‘हम यह सोच कर न बैठ जाएं कि काम पूरा हो गया’

    दिनांक 13-अगस्त-2020
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श्रीराम हमारी संस्कृति के आधार स्तंभ हैं। उनका जीवन और कर्म हमें बहुत कुछ सिखाता है। उनका व्यक्तित्व हमारे लिए प्ररेणास्रोत है, हमारे लिए एक आदर्श है। अयोध्या में रामजन्मभूमि पर श्रीराम मंदिर के निर्माण की नींव वास्तव में हमारे सांस्कृतिक पुनर्जागरण की स्थापना की शुरुआत है। अब यहां से हमें अपनी पौराणिक सांस्कृतिक विरासत को आगे ले जाना होगा। आने वाली पीढ़ी को अपनी पुरातन सभ्यता और संस्कृति से ही नहीं, 1,000 साल के संघर्ष काल के महानायकों की शौर्यगाथा से परिचित कराना होगा, जो अपनी मातृभूमि, अपनी सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा करते हुए बलिदान हो गए, लेकिन इसका उल्लेख कहीं नहीं किया गया। पाञ्चजन्य और शब्दउत्सव द्वारा 5 अगस्त को ‘सबके राम’ वेबिनार कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें इन सभी विषयों पर प्रख्यात लेखक और राजनयिक श्री अमीश त्रिपाठी, केंद्र्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री श्री प्रह्लाद सिंह पटेल से चर्चा की गई। इस कार्यक्रम का संचालन पाञ्चजन्य के संपादक श्री हितेश शंकर ने किया। उन्होंने अमीश त्रिपाठी और प्रह्लाद सिंह पटेल से सवाल भी पूछे। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय, स्तंभकार रतन शारदा और लोक गायिका मालिनी अवस्थी भी शामिल हुई
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केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) प्रह्लाद सिंह पटेल


समाज के 500 वर्षों के तप और संघर्ष के बाद यह क्षण आया है। अगाध आस्था और उस पर प्रबल आघात इस समाज ने देखे हैं। उन आघातों और संघर्ष के बाद आनंद के इस क्षण को आप कैसे अभिव्यक्त करेंगे?

अमीश त्रिपाठी:  अगर हम दिल पर हाथ रखकर ठीक से सोचें तो यह संघर्ष शायद 500 साल का नहीं, बल्कि 1000 साल से अधिक से चला आ रहा है। 5,000 वर्ष पूर्व कांस्य युग की शुरूआत हुई थी। कुछ सभ्यताएं और संस्कृतियां ही यह दावा कर सकती हैं कि उनकी शुरूआत 5,000 पूर्व हुई थी। उनमें से एक भारत देश है। मिस्र, जिसे प्राचीन काल में खेम कहा जाता था, गिलगमेश की मेसोपोटामिया, जोराष्ट्रीयन पर्सिया जैसी बाकी दूसरी प्राचीन सभ्यताएं नष्ट हो गईं और अब वह केवल संग्रहालयों में जिंदा हैं। आज मिस्र के प्राचीन देवता अमुन-रा को कोई नहीं मानता। इराक में तो गिलगमेश का नाम ही नहीं सुना होगा। जोराष्ट्रीयन पर्सिया की सभ्यता-संस्कृति तो भारत में जीवित है। पर्सिया और ईरान से तो सभी को भगा दिया गया। वहां सबकुछ ध्वस्त हो गया। भारत में रहने वाले पारसी उसी जोराष्ट्रीयन पर्सिया के वंशज हैं। दुनिया की प्राचीन सभ्यताएं मर गइं, सिर्फ हम जिंदा हैं। क्यों? हमारे ऊपर तुर्कों और यूरोपीय ने जो प्रहार किए, वह प्रहार दूसरों के ऊपर भी हुए। लेकिन जो दूसरी प्राचीन सभ्यताओं के पूर्वजों ने एक हद तक लड़ाई की, फिर हथियार डाल दिए। एक हमारे ही पूर्वज थे, जिन्होंने कभी हथियार नहीं डाले। वे लड़ते रहे। इसीलिए आज हजार साल बाद भी हम जिंदा हैं। लिहाजा यह लड़ाई 500 साल की नहीं, यह लड़ाई 1,000 साल की है।



