इस ऐतिहासिक क्षण को पड़ाव मत समझना

    दिनांक 12-अगस्त-2020
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तुफैल चतुवेर्दी की फेसबुक वॉल से 
 
यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। तेरह सौ वर्षों से मेरी बैलेंस शीट फाइनल नोटिंग की प्रतीक्षा में है। मेरे हृदय में तेरह सौ वर्षों से अंगारे धधक रहे हैं। इसे इस एक छोटे से घाव की 500 वर्षों बाद सफाई से गंवा मत देना। यह अग्नि जलती रहनी चाहिए। प्रधानमंत्री आज के भाषण में सुहेल देव पासी का जिक्र संकेत है, दिशानिर्देश है, दीर्घ यात्रा के लिये पाथेय है। 

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राष्ट्र की अवधारणा, जो वेदों से नि:सृत होती है, को व्यष्टिवाचक मान लिया जाए तो उसकी कल्पना पुरुष के रूप में की जा सकती है। आज सारा राष्ट्र एक टक टीवी के सामने टकटकी लगाए बैठा था। अत: सारी बात व्यक्तिवाचक प्रथम पुरुष में।

मैं अर्थात राष्ट्र-पुरुष सैकड़ों वर्षों से आहत, लहूलुहान, पीड़ा से दहकता-सिसकता रहा। मेरी आंखें लहू रोती रहीं। अंगार बरसाती रहीं। मेरा हृदय जौहरों की ज्वाला को स्वयं में संजोये धधकता रहा। बड़ी कठिनाई से अवसर आया कि एक छोटे से घाव की 500 वर्षों बाद सफाई हुई है, औषधि लगी है। इस ऐतिहासिक क्षण को पड़ाव समझने की गलती मत कीजियेगा। मुझे तेरह सौ वर्षों का हिसाब लेना है।

तक्षशिला, नालन्दा के खंडर आज भी मुझे पुकारते हैं। असंख्य मंदिरों के तोड़े जाने का हिसाब शेष है। पैशाचिक बलात्कार की जातीं असंख्य स्त्रियों के आर्तनाद मेरे कानों में गूंजते हैं। तेरह सौ वर्षों से असंख्य जलते विद्यालयों, पुस्तकालयों का धुआं मेरी आंखों में जलन पैदा किये जा रहा है। तिलक लगाने, जनेऊ पहनने, शंख बजाने पर कोड़ों से छलनी हुआ मेरा बदन आज भी जल रहा है। मेरी संतानें मेरी गोद से छीन कर गुलाम बना ली गर्इं, उनकी आहत चीखें मेरे कानों में पिघले सीसे की तरह आज भी दहक रही हैं। मेरी छीनी गई धरती आज भी मुझे पुकारती है। गौ वंश की हत्या रोक न पा सकने वाला मैं आज भी नींद से चौंक-चौंक कर उठा जाता हूं। ठंडे पसीने में नहाया हुआ मेरा बदन तिलमिलाता रहता है।

यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है। तेरह सौ वर्षों से मेरी बैलेंस शीट फाइनल नोटिंग की प्रतीक्षा में है। मेरे हृदय में तेरह सौ वर्षों से अंगारे धधक रहे हैं। इसे इस एक छोटे से घाव की 500 वर्षों बाद सफाई से गंवा मत देना। यह अग्नि जलती रहनी चाहिए। प्रधानमंत्री आज के भाषण में सुहेल देव पासी का जिक्र संकेत है, दिशानिर्देश है, दीर्घ यात्रा के लिये पाथेय है। 

युग-युग से जिसे संजोये हूं बाप्पा के उर की ज्वाल हूं मैं
कासिम के सर पर बरसी वह दाहर की खड्ग विशाल हूं मैं

अस्सी घावों को तन पर ले जो लड़ता है वह शौर्य हूं मैं
सिल्यूकस को पददलित किया जिसने असि से वह मौर्य हूं मैं

कौटिल्यहृदय की अभिलाषा मैं चन्द्र गुप्त का चन्द्र्रहास
चमकौर दुर्ग पर चमका था उस वीर युगल का मैं विलास

रणमत्त शिवा ने किया कभी निश-दिन मेरा रक्ताभिषेक
गोविन्द, हकीकत राय सहित जिस पथ पर पग निकले अनेक

वो ज्वाल आज भी धधक रही है तो इसमें कैसा विस्मय
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय