मुसलमानों ने ही खोली कारवां की कलई

    दिनांक 13-अगस्त-2020   
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उत्तरपूर्वी दिल्ली के सुभाष मोहल्ले की जिस गली में रिपोर्टिंग करने के दौरान कारवां के पत्रकार वहां के हिंदुओं पर मारपीट का आरोप लगा रहे हैं उस गली के मुसलमान ही उनकी कलई खोल रहे हैं। वह बता रहे हैं कि उन्होंने वहां आकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश की और तथ्यों को गलत ढंग से प्रस्तुत किया

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सुभाष मोहल्ले की इसी गली में लोगों ने किया था विरोध, माहौल न बिगड़े इसलिए सभी लोगों ने मिलकर गेट बंद कर दिया है।
11 अगस्त को दिल्ली दरबार रोड पर सुभाष मोहल्ले की गली नंबर 2 में कारवां पत्रिका के तीन पत्रकार रिपोर्टिंग करने जाते हैं। वहां रहने वाले स्थानीय लोगों से उनकी गलत तथ्य प्रस्तुत करने को लेकर बहस होती है। यहां गौर करने वाली बात है स्थानीय लोगों में हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग हैं। स्थानीय लोगों के फोन करने के बाद वहां पुलिस आ जाती है। इसके बाद तमाम सेकुलर मीडिया एकजुट होकर अभियान चलाने लगता है कि वे पत्रकार वहां दिल्ली हिंसा से संबंधित खबरों के सिलसिले में रिपोर्टिंग करने गए थे। हिंदुओं ने उन्हें घेर लिया, उनके साथ मारपीट की। महिला पत्रकार के साथ अभद्रता की। उन्हें सांप्रदायिक गालियां दीं। देखते ही देखते वामपंथी लॉबी ने दिल्ली प्रेस क्लब में इस संबंध में प्रेस कांफ्रेंस भी कर डाली जिसमें दोषियों पर एफआईआर करने की मांग की गई है, लेकिन क्या वास्तव में कहानी कुछ ऐसी ही थी जैसी बताई गई।
 आइए इस कहानी पर आगे बढ़ने से पहले इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को थोड़ा जान लेते हैं। जहां यह घटना हुई, उस गली में तकरीबन 18 घर हिंदुओं के हैं और 7 घर मुसलमानों के। उससे जुड़ती हुई एक और गली है जो पूरी गली मुस्लिम बहुल है। फरवरी में उत्तरपूर्वी दिल्ली में जब दंगे भड़के तो इस क्षेत्र में तनाव था लेकिन बाकी क्षेत्रों जैसी स्थिति नहीं थी। क्षेत्र में लगभग 45 प्रतिशत मुसलमान हैं और 55 हिंदू हैं।
सुभाष मोहल्ले की इसी गली में रहने वाले पंकज जैन का कहना है कि पांच अगस्त को अयोध्या में हुए भूमिपूजन के बाद पूरे देश में खुशियां मनाई गईं। श्री राम प्रभु के मंदिर के पुर्ननिर्माण की खुशी ​हर हिंदू के मन में थी। हिंदुओं ने अपने घर के बाहर दीए जलाए, भगवा झंडा लगाए तो इसमें गलत क्या है ? सभी खुश थे। अचानक पांच दिन बाद एक महिला समेत तीन लोग वहां पहुंचते हैं, और गली के बा​हर से कैमरे का शॉट बनाना शुरू करते हैं।  दिल्ली में फरवरी में हुए दंगों के बाद से लगातार इस क्षेत्र में विभिन्न मीडिया संस्थानों की टीम आती रहती हैं इसलिए किसी को कोई ताज्जुब भी नहीं हुआ। सभी ने सोचा पत्रकार हैं अपना काम कर रहे होंगे।
इस बीच एक पत्रकार कैमरे के सामने आकर रिकार्डिंग करता है कि और कहता है कि देखिए यह वह गली है जहां मुसलमानों को दबाया जा रहा है। आप देख सकते हैं यहां हर घर के बाहर भगवा झंडा लगा हुआ है। मुसलमान यहां से अपने मकान बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं। उन्हें डराया जा रहा है, धमकाया जा रहा है। इस तरह की बातें सुनकर वहां लोगों ने उन्हें टोका कि यहां ऐसा कुछ नहीं हैं, चाहें तो आप गली में रहने वाले मुस्लिम परिवारों से बात कर लें। यहां सभी मिलजुल कर रहते हैं। इस पर स्वयं को पत्रकार बताते हुए उनमें से एक ने धौंस जमानी शुरू कर दी। उनके साथ आई महिला पत्रकार चिल्लाने लगी। इस बीच शोर सुनकर वहां लोग एकत्रित होने लगे। मोहल्ले के मुसलमानों ने भी उन्हें समझाने की कोशिश की लेकिन वे नहीं माने।
