्ट कहा था, ‘‘अगर सरकार ने राम जन्मभूमि के बारे में टकराव का रुख अपनाया तो देश में एक ऐसा आंदोलन जन्म लेगा जो पहले कभी नहीं हुआ होगा।’’ यह बात मैंने सोच-समझकर ही कही थी। राम नाम की शक्ति और देश की जनता के गहरे राष्ट्रप्रेम को समझते हुए ही मैंने यह घोषणा की थी। मैं कभी अतिशयोक्ति भरी बात नहीं कहता। इसलिए आज जो जनसागर राम रथयात्रा से जुड़ रहा है वह मुझे बहुत अचंभित नहीं कर रहा। हिन्दुस्थान की आत्मा की आवाज जब प्रकट हो तो यह कैसे संभव है कि कोई हिन्दुस्थानी उसकी उपेक्षा कर दे।

क्या यह अभियान एक व्यापक समाज सुधार आंदोलन में भी बदल सकता है?

इसके कई आयाम हो सकते हैं। पर सबसे प्रमुख संदेश यही है कि देश की किसी भी समस्या का हल तब तक नहीं हो सकता जब तक आप राष्ट्रवाद को पुन: प्रतिष्ठित नहीं करते और राष्ट्रीय परंपराओं से देश को नहीं जोड़ते। 1917-18 में प्रख्यात विचारक श्रीमती एनी बेसेंट ने कहा था, ‘‘आप हिन्दुस्थान में से हिन्दुत्व को निकाल दो तो सिर्फ एक देश बाकी बचेगा।’’ वह अविभाजित भारत के बारे में कहा गया था। विभाजन के बाद तो यह सत्य और अधिक घनीभूत हो गया है। पर आज मिथ्या सेकुलरिस्टों द्वारा यही किया जा रहा है जो अब इस देश की जनता नहीं होने देगी।

स्वाभिमान की शानदार वापसी

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शिलान्यास औपचारिक रूप से मंदिर निर्माण की नींव का प्रथम चरण है। यह भारत के हिन्दू समाज के खंडित सम्मान की वापसी माना जाएगा। सदियों से अपमान और हीनता की जिंदगी जी रहा हिन्दू समाज अब सिर उठाकर कह सकेगा कि उसने अपने खंडित स्वाभिमान की शानदार वापसी की है, उसकी ओर बढ़ता हुआ यह एक कदम है।
— महंत अवेद्यनाथ गोरक्षपीठाधीश्वर (पाञ्चजन्य, 19 नवंबर,1989)

हिन्दुओं के लिए प्रेरणास्रोत 

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श्रीराम मंदिर देश की हिन्दू जनता के लिए एक प्रेरणास्रोत बनेगा। 400 वर्ष के बाद हिन्दू जागरण का अद्भुत प्रवाह होगा। यहीं से सेवा, संस्कार, संगठन और त्याग की गंगा प्रवहमान होगी, जो पूरे देश को अपने पवित्र जल से अभिसिंचित करेगी।
— स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि जी (पाञ्चजन्य, 19 नवंबर, 1989)


कुछ राजनीतिज्ञ आरोप लगा रहे हैं कि इस रथयात्रा की सफलता में आडवाणी की भूमिका नगण्य है। यह तो राम भक्ति और धार्मिकता के कारण उपजा उत्साह है?
आडवाणी की भूमिका राम रथयात्रा में नगण्य है, तो इसमें खराबी क्या है? राम मंदिर हेतु रथयात्रा में तो राम की ही सर्वोच्चता रहनी चाहिए। मुझे यदि इस रथयात्रा में गौण माना गया तो यह अच्छा ही है। वैसे यह आरोप लगाने वाले एक ओर यह भी कहते हैं कि आडवाणी रथयात्रा के द्वारा साम्प्रदायिकता फैला रहे हैं, दूसरी ओर वही आडवाणी को नगण्य बताते हैं। यही दोतरफा मिथ्या सेकुलरवाद की विकृति है।


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चाहे गणेशोत्सव हो, गोरक्षा या सोमनाथ संकल्प- वे देश की राष्ट्रीयता को मजबूत करने के प्रयास थे। पर उन सभी पर सांप्रदायिकता के आरोप लगे। आज की पीढ़ी के लिए यह जानना अत्यंत विस्मयकारी होगा कि सरदार पटेल पर यहां तक आरोप लगाए गए थे कि उनका गांधी हत्याकांड में हाथ था। इसी तरह के घृणित आरोप आज वे लोग भाजपा पर लगा रहे हैं। जबकि हम यह रथयात्रा राष्ट्रवाद की पुन:प्रतिष्ठापना और मिथ्या सेकुलरवाद की समाप्ति हेतु कर रहे हैं। यह न तो सांप्रदायिक है, न ही मुसलमानों के विरुद्ध है।