मंदिर निर्माण में खुलकर सहयोग दें

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राम मंदिर का शिलान्यास हो गया और अब इस पर एक भव्य मंदिर बनना चाहिए। अब तक सरकार ने इसे सियासी मसला बना रखा था। अब मैं चाहता हूं कि मुस्लिम नेता राम मंदिर के निर्माण में खुलकर सहयोग दें। लेकिन एक बात का ध्यान रखा जाए कि किसी भी तरह से देश में कायम अमन व्यवस्था में बाधा न पहुंचे।
— अर्जन सिंह,  (सेनि) एयर चीफ मार्शल (पाञ्चजन्य, 19 नवंबर,1989)


राजा सुहैल देव आए, हरिहर राय, बुक्का राय आए। जब विजयनगर हार गया तो मराठा साम्राज्य आया। मराठे हार गए तो गुज्जर-प्रतिहार आए। इस तरह, जाट, राजपूत, अहोम भी लड़े, लेकिन हमने कभी हथियार नहीं डाले। आज मंदिर का पुनर्निर्माण हो रहा है, मैं इसे एक मुहिम का अंत नहीं मानूंगा। मैं यह कहूंगा कि हमारा 1,000 साल का संघर्ष वास्तव में पुनर्निर्माण का समय है। यह उसका पहला कदम है। ऐसा न हो कि हम यह सोच कर बैठ जाएं कि हम जीत गए और अब कुछ काम करने की जरूरत नहीं है। काम तो अब शुरू होगा। हमें फिर से राम राज्य स्थापित करना है। ऐसा देश बनाना है, ताकि स्वर्ग से देख रहे हमारे पूवर्जों को गर्व हो। उन्हें शर्म नहीं महसूस होना चाहिए। इसलिए इसे एक शुरूआत के रूप में देखा जाए। लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति को कैसे जीवित रखना है, इस पर विचार करना होगा। प्रख्यात लेखक राजीव मल्होत्रा कहते हैं, सबसे पहला काम यह है कि धार्मिक लोगों को धार्मिक कैसे बनाया जाए? कुछ हद तक तो हम खुद अपनी संस्कृति को भूल चुके हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली भी ऐसी थी। हमारी शिक्षा प्रणाली में रामायण-महाभारत तो पढ़ाया नहीं जाता। योग नहीं सिखाया जाता है। गणित में हमें पाइथागोरस और यूक्लिड के बारे में सिखाया जाता है। भास्कराचार्य और बोधायन के बारे में कुछ नहीं सिखाया जाता है। पाइथागोरस के 200 साल पहले बोधायन ने शुल्ब सूत्र के बारे में लिखा था। यूरोप में बच्चों को यह सब सिखाया जाता है, लेकिन भारत में नहीं।

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राजनयिक एवं प्रख्यात लेखक  अमीश त्रिपाठी


समाज सदियों से उद्वेलित था, जिसका आज समाधान हुआ है। आज हर जगह उत्साह है, हर जगह उत्सव मनाया जा रहा है। राम काज किन्हें बिनु मोहे कहां विश्राम की जो बात है, उसे पूरा करने के लिए भाजपा ने सौगंध ली, उस यात्रा में क्या राजनीतिक शिथिलता के भी कुछ पल थे?
प्रह्लाद सिंह पटेल- मुझे लगता है कि हमें उन बातों का उल्लेख करना चाहिए, जिसके लिए भारतमाता, उसकी संस्कृति दुनिया को संदेश देती रही है। इस नाते हमारी दुनिया में चर्चा नहीं हुई कि हम अपने संस्कारों के कारण अपनी जगह पर कायम थे और अपनी संस्कृति तथा अस्तित्व को बचाने को किसी भी बलिदान के लिए हमेशा तत्पर रहे। हजारों वर्ष का हमारा अपना संघर्ष था। लेकिन उसके साथ हमारी उदारता की चर्चा नहीं होती। दुनिया में पूजा की जितनी भी पद्धतियां हैं, दुनिया के किसी दूसरे देश ने उसे स्वीकार नहीं किया। दमन के बावजूद भी हमने शरण देने में संकोच नहीं किया। पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र की प्रयोगशाला की अगर कोई धरती थी, तो वह भारत की थी। मैं उस क्षेत्र से आता हूं, जिसे बुंदेलखंड या गोंडवाना कहा जाता है। 16वीं सदी के पहले रानी दुर्गावती के शहादत के पूर्व मुगल इस धरती पर पैर नहीं रख पाए। यह ऐसा क्षेत्र है, जहां मुगल बमुश्किल आ पाए, लेकिन लंबे समय तक टिक नहीं पाए। इसलिए लगता है कि यह 500 साल की लड़ाई है। लेकिन सच तो यह है कि संस्कृति पर जो हमले हुए वह हजार साल से भी पुराने हैं। इसी तरह, धर्म धारण करने के लिए होता है, उदाहरण के लिए नहीं। हम बातें करते हैं, ठीक है। लेकिन हमारा आचरण कैसा है? जो आज घटा है, वह हमारे स्वाभिमान की स्थापना है। हमारे आस्था की स्थापना है। हमारे अध्यात्म की स्थापना है। लेकिन साथ में हमें अपने आदर्श को भी रखना पड़ेगा कि राम क्या हैं, जो आज हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री ने कहा है। सत्य प्रताड़ित हो सकता है, लेकिन पराजित नहीं हो सकता। यह हमारी संस्कृति का मूल मंत्र रहा है। सत्य प्रस्तुति के लिए है, स्तुति के लिए नहीं। किसी के दरवाजे पर याचना करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम सत्य को प्रस्तुत कर रहे हैं। सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं है, परिणाम की आवश्यकता है। आज वह दिन है। आपने शिथिलता की बात कही, तो मैं यह कहना चाहता हूं कि मानव की यात्रा में बहुत से ठहराव आते हैं। उन पर आज चर्चा करना कि हम पराजय के शिकार हुए हैं। हमारा दमन हुआ है। हमने इस दृष्टि से नहीं देखा। जब मैं श्रीरामजन्मभूमि आंदोलन में शामिल हुआ था, उस समय मेरी उम्र 28-29 वर्ष थी और मैं संसद में चुनकर आ गया था। हमलोग बांदा जेल में थे। इसलिए 30-31 वर्ष तो मुझे इससे जुड़े हुए हो गए। ठहराव की बात तब आती है, जब हम इसे राजनीतिक चश्मे से देखते हैं। लेकिन जब कभी हम अपने मिशन और विचार आंदोलन के बारे में सोचते हैं तो मुझे कहीं ठहराव दिखता जैसा कि आज पूज्य सरसंघचालक जी ने कहा। पूर्व सरसंघचालक देवरस जी ने तो पहले ही कह दिया था कि 20-30 वर्षों तक हमें संघर्ष करना पड़ेगा। दूर बैठे लोगों को यह ठहराव लग सकता है, लेकिन जो लोग अंतर्मन के साथ इस आंदोलन से जुड़े हुए थे, जो संकल्प के धनी थे उनके मन में कभी ठहराव नहीं आया। बाहर से दिखना अलग बात है, लेकिन मुझे लगता है कि समुद्र की गहराइयों में जो तूफान था, वह कभी ठहरा नहीं। मुझे ऐसा नहीं लगता।