गली में रहने वाली रवि तिवारी का कहना है कि शोर सुनकर उनकी पत्नी अनीता तिवारी नीचे उतर कर आई तो स्वयं को पत्रकार बताने वाली वह महिला उनके घर का फ्रेम बनाकर यह बोलते हुए रिकॉर्डिंग करने लगी कि यह देखिए यह हिंदुओं के नेता हैं। हमें रिपोर्टिंग नहीं करने दी जा रही है। लोगों ने उन्हें समझाने की कोशिश कि तो तीनों ने स्थानीय लोगों के साथ धक्का—मुक्की शुरू कर दी। उस वक्त घरों में महिलाएं ज्यादा थी। ज्यादातर पुरुष अपने काम धंधों पर गए हुए थे। महिलाओं से उनकी काफी बहस हुई।
भजनपुरा थाना क्षेत्र में स्थित सुभाष मोहल्ले की इसी में रहने वाले फखरुद्दीन यहां 16 बरसों से रह रहे हैं। वह बताते हैं कि कुछ लोग यहां आए थे। खुद को पत्रकार बता रहे थे। जब उनसे आईडी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दिखाने से मना कर दिया। वह यहां का माहौल बिगाड़कर हिंदू मुसलमान करवाना चाह रहे थे। हम यहां बरसों से रह रहे हैं। यहां सभी प्यार से रहते हैं यहां ऐसा कुछ नहीं है। यहां सभी मिलजुल कर रहते हैं।
इस गली में रहने वाले नियाज मोहम्मद बताते हैं कि हम यहां 25 बरसों से रह रहे हैं। हिंदू और मुसलमान दोनों मिलजुल कर रहते हैं। कभी किसी तरह की कोई लड़ाई यहां नहीं हुई। सभी बहुत शांति से रहते हैं। यहां कुछ मीडिया वाले आए थे और यहां का माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे। जब उन्हें रोका गया तो उन्होंने लोगों ने बहस की।
स्थानीय निवासी कुलदीप बताते हैं कि जब माहौल बिगड़ने लगा तो लोगों ने पुलिस को फोन कर दिया। कुछ ही देर में वहां पुलिस पहुुंच गई। इस बीच न तो कोई मारपीट हुई न लोगों ने उन तीनों को कुछ कहा। हां इतना जरूर हुआ कि लोगों ने रिकॉर्डिंग करने मना कर दिया क्योंकि वह बेकार की बातें बोलकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस वहां पहुंची और तीनों पत्रकारों को अपने साथ थाने लेकर चली गई। पुलिस के आते ही उन्होंने अनर्गल आरोप लगाने शुरू कर दिए। स्थानीय लोग भी थाने पहुंच गए। थाने में खुद को कारवां का पत्रकार बताने वाले पत्रकारों की तरफ भी शिकायत दी गई और स्थानीय लोगों ने भी अपनी शिकायत पुलिस को लिखकर दी। इसके बाद मीडिया में एक ​तरफा खबरें आनी शुरू हो गई। किसी ने खबर चलाई कि मस्जिद पर भगवा झंडा फहराने की खबर सुनकर रिपोर्ट करने गए पत्रकारों से मारपीट। किसी ने खबर चलाई कि महिला पत्रकार से अभद्रता की गई। पत्रकारों को बंधक बनाया गया, जबकि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं।
इस गली में रहने वाली महिला पिंकी देवी कहती हैं कि वे तीनों खुद को पत्रकार बता रहे थे। यहां हिंदू—मुसलमान कर रहे थे। जबकि यहां ऐसा कुछ नहीं है। वे मकानों की वीडियो बना रहे थे। उल्टी सीधी बातें कर रहे थे। जब उन्हें रोका गया तो उन्होंने बदतमीजी की और लड़ाई करने लगे।
अब कारवां के पत्रकारों की बात करते हैं। आरोप है कि कारवां के पत्रकार शाहिद तांत्रे, प्रभजीत सिंह और एक महिला पत्रकार करीब डेढ़ घंटे तक भीड़ से घिरे रहे. उन पर सांप्रदायिक टिप्पणी की गई, धमकाया गया। महिला पत्रकार का कहना है कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया। वहीं स्थानीय लोगों का कहना है​ कि ऐसा कुछ नहीं हुआ उन्होंने ही पुलिस को फोन करके मामले की जानकारी दी। सबसे पहला सवाल तो यहां यह ही उठता है कि यदि कोई पत्रकारों के साथ मारपीट करेगा तो वह खुद पुलिस को कॉल क्यों क्यूं करेगा ? दूसरा सवाल उठता है कि जबकि उत्तरपूर्वी दिल्ली में हुए दंगों को पांच महीने बीत चुके हैं तो राममंदिर भूमिपूजन के बाद वहां जाकर इस तरह की रिपोर्टिंग करना जिससे लोगों की भावनाएं आहत हों क्या यह एजेंडा पत्रकारिता नहीं है ? तीसरा सवाल यह उठता है कि यदि स्थानीय लोग उसमें हिंदू और मुसलमान दोनों उन पत्रकारों से गलत तथ्य प्रस्तुत न करने की बात बोल रहे थे तो क्या उन्हें उनकी बात नहीं सुननी चाहिए थी ? लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जैसे ही मामले ने तूल पकड़ा वामपंथी बिग्रेड सक्रिय हो गई और दिल्ली प्रेस क्लब में इस संबंध में प्रेस कांफ्रेस कर डाली। जिस तरह से मामले को मीडिया में प्रस्तुत किया जा रहा है वह किसी साजिश की तरफ इशारा करता है।