 रथयात्रा में युवाओं के प्रमुख सहयोग को आप किस रूप में देखते हैं?
यही कि उन्हें समझ आ रहा है कि राम इस राष्ट्र की एकता के प्रतीक हैं। राम सिर्फ भगवान के रूप में पूजनीय नहीं, बल्कि वह रूप हैं जिसके नाम से पूरा देश एकसूत्र है।

आप पर यह भी आरोप लगाया जाता है कि आरक्षण, पंजाब व कश्मीर जैसे विषयों पर जब देश जल रहा है तो राम रथयात्रा का क्या औचित्य है?
औचित्य यह है कि मैं बताना चाहता हूं कि देश की समस्याएं यदि हल करनी हैं तो हमें राष्टÑवाद की ओर मुड़ना है। समस्याओं का लाक्षणिक नहीं मूलोपचार करना हो तो हमें देश की उन परंपराओं की ओर लौटना होगा, जिसे मिथ्या सेकुलरवादी शासक छोड़ चुके हैं। राष्ट्रवाद को पुष्ट किए बिना किसी समस्या का समाधान संभव नहीं।

क्या इस माहौल में आप नहीं समझते कि भाजपा पर जनता का यह दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह इस सरकार को समर्थन देना बंद कर दे?
मैं यह मानता हूं कि जनता का विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से बहुत तीव्रता से मोहभंग हो रहा है। इस सरकार ने जनता को हताश किया है। मैं यह नहीं कहता कि सरकार चाहे जो करे, हम उसे समर्थन जारी रखेंगे। वह बिंदु आ सकता है जब हमें सरकार से समर्थन वापस लेना पड़े। पर हम कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लेते। अभी हम स्थिति पर नजर रखे हुए हैं, अभी इतना ही मुझे कहना है।

 राम रथयात्रा पर सांप्रदायिकता का जो आरोप लग रहा है?
कौन लगा रहा है? वही लोग, जिनकी मानसिकता भी उन लोगों जैसी है, जिन्होंने तिलक के गणेशोत्सव, गांधी जी के गोरक्षा अभ्यिान, सरदार पटेल के सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण के संकल्प को भी सांप्रदायिक कहा था। मैं यह बताना चाहता हूं कि स्वतंत्रता के संघर्ष में जब भी नेतागण राष्ट्रवाद को मजबूत करना चाहते थे, वे हमेशा किसी राष्ट्रीय विषय को लेकर उसे सार्वजनिक स्वीकृति दिलाने की कोशिश करते थे। लोकमान्य तिलक ने इसी भावना से गणेशोत्सव आरंभ किया था। बाद में महात्मा गांधी ने गोरक्षा को बहुत महत्व दिया।

यहां तक कहा कि वे गोरक्षा को देश की स्वतंत्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं। गांधीजी स्वतंत्रता का मूल्य कम आंकते थे- ऐसा नहीं। पर स्वतंत्रता के लिए जनता में भाव पैदा करने का साधन उन्होंने गोरक्षा को माना। यह बात गांधी जी के अनुयायियों ने भी इतनी महत्वपूर्ण समझी कि गोरक्षा को संविधान का हिस्सा बनाया। इसी तरह स्वतंत्रता के बाद सरदार पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की घोषणा की, केन्द्रीय मंत्रिमंडल की उस पर स्वीकृति ली जिसमें पं. नेहरू भी थे और मौलाना आजाद भी। मंदिर बना तो प्रथम दिन प्रतिष्ठापन पूजन राष्टÑपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने किया। चाहे गणेशोत्सव हो, गोरक्षा या सोमनाथ संकल्प- वे देश की राष्ट्रीयता को मजबूत करने के प्रयास थे। पर उन सभी पर सांप्रदायिकता के आरोप लगे। आज की पीढ़ी के लिए यह जानना अत्यंत विस्मयकारी होगा कि सरदार पटेल पर यहां तक आरोप लगाए गए थे कि उनका गांधी हत्याकांड में हाथ था। इसी तरह के घृणित आरोप आज वे लोग भाजपा पर लगा रहे हैं। जबकि हम यह रथयात्रा राष्ट्रवाद की पुन:प्रतिष्ठापना और मिथ्या सेकुलरवाद की समाप्ति हेतु कर रहे हैं। यह न तो सांप्रदायिक है, न ही मुसलमानों के विरुद्ध है। दुर्भाग्य से आज कोई सरदार पटेल नहीं है और हम वैचारिक रूप से अन्य सभी दलों के विपरीत खड़े हुए हैं।

अगर कुछ लोगों को इंटें, पत्थर, गारे का बना वह पुराना और कमजोर ढांचा इतना महत्वपूर्ण लगता है तो इसे वे दूसरे स्थान पर ले जाएं और हर वर्ग और मजहब के लोगों के सहयोग से वहां एक मंदिर का निर्माण करें तो यह मंदिर राष्ट्रीय एकता का इतना मजबूत केन्द्र बनेगा कि आने वाले समय में कोई इस एकता को तोड़ नहीं सकेगा।

 क्या आप मानते हैं कि यह सरकार मुसलमानों को भड़का रही है?
वोट-राजनीति के लिए मिथ्या से सेकुलरवादी मुसलमानों को भड़का रहे हैं। वरना मुझे विश्वास है कि यदि सरकार ने मुसलमानों के समक्ष वास्तविकता रखी होती तो मुसलमान सहर्ष राम मंदिर निर्माण हेतु सहयोग देते। पर सरकार ने न तो अदालती कार्यवाही में दिलचस्पी ली, न ही मुसलमानों को समझाया। बल्कि जान-बूझ-कर पूरा ध्यान मंदिर निर्माण करने वालों की ओर केन्द्रित कर दिया। ये नेतागण विशुद्ध वोट-राजनीति के लिए देश को आग में झोंक रहे हैं।

कुछ वर्ष पहले की ही बात है- विवेकानंद केन्द्र की ओर से कन्याकुमारी में शिला स्मारक बनाने का प्रस्ताव आया। उस समय आदरणीय एकनाथ जी रानाडे इस प्रस्ताव को लेकर भारत सरकार व राज्य सरकारों के पास गए। जिस शिला पर स्वामी विवेकानंद का स्मारक प्रस्तावित था, उसका स्वामित्व न तो रानाडे जी के पास था न ही किसी और के पास। केवल यह श्रद्धा थी कि इसी शिला पर स्वामी विवेकानंद ने एक समृद्ध महान भारत के स्वरूप की कल्पना की थी। इसी श्रद्धा को भारत सरकार ने माना और स्मारक बनवाने में पूरा सहयोग दिया। राम जन्मभूमि का मामला भी ऐसा ही है। यदि सरकार कहती है कि उस जमीन का स्वामित्व विश्व हिन्दू परिषद के पास नहीं है तो मैं कहता हूं कि उस भूमि का मालिक विश्वनाथ प्रताप सिंह या मुलायम सिंह भी नहीं हैं। वह जमीन है हिन्दुस्थान की जनता की, जो वहां मंदिर बनवाकर ही रुकेगी।

मैं विश्व हिन्दू परिषद को भी इस बात का श्रेय दूंगा कि उसने पूरे देश के वातावरण में एक असाधारण परिवर्तन ला दिया है। जब 1986 में अदालती आदेश से राम जन्मभूमि मंदिर के ताले खुले थे तो पूरे देश में मिथ्या सेकुलरवादियों ने शोर मचा दिया था।

वे कहते थे वहां मस्जिद की पुन:स्थापना करके ही दम लेंगे। एक बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बन गई, गणतंत्र दिवस के बहिष्कार तक की घोषणा हुई। पर आज उन्हीं की मानसिकता में इतना अधिक परिवर्तन आ गया है कि यहां तक सरकार भी यह जानने लगी है कि मंदिर तो बनेगा ही, मंदिर को बनना ही चाहिए पर वर्तमान ढांचा आप बचा लीजिए। हम इन बातों की गहराई में नहीं गए हैं। पर यह हिन्दू देश है। मैं उन लोगों को गलत मानता हूं जो कहते हैं कि भाजपा भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती है। मैं तो मानता हूं कि यह हिन्दू राष्ट्र है ही। यहां की परंपरा सर्वपंथ समभाव की है, सहिष्णुता की है। इसलिए अगर कुछ लोगों को र्इंटें, पत्थर, गारे का बना वह पुराना और कमजोर ढांचा इतना महत्वपूर्ण लगता है तो इसे वे दूसरे स्थान पर ले जाएं और हर वर्ग और मजहब के लोगों के सहयोग से वहां एक मंदिर का निर्माण करें तो यह मंदिर राष्ट्रीय एकता का इतना मजबूत केन्द्र बनेगा कि आने वाले समय में कोई इस एकता को तोड़ नहीं सकेगा।