बने भव्य मंदिर
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राम मंदिर का शिलान्यास करके विश्व हिन्दू परिषद ने बहुत ही अच्छा काम किया है। सब इस बात से सहमत हैं कि बाबर इस देश में आक्रामक की हैसियत से आया था। शर्मनाक यह है कि वोटों की लालची सरकार आक्रामक बाबर से राम की तुलना कर रही है। अब जब राम मंदिर का शिलान्यास उक्त स्थान पर हो गया है तो वहां से ‘मस्जिद’ को हटा दिया जाना चाहिए। विश्व हिन्दू परिषद तथा इस देश की नई पीढ़ी से मैं अपेक्षा करता हूं कि उक्त स्थान पर एक ऐसे मंदिर का निर्माण करे जिसका तोड़ विश्व में दूसरा खोजने से भी न मिले।
— आचार्य क्षेमचन्द्र सुमन साहित्यकार  (पाञ्चजन्य, 19 नवंबर, 1989)


कोदंडधारी (कोदंड श्रीराम के धनुष का नाम) रामजी का जीवन शिक्षाओं का इंद्र्रधनुष है, वाद नहीं है। इससे इतर साहित्यकार अमीश के राम कैसे हैं?
अमीश त्रिपाठी- प्रभु श्रीराम के जीवन से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। उनका संयम, उनका धैर्य। हमने यह धारणा बना ली है कि अहिंसा परमो धर्म: यानी अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है और हम सबको उसका पालन करना चाहिए। मैं इसे नकार नहीं रहा हूं। अहिंसा हमारी परंपरा रही है। दुनिया का सबसे प्राचीन अहिंसावादी जैन धर्म भारत का ही है। महाभारत में यह लिखा भी है, लेकिन अन्यत्र यह भी लिखा है कि धर्म हिंसा तथैव च। अर्थात् अगर धर्म के लिए हिंसा की जरूरी है तो उसे करना पड़ेगा। प्रभु श्रीराम के जीवन और कर्म से हमें यह सीखना चाहिए। प्रभु श्रीराम के जीवन को अगर देखेंगे तो पाएंगे कि बातचीत और शांति से अगर मामला सुलझ सकता है, तो वह हरदम यह प्रयत्न करते थे। लेकिन यह भी सीखने की जरूरत है कि जब युद्ध अवश्यंभावी हो जाए तो युद्ध करना ही पड़ेगा। उनके जीवन में ऐसे कई उदाहरण हैं। शांति उसी इनसान को मिल सकती है, जिससे दूसरे थोड़ा डरते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी को थप्पड़ मारे और वह दूसरा गाल आगे कर दे तो लोगों को लगेगा कि यह तो कभी कुछ नहीं करेगा। मेरे हिसाब से पहला वार हमारा नहीं होना चाहिए। लेकिन अगर कोई थप्पड़ मारे तो हमें दूसरा गाल भी नहीं देना चाहिए, बल्कि मुक्का मारना चाहिए। प्रभु श्रीराम से हम यह भी सीख सकते हैं कि युद्ध धर्म के अनुसार हो। मैं लंदन में रहता हूं, लेकिन मूलरूप से काशी का हूं। यूपी-बिहार में एक लोक कथा बहुत प्रचलित है। कहते हैं कि जब रावण युद्ध भूमि में प्राण त्यागने वाले थे तो प्रभु श्रीराम ने प्रभु श्री लक्ष्मण से कहा था, ‘हां, रावण हमारा शत्रु होगा, लेकिन वह ज्ञानी है। उस पर मां सरस्वती की बहुत कृपा है।’ इसलिए उन्होंने प्रभु श्री लक्ष्मण से कहा कि वह रावण से जाकर कुछ सीखें। चूंकि वह सीखने जा रहे थे, इसलिए श्रीराम ने कहा कि वह रावण को पूरा सम्मान दें। प्रभु श्रीराम की उदारता देखिए, जिसमें वह अपने शत्रु से भी सीखने की मंशा रखते हैं। इसलिए यह संदेश पूरी दुनिया में जाना चाहिए कि हम शांतिप्रिय हैं, लेकिन कायर नहीं हैं।

आपकी लिखी पुस्तकें बहुत सौम्य होती हैं। राजा सुहेलदेव पर लिखा आपका उपन्यास बेहतरीन है। आप अगली कौन सी किताब लिख रहे हैं?
अमीश त्रिपाठी- लीजेंड आॅफ सुहेलदेव में ही मैंने एक संकेत दिया है। अगर शिवजी की कृपा रही तो मैं राजेंद्र चोल पर भी एक किताब लिखूंगा। हमारे देश में ऐसे बहुत से महान नायक और नायिकाएं हैं, जो इतिहास के पन्?नों से मिटा दिए गए। इन सब कहानियों को देश के समक्ष पेश किया जाए, इसके लिए प्रयास करूंगा। इसके अलावा, रामचरित शृंखला की चौथी किताब भी लिख रहा हूं। दक्षिण के इतिहास पर भी काम करूंगा।


सामाजिक जागरण का माध्यम
श्रीराम मंदिर सामाजिक जागरण का माध्यम बनेगा। राम नाम से महात्मा गांधी ने पूरे देश को एकसूत्र में बांधा था। मंदिर निर्माण पुन: देश को एकसूत्र में बांधेगा। हिन्दू संस्कृति और सम्मान की वापसी होगी। यहां से नैतिकता, मानवता और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना बलवती होगी।
— स्वामी चिन्मयानंद, परमार्थ आश्रम, हरिद्वार (पाञ्चजन्य, 19 नवंबर, 1989)


हमारी संस्कृति के जितने भी प्राचीन आधार हैं, जिन्हें देखकर हमें प्रेरणा मिलती है, उनकी हालत बहुत खस्ता है। इनके रखरखाव के लिए धन की कमी बताई जाती है, लेकिन मुगल स्मारकों के रखरखाव के लिए आगा खां ट्रस्ट को धन मिलता है। प्राचीन विरासतों की स्थिति सुधारने के लिए आपके पास क्या योजना है?
प्रह्लाद सिंह पटेल- दरअसल, आगा खां ट्रस्ट को पैसा पर्यटन मंत्रालय ने ही दिया है। संयोगवश पर्यटन मंत्रालय का प्रभार भी मेरे पास है, इसलिए यह जानकारी दे रहा हूं। मैं तुलना नहीं कर रहा, लेकिन एक वर्ष भीतर दो-तीन काम हुए हैं। जैसे पुराना किला, यहां सात वंशों के प्रमाण हैं। यहां के दस्तावेजों में आज भी उस स्थान का महाभारत कालीन नाम दर्ज है। अब हमें पौराणिक काल की ओर आगे बढ़ना है। यह सच है कि हमारे पास धरोहर के रूप में जो है, उसकी हम पूरी तरह से देखभाल नहीं कर पा रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सवेक्षण (एएसआई) के जो स्तंभ हैं चाहे बीआर मणि हों या केके मुहम्मद हों, इन लोगों ने रामजन्मभूमि के बारे में जो तथ्य दिए उस पर भरोसा करना चाहिए। अभी मैं ग्वालियर के बटेश्वर गया था, वहां 200 मंदिरों का संकुल है, केके मुहम्मद की देखरेख में इनमें से 85 मंदिर बन कर तैयार हो गए, लेकिन 2009 के बाद इस पर कोई काम नहीं हुआ। मैं राखीगढ़ी, लोथल और दूसरी जगहों पर भी गया। मुझे लगता है कि आप जो कह रहे हैं, वह कठिनाई कहीं न कहीं रही है। लेकिन दक्षिण को अलग नजरिये से देखना होगा। तमिलनाडु में मंदिरों के जो संस्थान हैं, उसके बारे में दूसरे तरह से सोचना होगा। एक बार मैंने उनसे कहा कि 1,000 साल पुराने मंदिर को एएसआई की सूची में डाल देते हैं तो इस पर बहुत बवाल खड़ा हो गया। मुझे लगता है कि यहां बेहतर समन्वय की जरूरत है।

एएसआई के स्मारक 3,692 से कभी बढ़े ही नहीं। 15 अगस्त के बाद इस पर काम शुरू होगा। हमारी बहुत स्पष्ट नीति है। 1,000 पहले हमारा इतिहास था, इस बात को स्वीकार करना पड़ेगा। 1,000 वर्ष पहले जो संघर्ष हुए, जिन्होंने देश की मिट्टी, सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए बलिदान दिए हैं, हमारी प्राथमिकता वही होनी चाहिए। इसमें किसी प्रकार का भ्रम नहीं है और न ही कोई प्रतिस्पर्धा है। यह सच्चाई है, लेकिन नई पीढ़ी को इसके बारे में पता ही नहीं है। मगर कोविड-19 ने बहुत सारी बातों का अहसास करा दिया है। हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धतियां, जो रोग से लड़ने का सामथ्य पैदा करती थीं, उनके प्रति अब सम्मान और विश्वास बढ़ा है। लोग हमारी जीवनशैली का मजाक उड़ाते थे। लेकिन तथ्य कोई नहीं बता पाता था। तथाकथित पढ़े-लिखे लोग कहते थे कि जूते पहन कर खाने में क्या दिक्कत है? अंत्येष्टि से आने के बाद नहाना क्यों जरूरी है? अब कोरोना वायरस के डर से चिकित्सक और तमाम लोग इसके बारे में बता रहे हैं तो लोग उसे स्वीकार भी कर रहे हैं। हमने नहीं कहा कि दुनिया नमस्ते करे। इसलिए मुझे लगता है कि कोरोना काल भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। संकल्प में विकल्प नहीं होता। यदि संकल्प में विकल्प ढूंढ़ा गया तो यह महाविनाशकारी हो जाएगा। हम तथ्यों के आधार पर आने वाली पीढ़ी को यह सब बताएंगे तो उन्होंने विश्वास होगा। मैं यह स्वीकार करता हूं कि अनेक प्राचीन स्थलों की उपेक्षा की गई है, लेकिन भविष्य में ऐसा नहीं होगा।

अमीश जी, आपने हिंसा और अहिंसा की बात की। लेकिन प्रभु श्रीराम तो हमेशा नीति और अहिंसा की बात करते थे। इसलिए धर्मयुद्ध में हिंसा और अहिंसा का सवाल बेमानी है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
अमीश त्रिपाठी- मैं जो कह रहा था, उसे आप रामायण या रामचरितमानस के संदर्भ में न देखें। इसे आज के माहौल के संदर्भ में देखें, क्योंकि हमें इतिहास में यह पढ़ाया जाता है कि हजार साल से हमारे पूर्वज हर लड़ाई लगातार हारते रहे और विदेशी आक्रांता एक के बाद एक लड़ाई जीतते रहे। हम हजार साल तक गुलाम थे। कई बार तो यह भी सिखाया जाता है कि यह सब इसलिए हुआ, क्योंकि हम अहिंसावादी हो गए थे। मैं अहिंसा के विचार को नकार नहीं रहा हूं, लेकिन हमारे पूर्वजों ने यही सिखाया है कि जब लड़ना है तो लड़ेंगे, पीछे नहीं हटेंगे। प्रभु श्रीराम के युद्ध का नजरिया अलग है। भगवान कृष्ण के युद्ध का नजरिया अलग है।

भारत में धार्मिक पुनर्जागरण की शुरूआत गोस्वामी तुलसीदास ने की। उन्होंने न केवल रामायण लिखी, बल्कि रामलीला को घर-घर तक पहुंचाया और हमारे मन में यह भावना बैठाई कि श्रीराम हमारे महानायक हैं। पहले स्कूलों में तुलसीदास के काव्य को पढ़ाया जाता था, लेकिन बाद में उसे धार्मिक पुस्तक बताते हुए एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम से निकाल दिया गया। क्या आप इस कुत्सित षड्यंत्र को समाप्त कर इसे फिर से पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रयास करेंगे?
प्रह्लाद सिंह पटेल- आपके प्रश्न का एक हिस्सा मेरे पास है, बाकी आपने जो कहा है वह शिक्षा मंत्रालय तक पहुंच जाएगा। हुमायूं के मकबरे में दारा की समाधि है, लेकिन दारा कौन थे? इसके बारे में उस समय के विद्वानों ने ज्यादा कुछ नहीं लिखा है। इसी तरह, रसखान, ताज बीबी, रहीम हैं। इसके लिए मैंने एक समिति गठित की थी। समिति की रिपोर्ट भी आ गई है और शायद एक सप्ताह के भीतर यह फैसला भी हो जाएगा कि मकबरे के पास दारा की समाधि कौन-सी है। वहां पर्यटन मंत्रालय की पहल पर एक भवन बन गया है, जिसे दारा को समर्पित किया गया है। मुगल शासन के दौरान दारा ने 27 उपनिषदों का उर्दू और फारसी में लिखा है। यह इतिहास का एक हिस्सा है, जिसे दबा कर रखा गया, जो कि नहीं होना चाहिए था। पूर्व में गलतियां हुई हैं, जिन्हें हम ठीक करेंगे।

खंडित  राष्ट्र का सम्मान वापस

मंदिर शिलान्यास के बाद उसके निर्माण से चार फायदे होंगे। एक, बाबर द्वारा मंदिर तोड़कर ‘मस्जिद’ बनाने से खंडित राष्ट्र का सम्मान वापस होगा। दो, हिन्दुओं और मुसलमानों में स्थाई भाईचारा कायम होगा। तीन, देश में हिन्दुत्व की लहर चलेगी और अंतत: हिन्दू राष्ट्र की स्थापना होगी।
— वीतराग संत वामदेव (पाञ्चजन्य, 19 नवंबर, 1989)


यह प्रश्न दोनों अतिथियों से है। रामजी ने एक सेतु बनाया था। एक सेतु संस्कृति बनाती है और एक सेतु साहित्य बनाता है। राजा सुहेलदेव की तरह भारतीय इतिहास के कई नायक हैं, उन्हें दुनिया के सामने कैसे प्रस्तुत किया जाना चाहिए? इसमें संस्कृति मंत्रालय कैसे सहयोग कर सकता है?
अमीश त्रिपाठी- मैं एक साहित्यकार हूं, एक कथाकार हूं। अगर कहानियों के माध्यम से भारतीय नायकों के बारे में बहुत समय लग जाएगा। एक हजार साल के दौरान हम पर क्या बीता, हम पर कितने आक्रमण हुए अगर उन महानायकों की कहानियों को अच्छी रोमांचक फिल्म के माध्यम से प्रस्तुत कर उसे भारत और दुनिया के सामने रखें तो अधिक फायदा होगा। इसलिए मैं सुहेलदेव पर एक फिल्म बनाने की कोशिश कर रहा हूं। इसके लिए मुंबई में मैंने एक प्रोडक्शन हाउस खोला है।
प्रह्लाद सिंह पटेल- मैं अमीश जी की बात से सहमत हूं। हमने फिल्म निमार्ताओं से बात की है कि हम एक महीने में स्मारकों, धरोहरों के बारे में पूरी जानकारी देंगे। हमारी बस एक शर्त है कि अगर वह दो धरोहरों पर फिल्म बनाते हैं तो दो स्थान हम भी देंगे, अपनी फिल्म में उसे एक-एक मिनट दिखा दीजिए। जब फिल्म में कोई चीज दिखाई जाती है तो स्वत: ही उसका प्रचार हो जाता है। पर्यटन मंत्रालय की प्रसार योजना का उद्देश्य मंदिरों के पुनरुद्धार और विश्वस्तरीय सुविधाएं देने के लिए है। पर्यटन मंत्रालय की दूसरी योजना है स्वदेश दर्शन जिसमें उन तमाम स्थानों के बीच जो खालीपन है, उसे पाटने की बात है। सिर्फ राम ही नहीं, राम पथगमन की बात भी करिए। बीते पांच वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जो काम हुए हैं उसमें राम सर्किट का निर्माण भी शामिल है। राम पथगमन में दक्षिण-पूर्व एशिया से लेकर दुनिया के तमाम देश आते हैं। उसमें रामसेतु भी आता है। रामसेतु को स्मारक के रूप में हम कैसे मान्यता दें, उसके भी रास्ते हैं। राम जहां-जहां गए, जिन उद्श्यों की पूर्ति के लिए गए उसके बारे में बताना हमारा कर्तव्य और संकल्प भी है।

यह प्रश्न भी दोनों अतिथियों से है। आज के इस क्षण की एक सांस्कृतिक और सामाजिक व्याख्या है। परंतु उसकी एक राजनीतिक टीका और आलोचनात्मक व्याख्या भी है। देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह माहौल बनाने की कोशिश हो रही है कि 2014 के बाद भारत में कट्टरता बढ़ रही है। लोगों ने हिन्दुत्व 2.0 जैसे शब्द गढ़ लिए हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?
अमीश त्रिवेदी- देखिए, हमारे खिलाफ थोड़ा पक्षपातपूर्ण तो है। पश्चिम सहित दूसरे देशों में जाकर भारतीय खुद अपनी संस्कृति को गाली देते थे। विदेशियों से दोगुनी आलोचना भारतवासी खुद करते थे। उन्हें इसकी आदत पड़ गई थी। अब चीजें थोड़ी बदल रही हैं। अगर उनकी आलोचना ठीक है तो हम मानने को तैयार हैं, लेकिन अगर गलत है तो हम अपना पक्ष रखते हैं। उनसे कहते हैं कि आप जो कह रहे हैं वह सत्य नहीं है। जिन्होंने 70 साल तक उनके आगे सिर झुकाए रखा और वही सिर उठा रहे हैं तो जाहिर है उन्हें यह पसंद नहीं आएगा। यह सब धीरे-धीरे बदलेगा। इसमें 15-20 साल लगेंगे। हम अपनी बात पर डटे रहेंगे, पीछे नहीं हटेंगे। हमें धैर्य और शांति से काम करना है। पक्षपात केवल मीडिया और अकादमिक स्तर पर है। बाहर के देशों में आम लोगों से बात करने पर आप पाएंगे कि भारत के प्रति उनके मन में प्रेम है। योग, गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी के कारण वह भारत को सकारात्मक दृष्टि से देखते हैं। ऐसा नहीं है कि हर कोई हमारी आलोचना कर रहा है या घृणा की नजर से देख रहा है।
प्रह्लाद सिंह पटेल- हीन भावना हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों में थी। उनके पास जबाव नहीं था। मैं तीन-चार उदाहरण देता हूं। दुनिया का इतिहास और एएसआई कहती थी कि धौलावीरा के वास्तुशिल्प का निर्माण पश्चिम में हुआ। धौलावीरा के उत्खनन में पता चला कि इसका निर्माण भारत में हुआ और दुनिया का इतिहास बदल गया। इसी तरह, राखीगढ़ी में इस बात का प्रमाण है कि सबसे पहले सभ्यता यहीं पनपी। इस पर दुनिया में बहस छिड़ गई है। दूसरी तरफ, हमारे एएसआई के अधिकारी अंकोरवाट जाकर वहां मंदिर की मरम्मत कर सकते हैं तो कोणार्क मंदिर की मरम्मत क्यों नहीं हो सकती? सबको मालूम है कि पुरी के सामने जो स्तंभ है, कोणार्क सूर्य मंदिर का है। मैं अमीश जी की एक बात से सहमत नहीं हूं कि बदलाव में 15-20 साल लगेंगे।
पर्यटन मंत्री होने के नाते मैं आश्वस्त हूं कि जिस दिन सामान्य परिस्थिति बनेगी रेंगते हुए शुरू करेंगे, लेकिन जब हम दौड़ेंगे तो शायद एल बन जाएगा। इतिहास पल भर में बदलता है। इसलिए हमें इतिहास बदलने की नहीं, बल्कि जानने की बात करनी चाहिए। इसके लिए इतिहास को सही दिखा में रखना होगा। जब सरकार ने ही कह दिया कि पाठ्यक्रमों में हमारे वैज्ञानिकों की बात नहीं होगी, हमारे अनुसंधान की बात नहीं होगी, लेकिन बाहर की बात होगी।